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मछलियाँ, जो विलुप्त होने की कगार पर है |
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पर्यावरण
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शनिवार , , 29 सितम्बर |
Team Tarakash
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मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए हमेशा के प्रकृति के साथ खिलवाड़ करता आया है. कभी अपनी क्षुदा पूर्ति के लिए और कभी महज मौज़ के लिए वह वन्यजीवों का हनन करता आया है. मनुष्य के इस कृत्य की वजह से कई जानवरों के नामो निशान हमेशा के लिए मिट गए. और कई अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं. वैसे नाम शेष रह गए जानवरों मे हमेशा शेर, बाघ, पांडा आदि जानवरों के नाम आते हैं क्योंकि उनकी गणना की जा सकती है, लेकिन समुद्र मे रहती मछलियाँ हमेशा ध्यान से बाहर हो जाती हैं.
आज लगातार हो रहे शिकार की वजह से कई प्रकार की मछलियों का अस्तित्व भारत और विशेष कर गुजरात के समुद्रतट पर नष्ट होने की कगार तक आ पहुँचा है. एक अनुमान के मुताबिक भारत के 9 लाख से अधिक मछुआरे हर वर्ष 30 लाख टन मछलियाँ पकडते हैं. भारत के समुद्रतट पर मछलियों का अस्तित्व बना रहे इसलिए हर वर्ष 22 लाख टन से अधिक मछलियों का शिकार नही होना चाहिए लेकिन आज उससे कहीं अधिक हो रहा है.
अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही मछलियों की कुछ प्रजातियाँ निम्नलिखित हैं:
हारिया (Halibut) : यह मछली 1.5 मिटर लंबी होती है, और वजन लगभग 200 किलो तक होता है. यह मछली, मांसाहारी लोगों मे विशेष रूप से पसंद की जाती है. गुजरात के समुद्र तट पर इस मछली का अस्तित्व सन 2003 के बाद नदारद है. भारत के बाकी समुद्रतट पर भी हालात कुछ खास अच्छे नही है.
पापलेट (Pomfret) : इस प्रजाति की मछली की लम्बाई 90 से.मि. होती है. रेस्त्रां और होटलों मे यह मछली पहली पसंद होती है. इसकी घटती आबादी के मद्देनज़र मछुआरे इसके व्यस्क होने और प्रजनन क्षमता हासिल करने से पहले ही इसका शिकार करने लगे, इससे इस मछली का अस्तित्व तेजी से खत्म हो रहा है.
पालवा (Hilsa) : हिल्सा या पालवा मछली मुम्बई और दिल्ली के मछली बाजारों मे अधिक लोकप्रिय है. इसलिए इस मछली का इतने व्यापक पैमाने पर सहार हुआ कि गुजरात के तट से तो यह मछली 2002 से हीगायब हो चुकी है. और भारत के बाकी बचे समुद्र तटों जहाँ पर यह पहले पाई जाती थी, वहाँ भी नष्ट होने के कगार पर है.
गांधिया (Mullet) : म्युलेट प्रकार की मछली की लगभग 100 जितनी प्रजातियाँ है. इनके बेलगाम शिकार की वजह से आज इन मछलियों का अस्तित्व सिर्फ 10% रह गया है.
ट्युना (Tuna) : ट्युना मछली प्रवासी जीव होती है. यह मछली जब प्रवास कर रही होती है तब इसे 1500 फीट लम्बे Purse Seine नाम से जाने जाते जाल से पकड़ा जाता है. इसलिए एक साथ बडी संख्या मे इनका शिकार होता है. माना जा रहा है कि आजकल यह मछली भाग्य से ही दिखती है. इसका अस्तित्व लगभग खत्म हो चुका है.
हमारे पास इस तरह की कुछेक मछलियों के ही विवरण उपलब्ध हैं, लेकिन वास्तव में इसके अलावा अन्य कई प्रजातियों की मछलियाँ या तो खत्म हो चुकी है अथवा खत्म होने की कगार पर है.
सरकार मत्स्य उद्योग को बढावा देती है. देश के लाखों लोगों के लिए रोजगार का एकमात्र विकल्प मछलियाँ पकड़ना ही है. इसलिए इस उद्योग को मछली बचाने के लिए बंद करना या कम करना संभव भी नही दिखता, लेकिन जो मछलियाँ विलुप्त होने वाली हैं उन्हे बचाने के लिए कोई ठोस योजना बनाना बहुत जरूरी हो गया है. नही तो एक दिन ऐसा आएगा जब हमारे समुद्र तट पर गिनी चुनी मछलियाँ ही दिखेगी.
आज यह दिवास्वप्न लग सकता है लेकिन क्या किसी ने कभी सोचा था कि शेर और बाघों का अस्तित्व भी खत्म हो सकता है!
(आंकडे और तथ्य साभार: सफारी पत्रिका)
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