|
धर्म एवं मान्यताएँ
|
|
मंगलवार , , 08 मई |
|
संजय बेंगाणी
|
एक बार फिर जैन संस्कारों पर बहस हो रही है. इस बार मुद्दा बाल दीक्षा है. इससे पूर्व संथारे पर मैने अपने विचार रखे थे की कैसे संथारा आत्महत्या से भिन्न है.
जन्म से जैन होने के नाते जैन संस्कारों से परिचित हूँ, इस नाते काफी कुछ है जो कह सकता हूँ. बाल दीक्षा भी उन में से एक है.
हमारे यहाँ बच्चे के स्कूल जाने की उम्र तय है, विवाह की उम्र तय है मगर दीक्षा की उम्र तय नहीं है. इसके कारण जो मुझे नजर आते है, वे हैं एक तो इसकी जरूरत ही महसूस नहीं की गई. जैसे स्कूल जाने की उम्र पहले तय नहीं थी. फिर समय के साथ बच्चों का बचपन छीना जाने लगा. माँ-बाप पैदा होने से पहले ही बच्चे को स्कूल भेजने को उतावले होने लगे तब इसकी एक उम्र तय करनी पड़ी. दूसरा कारण है, धार्मिक मामलो में दखल देने से बचने का यत्न. मगर सती प्रथा या ऐसी ही बुराईयों के विरुद्ध कानून बन सकता है तो बाल दीक्षा के विरूद्ध क्यों नहीं.
चुंकि आज ऐसा कोई कानून नहीं है इसलिए बाल दीक्षा भी अपराध नहीं है. मगर क्या बच्चो को दीक्षित करना सही है? शायद नहीं.अब देखें बाल दीक्षा दी क्यों जाती है.
तर्क यह दिया जाता है की चुंकि मुमुक्षू (जो दीक्षा लेने का इच्छुक है) को एक दिन दीक्षित होना ही है तो क्यों न उसे बचपन में ही दीक्षित कर दिया जाय, इससे वह उसी माहौल में बड़ा होने की वजह से धार्मिक रिवाजो को आत्मसात कर सकेगा.
वैसे तो जैन धर्म अपने तमाम शांति-अहिंसा के दावो के बावजुद अनेक पंथो(शाखाओ) में बटा हुआ है.
इनमें मेरा परिचय तेरापंथ शाखा से ही ज्यादा रहा है. देखा गया है की तेरापंथ में सामान्यतः महिला मुमुक्षू को बाल दीक्षा नहीं दी जाती. उन्हे अच्छी तरह से शिक्षित करने के बाद ही दीक्षा दी जाती है. वहीं पुरूष मुमुक्षू को ज्यादा समय न देते हुए दीक्षित कर दिया जाता है. कारण शायद यह होता है की महिलाएं पुरुषों के मुकाबले ज्यादा आस्थावान होती है. एक बार बालिग होने पर शायद पुरूष स्त्री के मुकाबले दीक्षा लेना कम पसन्द करे. ऐसे में बचपन में ही दीक्षित कर देना सही लगता है. धर्मसंघ को जीवित रखने के लिए यह अनिवार्य जान पड़ता है.
एक जैनमूनि का जीवन अत्यंत कष्टपूर्ण होता है, अतः नादानी में कोई बालक दीक्षित न हो इसका समाज जतन करे, अन्यथा कानून बने.
|
|