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संजय बेंगाणी द�?वारा
यहा�? जो भी लिखा हैं वह संथारे के समर�?थन में या विरोध में नहीं लिखा हैं, मात�?र इस विषय पर सही जानकारी देने की कोशीश की हैं।
क�?या हैं संथारा?
संथारे का सरल अर�?थ हैं अन�?न-जल का त�?याग कर इच�?छा-मृत�?य�? का वरण करना। इसमे मूल भावना मृत�?य�? का भय तथा जीने के मोह को त�?यागना हैं। कोई भी व�?यक�?ति जिसे लगता हैं की उसके सारे उत�?तरदायित�?व पूरे हो ग�? हैं तथा अब उसे अपने कर�?म-बन�?धनो से म�?क�?त हो जाना चाहि�?, वह स�?वेच�?छा से परिवार तथा धर�?मग�?रू की अन�?मति ले कर मोक�?ष की कामना करते ह�?�? संथारा ले सकता हैं। अम�?मन वे व�?यक�?ति जिनकी मृत�?य�? तय होती हैं, तथा वैद (अब डोक�?टर) भी ईलाज को व�?यर�?थ मानने लगते हैं, संथारा ले लेते हैं।
भगवान महावीर सहित सभी तिर�?थंकरो ने संथारा लिया था, अधिकतर जैनाचार�?य भी संथारा ले कर मृत�?य�? का वरण करते हैं।
�?क चेनल ने इसे ईश�?वर के साथ मिलन का उपकर�?म बताया, जबकी जैन दर�?शन ईश�?वर के अस�?तित�?व को ही नहीं स�?वीकारत। यह मोक�?ष के लि�? लिया जाता हैं।
क�?या हैं मोक�?ष?
भारत में जन�?मे सभी धर�?मो की मान�?यता हैं की शरीर मरता हैं आत�?मा नहीं। आत�?मा न�? न�? शरीरों को धारण कर बार बार जन�?म लेती हैं, यह काष�?टकारी हैं। न�? जन�?म के साथ जीने के लि�? न�? कर�?म बन�?धनो में बन�?धना पड़ता हैं, इन�?ही बन�?धनो के कारण मृत�?य�? उपरांत फिर जन�?म लेना पड़ता हैं। अन�?य प�?राणी के रूप में जन�?म लेने पर इस बात की सम�? नहीं होती और बार बार जन�?म लेते हैं मरते हैं, पर मन�?ष�?य के रूप में हमारे पास इस बात की सम�? हैं, अतः हम इस चक�?र से म�?क�?त हो सकते हैं, जिसे मोक�?ष कहा जाता हैं।
संथारे तथा आत�?महत�?या में अंतर:
आत�?महत�?या करने के पीछे मन में द�?वेष का भाव होता हैं या फिर घोर निराशा। �?सा हो सकता हैं अवसर मिलने पर व�?यक�?ति आत�?महत�?या का इरादा त�?याग दे तथा अपने कृत�?य पर पछतावा भी हो। जबकि संथारे में तत�?काल मृत�?य�? नहीं होती यानी सोचने सम�?ने तथा अपने उठा�? कदम पर प�?नर�?विचार करने का पर�?याप�?त समय होता है। संथारे में जीवन से निराशा तथा किसी भी प�?रकार के द�?वेष का कोई स�?थान नहीं होता। इसलि�? इसे आत�?महत�?या से अलग माना जाना चाहि�?। संथारा की त�?लना सति प�?रथा से करना भी गलत हैं, संथारा लेना हिन�?दू धर�?म के समाधि ले कर मृत�?य�? को प�?राप�?त होने जैसा है। शिवाजी महाराज के ग�?रूजी ने तथा रामदेव पीर ने समाधि ली थी। सीताजी ने भी समाधि ली थी।
मेरा निजि मत हैं की धर�?म में दखल न मानते ह�?�? इस विषय पर व�?यापक चर�?चा होनी चाहि�?। अगर हम चाहते हैं की सभी का जीवन स�?खद हो तो हमें सभी के लि�? स�?खद मृत�?य�? की कामना भी करनी चाहि�?।
(मेरी परदादीजी ने भी संथारा लिया था, मेरे पिताजी की मौसीजी ने भी संथारा लिया था. और जो विमलादेवी चर�?चा में हैं वे भी मेरी दूर की रिश�?तेदार हैं.)
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Paras Shah.
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