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जैन धर�?म की संथारा प�?रथा, कितनी उचित?
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 3
बेकारअति उत्तम 
धर्म एवं मान्यताएँ
रविवार , , 24 सितम्बर

  संजय बेंगाणी द�?वारा


यहा�? जो भी लिखा हैं वह संथारे के समर�?थन में या विरोध में नहीं लिखा हैं, मात�?र इस विषय पर सही जानकारी देने की कोशीश की हैं।

 

क�?या हैं संथारा?

संथारे का सरल अर�?थ हैं अन�?न-जल का त�?याग कर इच�?छा-मृत�?य�? का वरण करना। इसमे मूल भावना मृत�?य�? का भय तथा जीने के मोह को त�?यागना हैं। कोई भी व�?यक�?ति जिसे लगता हैं की उसके सारे उत�?तरदायित�?व पूरे हो ग�? हैं तथा अब उसे अपने कर�?म-बन�?धनो से म�?क�?त हो जाना चाहि�?, वह स�?वेच�?छा से परिवार तथा धर�?मग�?रू की अन�?मति ले कर मोक�?ष की कामना करते ह�?�? संथारा ले सकता हैं। अम�?मन वे व�?यक�?ति जिनकी मृत�?य�? तय होती हैं, तथा वैद (अब डोक�?टर) भी ईलाज को व�?यर�?थ मानने लगते हैंसंथारा ले लेते हैं।

 

भगवान महावीर सहित सभी तिर�?थंकरो ने संथारा लिया था, अधिकतर जैनाचार�?य भी संथारा ले कर मृत�?य�? का वरण करते हैं।

�?क चेनल ने इसे ईश�?वर के साथ मिलन का उपकर�?म बताया, जबकी जैन दर�?शन ईश�?वर के अस�?तित�?व को ही नहीं स�?वीकारत। यह मोक�?ष के लि�? लिया जाता हैं।

क�?या हैं मोक�?ष?

भारत में जन�?मे सभी धर�?मो की मान�?यता हैं की शरीर मरता हैं आत�?मा नहीं। आत�?मा न�? न�? शरीरों को धारण कर बार बार जन�?म लेती हैं, यह काष�?टकारी हैं। न�? जन�?म के साथ जीने के लि�? न�? कर�?म बन�?धनो में बन�?धना पड़ता हैं, इन�?ही बन�?धनो के कारण मृत�?य�? उपरांत फिर जन�?म लेना पड़ता हैं। अन�?य प�?राणी के रूप में जन�?म लेने पर इस बात की सम�? नहीं होती और बार बार जन�?म लेते हैं मरते हैं, पर मन�?ष�?य के रूप में हमारे पास इस बात की सम�? हैं, अतः हम इस चक�?र से म�?क�?त हो सकते हैं, जिसे मोक�?ष कहा जाता हैं।

 

संथारे तथा आत�?महत�?या में अंतर:

आत�?महत�?या करने के पीछे मन में द�?वेष का भाव होता हैं या फिर घोर निराशा। �?सा हो सकता हैं अवसर मिलने पर व�?यक�?ति आत�?महत�?या का इरादा त�?याग दे तथा अपने कृत�?य पर पछतावा भी हो। जबकि संथारे में तत�?काल मृत�?य�? नहीं होती यानी सोचने सम�?ने तथा अपने उठा�? कदम पर प�?नर�?विचार करने का पर�?याप�?त समय होता है। संथारे में जीवन से निराशा तथा किसी भी प�?रकार के द�?वेष का कोई स�?थान नहीं होता। इसलि�? इसे आत�?महत�?या से अलग माना जाना चाहि�?। संथारा की त�?लना सति प�?रथा से करना भी गलत हैं, संथारा लेना हिन�?दू धर�?म के समाधि ले कर मृत�?य�? को प�?राप�?त होने जैसा है। शिवाजी महाराज के ग�?रूजी ने तथा रामदेव पीर ने समाधि ली थी। सीताजी ने भी समाधि ली थी।

मेरा निजि मत हैं की धर�?म में दखल न मानते ह�?�? इस विषय पर व�?यापक चर�?चा होनी चाहि�?। अगर हम चाहते हैं की सभी का जीवन स�?खद हो तो हमें सभी के लि�? स�?खद मृत�?य�? की कामना भी करनी चाहि�?।

 

(मेरी परदादीजी ने भी संथारा लिया था, मेरे पिताजी की मौसीजी ने भी संथारा लिया था. और जो विमलादेवी चर�?चा में हैं वे भी मेरी दूर की रिश�?तेदार हैं.)

 

टिप्पणियाँ (7)add
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द्वारा प्रेषित Paras Shah , सितम्बर 24, 2006
I agree with this post. smilies/smiley.gif

Paras Shah.
http://imparas.blogspot.com
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जैन धर?म की
द्वारा प्रेषित नीरज दीवान , सितम्बर 24, 2006
भई, संथारे पर विश?लेषण तो रोचक बन पड़ा है. उस चैनलवाले को जानकारी का अभाव है. मेरा निजी विचार यह है कि मृत?य? परम सत?य है, आपके लेख में दो बातें अति महत?वपूर?ण हैं-

पहला, इसमे मूल भावना मृत?य? का भय तथा जीने के मोह को त?यागना हैं।
और दूसरा, कोई भी व?यक?ति जिसे लगता हैं की उसके सारे उत?तरदायित?व पूरे हो ग? हैं तथा अब उसे अपने कर?म-बन?धनो से म?क?त हो जाना चाहि?.

अब यूथेनेसिया, आत?महत?या और संथारे में अंतर स?पष?ट होना चाहि?. मेरी चिंता यह भी है कि जिन ब?ज़?र?गों की देखभाल करने में घरवाले आनाकानी करते हैं या उन?हें संथारे के लि? द?ष?प?रेरित करते हैं.. उस पर भी विचार होना चाहि?. यही चिंता का विषय है. हाईकोर?ट ने इसे ही ध?यान में रखकर नोटिस भेजा है. इस पर चर?चा की जानी चाहि?. संजय भाई इसी विषय पर आगे प?रकाश अवश?य डालें और सती तथा संथारे के अंतर को भी स?पष?ट करें.

यूथेनेसिया को अब तक सैकड़ों देशों में मान?यता नहीं मिल सकी है. सती पर भारत में क़ानूनन पाबंदी है. आत?महत?या भारतीय दंड संहिता में ३०९ के अंतर?गत दंडनीय अपराध है तो संथारे में ?सा क?या है जो इसे महिमामंडित किया जाता है. बहस जारी है..

neerajdiwan.wordpress.com
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संथारा प?र
द्वारा प्रेषित स?नील , सितम्बर 24, 2006
संजय जी, संथारे जैसी बात म??े स?वयं अपने लि? सही लगती है पर इसके ख?ले प?रचारण की बात हो तो जो सवाल नीरज ने उठाया है, यानि अनचाहे वृद?धों को जबरदस?ती संथारे की ओर द?ष?प?रेषित करना, उसकी चिंता होती है. यही डर यूथेनेसिया के साथ लगता है.
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संथारा
द्वारा प्रेषित ratna , सितम्बर 25, 2006
सही कह रहे है मैंने कई वृद?धों को मौत के लि? तरसते देखा है।
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द्वारा प्रेषित Ashish , सितम्बर 28, 2006
Bahut se log maante hain ki sati karke moksha milta he. Sati main bhi sochane ka time hota he (jo apani marji se sati hoti he we pati ki maut ke pahale hi soch kar rakhati he). Sati main bhi koi hatered, ill will nahi hota, sirf prem hota he. Fir sati aur santhare main kya antar hai, krapaya bataane ka krisht karen. (sorry for hinglish)
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santhara
द्वारा प्रेषित sanjay bafna , अक्टूबर 17, 2006
[img=aapk lekh sahi aur sampurna hei,santhare ka virodh vahi kara rahe hei jo jain dharma ko aatmasata nahi kar paye hei ya jain nahi hei.ise samajhne k liye jain dhrma ki samajh honi chahiye.dhanyavad
sanjay bafna,mumbai
:arrow: [url=www.bafnawadi.com
]]www.bafnawadi.com
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santhara
द्वारा प्रेषित sureshgoyal , जुलाई 19, 2007
jab manusya jatil or la ilaj bimario se ghir jata ha or savacha se apna jeewan ka tiag karna chata ha to isme kisi parkar ki koi burai nhai dekhni chaia yhai sanhara ka dharmik rup ha bhartya risi munio ne ak suvavstha ka nirman kia
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