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मंतव्य

जब चाहा, जो लिखा

पद्मश्री विनोद दुआ साहब, क्या आपने यह सुना था?

शनिवार दोपहर 1.30 के करीब जब मैं सभी समाचार चैनलों को एक के बाद एक बदल रहा था, तब थोडी देर के लिए ज़ी न्यूज़ पर रूका क्योंकि वहाँ नरीमन हाउस के पास खडे लोगों से बातचीत की जा रही थी.

एंकर ने लोगों से पूछ कि वे 2 दिन से वहीं खडे एन.एस.जी. की कार्रवाही देख रहे हैं तो उन्हे कैसा लग रहा है? मैने देखा भीड के पीछे से एक बुजुर्ग बाहर आया और उसने अपना नाम बताया जिससे पता चला कि वह मुस्लिम है.

उस बुजुर्ग ने कहा कि, सरहद पार के लोग हमें बाँटना चाहते हैं लेकिन हम बँटेंगे नहीं साथ जीएँ है और साथ मरेंगे. फिर उस नेकदिल इंसान ने "भारत माता की जय" और "वन्दे मातरम" के नारे लगाए.

मुझे गुरूवार की रात एनडीटीवी पर श्री विनोद दुआ का शो याद आ गया. वे बता रहे थे कि ट्राइडेंट होटल में एन.एस.जी. के आने पर लोगों ने "भारत माता की जय" के नारे लगाए. श्री विनोद दुआ बार बार कह रहे थे, एक खास मजहब के नारे लगा रहे हैं लोग... दूसरे मजहब के क्यों नहीं... ना जाने कितनी बार उन्होनें यह कहा.

अब वे ही यह तय करें "भारतमाता की जय" कौन से मजहब का नारा है? वे कृपया यह भी सोचें कि "इंडिया को कौन तोड रहा है?"

एनडीटीवी की फूटेज तो उनके पास होगी ही, ज़ी न्यूज की वे प्राप्त कर देख लें.

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क्या गुजरात का एक भी शहर महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं!

नेटवर्क 18 समूह की समाचार साइट IBNlive.com, एक सर्वेक्षण करा रही है, जिसमें लोगों से पूछा जा रहा है कि भारत का कौन सा शहर महिलाओं के लिए सबसे अधिक सुरक्षित है?

लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि गुजरात के एक भी शहर को इस सूचि मे शामिल नही किया गया है.

गौरतलब है कि गुजरात के शहर अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा, राजकोट आदि महिलाओं के लिए हमेशा से सुरक्षित माने जाते रहे हैं. इन शहरों का सूचि मे ही ना होना और दिल्ली का होना, इस पोल की निष्पक्षता पर सवाल खडे करता है.

कुछ लोगों ने भी टिप्पणी देकर इस पर आश्चर्य व्यक्त किया. मैने भी दो बार टिप्पणी दी, लेकिन मेरी टिप्पणियाँ अभी तक प्रकाशित नहीं की गई है.

कुछ मीडिया चैनलों और उनकी साइटों का गुजरात के प्रति विषम दृष्टिकोण हमेशा से दिखता आया है. इससे पहले भी गुजरात चुनाव के समय मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मीडिया के कुछ हलके स्वर उठाते रहे थे और अनर्गल प्रचार भी करते रहे थे, लेकिन हकीकत यही है मोदी ना केवल जीते बल्कि भारी बहुमत से जीते.

इससे यही सिद्ध होता है कि हमारी मीडिया को जमीनी हकीकत की कोई जानकारी ही नही है.

क्या दंगे यहीं हुए है और भारत के अन्य किसी स्थान पर नहीं हुए हैं. यदि नहीं तो क्या पूरे देश को असुरक्षित समझा जा सकता है?

हमारी टीम ने यहाँ कई लोगों से इस बाबत पूछा तो सभी ने आश्चर्य व्यक्त किया कि गुजरात का एक भी शहर सूचि मे नही है.

श्री माणेकभाई शाह ने कहा कि, खबरी चैनल और विशेषकर आईबीएन का गुजरात के प्रति भेदभाव जगजाहिर है. लेकिन ऐसा करके वे मात्र सस्ती लोकप्रियता ही हासिल कर सकते हैं और कुछ नहीं.

यहाँ के जुहापुरा (मुस्लिम बहुल) इलाके के श्री जावेद फार्रूकी के अनुसार, अहमदाबाद मे महिलाएँ सबसे अधिक सुरक्षित हैं और मुसलमान भी. यह तो खबरी चैनल हैं, जिन्हे मात्र सनसनी फैलानी ही अच्छी लगती है.

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याद आया आज़मगढ

उत्तरप्रदेश का आज़मगढ सुर्खियों मे है और कुछ उत्साही मीडियाकर्मी इस शहर या प्रदेश को आज़मगढ की बजाय आतंकगढ कह रहे हैं.

इसके लिए भले ही इन मीडियाकर्मियों की भ्रत्सना हो रही है, लेकिन वे उतने गलत भी नहीं है. मुझे लगता है कि आजमगढ आज से नहीं काफी पहले से ही आतंकगढ बना हुआ है.

आज से कोई 15-16 साल पहले जब मैं छोटा था तक हमारी एक पडोसी (हिन्दू) हुआ करती थीं जिनका बचपन आजमगढ में गुजरा था. वे वहाँ की बातें बताया करती थी, कि किस तरह वे लोग डर डर कर रहते हैं. आजमगढ में हर समय खौफ का माहौल रहता है. बाजार में से निकलने मे डर लगता है. और लडकियों के लिए तो वहाँ जीना एकदम दूभर है.

आज इतने साल बाद ये बातें फिर से याद आई है क्योंकि आजमगढ आतंकवादियों का केन्द्र बताया जा रहा है और इंडियन मुजाहिद्दीन के पकडे गए लगभग हर आतंकवादी की जन्मभूमि/कर्मभूमि रहा है.

पिछले दिनों दिल्ली ब्लास्ट से संबंधित खबर पर दी गई प्रतिक्रियाओं को पढते समय एक व्यक्ति की टिप्पणी की तरह ध्यान गया जो आजमगढ से है. उन्होने बताया कि कैसे यहाँ पीसीओ जाल फैला हुआ है और विदेश से पैसा मंगाया जा रहा है. हवाला का एक बहुत बडा नेटवर्क स्थापित है.

सच वही जान जा सकता है जो वहाँ रहा हो अथवा रह रहा हो. मैं कभी आज़मगढ गया नहीं इसलिए सिर्फ सुनी सुनाई बातें ही लिख सकता हूँ. लेकिन मुझे यकीन है कि सबकुछ यदि गलत नही है तो सबकुछ सही भी नही है.

कुछ लोगों को लगता है कि उन्हे सताया जा रहा है, उन्हे यह समझना होगा कि पीडित तो हम सभी हैं. पूरा देश है.

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सोचता हुँ अब फिर से टहला जाए

आजकल मुझे अपने दिल की बडी चिंता लगी रहती है. नहीं कहीं लगा तो नही है, और चांस भी नही है क्योंकि हम तो लगवाने के लिए चाहे कितने भी लालायित क्यों ना हो, पर कोई “रिसिवर” भी तो होना चाहिए.

दिल की चिंता स्वास्थ्य संबंधी है. सोचता हुँ कहीं कोलेस्ट्रोल बढ तो नही रहा है. डरता हुँ कहीं बुढापे में परेशानी ना खडी हो. कोलेस्ट्रोल की तो छोडिए, अभी एक नया टेंशन और मिल गया है. वह यह कि बुढापे मे याददास्त कमजोर होने के चांस बढ गए हैं.

फिर यह खबर पढी, तो सोचा कि अब पैदल चलना फिर शुरू करना चाहिए. पहले सुबह मॉर्निंग वॉक करने जाता था. पर फिर बंद कर दिया. कुछ आलस भी था, कुछ “मोटीव” भी जाता रहा. मोटीव यह कि – गर्मियों की छुट्टियाँ खत्म होने के बाद से छुट्टियाँ मनाने आई पास पडोस की लडकियाँ घर वापस चली गई, वे वॉक करने आती थी तो जी लगा रहता था.

लेकिन अब लगता है वॉकिंग फिर से शुरू करनी पडेगी और नया “मोटीव” ढुंढना पडेगा. स्वास्थ्य डरा तो सकता है पर “मोटीव” नहीं बन पा रहा. लेकिन कुछ तो करना पडेगा.

Nobody can go back and start a new beginning, but anyone can start today and make a new ending - - Maria Robinson

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स्वतंत्रता के मायने

देश की स्वतंत्रता को 61 वर्ष हो गए हैं. आज हम अपने आप से यह सवाल पूछ सकते हैं कि क्या हमने स्वतंत्रता के अर्थ को पहचाना है?

क्या विरोध दर्ज करने के लिए हिंसक आंदोलन करने के लिए हम स्वतंत्र है?
क्या कुछ हजार वोट के लिए आम जनता की भावनाओं से खेलने को हम स्वतंत्र हैं?
क्या ऑलम्पिक मे खिलाडियों से अधिक अधिकारियों और उनके परिवार वालों को ले जाने के लिए हम स्वतंत्र हैं?

आखिरी हमारे लिए स्वतंत्रता के मायने क्या हैं?



उपरोक्त सवाल हमने तरकश पर चर्चा में विभाग में पूछे हैं. आप भी इस चर्चा मे भाग ले सकते हैं.

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ऑह फादर व्हाट एन आइडिया!

आप किसी भी फिल्म में देख लीजिए. यदि स्कूल दिखानी हो तो 99.99% सम्भावना है कि वह किसी फादर अथवा सिस्टर (पढें मिशनरी) की होगी. बीते जमाने के इचक दाना बिचक दाना को भूल जाइए, नया जमाना फादर्स का है.

और यदि सिनेमा को जिंदगी का आइना माना जाए तो इससे यही सिद्ध होता है कि भारत में यदि स्कूले हैं तो बस ईसाई मिशनरियों की हैं वरना नहीं है. स्कूल हो तो फादर की वरना ना हो!

और हमारे सिनेमा और विज्ञापन जगत के लोगों के आइडियाज़ तो देखिए, एक से बढकर एक हैं. यकीन ना हों तो आइडिया सेल्यूलर का नया विज्ञापन केम्पेन देख लें. अभिषेक बच्चन “फादर” इस बात से दुखी हो जाते हैं कि एक ग्रामीण की बेटी को “शहरी” प्राध्यापक स्कूल मे दाखिला नहीं देता. तो अब इसका क्या ईलाज किया जाए?

बच्चों को अंग्रेजी तो पढानी ही है कैसे भी करके. तो फादर एक अनोखा आइडिया निकालते हैं. मोबाइल पढाई का ऐसा नायाब तरीका जिसमे ना ब्लेकबॉर्ड की जरूरत होगी, ना शिक्षक की, ना वर्ग की, ना कमरे की, ना धूप की, ना छाँव की. जरूरत होगी आइडिया की. बस मोबाइल लगाओ शिक्षा पाओ.

और फिर अपने दादाजी को “ऑह गोड थेंक्स फोर द फूड’ सिखाओ. मुझे आश्चर्य है बजरंगियों ने यह विज्ञापन कैसे नहीं देखा और देखा तो अब तक हुडदंग कैसे नहीं मचाया.

खैर, इस मुहिम के अंत मे होगा यह कि “हो हो हो.. हो हो हो..’ करते हमारे देश के भविष्य, एक जवान फादर की बदौलत मोबाइल शिक्षित हो जाएँगे और अंग्रेजी में रास्ता बताएँगे, और ‘ऑह गोड थेंक्स फोर द फूड” गाएँगे.

पता नहीं कौन किसका विज्ञापन कर रहा है.

सचमुच, व्हाट एन आइडिया सर जी!

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अस्पताल, धमाका, मौतें और सफेद प्रिंस सूट

26 जुलाई 2008, अहमदाबाद.

शहर में कुछ ही देर पहले धमाके शुरू हुए हैं. अफरा तफरी के बीच लोग सिविल अस्पताल पहुँच रहे हैं. इनमें से अधिकतर धमाकों के शिकार हैं, और इसके अलावा स्वयंसेवी हैं, जो चिकित्सकों की मदद करना चाहते हैं.

ट्रोमा वार्ड के बाहर 108 नम्बरी एम्बूलेंसों की लाइन लगी है. घायलों की संख्या बढती जा रही है. एक अखबार का छायाकार अभी वहाँ पहुँचता है और सोच रहा है कि अपनी बाइक कहाँ खडी करे. दूसरा एक पत्रकार ट्रोमा वार्ड के अंदर घायलों को देख रहा है.

एक घायल को चोटें तो कम लगी है लेकिन वह बहरा हो चुका है. एक अन्य को यह होश नहीं है कि उसके शरीर से खून निकल रहा है. वह इतना डरा हुआ है बोल नहीं सकता.

ट्रोमा सेंटर की सफेद टाइलें गंदी हो रही हैं. वहाँ एक लाश पडी है, जिसके पास ज्योत्सनाबेन खडी हैं. ज्योत्सनाबेन पत्रकार को बताती हैं कि यह आदमी अभी जिंदा था, एक नर्स उसके लिए पलंग खाली करने गई और वह मर गया. पत्रकार उससे पूछता है कि वह कौन से धमाके का शिकार है, हाटकेश्वर के या नारोल के?
छायाकार को पार्किंग की जगह नहीं मिलती. वह सोचता है कि उसे बाइक सडक पर पार्क कर देनी चाहिए. जब वह अपनी बाइक को सडक पर पार्क कर रहा होता है, तभी एक तेज धमाका होता है.
पार्किंग में खडी वेगन आर कार ध्वस्त हो गई है. और उसके साथ ही यह धारणा भी ध्वस्त हुई है कि आतंकवादी अस्पतालों मे हमला नहीं करेंगे.

छायाकार धमाके से मात्र 20 फूट दूर है. जब वह होश मे आता है तब इस बात पर राहत की सांस लेता है कि वह सही समय पर बाहर निकल आया था.

ट्रोमा सेंटर के अंदर मौजूद पत्रकार धक्का लगने से नीचे गिर गया था. वह बच गया है. लेकिन उनके साथ खडी ज्योत्सनाबेन के शरीर में छर्रे घूस गए हैं. वे नहीं रहीं. ट्रोमा सेंटर की सफेद टाईलें अब लाल हैं.

30 लोग मारे गए हैं. ज्यादातर स्वयंसेवी थे, जो घायलों की मदद करने आए थे.

छोटा रोहन व्यास भी नहीं रहा, वह अपने पिता और भाई के साथ आया था. उसके भाई यश व्यास का शरीर बुरी तरह से जल रहा है और वह अपने पिता को ढूंढ रहा है. लेकिन उसे नहीं पता कि उसके पिता अब नहीं रहे.

10 मिनट बाद एक और धमाका होना बाकी है.


गृहमंत्री शिवराज पाटिल के लिए, जिन्हे सिविल अस्पताल के ट्रोमा वार्ड के अंदर घायलों से मिलने जाते समय इस बात की अधिक चिंता थी कि बरसाती पानी में उनका झक सफेद प्रिंस सूट कहीं गंदा ना हो जाए.

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