| कौन थी मेडम तुसाड? |
| इतिहास | |
| गुरुवार , , 15 मार्च | |
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मैडम तुसाड संग्रहालय दूनिया भर में प्रसिद्ध है. लेकिन मैडम तुसाड कौन थी, इस बारे मे बहुत कम जानकारी हिन्दी मे उपलब्ध है. प्रस्तुत लेख मे यह जानकारी दी गई है.
मेरी गोज़ोल्स को पूरा यकीन था कि अब किसी भी वक्त उसका भी शिरच्छेद कर दिया जाएगा. फ्रांस की मशहूर क्रांति अपनी सफलता के अंतिम चरण में थी. लुई सोलहवें को क्रांतिकारीयों ने उसके पूरे परिवार के साथ मौत के घाट उतार दिया था.
मेरी गोज़ोल्स उस दिन को कोस रही थी, जिस दिन उसने मोम की मुर्तियाँ बनाना सिखा था. क्योंकि इसी विधा की वजह से वह आज मौत के मुहाने पर खड़ी थी.
मेरी की इंतजार की घडीयाँ तब खत्म होती है जब कुछ क्रांतिकारी उस कोठरी के पास आते हैं, तथा मेरी को उसकी माँ के साथ रिहा कर देते हैं. मेरी के आश्चर्य के बीच वे उससे कहते हैं तुम इसलिए बची हुई हो क्योंकि तुम्हें मोम की मुर्तियाँ बनाने में महारत हासिल है. हम चाहते हैं कि अब तुम मुर्दा क्रांतिकारीयों के लिए डेथ मास्क बनाओ.
मेरी की जान बच जाती है. कुछ समय पहले तक जिस विधा को वह कोस रही होती है, वही विधा उसकी जान बचाने का निमित्त बनता है.
मेरी गोज़ोल्स का जन्म सन 1761 में स्ट्रासबर्ग (Strasbourg) में हुआ था. उसके पिता एक सिपाही थे जो उसके जन्म के दो महीने पहले मशहूर सेवन डेज वार में मारे गए थे. उसके पिता के देहांत के बाद उसकी माँ ने डॉ. फिलिप कर्टियस (Dr. Philippe Curtius) जो कि एक मशहूर चिकित्सक थे, के घर काम करना शुरू किया. डॉ. कर्टियस को मोम की मुर्तियाँ बनाने में महारत हासिल थी. उस समय के चिकित्सा केंद्रों में मानव अंगों के अध्ययन के लिए मोम की प्रति-कृतियों का प्रयोग किया जाता था, तथा इस प्रकार के मोम निर्मित अंगों की भारी मांग थी. इसके अलावा मोम की मूर्तियों की मांग स्थानीय चर्च तथा ऊँचे तबके के लोगों में भी थी, जो अपने शारीरिक विकार को मोम के अंगों से ढका करते थे.
कुछ समय पश्चात किसी मित्र के कहने पर डॉ. कर्टियस ने अमीर लोगों के लिए संपूर्ण आदम कद मुर्तियाँ बनानी शुरू की. उन्होने अपनी मुर्गियों को सलोन डे सायर (Salon de Cire) के नाम से प्रदर्शित करना शुरू किया, जिसको लोगों ने हाथों हाथ लिया.
मेरी ने अपना सबसे पहला पोट्रेट फ्रेंकोइस मेरे अरोटॅ (Francois Marie Arouet de Voltaire) नामक अति धनाढ्य व्यक्ति का बनाया. इसके अलावा उसने बेंजामिन फ्रेंकलिन का भी पोट्रेट बनाया था.
डॉ. कर्टियस की लोकप्रियता एवं सम्पर्कों की वजह से फ्रांस के राजमहल के साथ उनके मधुर सम्बन्ध थे. इसका फायदा मेरी गोज़ोल्स को भी मिला और उसे लुई सोलहवें की बहन का निजी शिक्षक नियुक्त किया गया. मेरी गोज़ोल्स का काम राजघराने की बेटी को मुर्तिकला में पारंगत करना था. राजघराने से निकटता तथा लुई सोलवहें के साथ उसके अच्छे संम्बधों की वजह से ही मेरी गोज़ोल्स को भी फ्रेंच क्रांति के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया था. पर मोम मुर्तिकला की जानकारी ने उसके प्राणों की रक्षा कर ली थी.
सन 1794 में डॉ. कर्टियस का देहांत हुआ. डॉ. कर्टियस ने जाने से पहले अपना सारा कार्य तथा संग्रह मेरी के नाम कर दिया था.
सन 1795 में मेरी ने एक इंजिनियर फ्रेंकोइस तुसाड (François Tussaud) से विवाह किया और इस तरह मेरी गोज़ोल्स, मेडम मेरी तुसाड के नाम से जानी जाने लगी.
सन 1835 में लन्दन की बेकर स्ट्रीट में मेडम तुसाड ने पहली बार अपना स्थायी स्टुडियो खोला. इस स्टुडियो अथवा संग्रहालय का मुख्य आकर्षण था, चेम्बर ऑफ होरर (Chamber of Horrors) जिसमें फ्रेंच क्रांति के दौरान मारे गए लोगों की मुर्तियों के अलावा अन्य कई नामि गिरामी अपराधीयों की कृतियाँ प्रदर्शित की जाती थी.
सन 1884 में मेडम तुसाड संग्रहालय का स्थान परिवर्तन हुआ और वह मेरिलबोन रोड पर खोला गया, जहाँ वह आज भी विद्यमान है.
मेडम तुसाड ने सन 1842 में अपना खुद का पोट्रेट बनाया जो आज लन्दन के मेडम तुसाड संग्रहालय के मुख्य द्वार पर आगतुकों का स्वागत करता है.
मेडम तुसाड का निधन सन 1850 में हुआ था. अपनी 90 वर्ष की दिर्घायु में मेडम तुसाड ने अनेक चुनोतीयों का डटकर मुकाबला किया. उन्होने अपने जीवन में वो स्थान हासिल किया जो बहुत कम लोग कर पाते हैं.
मेडम तुसाड संग्रहालय आज लन्दन के मुख्य पर्यटन स्थलों में से एक है. इतने वर्षों में इस संग्रहालय ने अनेक विपदाओं का सामना किया है. सन 1925 में लगी भीषण आग की वजह से लगभग सभी मुर्तियाँ पिघल गई थी. लेकिन सौभाग्य से मोल्ड बच गए थे, जिनके आधार पर मूर्तियों को फिर से बनाया गया. इसी तरह द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लन्दन पर हुई भारी बमवर्षा के दौरान भी मेडम तुसाड संग्रहालय को भारी नुकसान हुआ था और लगभग 325 मुर्तियाँ सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो गई थी.
लेकिन मेडम तुसाड संग्रहालय आज भी लोगों के बीच मेडम तुसाड की यादों को जीवित रखे हुए है. लन्दन के अलावा इस समय इसकी शाखाएँ एमस्टरडम, लास वेगास, न्यु योर्क, होंगकोंग और शंघाई में भी है. मुम्बई तथा होलीवुड में इसकी शाखाएँ खुलेंगी ऐसी खबरें हैं.
शाहरूख़ को यह नसीब नहीं होता अगर फ्रांसिस क्रांतिकारीयों ने मेडम तुसाड को छोड नहीं दिया होता.. शाहरूख़ भाग्यशाली हैं और मेडम तुसाड के करोड़ों प्रशंसक भी..
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टिप्पणियाँ
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i love reading sp.those articles that give knowledge.never prefer to leave any of ur article unread..u have good flair of writing..pl.continue ur mission of sharing information...thank you
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आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।
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काफ़ी दीनो से इस विषय के बारे मै जानने की इच्छा थी। बहुत ही अच्छा प्रयास था। report abuse
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