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नि:शब्द सही मायने में ऐसी फिल्म है जो, बिना कुछ भी कहे बहुत कुछ कह जाती है। यह फिल्म सिर्फ उन दर्शकों के लिये हैं जो परिपक्व, समझदार, खुले दिमाग व आधुनिक विचारधारा के हैं। बहुत सारे सवाल हमारे दिमाग में बार बार आते रहते हैं, जिनके जवाब हमारे पास नही होते हैं। ढ़ूँढ़ने पर भी नहीं मिलते। यह फिल्म ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब बडी मासुमियत से चुपचाप दे जाती है।
इस फिल्म मे चाय बागान के कई रमणीय दृश्य फ़िल्माए गये हैं। हरी-भरी वादियाँ, पेड-पौधे, जंगल, चाय के बागान और इनसे उपर आसमान में कहीं कहीं छितराए बादल ये सब मिल कर एक दिलकश नज़ारा बनाते है। मैं इसे अमित रॉय की सिनेमाटोग्राफी का कमाल मानता हूँ । कैमरे का अद्भुत प्रयोग किया है। फिल्म की शुरुआत से लेकर आखिर तक, कैमरे का संचालन बहुत ही उम्दा हुआ है। चाहे अंदर के शॉट हो, या बाहर के नज़ारे, फिल्माने के अंदाज़ की प्रशंसा किये बगैर आप रह नही पाएंगे।
हर बार की तरह, इस बार भी अमर मोहील का पार्श्व संगीत बहुत ही बढिया है। दृश्य के साथ ध्वनि का तालमेल इतना अच्छा है, कि आप कब फिल्म के अंदर उतर कर इसका हिस्सा बन जाते हैं, आपको पता ही नहीं चलता।
इस फिल्म में गिने-चुने कलाकार ही हैं, मगर वे भी कमाल कर जाते है। अमिताभ का तो नाम ही काफी है, मेरे विचार से वे अपनी इस भूमिका को लम्बे अरसे तक याद रखेंगे। इस फिल्म में उनकी हर चाल, हर अदा, बहुत कुछ कह रही है। उनकी चुप्पी, उनके सवांद से ज्यादा बोल रही थी। उनके चेहरे के भाव, आँखें, आँसू (जो कई जगह पर मुझे असली लगे), बोडी लेंगवेज ... तुलनाहीन हैं। लेकिन यहां फिर से हम केमेरा के करतब को नज़रअंदाज़ नही कर सकते। जिस तरह से इन भावों को लेंस में कैद किया गया है, वह लाजवाब है। अमिताभ की हर फिल्म के तरह, इस फिल्म में भी छाये हुए रहे हैं, लेकिन बाकी कलाकार भी अपनी मौजूदगी का अहसास कराते हैं।
चलिए बात करते हैं रामुजी कि नई खोज की – जीयाह! हांलाकि यह जीयाह की पहली फिल्म है, लेकिन उसकी अदाकारी देखकर यह कोई नही कह सकता। ऐसा लगता ही नहीं कि वो अभिनय कर रही है है, बल्कि ऐसा लगता है मानो, वह इन सब घटनाओं से वास्तव में गुज़र रही हो। मानो लाईव दर्शाया जा रहा हो। बाकी कलाकार – रेवति, श्रद्धा, नासिर, आफताब, अपनी अपनी भूमिका के साथ न्याय करते हैं.
यह सच है कि निःशब्द एक लाजवाब कृति है, लेकिन कोई भी कार्य सर्वगुण सम्पन्न नही हो सकता। इस फिल्म में भी कुछ ग़लतियाँ हैं। उम्र की गणित देखते हैं। विजय (अमिताभ) 60 साल के हैं और शादी के 27 साल हो चुके हैं। शादी के समय, उनकी उम्र 33 की रही होगी। इतनी ज्यादा उमर में शादी? क्यों? अगर जीयाह 18 साल की है, तो रितु (फिल्म में अमिताभ की बेटी) भी लगभग वही उम्र की होगी, क्योंकि दोनो हम उम्र दोस्त दिखाए गए हैं। अर्थात शादी के 9 साल बाद 37/38 साल के उम्र में अमृता (रेवति) को बच्चा पैदा होता है (अगर यह मान लिया जाए कि विजय और अमृता के बीच 5 साल का अंतर है)। यह पूरा गणित थोडा अट-पटा सा लगता है, वह भी तब, जब इसकी कोई ठोस वजह न बताई गयी हो। कोई भी दम्पति, अधिक उम्र में विवाह करने के बाद 9 साल तक संतान के लिए क्यों रुकेंगे? निर्देशक 60 साल के आदमी का अपनी बेटी की दोस्त – 18 साल की लडकी - के साथ प्रेम सम्बन्ध दिखाने के लिये, उम्र के गणित को नज़रअंदाज़ नही कर सकते। यह गले नही उतरता। उम्र का अंतर अगर 50 – 20 होता, तो भी ज्यादा फर्क नही पडता।
फिल्म की अन्य ग़लतियाँ नज़रअंदाज़ कर सकते हैं। अधिकतर जगह जहाँ केमेरा का कार्य काबिलेतारीफ है, वहीं कुछ जगह पर, केमेरा को बच्चे के हाथ में खिलोने की तरह इस्तेमाल किया गया है। अचानक केमेरा का नीचे से उपर, पीछे से आगे, इधर उधर भटकना अखरता है। इससे कोई उत्तेजना तो नहीं जगती वरन चीड ज़रूर होती है।
बहरहाल यह फिल्म, एक से अधिक बार देखने लायक है। हांलाकि, इस फिल्म का भारत में सफलता पाना मुश्किल है। रोज़मर्रा की जिंदगी में इस तरह की घटनाएँ भले ही घटती रहती हों पर व्यापक रूप में इस विषय को स्वीकार कर पाना हमारे समाज में आज भी मुश्किल है।
इस फिल्म में यह भी दिखाया गया है समाज कैसे इस तरह के रिश्तों का बहिष्कार करता है। साथ साथ यह भी दर्शाया गया है के इस तरह के रिश्ते से परिवार पर क्या असर पडता है और इन रिश्तों को नकारने से क्या प्रतिक्रिया होती है।
बहुत से अनुत्तरित सवालों के जवाब इस फिल्म से मिल जाते हैं। मसलन, यह जानते हुए भी कि ऐसे रिश्ते स्वीकृत नही हैं, फिर भी ऐसे रिश्ते क्यों जन्म लेते हैं?
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