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पंकज बेंगाणी द�?वारा

दस हज़ार करोड रूपये के चेक, अरमानी स�?ट में लदे प�?रूष पात�?र, गहने लादकर सोने वाली महिला�?�?, बहन की उम�?र की मा�? और मा�? की उम�?र की पत�?नी, कल का जेठ आज का देवर, कल का देवर आज का पति..... क�?या आपको क�?छ याद आ रहा है? जीहा�? मैं बात कर रहा ह�?�? भारतीय शोप ओपेरा की यानि हर दिन आने वाले और कभी खत�?म ना होने वाले धारावाहिकों की। क�?या आप जानते हैं किस तरह इनकी कहानीया�? इतनी लम�?बे काल तक चल पाती है? किस तरह से इस तरह रोज की श�?टिंग सम�?भव हो पाती है? कहा�? से आते हैं न�? न�? विचार... आइ�? सम�?ते हैं �?क विश�?द�?ध भारतीय शोप ओपेरा के गणित को। इस तरह के धारावाहिकों को बनाने के लि�? सबसे बडी जरूरत होती है �?क अलग तरह के आइडिया की। जो अविश�?वसनीय हो तो और भी अच�?छा है। छोटा सा हो तो भी चलेगा, क�?योंकि बात का बतंगड बनाना और पकोडे का पापड बनाना निर�?माताओं को अच�?छी तरह से आता है।
रोज आने वाले धारावाहिकों का रोज का गणित �?क दम तयश�?दा होता है, जरा सी भी ऊ�?च नीच लाखों का घाटा करवा सकती है।
हर धारावाहिक कहने को 30 मिनट का होता है पर वास�?तव में हम 20 से 22 मिनट का ही देखते हैं, बाकी समय विज�?ञापनों का होता है जिनकी दर काफी अधिक यानि प�?रति दस सेकंड 10 से 15 लाख रूपये होती है।
निर�?देशक की समस�?या उस 20 मिनिटों को भरने की होती है, पर �?सा नहीं है कि पटकथा लेखकों को 20 मिनट की कहानी गढनी पडती है। देखि�? किस तरह से बेवजह तरीके से समय कटवाकर निर�?माता लाखों जोड लेता है....
मान लिजी�? किसी पात�?र को घर में आना है, अब अगर वो सामान�?य तरीके से आ�?गा तो सिर�?फ 6 सेकंड की ही फ�?टेज बन पा�?गी और बाकी की कहानी पर समय बिगाडना पडेगा। पर इसका इलाज निर�?देशक अच�?छी तरह से जानता है! पात�?र स�?लो मोशन में आ�?गा... धीरे धीरे.. कैमरा उसका चेहरा दिखा�?गा ही नहीं। इससे दो फायदे हो ग�?, �?क तो आप बन�?ध ग�? टीवी स�?क�?रीन से की अरे ये कौन आ गया देखो तो.. और द�?सरा बहम�?ल�?य समय बरबाद भी हो गया।
अब तेज संगीत के बीच कैमरा रोल होगा और �?क पंक�?ति में खडे बाकी पात�?रों को दिखा�?गा जिनके चेहरों पर अलग अलग भाव होंगे। कोई म�?स�?क�?रा�?गा, कोई चिंतित होगा और कोई म�?�?ह फेर लेगा। इससे बडे फायदे होते हैं, समय तो बरबाद ह�?आ ही पर आप कयास भी लगाने लग जाओगे कि फला�? का द�?श�?मन या फला�? का दोस�?त आया होगा। इससे आपको यानि कि दर�?शक को बोरियत भी नहीं होगी।
इसके बाद कैमेरा धीरे धीरे आगंत�?क का चेहरा दिखा�?गा। �?क दम धीरे धीरे... और चेहरा देखते ही आप कहोगे धत इसे ही आना था, लेकिन बाकी पात�?र चौंक जा�?ंगे और सम�?पादक को बह�?म�?ल�?य समय मिल जा�?गा विशेष प�?रभाव दिखाने के लि�?। विशेष संगीत के साथ हर पात�?र के चेहरे को विभिन�?न कोणों से दिखाया जा�?गा। और यह सब करने में 2 से 3 मिनट खर�?च कर दि�? जा�?ंगे। सोचि�? 6 सेकंड के दृष�?य को कितनी आसानी से 3 मिनट में बदल दिया जाता है। और पटकथा लेखक को इतने समय की कहानी लिखने से बचा लिया जाता है।
द�?सरा तरीका है लम�?बे लम�?बे संवाद लिखने का। इससे दो कौडी की बात दो करोड की बात में बदल जाती है, उदाहरण देखि�?:
सामान�?य संवाद:
समीर: यह लो, 5 लाख का चेक। इससे त�?म�?हारा ग�?जारा चल जा�?गा। अब त�?म जा सकती हो।
प�?रिया: खरीदना चाहते हो म�?�?े? नहीं चाहि�? म�?�?े त�?म�?हारे पैसे। मैं जा रही ह�?�?।
दैनिक धारावाहिक का संवाद:
समीर: बस प�?रिया बस। जिसे पलकों पर बिठाकर रखा, जिसके गम पर रोया, ख�?शी में ह�?सा। आज वही, हा�? वही म�?�?से मेरी ख�?शीया�? मांग रही है! क�?या चाहि�? त�?मको प�?रिया? मैने तो अपनी जान भी त�?मको दे दी थी, पर शायद त�?म�?हे उसकी कभी कदर थी ही नहीं। त�?म�?हे चाहि�? विरानी खानदान की धन दौलत। त�?म इसे पाकर ख�?श होना चाहती हो। ले लो, सब ले लो। कम से कम त�?म तो ख�?श रहोगी। मेरा क�?या है, जिसे हीरे के कदर नहीं उसके नही सोना भी क�?या बनना? मैं अकेला ख�?श था, अकेला ख�?श रह�?ंगा। यह लो... यह लो प�?रिया 500 करोड का चेक। जानता ह�?�? इससे त�?म�?हारा ग�?जारा नहीं चलेगा पर मेरी अमानत सम�? कर ही रख लो।
प�?रिया ने क�?या कहा आप पढना चाहेंगे?
गाने तो होते ही हैं समय बिगाडने के लि�?। किसी प�?राने गाने को नई बोतल में डालकर बजवा दो। बिगड गया बह�?म�?ल�?य समय। ना हो तो भगवान की आरती करवा लो, डांस पार�?टी करवा लो, और क�?छ नहीं तो बेमतलब का संगीत ही स�?नवा दो। हजारों तरीके हैं।
और �?क तरीका है फ�?लेश बेक का। प�?रानी कडियों के फ�?टेज य�?�? व�?यर�?थ नहीं जाते, बडे काम आते हैं। जब किसी पात�?र को प�?रानी बातें याद नहीं आती, या याददास�?त चली जाती है, या प�?राना हिसाब च�?कता करना होता है तो पहले दिखा�? ग�? दृष�?य बडे मजे से श�?वेत श�?याम करके फिर से दिखाया जा सकता है। आप को लगेगा आपकी याददास�?त को ताज़ा किया जा रहा है, पर पर�?दे के पीछे तो समय बिगाडा जा रहा है।
तो वास�?तव में लेखक को 10 से 15 मिनट की कहानी ही लिखनी पडती है जो म�?श�?कील नहीं होती, क�?योंकि पेनल में और भी कई लेखक होते हैं जो आगे से आगे जोड तोड कर कहानी ब�?नते ही रहते हैं। �?क के विचार खत�?म हो जा�? तो द�?सरा तो है ही।
देखा आपने कितनी आसानी से समय का गणित चलाकर �?क धारावाहिक को अनंत काल तक चलाया जा सकता है। लेकिन फिर भी कहानी के बासी हो जाने का खतरा तो हमेंशा बना ही रहता है।
तो फिर �?क ही �?क ही �?क कहानी को दोहरा कर और बेवजह समय कटवाकर भी निर�?माता अपने धारावाहिक की टी.आर.पी. यानि लोकप�?रियता कैसे बना�? रख पाता है?
यह हम सम�?ेंगे अगली कडी में।
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वैसे, आपने यह ५०० करोड़ वाला जो सम?मान हमारे नाम को बक?शा, इसके लिये ताउम?र श?क?रग?जार रहू?गा. आप धारावाहिक क?यू? नही बनाते, आपको तो पूरा गणित मालूम है?