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अन्धेर (पुन: प्रकाशित)
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 4
बेकारअति उत्तम 
कथा सागर
गुरुवार , , 01 मार्च

pankajphoto

  पंकज बेंगाणी 


 

 

 

 

 

 

 

  कब से घंटियों बज रही है, पर वो अपना मोबाइल नहीं उठा रहा। नया मोबाइल। अभी हाल में ही तो खरीदा है। उसे पता है यह उसकी पत्नी का फोन है। उसे उसकी आवाज सुनाई दे रही है, तुम अभी तक आए क्यों नहीं?

क्या इस वक्त मेरा और आगे जाना ठीक रहेगा?

जयंतिलाल ने मन में सोचा और स्कुटर की गति धीमी कर दी  | राष्ट्रीय राजमार्ग 8 पर इन दिनों कच्छे बनियानधारी उठाईगीरों का आंतक बढ गया था  | माउंट आबु से लौटते हुए अम्बाजी के बाद सुरेन्द्रनगर तक रास्ते में पिछले एक महिनें में दर्जनों ऐसी वारदातें हो चुकी थी, जब इस तरह के गिरोहों ने राह्गीरों को लुट लिया था  | खाशकर शाम ढलने के बाद दुपहिया वाहन वाले इस राजमार्ग से निकलना कम ही पसन्द करते थे |

जयंतिलाल ने पश्चीम में ढलते सूरज को देखा | फिर पीछे मुड़कर रास्ते को देखा |

कोई नहीं- कमाल है, उसने सोचा |

उसके स्कूटर के पीछे दूर दूर तक कोई वाहन नज़र नहीं आ रहा था और आगे भी सडक खाली थी |

मैं भी बेवकुफ हुँ, कल सुबह तक मुझे अम्बाजी में रूक जाना चाहिए था |”

उसने मन ही मन में निश्चय किया कि जैसे ही कोई छोटा मोटा रेस्टोरेंट या ढाबा भी आए तो वो वहीं रूक जाएगा और आगे का सफर अगली सुबह ही शुरू करेगा |

लेकिन नहीं, जयंतिलाल सोचने लगा रूकुं भी तो कैसे, घर पर कह कर आया हुं कि शाम तक लौट आऊँगा | अब अगर नही पहुँचा तो चिंता हो जाएगी | और मोबाइल भी नही है कि फोन कर लूँ | कहीं फोनबुथ मिल जाए तो!

अरे केशु भरवाड की टपरी तो बस आने ही वाली ही है!अचानक उसके ध्यान में आया |

 

केशु भरवाड की छोटी सी चाय की केटली है जो अम्बाजी से थोडी ही दूर है | वास्तव में वहाँ उसका बडा सा खेत है, पर वो चाय की केटली भी चलाता है क्योंकि उसके खेत के आसपास 20 कि.मि. के दायरे में खान-पान की कोई व्यवस्था नही है | ट्रक चलाने वाले तथा अन्य राहगीर वहाँ रूकते हैं, चाय पीते हैं, सुस्ताते हैं और फिर आगे निकल पडते हैं | केशु ज्यादातर समय अपनी केटली पर ही रहता है जबकि खेत में उसका बेटा काम करता है | लोग कहते हैं कि केशु कामचोर है, कौन भरी दुपहरी में खेतों मे शरीर जलाए | और फिर रोज गुजरते राहगीरों से उसकी दोस्ती भी हो गई है तो बस महफील जमी रहती है |

 

पर इस वक्त नहीं, जयंतिलाल ने सोच रहा था, रात घिरने को है, अब शायद ही कोई टपरी पर होगा ।

उसने गरदन उठाकर देखा, दूर दो छपरीयों से ढकी एक दुकान नज़र आने लगी थी, जिसे वो बरसों से देखता हुआ आ रहा था। वही छपरीयां, दुकान के आगे सजी दो बेंचें, पानी की मटकी, चूल्हा, चाय की केटली और केशु | कुछ भी नही बदला |

 

कुछ ही देर में वो केशु भरवाड की टपरी तक पहुँच गया। उसने दुकान के सामने स्कूटर खडा किया और एक कोने में रखी बाल्टी से पानी लेकर मुँह धोने लगा। केशु उसे देखते ही पहचान गया |

आह... जयंति | आवो आवो | आज बहुत दिनों बाद?

हाँ, वैसे भी आजकल धन्धा कहाँ है केशुभाई कि वसूली को निकला जाए, एक बेंच पर बैठते हुए जयंतिलाल बोला,वो तो क्या है बहुत सी लेनदारी हो गई थी अम्बाजी के किराणा व्यापारियों की, तो सोचा जा ही आउँ |”

वो तो सच्ची बात है, आजकल सब तरफ मन्दी है, लेकिन एक बात बताओ, केशु बोला,”इतनी देर क्यों की? पहले तो दोपहर तक लौट आते थे | अभी देखो रात घिरने वाली है |”

जयंतिलाल ने एक बार फिर डूबते हुए सूरज को देखा |

तो तुम कहना चाहते हो कि मैं आगे ना जाऊँ |”

ना, मैं क्यों रोकुँ? पर जयंतिभाई दो दिन पहले ही एक मोटरसाइकिल वाला लूट लिया गया था | बडी खतरनाक टोली मालूम पडती है |”

वो तो सही है, पर यहाँ कहाँ रुकूँगा |”

क्यों, भले रूको ना! यहाँ बेंच पर सो जाना | मैं तो वैसे भी रात को खेत पर ही रहता हूँ | कौन सा कोस दूर है | क्यों?

जयंतिलाल ने गरदन घुमा कर दुकान के पिछवाडे पर स्थित केशु के खेत की तरफ देखा | केशु का बेटा बैल जोत रहा था |

बडी मेहनत करता है, जयंतिलाल बोला |

ह्म्म, जवान छोरा है | इतना तो करेगा ही |” केशु मुस्कुराया, तो यहीं रहोगे ना रात को? मैं पीने का पानी ला दूँगा | कुछ थोडा बहुत खा भी लेना |”

ना भाई, रुकना ना होगा | घरवाली चिंता करेगी | जाना ही होगा |” जयंति ने कहा |

कितना बोलता हुँ मोबाइल तो रखा करो, पर नहीं | आपको तो वो क्या कहते हैं, एलर्जी है? केशु बोला |

भई अपने से नहीं होता | मोबाईल वोबाईल के चक्कर नहीं समझ आते | तुम क्यों नही फोन कनेक्शन लगा लेते? जयंतिलाल कमीज की आस्तीन चढाते हुए बोला और सडक की तरफ देखने लगा, ओह, कितनी सुनसान लगती है | कोई वाहन नहीं |”

है

क्या

लगता है, कि है, केशु मुस्कुराता हुआ बोला ।

क्या है?

गाडी है, वो देखो गरदन घुमाकर एक गाड़ी आ रही है | पर यह इतनी धीमी क्यों चल रही है?

जयंतिलाल खडा हो गया और गाड़ीं की दिशा में देखने लगा | एक कार लडखडाती सी उन्ही की तरफ आ रही थी |

चलो अच्छा है केशु, इसी गाड़ी के साथ साथ निकल लेता हुँ

जरा रूको, मुझे लगता है वो इसी तरफ आ रही है | शायद कोई तुम्हारे जैसा हो। सुस्ताने आ गया। केशु की उम्मीदें बंध गई कि कोई नया ग्राहक तो आया, जयंतिलाल से तो वैसे भी पैसे नहीं लेता था।

 

जब कार एकदम करीब आ गई तो दोनों ने देखा कि गाडी को एक लडकी चला रही थी।

तभी मैं सोचुँ यह गाडी इतनी लडखडाती क्यों चल रही है। केशु मन ही मन मुस्कुराया।

लडकी ने एक बेंच के पास गाडी को पार्क किया और बाहर निकलते हुए बोली,जी कोई मेकेनिक मिलेगा यहाँ?

नीली डेनिम और लाइनिंग्स का शोर्ट शर्ट पहनी एक सुन्दर सी लडकी को अपने टपरी पर देख केशु खुद को किस्मत का धनी समझने लगा था, क्या बात है, आज इस विराने में रौनक कैसे आ गई? मेक्डोनल्ड्स या रिलायंस के आर फ्रेश में रूकने वाले लोग हमारे गरीबखाने में!

भाईसाहब, लडकी ने काउंटर को थपथपाते हुए पूछा,”आपने सुना नहीं शायद। मैने पूछा कोई मेकेनिक है क्या यहाँ।

हा... हाँ हाँ, केशु इतनी जल्दी सपने को तोडना तो नहीं चाहता था पर तोडना पडा,”हाँ है ना, मैं हुँ।

आप मेकेनिक हैं?

हाँ, हूँ ना।

थेंक गॉड, अच्छा हुआ। यह देखिए, मेरी गाडी में कुछ प्रोब्लम है। बार बार रूक रही है। स्पीड भी नहीं आ रही। झटके खा रही है। आप देख लेंगे।

देख तो लेंगे, लेकिन, केशु अपने काउंटर से बाहर निकला और गाडी का चारों ओर चक्कर लगाकर मुआयना करते हुए बोला, एक प्रोब्लम अपने को भी है।

क्या? लडकी हताश हो गई।

दरअसल, मैं मेकेनिक तो हुँ पर कार का नहीं। सइकल रिपेर करता हुँ।

साइकल रिपेर करते हैं।

हाँ जी, एकदम फस्टक्लास

क्या मुसीबत है, लडकी झल्लाती हुई, बेंच पर बैठ गई। तभी उसने ध्यान दिया कि वहाँ कोई और भी मौजूद है।

सॉरी कहते हुए वो जयंतिलाल से थोडी दूर खिसक गई।

मैं आपकी मदद कर सकता हुँ जयंतिलाल ने धीरे से कहा।

जी, लडकी ने चौंकते हुए कहा,आप मेरी हेल्प करेंगे! ऑह, प्लीज। देखिए मेरी गाडी ठीक से नहीं चल रही।

हाँ वो मैने सुना। जयंतिलाल ने बेच पर से खडे होते हुए कहा, लगता है या तो इंजन गरम हो गया है, या कार्बोरेटर में कचरा है।

हो सकता है, मुझे नही पता। मैं सिर्फ गाडी चलाना जानती हुँ।

कोई बात नहीं, आप गाडी का बोनट खोलिए।

अरे हाँ स्योर, लडकी ने हंसते हुए कहा और गाडी के अन्दर जाकर बोनट खोलने का बटन खिंचा।

 

आपका नाम क्या है, जयंतिलाल ने गाडी का मुआयना करते हुए पूछा।

जी

नाम। नाम क्या है आपका?

ऑह, नाम। निहारीका। निहारीका सेन, लडकी ने मुस्कुराते हुए कहा, और आप।

जयंतिलाल | आगे सुरेन्द्रनगर में ही रहता हुँ। आप कहाँ जा रही हैं।

मैं तो... अ... एक्चुली, अहमदाबाद जा रही हुँ, राईट... अहमदाबाद जा रही हुँ।

जयंतिलाल ने झांककर देखा। निहारीका गाडी से निकल आई थी और परेशान लग रही थी।

क्या कोई प्रोब्लम है? जयंति फिर से अपने काम में लग गया।

नहीं तो। प्रोब्लम नहीं। बस मुझे जल्दी जाना है।

ह्म्म | हो जाएगा जल्दी। पेट्रोल सप्लाई वाली नली देख लेता हुँ। बाकी तो ठीक ही लग रहा है, जयंति ने आश्वासन देते हुए कहा। वास्तव में उसे खुद को पता नहीं चल रहा था कि आखिर समस्या कहाँ है।

फिर तो अच्छा है, मुझे यहाँ से जल्दी निकलना है

जयंति ने देखा, निहारीका बेचैनी मैं इधर उधर देख रही थी।

आप बताना नहीं चाहती पर कुछ तो है, जयंति को बाल की खाल निकालने में मजा आने लगा।

नहीं कुछ भी नही है। वास्तव में मेरी एक कज़ीन का जन्मदिन है और मुझे घर जल्दी पहुँचना है।

कब है जन्मदिन? जयंति ने पुछा।

आज ही तो है, पार्टी दे रही है रात को

फिर तो अफसोस। आप शामिल नहीं हो पाएंगी।

क्या मतलब?, निहारीका ने चौंकते हुए पुछा।

मतलब यह, जयंति ने बोनट से सर को बाहर निकालते हुए कहा कि यदि आपकी गाडी एकदम भली चँगी हो भी जाए तो भी क्या आप इस ढलती शाम.... लो अब तो रात ही हो गई समझो, हाँ तो रात को इस रास्ते आगे जाना चाहेंगी?

क्यों क्या प्रोब्लम है, निहारीका ने चारों तरफ नज़रे घुमाते हुए पुछा।

प्रोब्लम तो निहारीकाजी यह है कि आप बडे लोग अखबार कम पढते हो। सही है ना? लेकिन सुना तो होगा आपने कि आजकल इस हाइवे पर कच्छे बनियान धारी गिरोह का आंतक छाया हुआ है। रात को लोग कहाँ निकलते है? इतनी देर में आपने कोई वाहन देखा, सिवाय ईक्का दुक्का ट्रक के? जयंतिलाल ने हाथ झाडते हुए कहा। उसे अभी तक पता नहीं चला था कि गाडी में समस्या क्या है?

ऑह वो सब बकवास है। निहारीका ने मुस्कुराते हुए कहा, मै नहीं मानती। यह सब गोसीप है और कुछ नही।

जैसा आप ठीक समझो, फिलहाल क्या आप मैरे स्कूटर की डेकी में से औजार ला देंगी?

हाँ जरूर। चाबी दीजिए, निहारीका ने मुस्कुराते हुए कहा।

अरे... जयंतिभाई। केशु जो अभी तक निहारीका और जयंतिलाल के वार्तालाप को चाव से सुन रहा था, अचानक हडबडा कर जागा, मैं थोडा खेत जाकर आता हुँ। ग्राहक आए तो बुलाना।

ठीक है जाओ जयंतिलाल ने चिल्लाकर कहा और स्कूटर की चाबी निहारीका को दे दी।

निहारीका ने स्कूटर के पास जाकर उसकी जर्जर हालत पर तरस खाया, फिर चाबी से डेकी का लॉक खोलकर अन्दर रखे सामान खंगालने लगी।

 

आपको एक्च्युली में क्या चाहिए?, निहारीका ने पुछा और जयंति की तरफ घूमकर देखा जो अभी भी बोनट के नीचे सर घुसाए वायरों को टटोल रहा था।

अ... वैसे तो स्कूटर के पाने तो काम आएँगे नहीं, जयंति ने घूमकर कहा, आप एक काम करें उसमे एक वायर है, वो दे दीजिए, पेट्रोल लाइन को साफ करके देखता हुँ।

निहारीका वापस डेकी टटोलने लगी। अचानक उसकी नज़र एक पैकेट पर पडी। उसने पैकेट को टटोलकर देखा। फिर वापस रख दिया और वायर लेकर जयंति के पास लौट गई।

ये लीजिए, देखिए क्या होता है, निहारीका ने वायर को जयंति को देते हुए कहा।

हाँ बस, अब काम हो जाएगा, जयंति ने वायर लेते हुए कहा और पेट्रोल सप्लाई की पतली पाईप को टटोलने लगा।

 

एक बात पूछुं?, निहारीका ने पूछा।

हाँ कहिये, जयंति ने कहा।

वो उस पैकेट में क्या है?

कौन सी पैकेट? जयंति ने चौंकते हुए कहा।

ओह.. वो डेकी में है ना, पीले रंग की, निहारीका ने मुस्कुराते हुए कहा मैं तो ऐसे ही पूछ रही थी।

नहीं कोई बात नहीं, जयंति ने हाथ झाडते हुए कहा,मेहनत की कमाई है। पच्चीस हजार रूपये। वसूली के हैं, एक पार्टी से तकादा लिया है। बडी मुश्किल से निकाल पाया हुँ।

ओह | अच्छा, मैं तो यूँ ही पूछ रही थी, निहारीका ने कहा और बेंच पर जाकर बैठ गई।

कोई बात नहीं जयंति ने कहा और फिर से बोनट में सर घुसाकर पाइपों से खेलने लगा।

आप इस अन्धेरे में काम कैसे कर पा रहे हैं? वो भाईसाहब जो बल्ब जलाकर गए हैं, लगता नहीं उससे इतनी रोशनी हो रही है?, निहारीका ने सडक की तरफ देखते हुए कहा। उसे अब इस वीराने से डर लगने लगा था।

 

अनजान जगह, खराब गाडी, डकैत, एक अजनबी जो पता नहीं गाडी ठीक कर रहा है या...। एक अनजाने भय से वो एक क्षण को सिहर सी गई।

 

हो गया, जयंतिलाल ने बोनट बन्द करते हुए कहा।

क्या सचमुच, निहारीका झट से बेंच पर से खडी हो गई, वाकई में?

लगता तो है, आप गाडी स्टार्ट करके चलाकर देखिए जयंति ने कहा और पास रखी बाल्टी से पानी लेकर हाथ धोने लगा।

निहारीका को तो जैसा नया जीवन मिल गया हो। वो तुरंत गाडी की तरफ भागी और धम्म से ड्राइवर सीट पर धँस गई। चाबी घुमाकर  देखा। गाडी आराम से स्टार्ट हो गई थी।

 

मैं थोडा चलाकर देखती हुँ, निहारीका ने कहा और गाडी को सडक की तरफ ले गई।

जयंतिलाल ने पानी से भीगे हाथों को झाडते हुए देखा निहारीका गाडी को  एक पुरा चक्कर लगा कर वापस उसी जगह पर आ रही थी। उसे खुद को आश्चर्य होने लगा कि क्या सचमुच यह उसकी वजह से ही हुआ है?

लगता है, अब इसका मिजाज ठीक हो गया है। जयंतिलाल ने गाडी की तरफ जाते हुए कहा।

हाँ लग तो रहा है, निहारीका ने मुस्कुराते हुए कहा थेंक्स, आपने बहुत मदद की।

अरे ऐसी क्या बात है, मदद की कोई बात नहीं।

फिर भी, आपने मदद तो की ही है।

चलिए मान लेते हैं, और क्या! जयंतिलाल ने हंसते हुए कहा।

रात हो गई है, मुझे चलना चाहिए

क्या!!, जयंतिलाल ने चौंकते हुए कहा आप जाना चाहती हैं?

हाँ बिल्कुल, निहारीका ने गाडी स्टार्ट करते हुए कहा वैसे भी अहमदाबाद यहाँ दूर ही कितना है। मैं तो दो घंटे में पहुँच जाउंगी।

अगर पहुँची तो! जयंति ने सोचा।

चलिए फिर, अलविदा निहारीका ने कहा और एक्सीलेटर पर पाँव दबा दिया।

जयंतिलाल ने गाडी को एक झटके से आगे बढते हुए देखा जो कुछ सेकण्ड में ही सडक पर दौडने वाली थी।

एक बार फिर सोच लीजिए, मैं आपको डराना नहीं चाहता पर... जयंति ने चिल्लाकर कहा।

नो प्रोब्लम, थेंक्स, निहारीका ने कहा और तेजी से निकल गई।

जयंतिलाल ने घूमकर गाडी को आंखो के आगे से ओझल होते हुए देखा।

गई?

जयंतिलाल ने चौंक कर पीछे देखा।

केशुभाई मुस्कुरा रहा था।

हाँ, पागल है। कहीं पछताना ना पडे जयंति ने कहा और बेच पर जाकर बैठ गया।

जाने दो ना! अपने को क्या? केशुभाई ने कहा और स्टोव जलाने के लिए माचिस ढ़ूँढ़ने लगा, चाय तो पिओगे ना?

हाँ बना दो केशुभाई, जयंतिलाल ने बेंच पर लैटते हुए कहा मैं तो कोई बेवकूफी नहीं करूँगा, आज रात यहीं बिताउंगा।

सही करोगे, मैं दो रोटी भी लाया हुँ, वो भी खा लो। पानी यहाँ रखा है। वैसे भी रात को खेत में चक्कर लगाने तो आउंगा ही केशु ने कहा और माचिस से स्टोव को जलाकर चाय का पतीला लगा दिया।

जयंति ने एक बार केशु की तरफ देखा फिर आँख मूंद कर लेट गया।

 

काश फोन कर पाता, उसने सोचा। उसे पत्नी को चिंता हो रही थी।

जाने दो, समझ जाएगी कि कोई काम आ गया होगा।

वैसे भी जयंतिलाल के पास खुद को सांत्वना देने के अलावा और कोई विकल्प भी नहीं था।

निहारीकाबेन का फोन इस्तेमाल कर लेता तो मना थोडे ही करती? उसने सोचा, एक मिनट! उसके पास मोबाइल तो नहीं था। अजीब है। शक्ल से तो खाते पीते घर की लगती थी। मोबाइल नहीं? कमाल है!

उसने आंख खोलकर आकाश की तरफ देखा।

आज तो दिन ही खराब है, पहले देर हो गई फिर गाडी ठीक करने बैठ गया, क्या फायदा ऐसी समाजसेवा करके, एक बार पूछ लेता शायद मोबाइल हो उसके पास, लेकिन दिखा तो नहीं | क्या पता? वो भी सिरफीरी है | इस वक्त गई | लेकिन यहाँ भी कैसे रूकती? मुझे क्या...? उसने फिर से आंखे बंद कर ली और अनंत में खोने लगा।

 

लो चाय, केशु चाय का प्याला लेकर जयंति के पास आया।

जयंतिभाई... जयंतिभाई चाय। केशु ने थोडा झुककर देखा |

सो गया।

 

 



कब से घंटियों बज रही है, पर वो अपना मोबाइल नहीं उठा रहा। नया मोबाइल। अभी हाल में ही तो खरीदा है। उसे पता है यह उसकी पत्नी का फोन है। उसे उसकी आवाज सुनाई दे रही है, तुम अभी तक आए क्यों नहीं? हाँ ...क्या करू, नहीं आ पाया, वो बोलना चाह रहा है, पर बोल नहीं पा रहा। सामने कच्छे बनियानधारी गिरोह की टोली खडी है। कैसे अजीब लोग हैं, हँस रहे हैं। वो लडकी निहारीका भी वहीं है और उसकी गाडी भी। वो रो रही है, उसकी गाडी अभी तक खराब है। लेकिन अब वो ठीक नहीं करना चाहता। उसे नींद आ रही है। वो सो जाना चाहता है। लेकिन निहारीका उसे सोने नहीं दे रही। प्लीज... प्लीज...  मेरी गाडी ठीक कर दो ..। वो उसे जोर जोर से हिला रही है। वो सो नहीं पा रहा। वो उसे रोकना चाहता है। पर वो चिल्ला रही है, मेरी गाडी आपने खराब कर दी। वो उसे झकझोर रही है। अचानक उसका दम घुटने लग जाता है। अब वो और सहन नहीं कर सकता....

कौन है? जयंतिलाल हडबडा कर नींद से जागा। उसने देखा वो पसीने से लथपथ है।

धीरे धीरे थोडा सयंत होने के बाद उसने ध्यान से देखा। निहारीका उसके पास खडी थी।

 

सॉरी ... मैने आपको नींद से जगाया। मुझे...मुझे डर लग रहा है निहारीका बेहद घबराई हुई थी।

आप...! जयंतिलाल ने आंखे मलते हुए कहा, मैने आपकी गाडी खराब नहीं की।

नहीं, वो बात नहीं। आपकी कोई गलती नहीं। मेरी गाडी भी बिल्कुल ठीक है।

तो फिर आप वापस क्यों आई?

वो मैं.... बताती हुँ निहारीका जयंतिलाल के पास बेंच पर बैठ गई।

आप पानी पिएँगी? जयंति ने पुछा।

नहीं, आप कहीं मत जाइए। वो लोग आ सकते हैं।

कौन?

वो जो आगे सडक पर बैठे थे।

कौन बैठे थे? मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा।

बताती हुँ, निहारीका अब थोडी सम्भलने लगी थी, यहाँ से निकलने के बाद मैं कोई 30 किलोमीटर ही आगे गई थी। तब तक जयंतिभाई, रोड पर चार पाँच ट्रक के अलावा कोई व्यीकल नहीं मिला। मैं बहुत डर गई थी। वैसे भी आपने मुझे डाकुऑ वाली बात बताकर डरा दिया था। फिर भी मैं अहमदाबाद जल्दी से जल्दी पहुँचना चाहती थी, इसलिए चलती गई। थोडा आगे जाने पर मैने देखा रोड पर कुछ लोग आग जला कर बैठे हैं। थोडा करीब जाने पर मैने देखा वे लोग मुझे ही घूर रहे थे और आपस में इशारे कर रहे थे। अचानक मेरी नज़र एक मोटे से आदमी पर गई जिसके हाथ में तलवार थी। वो उन लोगों को इशारे कर रहा था। मैं बहुत घबरा गई थी। मैने तुरंत गाडी को रिवर्स किया और वापस उल्टी साईड दोडा ली। मै इतनी डर गई थी कि मैने रियर मिरर में भी नही देखा। फिर थोडी देर बाद हिम्मत जुटा कर देखा तो वो लोग नही दिखे। जयंतिभाई वे लोग भूत थे। हाँ, भूत ही थे। मुझे बहुत डर लग रहा है, जयंतिभाई। वे लोग मुझे मार डालेंगे।

 

नहीं, नहीं कुछ नहीं होगा, जयंतिलाल ने उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा, मैने तो आपको पहले ही मना किया था।

वो लोग यहाँ तो नहीं आएँगे ना?

नहीं, यहाँ क्या मिलेगा उनको? और अगर आपका पीछा करते हुए आते तो अब तक आ जाते।

वो लोग भूत थे।

भूत! जयंतिलाल को हंसी आ गई, भूत जैसा कुछ नही होता।

वो लोग यहाँ नहीं आएँगे ना?

नहीं, आना होता तो आ जाते। जयंतिलाल ने दिलासा देते हुए कहा, पर वो खुद कितना डर गया था वो तो सिर्फ वही समझ सकता था।

 

अगले आधे घंटे तक जयंतिलाल कभी खुद को कोसता कि क्यों रात को ठहरा, कभी केशु को कोसता कि रात को चक्कर काटने का वादा करके भी नही आया। कभी आकाश में टुटते तारे ढूँढता कि कोई मन्नत ही मांग ले। कभी चुपचाप सहमी सी बैठी निहारीका को देखता।

 

आप पानी पिएंगे मरघट की सी शांति को तोडते हुए निहारीका ने पूछा, तो जयंतिलाल जैसे नींद से जागा।

हं... हाँ मैं ला देता हुँ

नहीं, बैठीए। वैसे भी मैं आपको काफी परेशान कर चुकी हुँ, निहारीका ने कहा और एक कोने की तरफ रखी मटकी से पानी निकालने लगी।

वहाँ काउंटर पर गिलास रखी होगी, जयंतिलाल ने अंगडाई लेते हुए कहा।

 

थोडी देर में निहारीका एक गिलास में पानी लेकर आ गई।

लीजिए

आप नहीं पिएँगी?

पी चुकी निहारीका ने कहा और वापस बैंच पर बैठ गई।

 

पानी पीने के बाद जयंतिलाल ने थोडी राहत की सांस ली। थोडी देर तो वो फिर से अपनी दुनिया में खोया कभी अपने को कोसता, कभी पत्नी की चिंता करता, कभी केशु के खेत की तरफ नजर फेर लेता, कभी निहारीका को निहार लेता, लेकिन फिर उसकी आँखे जवाब देने लगी।

 

थोडी देर सो जाएँ तो अच्छा है, निहारीकाबेन। कल फिर लम्बा सफर हो जाएगा।

जी... क्या कहा आपने? निहारीका भी उनिन्दी सी हो चुकी थी।

जी, मैने कहा थोडी देर सुस्ता लें

ओह...हाँ ठीक है आप लेट जाइए। मैं खडी हो जाती हुँ।

हाँ वो ठीक है, पर मैं सोचता हुँ आपको भी थोडा आराम कर लेना चाहिए।

नहीं मैं ठीक हुँ

घभराईए मत। अब वे लोग नहीं आएंगे। आप ऐसा करें अपनी कार में ही थोडा सुस्ता लें। अन्दर से लोक भी कर लीजिए, मै बेंच पर सो जाता हुँ।

निहारीका थोडी देर असमंजस सी सोचती रही, फिर चुपचाप उठकर कार में चली गई।

 

गुड नाईट जयंतिलाल ने कहा और बेंच पर लेट गया। उसे वैसे भी जवाब की उम्मीद नही थी।

निहारीका ने कार की पिछली सीट से जयंतिलाल को लैटते हुए देखा, फिर आँखे बन्द कर ली।

 

 



 

आपने वादा किया था, वो लोग नहीं आएंगे निहारीका रोती हुई बोल रही थी।

हाँ मैने कहा था, पर... जयंतिलाल ने देखा वो बेडीयों में जकडा हुआ था।

तो वो कौन है, आपके पीछे?

जयंतिलाल ने पीछे मुडकर देखा, और भोंच्चका रह गया।

केशु हाथ में कुल्हाडी लिए हंस रहा था।

केशु तुम भी इन लोगों से मिले हुए हो?

तुम्हें अब पता चला? निहारीका अब हंस रही थी।

जयंतिलाल का सर चकराने लगा। निहारीका ठहाके मारकर हंसने लगी थी। तभी उसने महसूस किया जैसे किसीने पीछे से जोर से वार किया।

नहीं.... जयंतिलाल की चीख निकल गई।

 

अरे क्या हुआ?

जयंतिलाल ने सर उठाकर देखा, केशु खडा था।

कोई सपना देखा? केशु ने हंसते हुए कहा।

जयंतिलाल ने महसूस किया, वो पूरा पसीने से भीगा हुआ था। उसने आसपास नजर घुमाकर देखा, दिन निकल आया था, बल्कि धूप चढ गई थी।

कितना सोते हो भाई, मैने सोचा थके हुए होगे तो जगाया नहीं

कितने बज गए? जयंतिलाल ने पूछा।

साढे नो। चाय पिओगे?

वो लडकी, वो कहाँ है? और कार कहाँ गई?

कार तो वहीं जाएगी, जहाँ मेडम जाएगी। केशु ने हंसते हुए कहा,तुमको बडी चिंता है।

कब गई

मैं सुबह 6 बजे आया, तब तो नहीं थी

 

जयंतिलाल को अफसोस हुआ कि बिना अलविदा कहे चली गई। उससे अधिक उसे अफसोस इस बात का हुआ कि वो उसे जाते समय आखिरी बार देख भी नही पाया।

ये नींद भी कमबख्त! उसने सोचा और अपनी जेब से सिगरेट का पैकेट निकालने के लिए हाथ डाला।

ये क्या है? उसने देखा उसकी जेब में एक खत है।

क्या है? केशु ने अपने स्टोव में पम्प मारते हुए पुछा।

चिट्ठी</