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कैसे एक लूटेरा बारबार भारत को लूटता रहा. किस तरह से महमूद गज़नी लम्बे चौडे रेगिस्तान पार कर सोमनाथ लूट कर चला गया?
क�?या इतिहास उबाऊ होता है? अगर वह पाठ�?य-प�?स�?तक में सिमटा ह�?आ न हो तो बिल�?क�?ल नहीं. जानिये उस कथा के बारे में जिससे तब भारत सीख सकता था कि अपना अस�?तित�?व बचाना हो तो पूजे जाने वाले तमाम देवता व सम�?पति कभी काम नहीं आ�?ंगे, पर भारत ने सीखा नहीं और शताब�?दियों की ग�?लामी तो भोगी ही, अपनी आधी से ज�?यादा जमीन भी खो दी. भारत तब सोने का तो था, पर �?सी चिड़ीया था जिसे बाज़ नोचते रहे.
यह कथा हजार वर�?ष प�?रानी है, तब अफगानिस�?तान में �?क बह�?त ही छोटा-सा राज�?य ह�?आ करता था - गजनी. 9 अप�?रैल 977 को सबकतगीन नामक �?क जन�?मजात ग�?लाम ने विद�?रोह कर वहा�? के शासक पिराई को भागने पर मजबूर कर दिया तथा शासन पर अपना कब�?जा कर लिया. गजनी का भावी शासक तथा सबकतगीन का बेटा महमूद (जन�?म: 1 नवम�?बर 971) तब छह वर�?ष का था और यह कहावत की ग�?लाम का बेटा सदा ग�?लाम ही रहता है, उसके लि�? �?ूठी साबित ह�?ई थी.
अब चलते हैं भारत की ओर. उस समय भारत से (ग�?जरात के वेरावल बन�?दरगाह से) पर�?शिया (आज का ईरान) सम�?द�?री व�?यापार ह�?आ करता था. पर बाद में सम�?द�?री लूटेरों से तंग आकर यह व�?यापार भू-मार�?ग से होने लगा. व�?यापारी अपना मूल�?यवान सामान ऊ�?टों पर लाद कर गजनी होते ह�?�? होर�?म�?ज (बन�?दर अब�?बास) और सिराफ जाने लगे था. इन�?ही काफिलो से कभी बालक महमूद ने भारत तथा सोमनाथ के नाम स�?ने होंगे, पर तब उसके लि�? कौत�?हल का विषय भारत का वैभव न हो कर मात�?र ऊ�?ट के ये काफिले ही रहे होंगे.
इधर सबकतगीन शासक बनने के बाद लगातार अपना राज�?य ब�?ाने में लगा रहा. उसने राजा जयपाल से उसका हिन�?दू राज�?य पंजाब का अधिकतर हिस�?सा जिसमें काब�?ल भी शामिल था, जीत लिया तथा पूर�?वी पर�?शिया के ख�?रासान प�?रांत तक अपने राज�?य की सीमा�?�? ब�?ा ली. �?क समय का छोटा-सा राज�?य गजनी बीस वर�?षो में प�?रे अफगानिस�?तान तथा ईरान के क�?छ भू-भाग जितना बड़ा हो गया.
सबतगीन ने अपने �?क बेटे ईस�?माइल को ईरान के ख�?रासान का स�?बा दे रखा था. तथा 997 में मरने से पहले अपने दूसरे बेटे महमूद को अपना उत�?तराधिकारी निय�?क�?त कर दिया.
ईस�?माइल ने इसका विरोध किया पर दरबार में वजीरों का समर�?थन महमूद को मिला ह�?आ था.
दोनो भाईयों में टकराव चलता रहा, जिसका अंत �?क य�?द�?ध से ह�?आ. ईस�?माइल की फौज बल�?ख से, तो महमूद की निशाप�?र (इसी गा�?व में बाद में कभी क�?तब�?बूद�?दीन �?बक जिसने क�?त�?बमिनार बनवायी थी, ग�?लाम के रूप में बिका था) से कूच कर गजनी के पास टकराई. ईस�?माइल हार गया तथा उसे आजीवन कैद की सजा मिली.
भारत की वायव�?य भूमि पर गजनी नामक राज�?य की स�?थापना ह�?ई तब तक मात�?र अरब ही सिंध तक आ�? थे. इसके अलावा कंदहार (गांधार), तक�?षशिला, प�?रूषप�?र (पेशावर) तथा हिन�?द�?क�?श का प�?रा प�?रदेश तत�?कालीन भारतीय राज�?यों में बंटा ह�?आ था. पंजाब इनमें सबसे बड़ा राज�?य था. इसके विपरीत महमूद के पूर�?वज मोंगोलो के विरूद�?ध लड़ने के लि�? खरीदे ग�? महज ग�?लाम सैनिक भर थे.
सत�?ता पर आने के चार वर�?ष बाद महमूद ने आक�?रमणों की श�?रूआत की. सबसे पहले पंजाब की राजधानी पेशावर को निशाना बनाया. सितम�?बर 1001 को जब वह गजनी से निकला तब उसके साथ 15000 अश�?वरोही तथा पैदल सैन�?य था. उधर पंजाब के शासक जयपाल के पास 12000 अश�?वरोही तथा 300 हाथी भी थे. लाहोर से अन�?य सैन�?य मदद भी आने वाली थी पर इससे पहले ही महमूद ने आक�?रमण कर दिया. जयपाल प�?री तैयारी के बिना लड़ा और अंत में हार गया. उसे बन�?दी बना लिया गया. महमूद को अपनी सैन�?य ताकत ब�?ाने के लि�? धन की आवश�?यकता थी. पिता जयपाल को छ�?ड़ाने के लि�? आनन�?दपाल ने राज�?य का खजाना महमूद को सौंप दिया. जयपाल यह सह नहीं पाया और राजगद�?दी आनन�?दपाल को सौंप प�?रजा की उपस�?थिति में चिता पर च�? प�?राण त�?याग दिये.
सन 1004 में महमूद ने सिंधू नदी के किनारे बसे राज�?य उच पर इसलि�? आक�?रमण किया क�?योंकि वहा�? के शासक भीरराव ने जयपाल के विरूद�?ध य�?द�?ध में महमूद को सहायता करने का वचन दिया था, पर निभाया नहीं. भीरराव हार गया और जंगल की ओर भाग खड़ा ह�?आ. विरोधी सैनिको ने उसका पीछा किया पर उसने आत�?महत�?या कर ली. भीरराव का मस�?तक काट कर गजनी के दरबार में पेश किया गया.
इसके बाद महमूद ने 1006 में म�?लतान पर तथा 1008 में पेशावर पर फिर से हमला किया. आनन�?दपाल ने तब तक �?क बड़ी सेना का गठन कर लिया था, पर अंत में वह हार गया. उसके 8000 सैनिक मारे गये. यह आनन�?दपाल का अंतिम य�?द�?ध था. इसके तीन वर�?ष बाद उसकी मृत�?य�? हो गई थी.
सन 1009 में महमूद ने हिमाचल के नगरकोट (कांगड़ा) के वज�?रेश�?वरी मन�?दिर को लूटने के लि�? आक�?रमण किया. उसने यहा�? की घन-सम�?पदा के बारे में स�?न रखा था. इधर किसी ने सोचा भी नहीं था की गजनी का स�?ल�?तान यहा�? तक आ पा�?गा. इसलि�? मन�?दिर की स�?रक�?षा निहत�?थे पूजारीयों के हाथों में थी. महमूद तीन दिन तक मन�?दिर का घेरा डाले रहा. देवता न सहायता कर सकते थे और न ही उन�?होने की. अंत में रक�?तपात से बचने के लि�? मन�?दिर के द�?वार खोल दिये ग�? तथा 7 लाख सोने के सिक�?के 7 हजार किलो जवाहरात तथा 25 हजार किलो सोने-चा�?दी के बर�?तन महमूद को सौप दिये ग�?. मन�?दिर कंगाल हो गया.
दान-दक�?षिणा ने बाद में उसे फिर से समृद�?ध बना दिया पर तब तक उसकी समृद�?धि की गंध दूसरे कई लूटेरों को लग च�?की थी. 1337 में म�?हम�?म�?द बीन त�?गलक, 1399 में सिकंदर लोदी, 1621 में जहा�?गीर ने इस मन�?दिर को फिर से ल�?टा.
धन-दौलत के लि�? आक�?रमण करना महमूद गजनी की आदत-सी हो गई. बह�?त भारी मात�?रा में धन निहत�?थे पंडे-पूजारीयों के हाथो में रहता था. जहा�? भी धन की बात पता चलती महमूद पूरी ताकत से �?पटता था. क�?या उसके आक�?रमण मात�?र धन के लालच में ही होते थे? शायद नहीं. आइये देखें क�?या ह�?आ था सन 1014 को.
इस वर�?ष महमूद गजनी पूरे पंजाब को चीरता ह�?आ हरियाणा के थानेसर (स�?थानेश�?वर) के मन�?दिर तक पह�?ंचा. यहा�? उसके लि�? ख�?ला मैदान था. उसने भक�?तों का कत�?लेआम किया. 2 लाख लोगो को ग�?लामो के रूप में गजनी ले गया जो आजीवन ग�?लामो की जिन�?दगी जीते रहे, साथ ही मन�?दिर की सम�?पति कब�?जाने के बाद मूर�?ति के ट�?कड़े करवा कर उसे भी साथ में ले गया. मूर�?ति के इन टूकड़ो को उसने राजधानी के मार�?गो में जड़वा दिये. स�?थानेश�?वर की मूर�?ति के अवशेष रात-दिन लोगो की ठोकरे खाते रहे.
इस आतंक के बाद चार वर�?षो तक भारत की तरफ उसने नजरें नहीं की पर 1018 में उसने भारत के हृदय सम�?मान भाग पर आक�?रमण करने का विचार किया. यह गंगा-यम�?ना का फलद�?र�?प व समृद�?ध मैदानी भाग था. गजनी से लगभग 1500 किलोमीटर दूर तक उसे आना था, इसलि�? उसने 20 हजार सैनिको को लूट में हिस�?सा देने का लालच देकर अपने साथ किया तथा 1 लाख घ�?ड़सवार उसके अपने थे.
2 दिसंबर को वह यम�?ना पार कर मथ�?रा पह�?ंच गया. यहा�? दिल�?ली के राजा विजयपाल का शासन था, पर वहा�? रक�?षा करने के लि�? कोई नहीं था. मन�?दिर की सम�?पति लूट कर उसे तोड़ा-फोड़ा फिर आग लगा दी. यहा�? से निकल कर उसने राजा जयचन�?द के कनोज पर आक�?रमण किया तथा 20 दिसम�?बर को शहर को ल�?टा. फिर गजनी के लि�? रवाना ह�?आ. गजनी जाते समय वह 53 हजार ग�?लाम व 350 हाथीयों पर लदा धन ले गया.
अब तक महमूद सम�? गया था की भारत के अन�?दर तक के भागो को वह बिना किसी खास प�?रतिकार के लूट सकता है. उसकी हिम�?मत भी ख�?ल गई थी.
अब बारी थी सोमनाथ की.
वेरावल उस समय महत�?वपूर�?ण व�?यापारिक केन�?द�?र था. यहा�? की समृद�?धि के बारे में उसने स�?न ही रखा था. साथ ही उसे पता चला की सोमनाथ के मन�?दिर में अब तक उसके द�?वारा लूटी गई सम�?पति से भी ज�?यादा धन-दौलत है. वहा�? �?क हजार प�?जारी तथा म�?ण�?डन आदि के लि�? तीन सौ नाई सदा हाजिर रहते है. इससे महमूद गजनी पर धन का लालच तथा धर�?म का ज़�?नून सवार ह�?आ.
सोमनाथ को लूटने के लि�? उसे 1580 किलोमीटर की यात�?रा करनी थी, जिसमें 900 किलोमीटर तो केवल रेगिस�?तानी प�?रांत था. उसे बीकानेर, जयप�?र, जोधप�?र जैसे राजप�?ती राज�?यों को भी पार करना था. पर वह अच�?छी तरह जानता था की कलहप�?रिय राजा विदेशी आक�?रमण के समय भी �?कता नहीं दिखा पा�?ंगे. सजग महमूद ने अपने अभियान को अक�?टूबर में श�?रू करने की योजना बनाई ताकि दिसम�?बर तक रेगिस�?तानी इलाके में प�?रवेश कर फरवरी तक वापसी कर सके.
18 अक�?टूबर 1025 को 1 लाख से ज�?यादा सैनिक 30 हजार ऊंट सवार तथा 30 हजार रसद को लादे ऊंटो के साथ रवाना ह�?आ. 20 नबम�?बर को म�?लतान पह�?ंचा फिर 42 दिनो में ही राजस�?थान का रेगिस�?तानी इलाका पार कर जनवरी तक पाटण पह�?�?च गया. यहा�? राजा भीमदेव सौलंकी का शासन था जो महमूद के आने से पहले ही भाग खड़ा ह�?आ. महमूद ने शहर को मन भर ल�?टा. वहा�? से महमूद सोमनाथ की ओर ब�?ा. पर रास�?ते में ही उसका सामना भीमदेव से हो गया. भीमदेव को अपने कर�?तव�?य का बोध हो गया था अतः उसने अपने सैनिको के साथ महमूद से लड़ते ह�?�? केसरीया (अवश�?यम�?भावी मृत�?य�? को देखते ह�?�? भी य�?द�?ध करना) किया.
वह ग�?रूवार 6 जनवरी 1026 का दिन था, महमूद गजनी अपने लक�?ष�?य प�?रतिष�?ठित सोमनाथ मन�?दिर के आगे खड़ा था. वहा�? न किल�?लेबन�?दी थी न कोई सैनिक थे. मन�?दिर के प�?जारी तथा भक�?त मन�?दिर की रक�?षा में घेरा डाले खड़े थे.
उन�?होने मन�?दिर को भ�?रष�?ट न करने के लि�? सम�?ाते ह�?�? सारी सम�?पति उसे दे देने की बात कही. पर वह केवल दौलत लेने ही नहीं आया था. उसने 50 हजार लोगो का कत�?लेआम करवाया फिर कटे ह�?�? लोगो के ऊपर से ग�?जरते ह�?�? मन�?दिर में प�?रवेश किया. वहा�? छः – सात फूट का ज�?योतिर�?लिंग था, ऊपर सोने की जंजीर से अभिषेक-पात�?र लटक रहा था. उसने जंजीर को उतरवा लिया. मन�?दिर के नीचे के कक�?षो से धन के पात�?र निकलवाये तथा अपने हाथों से शीवलिंग के ट�?कड़े किये, जिन�?हे वह लूटी गई दौलत के साथ गजनी ले गया और जामा मस�?जिद की सीढ़ियों में जड़वाया. साथ में मन�?दिर के भव�?य द�?वार भी उतरवा कर ले गया. मात�?र पर�?शियन-ग�?रंथो की ही माने तो महमूद ने तब 2 करोड़ दिरहाम जितना धन ल�?टा था.
महमूद गजनी फिर भारत को ल�?टने नहीं आया क�?योंकि 30 अप�?रेल 1030 में उसकी मृत�?य�? हो गई थी.
लगभग हजार वर�?षो के विदेशी शासन के बाद भारत आजाद ह�?आ. तब तत�?कालीन गृहमंत�?री सरदार पटेल ने सोमनाथ का प�?नर�?निमाण करवाने का निर�?णय लिया. उन�?होने महाराजा जाम-साहेब की अध�?यक�?षता में सोमनाथ ट�?रस�?ट की स�?थापना की तथा 8 मई 1950 को जाम-साहेब के हाथों मन�?दिर का शिलान�?यास करवाया. राष�?ट�?रपति राजेन�?द�?रप�?रसाद ने भी निजि रूचि लेनी श�?र�? कर दी थी. साथ ही कई राज�?यों के म�?ख�?यमंत�?रियों ने भी इस कार�?य का स�?वागत किया.
तब पण�?डितजी (स�?वतंत�?र भारत के प�?रथम प�?रधानमंत�?री) ने 2 मई 1951 को इन�?हे धर�?मनिरपेक�?षता की याद दिलाते ह�?�? पत�?र लिखा, “आप जानते हैं कि सोमनाथ मन�?दिर का उद�?घाटन होने वाला है, बह�?त से व�?यक�?तियों को इस घटना ने आकर�?षित किया हैं, इनमें मेरे क�?छ साथी भी शामिल हैं. ...मैं आप लोगो से कहना चाहता हू�? कि आपको हमारी धर�?मनिरपेक�?ष नीति को ध�?यान में रखते ह�?�? �?से समारोह से दूर रहना चाहि�?.”
उद�?घाटन 11 मई 1951 को राष�?ट�?रपति राजेन�?द�?र प�?रसाद करने वाले थे. पण�?डितजी ने उन�?हे पत�?र लिखा,”उद�?घाटन समारोह में आप शामिल हो यह म�?�?े अच�?छा नहीं लगेगा. व�?यक�?तिगत रूप से मेरा मानना है की सोमनाथ के इतने बड़े निर�?माण की कोई आवश�?यकता नहीं थी. परंत�? जब �?सा हो ही गया है तब आपको इसके उद�?घाटन पर अध�?यक�?ष पद नहीं सम�?भालना चाहि�?.”
परंत�? पण�?डितजी का यह कथन राष�?ट�?रपति राजेन�?द�?र प�?रसाद को पसन�?द नहीं आया और उन�?होने नियत दिन स�?बह 9 बज कर 47 मिनट पर ज�?योतिर�?लिंग की स�?थापना की.
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