लेन्दुप दोर्जी काज़ी अपने घर की खिडकी से देखते हैं कि भारतीय सेना गंगटोक की सडकों पर फ्लेग मार्च कर रही है. शाही निवास चारों तरफ से घिर चुका है और राज परिवार नाम का रह गया है. जल्द ही सिक्कीम की भारत में विलय की घोषणा हो जाएगी, और उनका स्वप्न भी पुरा हो जाएगा. सत्ता लोगों के हाथो मे होगी और वे प्रधानमंत्री से मुख्यमंत्री बन जाएंगे. फिर भी वे खुश हैं.
इससे पहले लेन्दुप दोर्जी काज़ी ने एक लम्बी लडाई थी. उन्हे यह कतई मंजूर नही था कि एक भुटिया-लेपचा वोट छ: नेपाली वोट के बराबर होगा. उन्हे यह भी मंजूर नहीं था कि राजा की विलासीता का भोग आम जनता को उठाना पडे. उन्हे लगने लग गया था कि अब इसे हमेशा के लिए बदल देने का समय आ गया है. अब प्रजा के शासन का समय आ गया है.
लेन्दुप दोर्जी काज़ी सिक्कीम कोंसिल के सदस्य थे, और वे आगे जाकर सिक्कीम राज्य के पहले मुख्य मंत्री भी बने.
16 मई 1975 के ऐतेहासिक दिन भारतीय सेनाओं द्वारा सिक्कीम राजमहल को घेर लिया गया. अपने राज्य में बढ रही अराजकता एवं जनता के भारी विरोध के चलते सिक्कीम का राज परिवार पहले ही पंगु हो चुका था. इस दिन सिक्कीम विधिवत रूप से भारत का 22वां राज्य बना और लेन्दुप दोर्जी काजी पहले मुख्यमंत्री बने. सिक्कीम के लोगों का सपना पुरा हुआ.
सिक्कीम का इतिहास बहुत पुराना है. सन 1200 में तिब्बत के राजकुमार गुरू ताशी को दक्षिण की यात्रा करने की ईच्छा जागृत हुई. वे अपनी पत्नी एवं पाँच बच्चों के साथ दक्षिण की यात्रा पर निकले और चलते चलते शाक्य गणराज्य (अब सिक्कीम और दक्षिणीप्रदेश) में पहुँचे. वहाँ किसी मठ का निर्माण कार्य चल रहा था और मजदूर किसी भारी स्तम्भ को स्थापित करने के लिए जूझ रहे थे. गुरू ताशी का बेटा ख्ये बुमशा मजबूत कद काठी का था. उसने अपने हाथों से स्तम्भ को खडा कर दिया जिसे देख लोग दंग रह गए.
ख्ये बुमशा ने अपने नाम को चरितार्थ किया था. क्योंकि ख्ये बुमशा का मतलब "दस हजार से अधिक शक्तिशाली " होता है.
शाक्य राजा भी ख्ये बुमशा से अत्यधिक प्रभावित हुआ और उसने अपनी बेटी का विवाह उससे किया. इसके बाद ख्ये बुमशा एवं उसकी पत्नी वहीं निवास करने लगे.
उस समय सिक्कीम के इलाकों में बोद्ध मठों का ही राज्य चलता था और उसके निरीक्षक लेपचा कहलाते थे. ख्ये बुमशा की पत्नी को संतान सुख नहीं था और वे सिक्कीम के लेपचा थेकोंग टेक के पास आशीर्वाद लेने जाते थे. धीरे धीरे उनमें गहरी मित्रता हो गई. ख्ये बुमशा की पत्नी को बाद में तीन पुत्र हुए.
ऐसा माना जाता है कि थेकोंग टेक ने अपनी मृत्यु से पहले ख्ये बुमशा को अपना राज्य सम्भालने की जिम्मेदारी दी थी. और इस तरह से सिक्कीम का शासन धीरे धीरे बुमशा परिवार के हाथों मे आ गया था.
थेकोंग टेक की मृत्यु के बाद सिक्कीम छोटे छोटे टुकडो मे बँटने लगा था और अलग अलग मठ अलग अलग प्रदेशों मे निजी शासन करने लग गए थे. यह सिलसिला लम्बे काल तक चला और अंत में ख्ये बुमशा की पाँचवी पीढी के फुटशोंग नामग्याल सिक्कीम के पहले चोग्याल (राजा) बने.
उन्हे तीन दिशाओ से आए तीन धार्मिक गुरूओं का तथा मठो का समर्थन प्राप्त था.उस समय सिक्कीम बहुत बडा राज्य था और उत्तर में हा जोंग (भुटान), पश्चीम में अरूण नदी (नेपाल), और जलपाइगुडी पश्चीम बंगाल तक फैला हुआ था.
लेकिन आगे चल कर सिक्कीम में कई बार आक्रमण हुए. कभी तिब्बतीयों ने तो कभी नेपाली सेनाओं ने सिक्कीम पर लगातार हमले बोलकर उसका अधिकांश हिस्सा अपने कब्जे में कर लिया था.
सन 1800 में भारत में ब्रिटीश राज के आने के बाद ब्रिटेन ने नेपाल और सिक्कीम में सन्धि करवाई और सिक्कीम का अधिकतर हिस्सा जो नेपाल ने उससे जीत लिया था; उसे वापस मिल गया.
लेकिन ब्रिटीश हुकुमत कभी भी सिक्कीम के राज परिवार के साथ नहीं थी. ईस्ट इन्डिया कम्पनी ने जिस तरह से भारतीय राजाओं को छल, कपट और भय से विभाजीत और पंगु कर दिया था. कुछ ऐसा ही खेल वे सिक्कीम के राज परिवार के साथ खेलते थे. कहने को तो सिक्कीम और ब्रिटीश हुकुमत मित्र थे और उनका एक ही शत्रु था – नेपाल. लेकिन वस्तुत: ब्रिटीश हुकुमत की नज़र सिक्कीम की खुबसुरत वादियों पर पड चुकी थी जिसे वो किसी भी किमंत पर हासिल करना चाहती थी.
सन 1828 में माल्दा के जे. ग्रांट और केप्टन लोयड ब्रिटीश राज की तरफ से दार्जिलींग जाते हैं जो उस समय सिक्कीम और नेपाल की बीच विवाद का एक मुद्दा होता है. वहाँ जाकर वे दोनों दार्जिलींग की खूबसुरती से अत्यधिक प्रभावित हो जाते हैं और उन्हे दार्जिलींग में भावि पर्वतीय स्थल नज़र आने लग जाता है. आगे जो होता है वह भारत में कई अन्य स्थानो पर दोहराई जा चुकी कथा है. ब्रिटीश शासन सिक्कीम से दार्जिलींग 3000 रूपये सालाना की दर पर लीज पर ले लेता है और फिर कभी लौटाता नही है.
सन 1849 में दो ब्रिटीश चिकित्सक सर जोसेफ हुकर और डॉ. केम्बेल गैर कानुनी रूप से सिक्कीम में प्रवेश करते है और सिक्कीम सेना द्वारा गिरफ्तार कर लिये जाते हैं. इसकी कडी प्रतिक्रिया होती है और आगे चलकर सिक्कीम ब्रिटीश शासन की आंखो की किरकिरी बन जाता है. धीरे धीरे ब्रिटीश राज अपने पाँव फैलाने लग जाता है और दार्जिलींग और कई अन्य प्रदेशों पर अधिग्रहण के बाद सिक्कीम में ब्रिटीश गवर्नर की भी नियुक्ति कर दी जाती है और सिक्कीम का शाही परिवार कठपुतली बनकर रह जाता है.
1947 में भारत को ब्रिटीश राज से मुक्ति मिलती है. सिक्कीम में एक जनमत सर्वेक्षण करवाया जाता है जिसमें लोग बहुमत से फैसला लेते हैं कि सिक्कीम का भारत में विलय ना किया जाए. तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सिक्कीम को भारत सरंक्षित प्रदेश घोषित करते हैं और सिक्कीम के विदेशी मामले, रक्षा और संचार भारत अपने हाथों मे ले लेता है.
सन 1955 मे सिक्कीम मे एक राज्य कौंसिल बनती है जो प्रशासन का कार्य देखने लगती है. और इसके साथ ही सिक्कीम राज परिवार और सिक्कीम राज्य कौंसिल के बीच घर्षण भी शुरू हो जाता है.
सन 1963 में सिक्कीम के राजकुमार पाल्देन नामग्याल अमरीकी सुन्दरी होप कुक से विवाह करते हैं. होप कुक अति महत्वाकान्क्षी थी. सन 1965 में राजा ताशी नामग्याल के देहांत के बाद उसे और उसके पति पाल्देन नामग्याल को विलासीता की लत लग चुकी होती है.
ताशी नामग्याल की मृत्यु के बाद पाल्देन नामग्याल ने राजगद्दी सम्भाली थी और पहले से ही रूष्ट प्रजा के प्रति और निष्ठुर कदम उठाने लग गए थे. प्रजा का आक्रोश बढने लग गया था. लेंग्दुप दोर्जी काज़ी के नेतृत्व में गुस्साए लोग राजमहल पर आक्रमण करने लग गए थे. अपने पडोसी देश में फैल रही अराजकता ने भारत के कान खडे कर दिए थे. सन 1975 में सिक्कीम के प्रधानमंत्री लेंग्दुप काज़ी भारत से आग्रह करते हैं कि वह कुछ कडा कदम उठाए और उनके देश को अराजकता से मुक्ति दिलाए.
भारतीय सरकार अंत तक इंतजार करती है, लेकिन सिक्कीम के हालात लगातार बिगडते ही जाते हैं. अंतत: भारतीय सेना सिक्कीम मे प्रवेश कर जाती है और मात्र दो दिन में पुरे सिक्कीम पर भारत का कब्जा हो जाता है.
राजपरिवार को तब तक नजरबन्द कर लिया गया होता है. और उसके बाद उन्हे देश छोडकर जाने की अनुमति दे दी जाती है. एक जनमत सर्वेक्षण करवाया जाता है जिसमें 97% लोग सिक्कीम के भारत मे विलय को मंजूरी देते हैं, इस तरह से आखिरकार सिक्कीम भारत का अंग बनता है. लेन्दुप दोर्जी पहले मुख्य मंत्री बनते हैं.
अंतिम राजा पाल्देन नामग्याल और उनकी पत्नी होप कुक के बीच मतभेदो के चलते उनका तलाक हो जाता है. पाल्देन नामग्याल की सन 1980 में कैंसर से मृत्यु होती है.
सन 2003 मे चीन ; जो आजतक सिक्कीम को भारत का हिस्सा नही मानता था; ने भी सिक्कीम को भारत के अभिन्न अंग के रूप मे मान्यता दे दी है.
आज सिक्कीम पर्वत मालाओं से घिरा एक खूबसुरत प्रदेश है. समूद्र तल से 8000 मिटर की ऊँचाई पर स्थित सिक्कीम हिमालय की गोद में बसा हुआ है जिसके चारों ओर बर्फ से ढकी पर्वतमालाएँ और खूबसुरत वादियाँ हैं. भारत की सबसे ऊँची पर्वत चोटी कंचनजंघा यहीं है. यहाँ की पर्वतशृंखलाएँ खेती के लिए वैसे तो अनुपयुक्त है, लेकिन फिर भी वहाँ आधुनिक तकनीक की बदौलत उपरी पठारी इलाकों में खेती होती है.
सिक्कीम का विकास दर दिल्ली के बाद सबसे अधिक है. और 6 जुलाई को नाथुला पास; जो कि भारत को तिब्बत से जोडता है; के खुलने के बाद अब स्थानीय अर्थव्यवस्था को और अधिक मजबुती मिलने की उम्मीद है.
सिक्कीम एक छोटा सा पर्वतीय राज्य है लेकिन फिर भी यहाँ की प्रति व्यक्ति आय 11,356 रूपये है जो सिक्कीम को देश के सबसे धनी राज्यों मे से एक घोषित करती है.
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