कल्पना के घोड़े पर सवार, पत्रकार
घटना को सामने लाना पत्रकार का दायित्व है या अपनी सोच के आधार पर निर्णय सुनाना और काल्पनिक कथाएं घड़ कर साम्प्रदायिकता फैलाना?
घटना को सामने लाना पत्रकार का दायित्व है या अपनी सोच के आधार पर निर्णय सुनाना और काल्पनिक कथाएं घड़ कर साम्प्रदायिकता फैलाना?
वे जो अपने लिए नया डूमेन खरीदना चाहते है, उनके लिए यह सही समय है. इस समय वे शानदार ऑफर का लाभ उठा कर अच्छी खासी बचत कर सकते है.
वे पढ़ीलिखी है. न भी है तो भी अर्थार्जन करती है. कार्यालय जाती है, शाम को घर लौटती है मगर उसे पुरूषों वाली सुविधा नहीं मिलती. अगर पुरूष सिगरेट पी सकता है तो आप भी पी सकती है. सिगरेट पियें, दारू पियें, चरस लें. मगर आजादी के नाम पर नहीं.
ये आघात जनक समाचार है. समीरलाल उड़नतश्तरी वाले आत्महत्या का विचार कर रहे हैं, वहीं दुर्योधन के हाथों पीटे शिवकुमार मिश्र दवा-दारू में व्यस्त बताए जा रहे हैं. इधर अनूप शुक्ल को एटीएस ने गिरफ्तार किया है.
बड़ा अजीब सा किस्सा है. ईसा की तस्वीर छपी है जिसमें वे सिगरेट-बीयर को हाथों में थामे हुए है. वैसे ही जैसे बहुत बार विज्ञापनों में भारत का नक्शा गलत छपता है. कभी कभी समाचारों के साथ “उप्स” मुँह से निकले ऐसी तस्वीर छप जाती है.
देश के लिए आंतरिक चुनौती बने इस लाल आतंक का क्या कोई इलाज है? हिंसक नक्सलवाद से पार पाने का एक सफल प्रयोग भारत के ही एक कोने में हुआ है. यह कोना जहाँ नक्सलवाद का उदय हुआ वहाँ से ठीक विपरित दिशा में है. यहाँ के लोगों ने युद्ध व हथियार छोड़ कर शांति और समृद्धि को गले लगाया है.
बेकाबू बढ़ती आबादी. फिर भी सेक्स पावर में कहीं कमी सी महसूस होती है. शेर सी ताकत के लिए बाघ के नख से लेकर दाँत-आँत-आँख-अंडाशय, सब चबा गया इनसान.
आपके साथ यही समस्या है, झट से किसी नतीजे पर पहुँच जाते हो और किसी को भी दोष देने लगते हो. आप ठहरे अज्ञानी. महान पत्रकार, चिंतक, सेक्युलर मीडिया कर्मी हमारी आँखे हमारी आँखे खोलने वाला लेख लिखा है…
ठाकरे की हवा निकल जाने की बाते जिस तरह मीडिया व अन्य माध्यमों ने उछाली है वह सरासर झूठ है. युवराज के लिए ‘भाँड-राग’ अलापना हो तो अलग बात है.
यह आप पर है, भाव घटाने के लिए जो चाहे करें. बस याद रखना आपने मुझ पर जवाबदारी डाली तो मैं आप को लपेट लुंगा. कोई उपाय ध्यान में है? है ना, उपाय तो है ही.
बताओ…..