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भारत, संस्कृति और समलैंगिकता

कानून धार्मिक आधार पर नहीं, वैज्ञानिक सोच के आधार पर और समाज के कल्याण को ध्यान में रख कर बनाए जाते है. स्त्री देह में पुरूष या इससे उल्टा हो तो उसकी व्यक्ति की कशमकश को समझना उतना सरल नहीं है. यह भी है कि मौज मजे के लिए समलिंगी सम्बन्ध और समलैंगिता के समर्थन में भौंड़ी परेड़ का भी समर्थन नहीं किया सकता. सभ्य समाज में स्वछंद उद्दंडता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए.

[ आगे पढ़ें ] जून 30th, 2009 | 28 टिप्पणियाँ | श्रेणी लोकाचार में |

बलात्कार का एक पहलू दंभ की तुष्टि भी हैं.

बदचलन (?) हो या कॉलगर्ल हो क्या उससे हुआ बलात्कार कम दुखदायी या कम बड़ा अपराध हो जाता है? क्या वे आम महिलाओं की तरह इंसान नहीं होती? ज्यादातर बलात्कार की घटनाओं में शारीरिक आवेग कम अपने दंभ की पुष्टि करने का भाव ज्यादा जिम्मेदार होता है. किसी से बदला लेने का यह सबसे भयानक व पाशविक तरीका है.

[ आगे पढ़ें ] जून 17th, 2009 | 20 टिप्पणियाँ | श्रेणी लोकाचार में |

क्यों छोड़े कोई ब्लॉगिंग? सोचो जरा

भारी दुविधा सी है. क्या, कुछ करना चाहिए या मामले में टाँग डाले बिना मौन धारण कर लेना चाहिए. मेरा उद्देश्य विवाद खड़े करना नहीं है, टिप्पणी पाना भी नहीं है, एक विचार करने का मौका देना है. कृपया देखें कि कहाँ गड़बड़ है. हिन्दी ब्लॉगिंग अभी अंग्रेजी जैसी नहीं है. चिट्ठे जारी रहे यह जरूरी है.

[ आगे पढ़ें ] जून 15th, 2009 | 30 टिप्पणियाँ | श्रेणी बस यूँ ही में |

जानकारी के विक्रमादित्य है ब्लॉग

यहाँ बता देना चाहता हूँ कि मुझे किसी साइट पर नहीं ब्लॉगों पर ज्यादा जानकारी मिलती है. ब्लॉग अगर इतने ही उपयोगी है तो फिर क्या वजह है कि 95% ब्लॉग अपडेट ही नहीं हो रहे या दूसरे शब्दों मे कहें तो लगभग बंद हो चुके हैं.

[ आगे पढ़ें ] जून 9th, 2009 | 13 टिप्पणियाँ | श्रेणी जानकारी में |

हथियार उठाए गाँधीवादी नायक, फिल्मी जो है.

क्या कोई गाँधीवादी हथियार उठा सकता है या उसका समर्थन कर सकता है? पूरी फिल्म में भले ही गाँधीवाद से समस्याओं को सुलझते दिखाया हो, अंत में हथियार का ही उपयोग हुआ है. यह कुछ अखरने वाली बात है.

[ आगे पढ़ें ] जून 8th, 2009 | 10 टिप्पणियाँ | श्रेणी बस यूँ ही में |

एक अलबेला ब्लॉगर मिलन

अलबेला ब्लॉगर मिलन इस लिए क्योंकि यह कवि अलबेलाजी के साथ था. कल अलबेलाजी जरा सजधज के आए थे. परिचय तो पहले दिन हो ही चुका था. तो बातचीत का सिलसिला चला. ये ब्लॉगजगत में एकदम ताज़ा ताज़ा उदित हुए है…

[ आगे पढ़ें ] जून 5th, 2009 | 12 टिप्पणियाँ | श्रेणी जानकारी में |

ये तड़प जरूर गजब ढाएगी

वे अभी भी भटकना और स्टोरी लाना और छापना या दिखाना चाहते है. मगर छापेगा कौन? दिखाएगा कौन? मीडिया मालिकों को स्टोरी नहीं, मात्र विज्ञापन चाहिए. या फिर वे अब निष्पक्ष नहीं रहे है. व्यवस्था-सुविधा-विचारधारा के आगे घुटने टेक चुके हैं.

[ आगे पढ़ें ] जून 4th, 2009 | 14 टिप्पणियाँ | श्रेणी लोकाचार में |

नीले तारे की चमक अतीत की बात हुई

सब कुछ फिर से दोहराए जाने जैसा लगता है तब एक कमी जरूर खलती है, केन्द्र में मजबूत जनाधार वाली सरकार है ना मजबूत इरादों वाली इन्दिरा जैसे नेता है. आतंकवादियों को सरकारी मेहमान बना कर रखने वालों से ऑपरेशन ब्लू-स्टार जैसे कदम की आशा तो नहीं रखी जा सकती ना.

[ आगे पढ़ें ] जून 3rd, 2009 | 4 टिप्पणियाँ | श्रेणी राष्ट्ररंग में |

रोजगार योजना कहीं निक्कमेपन को प्रोत्साहन तो नहीं

जितना धन इस योजना के अंतर्गत खर्च हो रहा है, अगर उतना (और गुणवत्ता वाला भी) निर्माण कार्य ग्रामीण क्षेत्रों में हो तो भारत की शक्ल बदलते कितनी देर लगेगी. मगर क्या सचमुच में ऐसा हो रहा है?

[ आगे पढ़ें ] जून 1st, 2009 | 10 टिप्पणियाँ | श्रेणी लोकाचार में |

मटका बनाम मशीन

घर में भी ठंडा और तृप्त करने वाला पानी उपलब्ध है. पानी इतना ठण्डा होता है कि तृप्ति मिलती है और इतना अधिक भी ठंडा नहीं होता कि गला खराब हो जाए.

[ आगे पढ़ें ] मई 26th, 2009 | 25 टिप्पणियाँ | श्रेणी पर्यावरण में |

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