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पानी में कितना पानी

November 11th, 2006 | 5 टिप्पणियाँ | श्रेणी में

यह सृजन-शिल?पी की प?रविष?टी के पहले पेरेग?राफ के लि? लिखा गया है. इससे पहले मैंने उन?हे टिप?पणी में यह लिखा था की पा?च सितारा स?कूल क?यों नही खोले जाने चाहि?. तथा कोला का विरोध करने से कैसे आम आदमी को पानी उपलब?ध हो जा?गा. यहा? यह भी बता देना चाहता हू? की हो सकता है कोला कम?पनियों का विरोध करने वाले कभी सोफ?ट ड?रींक पीते हो, मैं सोफ?ट ड?रींक न पीता हू? न पीलाता हू?.

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?क दिन हमें महस?स ह?आ की चारचक?री वाहन ले लेना चाहि? तो हम पह?ंचे गाड़ीयों के शो-रूम और थैला भर नोट पकड़ा कर चाबी अपने कब?जे में करने ही वाले थे की ?क श?रीमान मे हमारी कोलर पकड़ ली. बोले शर?म नहीं आती, लाखो लोगों के पास पहनने को चप?पल नहीं है, हजारों के पास स?क?टर तो क?या साइकल तक नहीं है और त?म कार खरीदना चाहते हो. आज छोटी कार ले रहे हो कल सिने-सितारों के विज?ञापन देख बड़ी कार खरीदोगे. इतने पैसों से कितने लोगो को चप?पल या साइकिले मिल सकती है यह सोचा है कभी.
त?म कार खरिदोगे तो उसे चलाने के लि? सड़के बनवानी पड़ेगी, यहा? कच?चे रस?ते तक नहीं और त?न?हारे लि? सड़के बनवाओ. फिर त?म?हारी सड़क के लि? गरीब की ?ोपड़ीया? हटाई जा?गी वो अलग. अरे देश-द?रोही इतना तो सोच पेट?रोल क?या तेरे घर पर पैदा होगा? उसे बाहर से मंगवाना पड़ेगा. खाने को दाना नहीं, यहा? मंहगा तेल मंगवाओ त?म?हारे लि?. क?यों देश का पैसा बरबाद करते हो.

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क?या हमें कार इसलि? नहीं खरीदनी चाहि? क?योंकि कोई साइकिल नहीं खरीद सकता? क?या हमें अच?छे स?कूल नहीं खोलने चाहि?, सिर?फ इसलि? की किसी को प?ने के लि? स?कूल उपलब?ध नहीं है?
?क तर?क यह भी दिया जाता है, महंगे स?कूल ख?लने से समर?थ लोगो के बच?चे उनमें प?ेंगे तथा कमजोर लोगो के बच?चे सस?ते या सरकारी स?कूलो में प?ेंगे. यह असमानता होगी इसलि? महंगे स?कूल नहीं खोले जाने चाहि?. ठीक हैं, आप कम से कम ?क छोटे से फ?लेट में तो रहते होंगे. लेकिन ?क बड़ी संख?या में लोगो के पास ?ोंपड़ी भी नहीं है, तो क?या आप अपने फ?लेट का त?याग करने को तैयार हैं? नहीं ना. तो फिर किसी से कैसे कह सकते हैं की वह अपना बंगला या महल त?याग दे.
अब आवास की जगह स?कूल को रख कर सोच लिजीये.

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यहा? बात समाप?त नहीं होती है यह अभी जारी रहेगी पर समयाभाव के कारण आज नहीं लिख पाऊंगा. पर इतना जरूर बता देना चाहता हू?, मैं कार का उपयोग सम?भव हो उतना कम करता हू? तथा आस-पास के काम पैदल या फिर साइकील पर निपटाता हू?, क?योंकि अंधाधूंध दोहन से पृथ?वी का फल?दा बन जा?गा. मेरी कथनी और करनी में फर?क नहीं है. किसी से कहने से पहले ख?द अमल करता हू?. रही बात मेरी विचारधारा की तो यह किसी नेता या साधूबाबा से प?रेरीत नहीं है, अध?ययन तथा अन?भव से बनी है इसलि? बदलाव का तो प?रश?न ही नहीं उठता.

***
छूट ग? म?द?दो पर अभी जारी…

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5 प्रतिक्रियाएं to “पानी में कितना पानी”

  1. Amit Says:

    सही कहा संजय भाई, मैं पूर?णतया सहमत हू?। और आपके साथ सहमती जताने के लि? जल?द ही मैं भी अपना तोपखाना लेकर हाज़िर होऊ?गा। :)

  2. अन?राग श?रीवास?तव Says:

    मैं सहमत हूं, समाजवादी मानसिकता की उपज “गरीबी हटाओ” ने गरीबी तो नहीं हटाई, हां यह जरूर किया कि मेहनत से अमीर बने लोगो को भी ?से देखा जाने लगा कि वह कालाबाज़ारी ही करते होंगे. अजीब लोग हैं हम गरीबी तो हटा नहीं सहे और अमीरों से भी नफ़रत करने लगे.

    किसी भी हिन?दी फ़िल?म में देखिये सेठ हमेशा बेईमान और ठ?ग?आ ही दिखाया जाता है और मजदूर हमेशा मेहनती और ईमानदार. डायलाग क?छ यूं,” सेठ हम गरीब ज़रूर हैं लेकिन चोर नहीं” – हां भैया इस देश में सारी चोरी “टाटा”, “बिरला” और “आंबानी” करते हैं….(sic)

    मेहनत करो – कमाओ, कार क?या भैये हवाई जहाज़ खरीदो. इंशाअल?लाह इस देश में सबके पास हवाई जहाज़ हो.

    वक?त आ गया है कि गरीबी से फोकस हटा कर अमीरी पर फोकस किया जाये और “गरीबी हटाओ” से “अमीरी लाओ” की ओर ब?ा जाये.

    विदेश से आया तेल कार में भर कर चलाओ कोई बात नहीं लेकिन विदेश का कोका कोला पीने से हम देश विरोधी हो जाते हैं – कैसे दोहरे मापदण?ड!

    संजय जी लगे रहो……

  3. आशीष Says:

    संजय भाई,
    मै आपसे पूरी तरह सहमत ह?ं| इन तथा कथित समाजवादियो ने देश का सबसे बडा न?कसान किया है| क?या कर लिया देश ने ४० साल समाजवाद की लाश ढो कर ? त?लना किजिये जो उदारीकरण के १० सालो मे ह?आ वो समाजवाद के ४० सालो मे नही ह?आ !
    पेप?सी कोला भारत आ रहे है तो क?या ह?आ ? विडियोकान टाटा भी तो भारत से बाहर जा रहे है |

  4. प?रियंकर Says:

    बात चारचक?री या आठचक?री वाहन खरीदने नहीं है . खून-पसीने की कमाई से हवाईजहाज खरीदिये ना किसे आपत?ति है. हां !सामाजिक और राष?ट?रीय महत?व के म?द?दे पर चोंच खोलने के पहले थोड़ा सोच-विचार कर लेना चाहि? . क?तर?क से तथ?य और सत?य नहीं बदलते. विकास का मतलब है सबको शिक?षा-स?वास?थ?य और आवास . विकास का अर?थ है सबको समान अवसर . पर कई ?कआयामी लोग विकास का अर?थ सिर?फ़ फ़?लाईओवर,मॉल, मल?टीप?लेक?स और उपभोक?ता सामानों के अम?बार से लेते हैं . उनकी सम? पर तरस ही खाया जा सकता है .यह अश?लील जीवनशैली वाले सम?पन?न उच?चवर?ग की ओर लोल?प निगाहों से ताकता अवसरवादी मध?यवर?ग है जो वैसा ही बनने की लालसा रखता है. यह वर?ग सोचता है कि तथाकथित विकास के नाम पर हो रही लूट में थोड़ी-बह?त हिस?सेदारी उसकी भी हो. हालांकि उसके हाथ तलछट ही आती है,पर वह उससे ही संत?ष?ट है.अपने से संपन?न के आगे रिरियाओ और अपने से कमजोर को लतियाओ,यही इस वर?ग का मूल मंत?र है. और रहा देश तो वह भाड़ में जा?. देश ने हमें दिया ही क?या है.हम आज जो भी हैं अपने बल पर पर हैं. इस तरह की सोच वाले वर?ग से किसी गम?भीर विमर?श की उम?मीद करना बेकार है .

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  1. world from my eyes - द?निया मेरी नज़र से!!  

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