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ये तड़प जरूर गजब ढाएगी

June 4th, 2009 | 14 टिप्पणियाँ | श्रेणी लोकाचार में

चिट्ठाजगत से जुड़ने के बाद बहुत से पत्रकारों से, लेखकों से पहचान हुई. अब उनसे बातचीत होती है और कभी कभी मुलाकात भी होती रहती है.

जाहिर है, पत्रकारों से बात होगी तो विषय भी उन्ही के क्षेत्र का होगा. अखबार हो या उनकी समाचार साइट वहाँ से दिन प्रति दिन समाचार गायब होते जा रहें है. समाचार पत्र चलाने वालों की अपनी मजबूरियाँ हो सकती है. एक व्यवसायी के रूप में मैं उन्हे समझ सकता हूँ. मगर हर व्यवसाय का अपना एक सिद्धांत होता है. लोग समाचारपत्र समाचार जानने के लिए खरीदते है, अगर वही आप (निष्पक्ष) नहीं देते हैं तो यह बेईमानी है. ऐसे में आपको अपना काम छोड़ देना चाहिए नहीं तो लोग आपको वैसे भी नकारने वाले हैं.

विज्ञापन लेना और छापना एक अनिवार्य मजबूरी है, मगर धीरे धीरे विज्ञापन इतने महत्त्वपूर्ण हो गए कि उनके लिए समाचारों पर कैंची चलने लगी. फिर विज्ञापनदाताओं के हितों की रक्षा में लोकहित को ताक में रखा जाने लगा और अब तो समाचारपत्रों से (समाचार चैनलों से भी) समाचार ही गायब होने लगे है. वजह साफ है, पत्रकारों का काम “स्टोरी” जुटाना न हो कर विज्ञापन जुटाना होता जा रहा है. और जो काम पत्रकारों को करना होता है, यानी स्टोरी लाना और उसे छापना, उस स्थान को सनसनी या सॉफ्ट पोर्न से पाटा जा रहा है. हद तब होती है जब दबी जबान से कहते हुए सुना जाता है कि समाचारपत्र हो या चैनल अब विज्ञापन के बल पर भी चलाना मुश्किल होता जा रहा है, इसलिए ब्लैकमेलिंग को अपनाया जा रहा है.

इस बदलते वातावरण में ऐसे पत्रकार भी है जिनमें एक तड़प देखी जा सकती है. वे वातानुकूलित कक्ष में बैठ कर किसी राजनेता की बॉडी-लैंग्वेज की व्याख्या करना नहीं चाहते. वे अभी भी भटकना और स्टोरी लाना और छापना या दिखाना चाहते है. मगर छापेगा कौन? दिखाएगा कौन? मीडिया मालिकों को स्टोरी नहीं, मात्र विज्ञापन चाहिए. या फिर वे अब निष्पक्ष नहीं रहे है. व्यवस्था-सुविधा-विचारधारा के आगे घुटने टेक चुके हैं.

ऐसे में इन्टरनेट जैसा सशक्त, सरल व सस्ते माध्यम का महत्त्व समझ में आता है. जो बात कोई छापने को तैयार नहीं वह नेट पर कोई भी छाप सकता है.

वह दिन दूर नहीं जब समाचार साइटों पर कौए उड़ेंगे और ऐसी बहुत सी साइटें व ब्लॉग अस्तित्त्व में आएँगे जो जानकारी से भरपूर होंगे और जिन्हे पत्रकारों द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर चलाया जा रहा होगा. क्या इसकी शुरूआत नहीं हो गई है? जरा आसपास नजरें तो घूमाईए….

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14 प्रतिक्रियाएं to “ये तड़प जरूर गजब ढाएगी”

  1. ajaykumarjha Says:

    bahut hee badhiyaa baat uthaayee hai sanjay bhai…..bilkul yahee ho raha hai electronic media ke baad print bhee usee raaste par chal raha hai…halaanki abhee bhee haalaat utne nahin bigde hain……aur ye sab lala logon dwaraa akhbaar prabandhan karne ke kaaran ho raha hai….

  2. अनूप शुक्ल Says:

    सच कह रहे हैं! समय लगेगा लेकिन होगा कुछ ऐसा !

  3. सुरेश चिपलू्नकर Says:

    एकदम सही कहा आपने, समाचार पत्र एक “घटिया पेम्फ़लेट” बनते जा रहे हैं…

  4. संजय तिवारी Says:

    अगर ऐसा होता है तो निश्चित रूप से यह बहुत अच्छा होगा. कुछ प्रयोग तो शुरू भी हो चुके हैं लेकिन उन प्रयोगों को बल मिलना अभी बाकी है. मेरा ऐसा मानना है कि आनेवाले समय में दो तरह के मीडिया माध्यम उभरेंगे इंटरनेट पर.

    1. लोग अपनी वेबसाईट बनाएंगे और अपना सारा नेटवर्क इस्तेमाल करके मालिकाना हक से काम करेंगे. वे मीडिया घरानों की फोटोकापी होंगे. और अगर अच्छा कर ले गये तो इंटरनेट पर मीडिया घरानों को टक्कर भी दे सकते हैं.

    2. वे लोग होंगे जो सामूहिकता में काम करेंगे. ऐसी साईटों का जाल पैदा होगा जहां समूहगत रूप से लोग उसका संचालन करेंगे. किसी एक का मालिकाना हक नहीं होगा बल्कि सामूहिक रूप से मिलकर सभी लोग उसका संचालन करेंगे.

    इंटरनेट पर इन्हीं दो तरह के माध्यमों की प्रतिद्वदिता होगी.

  5. shyamalsuman Says:

    आपकी बातों से सहमत हूँ संजय जी। सचमुच वो समय आ रहा है, जब अखबार और न्यूज चैनल के तरफ लोग देखेंगे भी नहीं। यह भी सच है कि लोगों की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो रहीं हैं और आम जन निराश हैं इन समाचार एजेंसियों से।
    किसी की कार जब सर से गुजर जाये उसे सरकार कहते हैं।
    विज्ञापन के बाद बचे जगह की खबरों को अखबार कहते हैं।।  
     
    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

  6. बालसुब्रमण्यम Says:

    बहुत ही सामयिक मुद्दा उठाया है आपने। समाचार माध्यमों को हमारे लोकतंत्र में अहम भूमिका दी गई है। वे लोकतंत्र का चौथा खंभा और उनका काम राजतंत्र पर निगरानी रखना है। लेकिन इस दायित्व से समाचार माध्यमों ने कबका पीछा छुड़ा लिया है। वे सब अब व्यवसाय बन गए हैं। एक जमाना वह था जब सभी प्रमुख नेताओं ने अखबार निकालकर आजादी की लड़ाई में योगदान दिया था। साहित्यकारों के भी अपने पत्र-पत्रिकाएं थीं – प्रेमचंद की, प्रसाद की, महावीर प्रसाद द्विवेदी की, इत्यादि।

    अब टीवी, मुद्रित पत्रिकाओं से कोई आशा नहीं रह गई है। हां इंटरनेट, ब्लोक और पुस्तकों से अब भी निष्पक्ष जानकारी की आशा बनी हुई है। इसलिए हम सब ब्लोगरों को अपने ब्लोगों का उपयोग करके उन मुद्दों को व्यवस्थित रूप से उठाना चाहिए जिन पर समाचार माध्यम चुप्पी साधे हुए हैं।

  7. anil kant Says:

    bilkul sahi kaha aapne

  8. tasliim Says:

    पूरी तरह से सहमत।

  9. PN Subramanian Says:

    आपका आंकलन बिलकुल सटीक है. हमने तो टी.वी देखना बंद ही कर दिया है.

  10. दिनेशराय द्विवेदी Says:

    आप ने ठीक नब्ज पकड़ी है। ऐसा ही कुछ होने वाला है। जो अखबार को विज्ञापन दे उस के खिलाफ खबर होते हुए भी नहीं छपती और विज्ञापन दाता की खबर खबर न होते हुए भी छपती है।

  11. अनिल Says:

    सही कहा आपने सब कुछ विज्ञापन दाताओं के अनुसार हो रहा है ।

  12. amit Says:

    बात ये है कि क्या समाचार माध्यमों के मालिकों को यह बात समझ नहीं आती कि विज्ञापन दाता उनके यहाँ विज्ञापन तभी देंगे जब रीडरशिप/व्यूअरशिप होगी??!! आज विज्ञापन दाता को प्रसन्न करने के लिए रीडरशिप/व्यूअरशिप को नाराज़ कर रहे हैं, कल जब वह नहीं रहेगी तो विज्ञापन दाता भी चले जाएँगे क्योंकि उनके विज्ञापनों को देखने/सुनने के लिए कोई रहेगा ही नहीं!!

  13. amit Says:

    साथ में यह जोड़ना भूल गया:

    यदि रीडरशिप/व्यूअरशिप मज़बूत होगी तो विज्ञापन दाताओं को मजबूरन आना पड़ेगा क्योंकि वे पाठक/दर्शक संख्या को नज़रअंदाज़ नहीं कर पाएँगे। इसका (अनैतिक ही सही) लेकिन सबसे बढ़िया उदाहरण चीन है। याहू, गूगल जैसी जो कंपनियाँ अमेरिकी सरकार के आगे नहीं झुकीं वे चीन के आगे झुक गई क्योंकि बाज़ार को नज़रअंदाज़ वे नहीं कर सकतीं और चीन की तो सीधी सी पॉलिसी है कि यदि धंधा करना है तो सरकार की तानाशाही माननी होगी अन्यथा चीन में धंधा नहीं कर सकते!!

  14. काशिफ आरिफ Says:

    क्या बात है संजय जी, अपने सवाल का जवाब नही जानना है आपकॊ, आज मुझे आपकी कोई टिप्पणी नही मिली…

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