हिन्दी के नाम पर आजमी के साथ कतई नहीं
क्षमा करें हिन्दी के लिए मैं आजमी के साथ खड़ा नहीं हो सकता. मराठी के लिए कोई राज के साथ खड़ा होता है तो यह उसका दुर्भाग्य है. किसी एक भारतीय भाषा को नुकसान पहुँचा कर हिन्दी का भला नहीं हो सकता. नुकसान हिन्दी का हो या मराठी का अतंतः नुकसान हमारी ही भाषा का होना है.
मेरी दृष्टी में न हो आजमी हिन्दी हितैषी है न राज मराठी के. दो गुण्डें जब आमने सामने होंगे तब सदाचार की बाते नहीं होने वाली और जो हो सकता है वह विधानसभा में हम देख ही चुके हैं. इसमें अगर दोष किसी का है तो हमारा है. हमारा यानी भारतीय जनता का, जो ऐसे गुण्डा तत्वों को चुन कर भेजते है.
“तु बोल के दिखा”.
“ले बोलता हूँ क्या उखाड़ लेगा.”
फिर ढ़ीशुम- ढ़ीशुम.
बस यही मामला है. दो गुण्डों की आपसी राजनीतिक लड़ाई है. अतः इसे हिन्दी विरोधी या मराठी अस्मिता जैसे मुद्दे को मानना मूर्खता होगी. ध्यान दिया हो तो मराठी में शपथ लेने का दुराग्रह कर थप्पड़ जड़ने वाला अपनी बहादुरी के बखान हिन्दी में कर रहा था. (आजमी के बाद दो विधायको ने निर्विध्न हिन्दी में शपथ ली थी).
आजमी महाराष्ट्र से चुन कर आया है, मगर व्यवहार उ.प्र. के प्रतिनिधि सा कर रहा है. (मामला महाराष्ट्र का है और विरोध या समर्थन उ.प्र. में हो रहा है!!) यह सचमुच आपत्तिजनक है. एक राज्य से जनता के प्रतिनिधि बने हो और वहाँ की भाषा ही न आती हो यह कोई गर्व की बात नहीं है, यह शर्म की बात है. ठीक वैसे ही जैसे हमारे देश के प्रथम नागरिक को ही हिन्दी न आना शर्म की बात मानी जानी चाहिए.
विधायक मराठी में ही शपथ ले यह जितना बड़ा दुराग्रह था, उतना ही भारी दुराग्रह आजमी का भी रहा है (झगड़े की शुरूआत भी आजमी ने चप्पल दिखा कर की थी, ऐसा बताया जा रहा है) और इस दोनों के दुराग्रह ने दो भारतीय भाषाओं को आमने सामने ला खड़ा किया है.
मैं जिस तरह हिन्दु धर्म के लिए लंपट भगवाधारियों के साथ खड़ा नहीं हो सकता है वैसे ही हिन्दी के लिए आजमी और मराठी के लिए राज के साथ खड़ा नहीं हो सकता. दोनो भाषाओं को ही इन जैसे लोगों की जरूरत नहीं है.
इस सब के बाद भी हिन्दी (या किसी भी भारतीय भाषा) में शपथ न लेने देना एक गम्भीर अपराध है और दोषी पर राष्ट्रद्रोह का आरोप लगा कर कार्यवाही की जानी चाहिए. राज्य की कॉंग्रेस सरकार ऐसा करेगी? क्योंकि कॉंग्रेस ने जो खेल कश्मीर और पंजाब में खेला था वही अब महाराष्ट्र में खेल रही है. यह महाराष्ट्र के लिए कतई अच्छा नहीं है. देखें भविष्य में क्या लिखा है.













November 11th, 2009 at 11:03 am
बिल्कुल सही कहा आपने । सहमत हूँ आपसे
November 11th, 2009 at 11:25 am
सहमत हूं आपसे संजय भाई।आज़मी जैसे लोग जानबूझकर ऐसी हरकत करते हैं जिससे अलगाववाद या दुराव बढता है।राज भी इस मामले मे बराबर के दोषी हैं और मुद्दे की बात तो ये है कि ये मामला महाराष्ट्र वर्सेस यू पी बनता जा रहा है।हिंदी के पक्षधर यू पी के नेताओं ने कभी दक्षिण मे हिंदी की उपेक्षा पर कुछ नही कहा।वंहा तो माईल स्टोन पर हिंदी तो दूर अंग्रेज़ी भी नज़र नही आती,भटकते रहिये,पूछते रहिये,कोई बताने वाला भी नही।लेकिन इसका मतलब ये नही कि हिंदी के नाम पर हम भी आज़मी जैसों का स्पोर्ट करे या मराठी के नाम पर राज का।दोनो हथियार है जिसे कांग्रेस अपने फ़ायदे के लिये इस्तेमाल किये जा रही है।
November 11th, 2009 at 11:28 am
मेरी दृष्टी में न हो आजमी हिन्दी हितैषी है न राज मराठी के. दो गुण्डें जब आमने सामने होंगे तब सदाचार की बाते नहीं होने वाली और जो हो सकता है वह विधानसभा में हम देख ही चुके हैं. इसमें अगर दोष किसी का है तो हमारा है. हमारा यानी भारतीय जनता का, जो ऐसे गुण्डा तत्वों को चुन कर भेजते है.
बिलकुल, अगर आप उस दिन की विधानसभा हंगामे की टीवी फुटेज देखो तो चप्पल पैर से पहले आजमी ने ही उतारी थी आखिर समाजवादी मुलायम का चेला जो ठहरा !
November 11th, 2009 at 11:38 am
बिल्कुल सही कहा आपने । सहमत हूँ आपसे
November 11th, 2009 at 11:55 am
हिन्दी के नाम पर अबु आज़मी के साथ कत्तई नहीं खड़ा हुआ जा सकता । मराठी और हिन्दी को आमने खड़ा करने वाले अंग्रेजी के दलाल हैं ।
November 11th, 2009 at 11:56 am
ये लोग जो भी करते हैं या करने वाले होते हैं वो डंके की चोट पर करते हैं …..और उसके बावजूद उन्हें रोकने का कोई प्रयास नहीं किया जाता !!! कमाल है !!!??
November 11th, 2009 at 12:05 pm
हमें हमेशा मूल मुद्दों से भटका दिया जाता है | अबू आज़मी चाहे जैसा हो लेकिन सदन के अन्दर उसके साथ हुए बर्ताव को संविधान के प्रति अक्षम्य अपराध माना जा सकता है और किसी भी दृष्टि से राज ठाकरे और उसके गुंडे अधिक दोषी हैं | आज़मी तो वैसे भी जोकर है |
November 11th, 2009 at 12:06 pm
सहमत.
November 11th, 2009 at 12:18 pm
बहुत सही विचार! बहुत ही अच्छा पोस्ट!!
November 11th, 2009 at 12:30 pm
Testing
November 11th, 2009 at 12:31 pm
बाबा सिद्दीकी की अंग्रेजी में ली गई शपथ से राज को आपत्ति नहीं है लेकिन अबू आजमी की हिन्दी में ली गई शपथ से आपत्ति है क्यो …,पहले जै भारत है फिर जै महाराष्ट्र……
November 11th, 2009 at 12:43 pm
आप से सहमत हूँ। भाषा को अभिव्यक्ति का औजार होना चाहिए। आपसी राजनीति और गुंडागर्दी का नहीं। एक ने मराठी को राजनीति का औजार बनाया तो दूसरे ने हिंदी को। दोनों ही भावनात्मक शोषण कर रहे हैं। जो बात मैं कहना चाहता था आप ने कह दी।
November 11th, 2009 at 12:47 pm
तो हमें राज ठाकरे को इसलिए बरी कर देना चाहिए के उन्होंने अबू आज़मी को पीटा …अबू आज़मी खुद एक संदिग्ध चरित्र वाले इन्सान है …सब जानते है ….पर किसी व्यक्ति को देश के एक राज्य के सदन में उत्पात ओर गुंडागर्दी मचाने का हक है ? लोग शोर मचाते है इस देश में कानून व्यवस्था नहीं है …..कानून तो पूरे है भाई ….उन्हें लागू करने का जिगर नहीं है .सब के सब नपुंसक है ….टी एन शेषण के आने से पहले किसी को मालूम था के चुनाव आयोग के पास इतने अधिकार है ……हमने तो देखा के जेट एयरवेज का पंगा हुआ तो भी कर्मचारी राज ठाकरे के पास गए ….तो क्या लोगो का मौन समर्थन उन्हें प्राप्त है ऐसा माना जाये?मुझे नहीं मालूम के राज ठाकरे ने आज तक महाराष्ट्र से बाहर कभी कदम रखा है या नहीं …या उनके बच्चे ठेठ मराठी स्कूल में पढ़ते है या नहीं ?जहाँ उन्हें दुनिया की कोई दूसरी भाषा नहीं सिखाई जाती ……कोंग्रेस नहीं हमाम में सब नंगे है ..एक से सौ तक ….
.इस देश में ऐसे कानून क्यों नहीं बनते जिसमे किसी भी अपराधिक चरित्र वाले व्यक्ति को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाये ….
क्यों नहीं किसी उम्मीदवार की न्यूनतम शैक्षिणिक योग्यता तय हो
बंद या ऐसे किसी झगडे से हुए नुकसान का सारा आर्थिक दंड दुगुने तौर ओए सम्बंधित नेता या उसकी पार्टी से वसूला जाये …
November 11th, 2009 at 1:15 pm
महाराष्ट्र मे हिन्दी को लेकर आम जनता को कोई समस्या नही है| आप महाराष्ट्र मे कही भी जायेँ, हिन्दी मे बात करे, जिसे हिन्दी बोलते नही आती वह आपको मराठी मे जवाब देगा लेकिन आप क्या कह रहे है वह समझ जायेगा| किसी को शीकायत है तो वह है राज ठाकरे नामका गुण्डा|
ऐसे भी जो कुछ हुआ वह राज ठाकरे और अबू आजमी की व्यक्तिगत खुन्नस ज्यादा है| अबू आजमी के बाद २ विधायको ने हिन्दी मे, एक विधायक ने अँग्रेजी मे, २ विधायको ने सन्स्कृत म शपथ ली| उन्हे कोई कुछ नही बोला|
राज ठाकरे जैसे गुण्डे को शायद यह मालूम नही कि महाराष्ट्र मे गोण्दिया नाम का एक शहर है जिसकी नगर पालिका पुर्णत: हिन्दी मे काम करती है| विदर्भ के अधिकतर जिलो/नगरो मे मराठी कम हिन्दी ज्यादा बोली जाती है|
November 11th, 2009 at 1:49 pm
संजय भाई आप सही कहते है, सहमत हूँ आपसे लेकिन मुझे समझ नही आता की ज्यादातर लोग मेरी ही तरह अगर आपसे सहमत है तो ये लोग कैसे चुनकर विधानसभा में पहुच जाते है, ऐसा पहली बार भी नही हो रहा ये तो हमेशा होता आया है कोई कभी हिन्दी के नाम वोट मांगता है तो कोई मराठी के नाम तो कोई धर्म के नाम।
राज ठाकरे और उनके साथी जो हिन्दी में सपथ का बिरोध करते है और मराठी में सपथ लेने को कहते है। उनके घर में उनके बच्चे भी मराठी बोलते हो तो संदेह है क्योकि उनके बच्चे तो ख़ुद अंग्रेजी मीडियम के स्कूल में पड़ते है। अब ये बात कौन कहे। राज ठाकरे जी सिर्फ़ आपनी राजनीती कर रहे है और भोली भली जनता को बेवकूफ बना रहे है और जनता भी तैयार है बेवकूफ बन्ने को.
November 11th, 2009 at 4:17 pm
आपने बिल्कुल सही कहा है. पहले लगता था कि दाल मे कुछ काला है पर अब तो पक्के से पूरी दाल ही काली है और सारे भात (चावल) में मिल गई है.
रामराम.
November 11th, 2009 at 5:08 pm
सब राजनीति की रोटी है । जब चाहे तब सेंक ली जाती है ।
सही कह रहे हैं आप ।
November 11th, 2009 at 5:20 pm
3 दिन से कम्प्यूटर खराब था इसलिये इस मु्द्दे पर कहीं भी टिपिया नहीं सका…। राज ठाकरे कांग्रेस का खड़ा किया हुआ भिंडरांवाले साबित होने की राह पकड़ रहा है। जब अधिकतर मराठियों ने बाल ठाकरे जैसे व्यक्ति को मराठी के नाम पर वोट नहीं दिया तो राज ठाकरे को कैसे देंगे? राज ठाकरे सिर्फ़ युवाओं के आक्रोश का फ़ायदा उठाना चाह रहा है, इस तरह से उसकी सीटें 13 से बढ़कर ज्यादा से ज्यादा 20 हो जायेंगी, लेकिन यह सोचना मूर्खता होगी कि राज ठाकरे अपनी मनमर्जी चलाने में सक्षम होगा (जब तक कांग्रेस का वरदहस्त न हो)… जो भी विधानसभा में हुआ वह शर्मनाक तो है ही, लेकिन इससे भारतीय लोकतन्त्र खतरे में पड़ने वाली कोई बात नहीं है, क्योंकि वह तो पहले से ही रसातल में है (जरा उत्तरप्रदेश की विधानसभा के सीन याद कीजिये अथवा तमिलनाडु में जयललिता की साड़ी खींचने के सीन याद कीजिये, इस मुकाबले तो फ़िलहाल महाराष्ट्र में कुछ खास नहीं हुआ)…
November 11th, 2009 at 5:35 pm
“मेरी दृष्टी में न हो आजमी हिन्दी हितैषी है न राज मराठी के. दो गुण्डें जब आमने सामने होंगे तब सदाचार की बाते नहीं होने वाली ”
जब दो गुण्डे लड़ रहे हों- एक राष्ट्र के नाम पर एक राज्य [विघटन] के नाम पर ….तो किस का साथ दिया जाना चाहिए
November 11th, 2009 at 9:02 pm
हिन्दी की हिन्दी हिन्दी वाले ही जम कर कर लेते हैं। उसके लिये राज-आजमी जैसे सज्जनों की क्या जरूरत!
November 11th, 2009 at 9:04 pm
हिन्दी के नाम पर अबु आज़मी अपने पुराने पाप धो कर एक नई शुरुआत करना चाह्ते है . और राज ठाकरे पाप करना चाह्ते है .
November 11th, 2009 at 9:35 pm
“इस सब के बाद भी हिन्दी (या किसी भी भारतीय भाषा) में शपथ न लेने देना एक गम्भीर अपराध है और दोषी पर राष्ट्रद्रोह का आरोप लगा कर कार्यवाही की जानी चाहिए.”
यही मुद्दे की बात है ।
November 11th, 2009 at 9:58 pm
आपके विचार संतुलित और सराहनीय है.
मैं एक महाराष्ट्रीयन मालवी हूं, जो मातृभाषा मराठी के साथ हिंदी और मालवी को भी प्यार करता हूं.
अबु आज़मी और राज भिंडरावाले ५- ५ % विधायक लेकर देश की अखंडता के साथ बलात्कार कर रहें हैं.सियासत में बौने,अपना कद ऊंचा कर नहीं पा रहे हैं, और ये हिंदी मराठी का नया बखेडा खडा कर अपना कद बढ जायेगा , इस दिवास्वप्न में लगे हुए हैं.
कोहनी तक उगे हुए ये दोनो गुंडे और साथ ही इन जैसे अन्य गुंडे लालु, मुलायम , पास्वान की गुंडागिर्दी उनके प्रदेश में हम देख चुके हैं, अब महाराष्ट्र की भूमी पर दण्ड पैल रहे हैं. लता मंगेशकर, शिवाजी, आंबेडकर, ज्ञानेश्वर (एवम अन्य संत श्री) के प्रदेश में ये राज कहां से आ गया?
November 11th, 2009 at 10:58 pm
आपने सही बात कही है संजय जी, दोनों के दोनों दोषी है…लेकिन जिस तरह राज ठाकरे पहले खुलेआम कानुन को हाथ में ले रहा था लेकिन उसकी गुण्डागर्दी अब विधानसभा तक पहुंच गयी है… आज़मी भी कम दोषी नही है लेकिन उसने राज ठाकरे की तरह गुण्डापन नही किया है….
November 12th, 2009 at 12:29 am
आपने मूल बात तो कह ही दी है ” ये दो गुंडों की लड़ाई है |” इसे हिंदी विरुद्ध मराठी कहना भूल ही होगा |
November 12th, 2009 at 12:39 am
सहमत.
November 12th, 2009 at 6:05 am
सहमत.
भाषा तो एक और मुद्दा भर है…
जब इन्होंने ही सदन के बाहर बेचारे गरीब पीटे तब वे निश्चय ही हिंदी में शपथ की ज़िद नहीं कर रहे थे…लेकिन निर्वाचित विधायकों को यूं लिखित में धमकाना व्यवस्था को ही हाशिये पर ले आने को काफी है…
November 12th, 2009 at 1:06 pm
बिल्कुल सही कहा आपने । सहमत हूँ आपसे
November 12th, 2009 at 11:02 pm
राज ठाकरे के बंदों ने हिन्दी में शपथ लेने नहीं दी यह उतना बड़ा दुर्भाग्य नहीं है जितना बड़ा यह कि ऐसे लोगों को चुन के आम जनता कुर्सी पर बैठाती है। यह वाला दुर्भाग्य ही समाप्त हो जाए तो बाकी दुर्भाग्य अपने आप सुलट जाएँगे!!
रही बात देशद्रोह की, तो भारतीय संविधान के अनुसार कोई भी कुर्सी पर बैठने वाला/वाली 15-16 उल्लेखित भारतीय भाषाओं (और अंग्रेज़ी) में से किसी में भी शपथ ले सकता/सकती है। यह भारतीय संविधान की भी अवमानना है। रही बात कोई एक्शन लेने की, तो जनाब अभी तक राज बाबू के बंदों ने कितनों की ही खुलेआम वाट लगाई है, कुछ किया है क्या कांग्रेस ने? उनकी तो चांदी हो रही है, शिवसेना के वोट जो कट रहे हैं!!