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हर मर्ज की एक दवा है, काहे न आजमाएं….

जी हाँ, हर समस्या का एक समाधान है या फिर हर समस्या के लिए कोई एक कारण बताया जा सकता है. इसे समस्या का सरलीकरण कह सकते है या समस्या का सरल निवारण.

याद हो तो कभी भारत की हर समस्या के पीछे विदेशी हाथ हुआ करता था. समस्या की तह तक जाना और समाधान खोजना मेहनत का काम होता है, या फिर उससे हम आँखे चुराना भी चाहते हो सकते है. इसका सरल उपाय यह है कि विदेशी हाथ बता कर अपने हाथ झाड़ लो.

वैसा ही एक नया फैशन है, समस्या चाहे सामाजिक हो या आर्थिक उसके लिए “बाजारवाद” को जिम्मेदार ठहरा दो. बात खत्म. आगे कुछ करने की जरूरत ही नहीं.

हम भारतीयों के पास विकास का एक ऐसा ही एक सरलीकृत मंत्र है, जो हमें विकसीत देश बना देगा. एक पूरा तंत्र जी-जान से लगा है, भारत को बदलने के लिए. यह मंत्र मानसिक रूप से हम पर इतना हावी है कि इसके बिना भारत कभी जापान-फ्रांस-जर्मनी जैसा विकसीतबन सकता है, ऐसा कहने वाले को मूर्ख ही कहा जाएगा.

मंत्र है “अंग्रेजी”. जिस दिन सारे भारतीय अपनी भाषाएं भूल अंग्रेजी की शरण में चले जाएंगे, भारत विकसीत देश हो जाएगा. न बेरोजगारी होगी, न गरीबी. जब भी किसी चीज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाना होता है, हम अंग्रेजी की शरण में चले जाते है. हम गुलामों में या हमारी भाषाओं में वह काबलियत कहाँ?

इन दिनों गुजरात के मुख्यमंत्री जैंटलमेन टाइप गेटअप में देखे जाते है. राज्य को “अंतरराष्ट्रीय” कक्षा तक ले जाने के लिए जी-जान से जुटे है. अंतरराष्ट्रीय कक्षा में ले जाने के लिए जो सरल तरीका है वह है अंग्रेजी की शरण में जाना. एक बार अंग्रेजी का बोलबाला हो जाए तो समझो अंतरराष्ट्रीय कक्षा के हो ही गए. फिलहाल लगता है हिन्दी का स्थान अंग्रेजी ले रही है, अगला नम्बर गुजराती का होगा.

यहाँ के आदिवासी क्षेत्रों में आजकल अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार के लिए कई देशी-विदेशी स्वयंसेवी संस्थाएं लगी हुई है. कहा यह जा रहा है कि बिना अंग्रेजी ज्ञान के ये लोग पिछड़े हुए हैं और पिछड़े हुए ही रहेंगे. इसके पीछे गुप्त एजेंडा भगवान जाने मगर मैं इसे धर्म-परिवर्तन की तर्ज पर संस्कार परिवर्तन के रूप में देखता हूँ. अंग्रेजी अखबारों में ऐसे युवकों के समाचार भी छप रहे हैं जो गरीब बच्चों को “अंग्रेजी” में शिक्षित कर रहें हैं. हाल ही में एक समाचार था कि अंग्रेजी का प्रसार तेज करना होगा, वरना भारत पिछड़ जाएगा!!!.

आप कह सकते है जब हमारे बच्चे अंग्रेजी शिक्षा ले रहें हैं तो बाकी के क्यों वंचित रहे? पता नहीं क्या सही है और क्या गलत. चारों ओर से आते ऐसे समाचार व गतिविधियाँ देख निराशा सी घेर लेती है. जिन लोगों से आशाएं है वे ही अंग्रेजी की शरण में जा रहे है तब लगता है गहन अंधकार में कहीं आशा का एक दीपक जल रहा है, उसे भी बुझाने की कोशिश हो रही है. मैं ऐसे भारत की कल्पना कर ही असहज हो जाता हूँ जो शक्तिशाली है, प्रभावी है मगर पराई भाषा बोलता है.

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