अभिव?यक?ति की स?वतंत?रता व सामाजिक उत?तरदायित?व.
अभिव?यक?ति की स?वतंत?रता का अपना महत?त?व है, तथा ?क लोकतांत?रिक देश का नागरिक होने के कारण अभिव?यक?ति की स?वतंत?रता का सम?मान भी करता हू? तथा इस स?वतंत?रता का उपयोग भी कर रहा हू?.
आप म??े अभिव?यक?ति की स?वतंत?रता का कट?टर समर?थक मान सकते है परंत? मैं इसके अंधे समर?थन का विरोध भी करता हू?.
अभिव?यक?ति की स?वतंत?रता का उपयोग करने से पहले अपने उत?तरदायित?व के प?रति भी सजग होना उतना ही अनिवार?य है. अभिव?यक?ति की स?वतंत?रता का उपयोग किसीका मजाक बनाने या अपमान करने के लि? नहीं किया जा सकता. साथ ही साथ द?निया, देश व समाज के हितों की अनदेखी कर जाना भी मूर?खता ही होगी.
क?छ समय पूर?व डेनमार?क के समाचार-पत?र में इस?लामी आतंकवाद पर कार?टून छपे थे. द?निया भर में जिस प?रकार इसका विरोध ह?आ, इससे इस बात पर बहस की सम?भावना ही खत?म हो गई की क?या पैगम?बर को आतंकवादियों का सरदार जैसा दिखना सही था? मेरी नजर में अभिव?यक?ति की स?वतंत?रता की आड़ में यह गलत कृत?य था.
वैसा ही गलत कार?य ह?सैन के बना? चित?र है. उन?हे अभिव?यक?ति की स?वतंत?रता है, पर तभी जब वे इस स?वतंत?रता का उपयोग बिना पक?षपात किये करे. मैं कला का पारखी तो नहीं मगर जो मेरी सीमित ब?द?धि देख सकती है, वह यह है की यहा? ह?सैन के बना? चित?रो में

पहली तस?वीर में ?क चित?र का अंश है, जिसमे राम व सीता को सम?भोगरत दिखाया है पीछे नग?न हन?मान उन?हे देख रहे हैं, द?सरे चित?र में नग?न लक?ष?मी गणेश के सर पर सवार है. ?सी ही कलात?मक कल?पना उनके तीसरे चित?र में नहीं दिखती क?योंकि यह चित?र उनकी माताजी का है. हम भी नहीं चाहते की उनकी मा? को नंगा देखे. चौथे चित?र में भी भेद स?पष?ट है, ?क कपड़ो में मगर द?सरा नंगा है. क?यों? और पांचवे चित?र में नग?न रावण की जंघा पर नग?न सीता बैठी है. यह किसी कलाकार के निर?मल मन से बनाई कृतियां नहीं लगती बल?कि ?क यौन क?ढीत व?यक?ति की मनोदशा दर?शाते चित?र लगते है.
इन दिनों फिल?म परजानिया काफी चर?चा में है. इसे ग?जरात में प?रदर?शित नहीं किया गया. सरकार की तरफ से कोई पाबन?दी नहीं लगाई गई थी. सिनेमाघर के मालिक ही प?रदर?शित नहीं करना चाहते थे. अगर स?थानीय समाचारपत?रो की माने तो ज?यादातर लोग इसे देखना भी नहीं चाहते. मगर फिल?म बनाने वाले चाहते है की फिल?म प?रदर?शित हो. इसलि? हाथ-पा?व मारे जा रहे है.

फिल?म अच?छी हो सकती है, मैने देखी नहीं इसलि? इसबारे में अपनी राय व?यक?त नहीं कर सकता. मगर इतना जानता हू? फिल?म दंगो से सम?बन?धित है. जैसे-तैसे यहा? लोग दंगो को भूला कर सारा ध?यान धर?म के स?थान पर रोजी-रोटी पर केन?द?रीत कर रहे है. यहा? के दंगो का इतिहास जहा? म?गलकाल तक जाता है, फिलहाल ?सी शांति है जैसी पहले शायद ही कभी रही हो.. क?या ?से में अभिव?यक?ति की स?वतंत?रा के लि? भर रहे जख?मो को क?रेदा जाना चाहि?? या फिर समाज ?ेल सके इतना स?वस?थ हो जा? इसकी प?रतिक?षा करनी चाहि??
आप बताईये, आखिर अभिव?यक?ति की स?वतंत?रता आपको भी है.













February 5th, 2007 at 12:55 pm
?म.?फ़.ह?सैन जितने बड़े कलाकार हैं उनमें चर?चा में बने रहने का लालच उससे कम नहीं है। क?छ दिन पहले किसी म?स?लिम धर?म के नेता ने भी इस बात के लिये कोसा कि उन?होंने इस तरह की बचकानी तस?वीरें बनायीं जिससे हिंदी-म?स?लिम सौहार?द पर नकारात?मक असर पड़ता है।
February 5th, 2007 at 4:09 pm
क?छ इस?लाम धर?म के लोगों ने विरोध किया था तो इन?हीं ह?सैन साहब ने
अपनी पूरी की पूरी फ़िल?म वापिस ले ली. तब इन?होने अभिव?यक?ति की स?वतंत?रता की बात नहीं की. ग?रन?थ कहते है
सत?यम ब?रूयात, प?रियम ब?रूयात, न ब?रूयात सत?यम अप?रियम.
प?रियम सत?यम न ब?रूयात, ?ष: धर?म सनातन:
February 5th, 2007 at 6:18 pm
hey ram …
aaj ke yug me jo na ho vahi sahi hai. jo hindu virodhi ho to vah to ekdam sahi hota hai. yahi hamari sarkaare bhi aproksh rup se kahti hai.
hushin ke dvara banai gai yah chitra. unki gandi aur khud ki nangi lokpriyta ka suchak hai. unke andar nanga par kut kut kar bhara huaa hai. aisa nahi hai ki ve khuda ko nanga nahi kar sakte par darte hai kyoki jisdin kisi mulla maulvi ka nanga chitra banaa vah husain ka is dharti par aakhiri din hoga. nithari ke manindar singh aur husain mae koi antar nahi hai. ek CD banata tha to dusara CHITRA.
bas jarurat hai aise logo ko bhare samaj ne nanga kar unke CD aur CHITRA banane ki.
bas inki yahi saja ho
February 5th, 2007 at 6:22 pm
upar kuch kahne ko rah gaya tha niche kah raha hu …….
mujhe inki CD aur chitra ka intzaar hai.
jo vykit inke chitra aur CD banayega.
use $10000000000000000000000000000….ooo
inaam me diya jayega.
February 5th, 2007 at 6:50 pm
चर?चा में बने रहने के लिये ओछी मानसिकता का परिचायक है उनका यह कृत?य. निन?दनीय.
February 6th, 2007 at 12:17 am
सही चर?चा की है पंकज भाई…अभिव?यक?ति की आड़ में हमे अपने कर?तव?य नहीं भ?लना चाहि?…कला समाज की आत?मा है लेकिन इसका प?रभाव भी व?यापक पड़ता है खासकर सिनेमा का…!हमें यह कतई नहीं भ?लना चाहि? कि हमारा समाज अभी Basic Needs के लि? लड़ रहा है…इस तरह तो समाज जलने लगेगा…अच?छा मसला उठाया है…धन?यवाद आपको!!
February 6th, 2007 at 8:37 am
सम? नही आता कि मि ह?सैन को हिन?दू देवी देवताओं मे ही क?यों आर?ट नजर आता है, शायद उन?हे डर हो कि अपने ख?द के धर?म में आर?ट ढूढने बैठंगे तो पैंटिग से पहले ही उनके नाम का फतवा ना आ जाये। क?छ लोग अभिव?यक?ति की स?वतंत?रता का गलत फायदा उठाते हैं और ये साहेबान भी म??े इनमें से ही लगते हैं।
परजानिया यहा? तो मिलेगी ही देखने पर पता चलेगा इसमें क?या है। संजय काफी अच?छी पोस?ट थी ये।
February 6th, 2007 at 10:21 am
ह?सैन जी तो बेहद प?रसिद?ध चित?रकार है वेसे आपका लेखन भी बह?त अच?छा है
नारायण
February 6th, 2007 at 12:52 pm
divyabh:
सही चर?चा की है संजय भाई…अभिव?यक?ति की आड़ में हमे अपने कर?तव?य नहीं भ?लना चाहि?…कला समाज की