ब्लोगर मीट एट कर्णावती.
आप पूछ सकते है, शीरॿषक अंगॿरेजी में कॿयों लिखा है?
तो सॿपषॿट कर दूि यह सागरभाई का दिया हॿआ है. :) भला बॿरा उनॿहे कहे. मैं तो यहाि अहमदाबाद में हॿई हिनॿदी चिटॿठाकारो की बैठक के बारे में बताने जा रहा हूि.
कल रविवार था, और हैदराबाद के नितिन बागलाजी अहमदाबाद में थे. वे िक सॿवंय सेवी संसॿथा से जॿड़े हॿि है, किसी काम के सनॿदरॿभ में यहाि आि हॿि है. फोन पर बात हॿई तथा तय हॿआ की वे हमारी ऑफिस पर सॿबह गॿयारह बजे पहॿिच जािंगे. हमने उनॿहे लेने आने का पॿरसॿताव रखा, मगर संकोची सॿवभाव की वजह से उनॿहोने मना कर दिया.
खैर वे समयसर हमारी ऑफिस पहॿिच गि. घंटी बजी तो मैने दरवाजा खोला, तथा अपना परिचय देते हॿि उनसे हाथ मिलाया व बॿलॉगर मारॿका िपॿपी ली. इससे पूरॿव मैने उनके चिटॿठे पर उनकी तसॿवीर देखने का पॿरयास किया ताकि उनॿहे आसानी से पहचाना जा सके मगर उनॿहोने अपनी कोई तसॿवीर वहाि नहीं लगा रखी है, न ही अपने बारे में कॿछ लिख छोड़ा है. मगर खोजा तो नेट पर उनकी तसॿवीर मिल ही गई.
फिर पंकज से हाथ मिलाया गया. संयोग से अभिजीत भी ऑफिस में था, तथा खॿशी पोडकासॿट के लिि ऑफिस आयी हॿई थी. यानी हिनॿदी के पािच बॿलॉगर िक जगह मौजूद थे. मगर बातचीत, हिसी मजाक नितिनजी, मेरे व पंकज के बीच ही होता रहा.
हम घेरा डाल कर बैठे हॿि थे. चॿंकी उनके आने से पूरॿव मैं निरंतर को पॿ रहा था, उनॿहे नि अंक की जानकारी दी तथा चरॿचा रविशंकरजी, अनॿपजी, सूनील दीपकजी, जीतॿभाई, समीरलालजी, देबाशीषजी से होती हॿई नि बॿलोगरों तक पहूिच गई. पॿरशंसा तथा टीका (सामने तो कोई था नहीं अतः टीका-टिपॿपणीयों का आननॿद लिया जा सकता था :) ) टिपॿपणी करते हॿि बॿलोग से पैसे नहीं कमा सकते तक विचार कर डाला. विकि पर हिनॿदी सामगॿरी के टोटे को लेकर रोना भी रोया गया. करीब दो घंटे इनॿही सब बातो में गॿजर गया. तब तक पेट में चॿहे दौड़ने लगे थे. मैने घर चल कर सॿबह का खाना निपटा लेने का पॿरसॿताव रखा, मगर बागलाजी ना-नकॿर पर उतर आि. िसे में हमे थोड़ा दबाव बनाना पड़ा, िसे कैसे हाथ लगे को जाने देते.
लगभग अपहृत-से बागलाजी को गाड़ी में डाल घर पहूिचे, तो उनका सॿवागत बॿलोगर उतॿकरॿष ने किया. निधि (मेरी पतॿनी) व पूजा (पंकज की पतॿनी) से बागलाजी के अभिवादन के बाद हम फिर चरॿचा में लीन हो गि. इसबार चरॿचा का विषय घर-परिवार तथा दॿनियादारी से समॿबनॿधित थे. बॿती महंगाई पर चिंता वॿयकॿत की तथा दालो के आसमान छूते भावों के लिि वायदा-बजार को दोषी करार दिया.
भोजन के बाद मौका मिलने पर फिर मॿलाकात का वादा कर बागलाजी ने विदा ली.













February 14th, 2007 at 2:38 pm
बह?त आत?मीयता से भरा प?रसंग रहा. आज कल इसी आत?मीयता की ही तो कमी है. संकोच और आग?रह , प?नः संकोच और स?नेहपूर?ण आग?रह — इसी से तो बनता है आत?मीयता का रसायन. नामकरण करनेवाले सागर जी कहां रह गये थे?
February 14th, 2007 at 2:54 pm
वाह वाह, खूब, सही कि?, आखिरकार आपने भी ?क ब?लॉगर भेंटवार?ता में शिरकत कर ही ली!!
बधाई हो!!
वैसे पंकज भाई से कहना चाहू?गा कि मस?त रहा करो यार, इतने टेन?शन में काहे लग रहे हो तस?वीर में?? ?सा लगता है कि जैसे किसी ने जबरन बिठा के तस?वीर उतारी है!!
February 14th, 2007 at 3:24 pm
वाह भाई ! अच?छी रही ! हम भी ग?जरात में ही हैं !
घ?घूती बासूती
ghughutibasuti.blogspot.com
February 14th, 2007 at 3:36 pm
हाजिर है नामकरण वाले सागर!

भई बड़े ही निर?मोही हो नामकरण करवा लिया और ब?लॉगर मीट में हमारी ही चरा नहीं की, खैर कभी हम भी आयेंगे अहमदाबाद में आपके यहा? तो आपकी ही चर?चा नहीं करेंगे
बधाई हो आप सबको।
February 14th, 2007 at 3:38 pm
माफ कीजिये चरा नहीं की- की जगह चर?चा नहीं की प?ें
February 14th, 2007 at 5:10 pm
पढ़ कर अच??छा लगा, 9/2/2007 को मैने भी आपके शब??दों मे ?क ब??लागर मीट करने का मौका मिला। मौका मिला तो वर?णन करू?गा। वे भी काफी वरिष??ठ है।
आप लोगो को बधाई
February 14th, 2007 at 5:41 pm
वाह! बह?त बह?त बधाई।
?सी ब?लॉगर मीट तो अब रोजाना होनी चाहि?।
February 14th, 2007 at 6:10 pm
प?रियंकरजी,
टिप?पणी के लि? धन?यवाद. सागरभाई हैदराबाद में अटके ह?? है.
अमित,
सही कहा, सचम?च जबरीया तस?वीर ली थी.
घ?घूतीजी,
ग?जरात में आप कहा? है? क?यों न ?क ग?जराती हिन?दी चिट?ठाकारों की बैठक हो जाये.
सागरभाई,
चर?चा सभी की ह?ई थी, आप कैसे छ?ट जाते? समयाभाव के चलते जितना लिख सका लिखा. यह भी तीन दिन में पूरा कर पाया.
प?रमेन?द?रभाई,
आपकी चर?चा का इंतजार रहेगा.
जितूभाई,
हम भी रोजाना बैठक को तैयार है. बस कोई हमारे शहर आ? तो.
February 15th, 2007 at 1:22 am
बह?त ख?ब रही यह ब?लागर मीट भी. नाम तो प?ा मगर हमारे बारे में चर?चा क?या ह?ई, इसी की चिन?ता खाये जा रही है. वजन भी १५० ग?राम के आसपास कम आ रहा है इसी चिंता में.
नितिन जी को मय तस?वीर ब?लाग पर लाने के लिये साध?वाद.
February 15th, 2007 at 5:34 am
वाह खूब आत?मीय भरी रहा आपका ये ब?लोगर मिलन
February 20th, 2007 at 2:14 pm
माफ कीजियेगा, इतने दिनों से नेट की अनुपलब्धता के चलते ये पोस्ट अपनी नजरों से चूक गयी । आज जोगलिखी पर आये तो ध्यान गया ।
एक बार फिर , बैंगानी परिवार को उनके स्नेह और सत्कार के लिये धन्यमवादम ।
भेंटवार्ता का हमारा संस्करण जल्द ही उपलब्ध होगा…