कल्पना के घोड़े पर सवार, पत्रकार
कल राजदीप सरदेसाई की ट्विट, फिर उस पर टिप्पणी और उसका जवाब, यह सब मिला कर एक बात बनी कि संपादक भले ही बीक गए हो, आम पत्रकार अभी भी ईमानदार है.
मुझे लगता है कि यह ईमानदारी वाली बात भी एक भ्रम ही है. जब पत्रकार पैसे के लिए न भी बिके अगर वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो तब भी ईमानदार नहीं हो सकता. एक ताज़ा उदाहरण हमारे सामने है. कस्बा-किंग रवीशकुमार ने अपने ब्लॉग पर एक पोस्ट लिखी है, “त्रिवेदी ने सैयद को मार दिया..सैयद कहता रहा आतंकवादी नहीं है.”
रविश लिखते हैं,”इंस्पेक्टर शब्बीर अली सैयद,गुजरात एंटी टेररिस्ट स्क्वाड का सदस्य। वो चिल्लाता रहा कि सर मैं आतंकवादी नहीं हूं। फिर भी डीसीपी सुभाष त्रिवेदी उसे अपनी बाज़ुओं और अफसरी की ताकत से मरोड़ता रहा। यह सोच कर डर लगता है कि त्रिवेदी के भीतर ताकत का गुरूर और सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों का ज़हर कितना भयानक होगा कि उसने सैयद पर गोली दाग दी। सैयद चिल्लाता रहा- सर मैं आतंकवादी नहीं हूं। मैं तो ऑब्ज़र्वर हूं।”
आगे वे अपनी कल्पनाओं के घोड़े दौड़ाते हैं, यानी हुआ होगा- किया होगा जैसी सम्भावना देखते है,” मुसलमानों को लेकर सुभाष त्रिवेदी के भीतर कितनी घृणा होगी जिसके भड़क उठने पर उसने सैयद का गट्टा पकड़ लिया। त्रिवेदी को सैयद आतंकवादी नज़र आ गया। त्रिवेदी ने सैयद को कितनी ज़ोर से जकड़ा होगा कि उसे अंदेशा हो गया होगा कि कुछ गड़बड़ है और वो चीखने लगा होगा कि सर मैं आतंकवादी नहीं हूं। इस बात पर त्रिवेदी और भड़क गया होगा। उसका गुस्सा पूर्वाग्रह के ज़हर से लाल होने लगा होगा। आप बस कल्पना कीजिए।” यहाँ कल्पनाओं में ही पूरे घटनाक्रम को देख लिया और त्रिवेदी तथा सैयद के मन को भी पढ़ लिया. जिसे गोली लगी वह संयोग से मुस्लिम है वरना समाचार यही बनता, “लापरवाही से चली गोली, पुलीस का जवान घायल.”
यह एक स्थानीय घटना है इसलिए प्रतिदिन समाचारपत्रों में इससे सम्बन्धित समाचार छप रहें है. आज समाचार था उसका हिन्दी अनुवाद देखें, फिर उसकी तुलना रवीश के लिखे से करें.
सैयद ने कहा, मुझे त्यागपत्र देना है.
गोलीबारी का शिकार हुए सैयद के कुशलक्षेम पूछने गए राज्य के पुलिस उच्चाधिकारी ने कहा कि मुझे देख कर सैयद रो पड़ा और कहा कि सा’ब मैं लोगों को जवाब देते देते थक गया हूँ, मैं पुलिस की नौकरी से त्यागपत्र देना चाहता हूँ. मुझे गलत बातों से दुख हो रहा है. मुझे लगी है, मगर डीसीपी ने जानबुझ कर गोली नहीं मारी है. डीजीपी (शब्बीर हुसैन खांडवावाला) ने कहा कि मैने मोकड्रील की वीडियो क्लिप देखी है उसमें गोलीबारी सामने से नहीं हुई है. सुभाष त्रिवेदी जब सैयद से गले मिलने लगे तब ट्रीगर दबने से छाती के ऊपरी भाग से पेट में गोली लगी थी. सैयद को दो नहीं एक गोली लगी है ऐसी स्पष्टता करते हुए उन्होनें कहा कि यह मात्र एक दुर्घटना लग रही है. सैयद पुलिस विभाग का अनुशासित कर्मचारी है.
अंतिम रिपोर्ट आने के बाद इस (घोर) लापरवाही पर कार्यवाही होगी.
हर जगह हर बात में साम्प्रदायिकता देखना मानसिक दुषण दर्शाता है. घटना को सामने लाना पत्रकार का दायित्व है या अपनी सोच के आधार पर निर्णय सुनाना और काल्पनिक कथाएं घड़ कर साम्प्रदायिकता फैलाना?
रवीश ने शीर्षक दिया है, त्रिवेदी ने सैयद को मार दिया..जब कि सैयद जीवित है. सैयद कहता रहा आतंकवादी नहीं है… गोली लगने पर सैयद ने कहा था कि वह ऑब्जर्वर है, न कि आतंकवादी.
इस पोस्ट का उद्देश्य किसी की लापरवाही का पक्ष लेना कतई नहीं है. त्रिवेदी की घोर लापरवाही अपने साथी की जान ले सकती थी. इस पर उचित कार्यवाही होनी चाहिए. बताया जा रहा है कि इस घटनाक्रम का वीडियो भी उपलब्ध है.
इस पोस्ट का उद्देश्य हर जगह साम्प्रदायिकता देखने वाले लघुग्रंथी से पीड़ित पत्रकारों की निंदा करना है. वास्तव में इन्हें मनोचिकित्सक की जरूरत है वरना ये जहाँ न हो वहाँ भी साम्प्रदायिकता फैलाते रहेंगे.













March 16th, 2010 at 6:02 pm
उन्हें प्रोमोशन भी तय करना है
आखिर उन्होंने २००२ भी तो देखा हुआ है कैसे धडाधड साथी लोग टॉप पे पहुंचे , किसकी भावनाओ को क्या ठेस पहुँची, किसे क्या आघात लगा, किसने इसका गलत फायदा उठाया, इन बातों से उन्हें क्या फर्क पड़ता है ?
March 16th, 2010 at 6:04 pm
ऐसी कल्पनाशीलता तो बहुत भयावह है और पत्राकरिता की भावना के बिलकुल विपरीत
March 16th, 2010 at 6:08 pm
प्रणव जेम्स रॉय के साथ रह-रहकर “संगत” का असर आ गया है रवीश पर…। जैसे वार्न को सपने में भी तेण्डुलकर दिखता था, NDTV को भी सपने में गुजरात और मोदी दिखते हैं…
March 16th, 2010 at 7:09 pm
सादर वन्दे!
ये बिक चुके लोग कभी कभी जागते हैं लेकिन जैसे ही मालूम चलता है की हमारे सेकुलर बाप डंडा उठा लेगे और अन्य कोई योग्यता ना होने के कारण भीख मागनी पड़ जाएगी तो फिर वही अनाप सनाप बकना शुरू कर देते हैं,
इनकी अपनी कोई सोच नहीं होती ये तो एक मुहरे हैं, जब तक बोलेंगे जिन्दा रहेगे …….
भारतीय नववर्ष 2067 , युगाब्द 5112 व पावन नवरात्रि की शुभकामनाएं
Ratnesh
March 16th, 2010 at 7:39 pm
दो कौड़ी के ब्लॉगर, डेढ़ के पत्रकार और आधा कौड़ी के इंसान.
March 16th, 2010 at 7:47 pm
भगवन !
आपने तो हमें गफलत में डाल दिया, क्यों कि हम भी वंहा जाकर अपनी शान बधारते हुए एक हसींन-सी टिपण्णी लगे हांथो चस्पा आये थे और वो भी पुलिसिया महकमे के खिलाफ कि ये तो है ही पुराने शातिर जो श्याह को सुफेद तब करते है जब सर पे सूरज देवता पुरे जलाल से चमक-दमक रहे होते है / वैसे देखा जाये तो बद अच्छा पर बदनाम तो बिलकुल भी कबूल नहीं ऐसा तजुर्बेकार बोल गए है सो आज हम भी क्या झांसे में आ गए, बांकी सुबूत तो हूजूरे-आला रविश जी आला-ये-कलम के खिलाफ ही इंगित करते है, सचमुच ! अपन तो कन्फुसियश हो गए भाई !
March 16th, 2010 at 7:52 pm
बहोत ख़ूब !
काश ऐसी कल्पनाशीलता ‘धर्मनिरपेक्ष’ पत्रकार उन इलाक़ों में दिखाते जहां मज़हबी उन्माद चरम पर होता है। काश ऐसी पत्रकारिता वहां देखने मिलती जहां व्यापक पैमाने पर देश के टुकड़े-टुकड़े करने और मज़हबी परचम बुलंद करने के सबक सिखाए जाते हैं।
विषय से हटकर कहूं तो..
सभ्यताओं के इस संघर्ष को ना समझने और शतुरमुर्गी रवैया अपनाने वाले बुद्धिजीवी जल्द ही लतियाए जाएंगे।
इतिहास गवाह है लड़ाई चंद योद्धा लड़ते हैं और बाक़ी लाखो-करोड़ों के हिस्से ग़ुलामी या आज़ादी आती है। जिन पीढ़ियों में एक हज़ार साल की ग़ुलामी हो उनके लिए साठ साल की आज़ादी ‘आदत’ कैसे हो सकती है? यह मजबूरी है जो गंगा-जमनी तहज़ीब का नाम लेकर अपनी कायरता को ओढ़ने के काम आती है।
यह वही चैनल है जो स्वामी रामदेव, बीजेपी, संघ, गुजरात और मोदी का नाम आते ही अपने तमाम हथियार निकाल लेता है। और मुस्लिम चरमपंथियों, फ़तवे जारी करने वाले कठमुल्लों के बीच जाकर मानवाधिकार की स्टोरियां तलाशता है। यहां तक कि वहाबियत परोसने वाले ज़ाकिर नायक के साथ वाक द टाक (शेखर गुप्ता का शो) भी करता है। यह यहीं आकर नहीं रुकता बल्कि सरकारी चुंबन की लालसा में अपनी आशाओं को अमन के हाथों सौंपने को उतावला भी हो जाता है।
फिर भी ऐसे दौर में अगर आपको बुद्धिजीवी बनने का शार्ट-टर्म कोर्स करना है तो तत्काल मोमबत्ती ब्रिगेड में शामिल होना सुविधाजनक है। सुविधा यह है कि बंधी-बंधायी शब्दावली के साथ संघ परिवार को इतना लताड़ो मानो दुनियाभर में हो रहे सारे बुरे के लिए वही ज़िम्मेदार है। बाक़ी सब दूध के धुले और सताए हुए हैं जो नक्सली-जिहादी बन बैठे हैं इसलिए हथियार उठाए फिर रहे हैं।
March 16th, 2010 at 9:11 pm
ये घटना फरवरी की है और पीटीआई पर प्रकाशित हुई थी।
इसे सांप्रदायिकता के चश्मे से पहले-पहल इंडियन एक्सप्रेस ने दो हफ्ते बाद देखा और फिर उसे पढ़कर लकीर के फकीर पत्रकारों ने इस स्टोरी में अपना एजंडा ढूंढ लिया।
उन्हें इसमें ‘अब तक छप्पन’ टाइप फार्म्यूला मसाला दिखा।
आपने सही लिखा है कि वाकयी ये लघुग्रंथी से पीड़ित पत्रकार हैं। वैसे भी एनडीटीवी वाले प्रीपेड बुद्धिजीवी हैं।
March 17th, 2010 at 9:03 am
पत्रकार का कार्य है केवल समाचार देना ना कि अपने विचार थोपना। ये सारे ही पत्रकार केवल किसी भी लाभ के लिए लिखते हैं। पुरस्कार मिले, पदोन्नति मिले बस यही इनका मकसद रहता है। देश का दुर्भाग्य यह है कि ऐसे ही लोगों से समाज का विचार परिवर्तन होता है और लोगों का नजरिया बदल जाता है। बहुत ही सार्थक पोस्ट।
March 17th, 2010 at 9:17 am
माई नेम इज खान से प्रेरित होकर आजकल रवीश जी शायद पटकथा लिखने की प्रैक्टिस कर रहे हैं. कल ही सुरेश जी के ब्लॉग पर एक टिपण्णी पढ़ी. लिखा था; “सेकुलर को नहिं दोस गोसाईं.”
March 17th, 2010 at 10:05 am
हम इस पोस्ट के उद्देश्य के अनुरूप हर जगह साम्प्रदायिकता देखने वाले लघुग्रंथी से पीड़ित व्यक्तियों की निंदाकरते है..
March 17th, 2010 at 10:11 am
कुछ मछलियां मिल कर तालाब गंदा करने की फ़िराक़ में भले ही हों .. ख़ुदा ख़ैर करे.
March 17th, 2010 at 10:26 am
ऐसा ही कुछ कश्मीर और नार्थ ईस्ट के बारे मे सोचें और लिखे तो बात है,मगर वो ऐसा लिख ही नही सकते पलिसी मैटर है एनडीटीवी का।सिर्फ़ और सिर्फ़ हिंदुओं को गाली बकों।
March 17th, 2010 at 10:55 am
hairaan hai .
March 17th, 2010 at 1:16 pm
नोटिस भेजूं? …. केस ठोकूं?
रविशकुमार ने मेरा आइडिया चुरा लिया.
मैंने एक कार्टून बनाया था कि “इस न्यूज़ चेनल के सारे समाचार और घटनाएँ काल्पनिक हैं. ”
ये देखो http://bamulahija.blogspot.com/2008/09/blog-post_17.html
March 17th, 2010 at 10:07 pm
क्या कहें भैया इन कथित पत्रकारों के पास दिव्यदृष्टि होती है। जिसे देखो वही पत्रकार खुद को मुस्लिमों का रहनुमा और मसीहा सिद्ध करना चाहता है। ये बात अलग कि मुस्लिम समुदाय इन्हें कोई भाव नहीं देता। नेताओं का तो समझ आता है पर इन लोगों को वोट की बजाय किस चीज का लालच है जो ऐसी कहानियाँ घड़े जाते हैं।
March 17th, 2010 at 10:45 pm
KYA KAHEN…….
March 18th, 2010 at 6:37 pm
SHEE HAI..
March 19th, 2010 at 1:23 pm
ये नई बात नहीं है। पहले भी कुछ लोगों ने गुजरात एनकाउंटर में मरे अपराधी सोहराबुद्दीन के परिवार वालों को लगभग 8 लाख का मुआवजा न्यायालय से स्वीकृत करवाया है। दुख की बात यह है कि इसी सोहराबुद्दीन के साथ मरने वाले तुलसी सिलावट के लिए इनके में मन में कोई दर्द नहीं उपजा। उसका परिवार को मुआवजा नहीं मिला। यह घटना गुजरात के बाहर होती तो उसका ट्रीटमेंट अलग ढंग से होता।
वैसे यह सेक्युलर इंडिया में ही हो सकता है कि मरने वाले अपराधी के परिवार को मानव अधिकार के नाम पर मुआवजा और पुलिस अधिकारियों को सजा के तौर पर निलंबन।
(रोटियां भी तो सेंकी ना लोगों ने, रोटियां क्या पीढ़ियों का पेट भर लिया होगा)
इस मामले की संक्षिप्त जानकारी ‘मालव संदेश’ पर और विस्तृत जानकारी सुरेश चिपलूणकर के ब्लॉग पर मिल जाएगी।
March 19th, 2010 at 6:06 pm
it happened only in INDIA!!aisa hi kuchh ek gaana yaad aata hai…
March 22nd, 2010 at 1:00 pm
संजय भाई, आप कथित संभावनाओं को जताते हुए स्टोरी करने की बात कर रहे हैं, टीवी के न्यूज़ चैनलों में तो बकायदा आधे घंटे-एक घंटे के कार्यक्रम प्रसारित होते हैं जिसमें ये लोग अपनी सोच और तथाकथित संभावनाओं और अनुमान से पूरी कहानी बना के किसी भी घटना को किस्सागो अंदाज़ में चटकारे लेकर दिखाते हैं!!
श्रीश, टीआरपी कह सकते हो आम भाषा में; कोई मुस्लिम किसी घटना में शिकार होता है तो वह खबर सनसनीखेज होती है और बिकती है, यदि मुस्लिम नहीं होता तो खबर बिकाऊ नहीं होती चाहे शिकार किसी अन्य माईनॉरिटी का क्यों न हो, क्योंकि भई इन तथाकथित सेक्यूलरों के अनुसार ले दे के भारत में माईनॉरिटी भी सिर्फ़ मुस्लिम हैं और इंसान भी मुस्लिम हैं, बाकी सब तो जानवर हैं जिनके खांसी-ज़ुकाम से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।