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कौन रहे नारद पर?

March 6th, 2007 | 33 टिप्पणियाँ | श्रेणी में

हम सब ने नारद के लिए एक आचारसंहिता तय की थी. कोई भी ऐसा चिट्ठा जो देशद्रोही, साम्प्रदायीक, कामुक, विभस्त लेख छापेगा उसे नारद से हटा दिया जाएगा.

भूतकाल में सेक्स व टोने-टोटको वाले चिट्ठो को नारद से हटा दिया गया था. वहीं लोकमंच को अन्य कारण से अलग श्रेणी में डाला गया है.

मोहल्ला नामक चिट्ठा उद्देश्यपूर्ण तरीके से साम्प्रदायिकता फैलाने की कोशिश कर रहा है. हमारे लिए सभी धर्म समान है. फिर चाहे वह इस्लाम हो या हिन्दू, मगर मोहल्ला पर लगातार हिन्दू विरोधी लेख या शेरो-शायरी छापे जा रहे है. अतः मैं इसे नारद से हटा देने का अनुरोध करता हूँ.

यही बात सार्वजनिक मंच की जगह पिछले दरवाजे से भी कही जा सकती थी. मगर मुझे वह पसन्द नहीं.

मोहल्ला के लेखो का जवाब देने के लिए मेरे पास भी शब्द, क्षमता व सबूत हैं मगर मैं मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहता न ही यह हमारे देश के हित में हैं.

सभी चिट्ठाकार बहस कर निर्णय लें. याद रहे एक तरफ उगले जाते जहर को नहीं रोका जाता है तो प्रत्योतर में जो जहर उगला जाएगा, उसे रोकने का नैतिक अधिकार हम खो देंगे.

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33 प्रतिक्रियाएं to “कौन रहे नारद पर?”

  1. सोमेश सक्सेना Says:

    [quote]मोहल्ला नामक चिट्ठा उद्देश्यपूर्ण तरीके से साम्प्रदायिकता फैलाने की कोशिश कर रहा है. हमारे लिए सभी धर्म समान है. फिर चाहे वह इस्लाम हो या हिन्दू, मगर मोहल्ला पर लगातार हिन्दू विरोधी लेख या शेरो-शायरी छापे जा रहे है.[/quote]

    क्या सचमुच ऐसा है? मैने अब तक मोहल्ला के जितने पोस्ट पढ़े हैं उससे मुझे तो ऐसा नहीं लगा। पर चुंकि मैने उसके ज़्यादतर पोस्ट अब तक नहीं पढ़े हैं इसलिये पक्के तौर पर नहीं कह सकता।
    कुछ भी हो, आपने एक विवादास्पद मुद्दा उठाया है।

  2. Yogesh Samdarshi Says:

    baat ekdam sahee hai.

    meri sahamati hai

  3. धुरविरोधी Says:

    आदरणीय संजय बैंगाणी जी;
    क्या एसा करके हम एक सैंसरशिप नही थोपने जारहे हैं? विचार एक हवा हैं. अन्तरजाल एक खुली हवा है. जो हम कहीं नहीं कह पाते वह हम अन्तर्जाल पर बेहिचक कह लेते हैं. मैं भी मानता हूं कि मोहल्ला अपने एक एजेंडे पर काम कर रहा है. मुझे भी मोहल्ला पसंद नहीं, पर हर किसी को अपनी राय प्रगट करने का हक है. मोहल्ले को भी, आपको भी, धुरविरोधी को भी. हम सभी परिपक्व हैं. शायद हमें एसी किसी सैंसरशिप की जरूरत नहीं है. (सेक्स व टोने-टोटको वाले चिट्ठो का की बात अलग है.)

    आप हिन्दीभाषी न होते हुये भी हिन्दी में जिस तरह प्रयास कर रहे हैं मैं उनके आगे नतमस्तक हूं. धुरविरोधी को आपके प्रयासों में स्वामी दयानन्द एवं गाधीजी के हिन्दीप्रेम की झलक दिखायी देती है. (संयोग से वे दोनों भी गुजरात से थे.)

    कृपया इस पर सोचें, पुनर्विचार करें. मैं मोहल्ले के विचारों का कतई समर्थक नहीं, पर एसी किसी भी सेंसरशिप का विरोध करता हूं
    आपका
    धुरविरोधी

  4. जीतू Says:

    संजय जी,
    आपकी स्पष्टवादिता की मै प्रशंसा करता हूँ। मै स्वयं नही चाहता कि धर्म विशेष विरोधी बातें ब्लॉग पर लिखी जाएं। लेकिन ब्लॉगिंग मे सेल्फ़ सेन्सरशिप लागू होती है। ब्लॉग पर लिखा, ब्लॉग लेखक की परिपक्वता और उसकी मानसिकता को दर्शाता है।

    मेरे विचार मे ऐसे लोग, अपने ब्लॉग को विवादास्पद बनाकर, पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाहते है बस। पाठक सजग रहे, सावधान रहे, तो कुछ ही दिन मे सब बदल जाएगा। आपको याद दिलाना चाहूंगा कि टोने टोटके वाले ब्लॉग क्यों बन्द हुए, क्योंकि उनको पाठक वर्ग नही मिला। यदि हमे कोई ब्लॉग असभ्य, अशोभनीय और गलत लगता है तो हम उस पर जाना बन्द कर दें, उस पर टिप्पणी करना बन्द कर दें, धीरे धीरे ब्लॉग लेखक को इसका अहसास हो जाएगा।

    जहाँ तक नारद की बात है, नारद किसी व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति नही है, सभी हिन्दी चिट्ठाकारों का मंच है, जो बहुमत चाहेगा, वही होगा, वही माना जाएगा। वैसे हमने नारद के लिए एक सलाहकार मंडल का गठन करने का निश्चय किया है, जो नारद को सभी विषयों पर सलाह देगा। बाकी प्रभु इच्छा।

  5. अतुल शर्मा Says:

    संजय भाई, मैं आपसे सहमत हूँ और जीतू भाई से भी। ऐसे चिट्ठों की वर्जना करना चाहिए। इन लोगों को टिप्पणियों से नहीं समझाया जा सकता। ये दुनिया को, घटनाओं को, हालात को अपने एक पक्षीय चश्मे से देखते हैं।

  6. प्रियंकर Says:

    मैं इस प्रस्ताव से न केवल असहमत हूं बल्कि पूरी तरह खिलाफ़ हूं. मोहल्ला न तो देशद्रोही है,न कामुक और न ही वीभत्स.अतः उस पर बैन का कोई कारण नहीं बनता . अधिक से अधिक यह कहा जा सकता है कि उसकी सोच बहुत एकआयामी और ‘प्रिडिक्टेबल’ है .पर ऐसे बहुत से चिट्ठों से यह बहुत बेहतर है.

    बेहतर यह होगा कि मतभेद रहने पर शिष्ट और संयत भाषा में जवाब दिया जाए.भरोसा रखें इससे न तो किसी मर्यादा का उल्लंघन होगा और न ही देशहित पर कोई आंच आएगी. अतः संवाद जारी रहना चाहिए .

    हां! एक बात और कहना चाहूंगा सभी चिट्ठाकार साथियों से कि बहस पूरी विश्वसनीयता और ईमानदारी से होनी चाहिए — अपने नाम के साथ — अनाम या ‘अनॉनिमस’ रह कर नहीं.

  7. अनूप शुक्ला Says:

    मेरे विचार से मोहल्ला बैन करने लायक ब्लाग नहीं है।

  8. प्रमोद सिंह Says:

    बंधु,
    आप समूचे हिंदी ब्‍लॉगिंग की आचरण संहिता की एक विस्‍तृत प्रस्‍तावना ही क्‍यों नहीं कर डालते. और नारद ही क्‍यों, सीधे उसे गूगल तक मनवाने की गुजारिश करें. कि सिर्फ विचार ही नहीं, किस तरह की धारणाओं पर लोग बात करें, कैसे शब्‍दों का इस्‍तेमाल करें, एक-दूसरे के संबोधन में ऐसा न हो आदर प्रकट करने में कहीं चूक हो जाये. ब्‍लॉगिंग को एक बंद पारिवारिक इकाई की तरह चलाने में क्‍या-क्‍या कसरत हो, इसकी ऊर्जा लगाईये आप. बहुत सृजनात्‍मक हैं आप. बधाई.

  9. संजय बेंगाणी Says:

    प्रिय प्रमोदजी,

    मैं आचार संहिता रचने वाला कौन होता हूँ, मगर अपने विचार व्यक्त करने के लिए मैं भी स्वतंत्र हूँ.
    नारद परिवार का सदस्य होने के नाते अगर कोई बात मुझे गलत लगती है, तो सबके सामने लाने का तथा उस पर मेरे विचार रखने का मुझे अधिकार है. इस पर निर्णय तो सभी की मर्जी से होना है.

    मेरी सृजनात्मकता की प्रशंसा करने के लिए आपका आभार व्यक्त करता हूँ.

  10. अभय तिवारी Says:

    प्रिय संजय जी,
    मैंने मोहल्ले पर पिछले दिनों चली बहस के लगभग सभी लेख पढ़े हैं। मुझे उन में देशद्रोह या हिन्दू विरोध जैसी कोई बात नहीं लगी, हाँ..एक दो बार यह ज़रूर लगा कि उनके शीर्षक जानबूझकर ध्यानाकर्षक बनाये गये थे। आप को ऎसा लगा..मैं समझ सकता हूँ..हम सब को अपनी राय रखने का अधिकार है..जहाँ तक रही बात किसी एक ब्लॉग को बैन कर्ने की.. बहुमत से ये फ़ैसला किया जा सकता है..पर क्या ये ठीक होगा..जिस तरह से हमारे समाज में अलग अलग राय रखने वाले लोग स्वतन्त्र रूप से रहते हैं..और उन्हे अपनी बात कहने की आज़ादी होती है..उसी तरह, मुझे लगता है, हमें अपने समाज के इस चरित्र को इस मंच पर भी बरक़रार रखना चाहिये..और दूसरी दृष्टि से देखें तो आज हम सब मिलकर उन्हे नारद से बाहर कर देंगे.. पर इस फैलते हुये हिन्दी अन्तरजाल में जल्द ही दूसरे ब्लॉग एन्जिन्स या उन्हे जो भी कहते हों, आ जायेंगे.. और शायद नारद से ज़्याद संसाधनशील भी, तब हम उनको कैसे रोक पायेंगे? आप को उनके विचार पसन्द नहीं तो आप अपने विचार रखिये .. उसके लिये किसी को घर से निकालने की क्या ज़रूरत.. आशा है आप मेरी किसी बात को अन्यथा न लेंगे..

  11. शशि सिंह Says:

    पता नहीं क्यों मुझे अपने रास्ते में आने वाले अवरोधों को तोड़ने की इच्छा ही नहीं होती… क्यों तोडूं… क्यों खर्चूं अपनी ऊर्जा दूसरी की इच्छाओं पर … इन अवरोधों को तो मैं अपनी रचनाधर्मिता के लिए चुनौती और अपनी स्वतंत्र सोच के लिए जरूरी पोषण मानता हूं. मुझे तो इन अवरोधों के ऊपर या नीचे से निकल जाने में कहीं ज्यादा मज़ा आता है. याद रखिये… अवरोध अपनी जगह पर बने रहते हैं और आप उन्हें पार कर कहीं आगे निकल जाते हैं.

    संजय भाई, किसी की मोटी लाइन देखकर क्यों घबराते हो… आओ आगे बढ़ों उनसे भी मोटी और लंबी लाइन खींच दो. अगर मोहल्ले का प्रयास सुनियोजित है… तो निकालो तरकश से तीर और तान दो उनपर . अपनी योजना को उनसे भी ज्यादा सुनियोजित बनाओ. चलने दो यह शास्त्रार्थ… देखें तो किनके पाले में सच है?… तमाशबीन देखे तो लें कि किनके तर्क सच तक पहुंचाते हैं और कौन है झूठ का दामन फूल?

    वैसे एक और पक्ष हो सकता है… शायद अलग-अलग आस्थाओं वाले हम सब का लक्ष्य बेहतर राष्ट्र व बेहतर समाज का निर्माण हो? इसके लिए हम अपनी-अपनी आस्थाओं से पोषित वाद की गलियों में विचर रहे हों? अगर ये सच है तो हमें राष्ट्रवाद, साम्यवाद, समाजवाद आदि गलियों से निकलकर अपने कहीं वृहद लक्ष्यों को पूरा करने के राजमार्ग को पकड़ना चाहिये. इसके लिए बहस का जारी रहना जरूरी है. ऐसा मुझे लहता है.

    जहां तक http://www.lokmanch.com का सवाल है उसकी कैटेगरी को बदलना बिल्कुल ही अलग मामला है… ये हमारे नारद के लिए संसाधनों की कमी का मामला है. इसके समाधान के रूप में मैंने इसे जूमला आधारित एक साइट का रूप दे दिया है. आप उसे एक बार जरूर देखें.

  12. नितिन बागला Says:

    विचार चाहे मिलें या ना मिलें लेकिन नारद से हटाये जाने के हम भी सहमत नही हैं..

  13. divyabh Says:

    संजय भाई,
    हजार हिंदुस्तान बनाने की कोई जरुरत नहीं…कई और हजार पाकिस्तान भी इसी देश में बन जायेंगे॥इस विषय पर इतना ध्यान क्यों दिया जा रहा मैं अबतक समझ नहीं पाया हूँ… जब इस देश में मिडिया स्वतंत्र है और यह एक अधिकार है तो इतना व्यापक दृष्टिकोण का तो कोई फायदा नहीं जो लोग भी अंग्रेजी से, अपनी मातृ-भाषा को लिखने का माध्यम बनाते हैं उनके लिए तो यह हतोत्साहना है। अब चूंकि “नारद” काफी प्रचलित है तो यह एक प्रकार का “तानासाही” स्वरुप ही होगा,जबकि अन्य जगहों पर सामान्यत: यह आता ही रहेगा तो आपका जो सजग दृष्टिकोण है वह तो धरा का धरा रह गया…। और हर व्यक्ति अपनी लेखन के लिए स्वतंत्र है…RSS के मुद्दे पर जिन-जिन महापुरुषों ने टिप्पणी की है उसपर पर तो सबसे पहले सेंसर होना चाहिए… किसी को सीधा गाली देने का क्या कोई अधिकार है? और “नारद” पर हिंदूवादी शोर अच्छा नहीं लगता…और हर का अपना आदर्श होता है मार्क्सवाद में भी बहुत हिंदू विरोधी तत्व मौजूद हैं तो क्या उनको बात रखने की अनूमति नहीं है…???

  14. divyabh Says:

    संजय भाई,
    लगता है थोड़ा ज्यादा हो गया अभी मैने मोहल्ला का कुछ पिछला पोस्ट पढ़ा आपकी की बातें भी सही लगी… थोड़ा प्रयास है भटकाने का और सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का…। अगर आपको कष्ट पहुँचा है तो नजर-अंदाज करें पर हाँ चेतावनी हो चुकि है जो काफी है…।

  15. रीतेश गुप्ता Says:

    संजय भाई,

    मैं मोहल्ला ब्लाग को नारद से हटाने के पक्ष में नहीं हूँ ।

    धन्यवाद !!

    रीतेश

  16. PRAMENDRA PRATAP SINGH Says:

    जिस प्रकार मोहल्‍ले के द्वारा विद्धेष फैलाने की कोशिश की जा रही है वह गलत है। अपनी बात कहना ठीक है, इतना अंतकाई होना ठीक नही। अगर उन्‍हे हिन्‍दस्‍थान मे इतना खतरा और खौफ कयों सता रहा है। जिस भाई की रोटी के टुकडें पर पलते है उसी पर लांछन लगाते है। अपने हिस्‍से से ज्‍यादा की रोटी तो 1947 मे ले गये। जब कुछ नही हो रहा है तो इतना हल्‍ला मचा रखा है, जब सही मे होगा तो …..

    संजय भइया इसे हटना तो ठीक नही है पर ये सही नही लिखते है तो वहॉं नकारात्‍म टिप्‍पणी करना भी ठीक नही है।

    शशि भाई जी की बात भी विचारणीय है कि मोहल्‍ले वाले शोर माचना बन्‍द नही करते है तो तरकश के तीरों धार कम नही है।

    और अपने अपने पास प्रबुद्ध लेखको की कमी नही है। जो बाखूबी ईट का जबाब पत्‍थर से दे सकते है। पूर्ण तथ्‍यों के साथ बिना अनर्गल प्रलाप किये बिना।

  17. अतुल Says:

    एक दिन सांप्रदायिकता, हिंदूवाद वगैरह पर समोसा बहस सुन रहा था एकपार्टी में। सबके तर्क सुनने के बाद एक ही बाद दिमाग में आयी हमें रामविलासपासवान , सीताराम येचुरी प्रकाश कारात , मेधा पाटकर , मुलायम सिंह यादव और शरद पवार जैसे अनगिनत हिंदू मिल जाते हैं पर मौलाना वहीउद्दीन खान जैसे लेंस लेकर ढूँढने पढ़ते हैं। अव्वल तो जो हैं वो बोलते नही, जो बोलते हैं उन्हे मीडिया छापता नही। मीडिया यह क्यों नही छापता कि जावेद अख्तर को मुशर्रफ वीजा देने से क्यों डरता है हाँ मीडिया पासवान को छापता है जो मुशर्रफ के सामने मुस्लिम वोटो के लिये इस्तीफा देने का ढोल पीटता है। मोहल्ला में भी कभी अच्छी चीजे भी पढ़ी पर कभी अटपटे सुर भी सुनने को मिले पर दिल से कहूँ तो उनके जवाब सागर और बेंगाणी बँधु सही सुर में दे नही पाये। कुतर्की चाहता ही यही है सामने वाला ईंट के जवाब में पत्थर उठाये। सागर और संजय , इस खेल को समझो , वह पहले भड़काऊ बाते करेंगे, तुम चुप बैठोगे तो और उकसायेंगे, तुम कुछ बोलोगे तो वह नरेंद्र मोदी और तोगड़िया के पुतले फाड़ेंगे। तुम तर्क लाओगे तो वे सत्रह हजार किताबो के उद्धरण तुम पर पटक कर भाग जायेंगे।
    अब इससे निपटने के तीन ही रास्ते है पहला जोर जबरदस्ती जो संजय ने सुझायी, दूसरा भगवान बलराम वाला जो महाभारत के समय तीर्थाटन को निकल गये जैसा नारद के संचालक और वरिष्ठजन सुझायेंगे और तीसरा सत्रह हजार किताबो के उद्धरण के बदले चौतीस हजार तर्क लाओ पर ये काम न तुम्हारे बूते का है न मेरे क्योंकि हम दोनो ने ही हिंदी,समाजशास्त्र या राजनीतिशास्त्र में पीएचडी नही कर रखी। हम तुम वही कह छाप सकते है जो हमारा औसत दिमाग सोच समझ सकता है या विकीपिडिया पर ढूढ़सकता है। कुतर्क का जवाब जो देने में सक्षम हैं वह मौलाना वहीउद्दीनखान बन कर जाप कर रहे हैं “ऊँ शांति शांति!”

  18. अविनाश Says:

    संजय भाई, आपका प्रस्‍ताव और दोस्‍तों की टिप्‍पणियां पढ़ी। मोहल्‍ले पर जो आरोप है, उससे मैं इत्तफाक नहीं रखता। ये दीगर है कि बहुमत अगर फैसला करे कि मोहल्‍ले पर नारद की नज़र न रहे, तो मैं उसे सहर्ष स्‍वीकार करूंगा। आपने कहा कि मोहल्‍ले पर उद्देश्‍यपूर्ण तरीके से देशद्रोही सामग्रियां छप रही हैं। (देशद्रोही शब्‍द हटा दें, तो…) ये सही है, क्‍योंकि मोहल्‍ला निरुद्देश्‍य नहीं है- मसलन टाइम पास। लेकिन मोहल्‍ले के लिए समाज को समझने वाली सामग्रियां चुनते हैं।
    भड़काऊ शीर्षक क्‍या होता है अभय जी, जो पोस्‍ट होती है, उसका ही एक अंश शीर्षक होता है। भड़काऊ वो होता है कि पोस्‍ट में कुछ और हो, और शीर्षक कुछ और। जैसे सांध्‍य अख़बारों के शीर्षक होते हैं कि श्रीदेवी नहीं रही। ख़बर से पता चलता है कि दिल्‍ली की किसी कॉलोनी में श्रीदेवी नाम की कोई महिला का इंतकाल हो गया।
    और जैसा कि जीतू भाई ने कहा कि कुछ लोग विवादास्‍पद पोस्‍ट जानबूझ कर देते हैं ताकि लोग आकृष्‍ट हों। शायद ऐसा नहीं है। समाज में विवाद के जो मुद्दे हैं, उनको सुलझाना ज़रूरी है। अब कल को अगर मोहल्‍ले में आधुनिक भारत में अछूत समस्‍या पर कोई विचार छपे, तब भी लोग हल्‍ला करेंगे।
    हिंदू-मुस्लिम अलगाव हमारे मुल्‍क का सच है और इस पर बार-बार बात होनी चाहिए। मैं ये भी मानता हूं कि भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता जितनी ख़तरनाक है, उससे अधिक ख़तरनाक है हिंदू सांप्रदायिकता है। वैसे ही जैसे पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश में हिंदू सांप्रदायिकता से ज्‍यादा ख़तरनाक है मुस्लिम सांप्रदायिकता। गुजरात में जो हुआ, वह वीभत्‍स है और इसके लिए नरेंद्र मोदी को इतिहास कभी माफ नहीं करेगा। वो एक हत्‍यारा मुख्‍यमंत्री है, हिटलर की तरह। आप गोधरा का उदाहरण देंगे। उस पर कई सारी रिपोर्ट आयी कि वो किसकी करतूत है। एक तुक्‍का मिला कि हिंदू मारे गये, तो ज़रूर मुसलमानों ने मारा होगा। क्‍या इसी आधार पर मान लें कि समझौता एक्‍सप्रेस में जो हुआ, उसे हिंदू आतंकवादियों ने अंजाम दिया? तब, जबकि ट्रेन में ज्‍यादातर मुसलमान थे और वो भी पाकिस्‍तानी?
    बहरहाल, दो महीने पहले जब मैं हिंदी ब्‍लॉग की दुनिया से परिचित हुआ, जिसमें सुनील दीपक जी का हाथ है, तब से नारद से जुड़े चिट्ठाकारों को देख रहा हूं। लेकिन इसमें एक भी मुझे मुसलमान साथी नहीं मिला। यही है हमारे हमारे समाज का भी सच। कि हम बातें तो बड़ी बड़ी करेंगे, लेकिन दोस्‍तों के बीच में बाहरी कौम की घुसपैठ नहीं होने देंगे। ये आपका कैसा धर्मनिरपेक्ष चरित्र है संजय जी? आप कहते हैं हमारे लिए सभी धर्म समान है, लेकिन सिर्फ कहते हैं, आचरण तो ऐसा नहीं कहता? आप अपनी शब्‍द, क्षमता और सबूत के हिसाब से बात करें, न कि फासीवादी तरीकों से मोहल्‍ले को नारद से हटाने का प्रस्‍ताव देकर।
    अंत में धुरविरोधी जी की बात। धुरविरोधी जी ने आपमें स्‍वामी दयानंद और गांधी जी की झलक देखी है। इस पर क्‍या कहना चाहिए, हंसना ही चाहिए। जिस विचारधारा ने गांधी को मारा, उसी विचारधारा वाले एक शख्‍स (संजय बेंगाणी जी) को गांधी जी के साथ खड़ा कर दिया! चलिए फिर बात होगी…

  19. अविनाश Says:

    मोहल्‍ले में सांप्रदायिक सामग्रियां नहीं छपती है, सांप्रदायिक ता‍कतों के खिलाफ सामग्रियां छपती हैं।

  20. धुरविरोधी Says:

    अविनाश जी; संजय बैंगाणी जी के लिये मेरे पूरे ये शब्द हैं;
    “आप हिन्दीभाषी न होते हुये भी हिन्दी में जिस तरह प्रयास कर रहे हैं मैं उनके आगे नतमस्तक हूं. धुरविरोधी को आपके प्रयासों में स्वामी दयानन्द एवं गांधीजी के हिन्दीप्रेम की झलक दिखायी देती है. (संयोग से वे दोनों भी गुजरात से थे.)” नारद की संरचना बहुत बड़ी बात है.

    आपके इन शब्दों; “जिस विचारधारा ने गांधी को मारा, उसी विचारधारा वाले एक शख्‍स (संजय बेंगाणी जी) को गांधी जी के साथ खड़ा कर दिया!” का भी में विरोध करता हूं.

    मोहल्ले या किसी और पर सैंसरशिप का मैं भी पुरजोर विरोधी हूं.

  21. नीरज दीवान Says:

    काहे किसी को हटाने, बिठाने और लेटाने की बातें हो रही हैं?? नारद विवेकी और विशाल हृदय वाला महागुरू है. हमें भरोसा है कि वो मोहल्ला को नहीं हटाएगा. रही बात हिन्दू विरोध की तो हमें समझना होगा कि हिन्दू विरोध और हिन्दू कट्टरता का विरोध करने में फर्क है. इस फर्क को समझना हमारी कोशिश होनी चाहिए. यदि संजय भाई को मोहल्ले के विचारों में हिन्दू विरोध नज़र आता है तो उन्हें अपने तर्कों से लेख पेश करना चाहिए.
    अभी तो सांप्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता पर ही बहस शुरू हुई है और ये हाल है. आगे मासिक पत्रिका ‘हंस’ की भांति स्त्री विमर्श और दलित चिट्ठाकारिता पर भी बहसें शुरू होंगी. किस किस का विरोध होगा.. कल कोई और नारद आ गया तो क्या करेंगे? कितनों को चिल्लाएंगे? कितनों को रोकेंगे? हम क्यों दूसरों के विषय में अपनी उंगली घुसेड़कर विवाद को हवा दें?
    आप भी संयम और सहिष्णुता का परिचय दें.. संजय भाई.. इतना ही निवेदन है.

  22. eswami Says:

    संजय,

    आपको अपनी भूमिका को बेहतर समझना होगा. आपकी भूमिका शाब्दिक झोंटानुचव्वल से अधिक व्यापक है.

    कल को अगर किसी ऐसी वेबसाईट को जिसपर प्रकाशित हिंदी सामग्री आपको व्यक्तिगत रूप से पसंद ना हो, को जूमला या वर्डप्रेस पर आना हो तो आपको उनकी तकनीकी मदद के लिये उपलब्ध रहना है – एक हिंदी की वेबसाईट को खडा करने का मामला है. हमारी प्रतिबद्धताएं भूलनी नहीं हैं.

    नारद का काम सामग्री का आकलन करना नही है – उसकी उपलब्धता के बारे में सूचित करना भर है. हां पॉर्न आदी जैसी वर्क अनसेफ़ साईट्स की बात और होती है और उन पर अलग नीयम-कानून लागू होते हैं.

    अब अगर आप ये दोनो काम करने के पश्चात किसी के विचारों से असहमत हैं तो उसके विरोध में पांच वेबसाईट्स खडे कीजिये ना किसने रोका है?

    मुझे आश्चर्य हुआ की आपके जैसा युधिष्ठीर अपनी पोलिटिकल करेक्टनेस कैसे भूल गया? मुझे लगा था की गरमागरमी करना तो मेरा मैदान है!:)

  23. अभिषेक Says:

    ये सच है कि मोहल्ला को हटा देने मात्र से किसी समस्या का हल नही होने वाला । लेकिन यदि कोई आचारसंहिता बनी थी नारद की शुरुआत मे तो उसका पालन होना ही चाहिये । wikipedia भी neutral point of view (NPOV) कि नीति अपनाता है । ये सच है कि ब्लॉग और विकिपीडिया एक चीज़ नही हैं पर फ़िर भी कहीं ना कहीं तो लक़ीर खीचनी ही पड़ेगी । उकसाने वाले और भड़काऊ लेख ना ही देखने को मिले तो ज़्यादा अच्छा है । उत्तर तो दिये जा सकते हैं लेकिन इस बेकार काम मे जो फ़ालतू वक़्त खराब होगा और जो टेंशन होगी उसका क्या ?

    आजकल “pseudo secularism” इतना बढ़ गया है कि क्या कहें । जिसे भी अपने आप को बुद्धिजीवी साबित करवाना हो वो चौराहे पे खड़ा हो जाये और हिन्दुओं को तन मन धन से गाली देना शुरु कर दे । बस बन गया काम । और साथ मे भारत मे मुसलमान कितनी बुरी हालत मे हैं और उनका रोज़ कितना शोषण हो रहा है, अगर ये भी लिख दिया तो फ़िर सोने पे सुहागा । हिन्दू तो कोई आयेगा नही कुछ बोलने । उल्टा बहुत से ऐसे होंगे जो कहेंगे वाह वाह, और दो गाली, हम तुम्हारे साथ हैं । क्योंकि कल को उन्हे भी तो वही सब करना है । सस्ती पब्लिसिटी पाने कि भी ये सब अच्छे तरीके हैं । अविनाश भाई को भारतवर्ष मे हिन्दू, सांप्रदायिक नज़र आते हैं । गोधरा के बाद की घटनाओं से इतना द्रवित हुए हैं वो । गोधरा मे जो चलती ट्रेन मे आग लगा के लोगों को ज़िन्दा जलाया गया वो तो शायद स्टोव फ़टने से हो गया होगा । बाबरी मस्ज़िद काण्ड के बाद जब मुलायम सिंह ने गोलियों से भुनवाया कार सेवकों को, उसका तो इन्हे पता ही नही होगा । और यदि होगा तो भी यही कहेंगे कि बहुत सराहनीय कार्य था वो ।

    क्या करें भाई, प्रॉब्लम हमे मुसलमानो से नही है, प्रॉब्लम है इन pseudo secularists से । असली हिन्दू मुस्लिम डिवाइड ये पैदा करते हैं । अब आगे क्या लिखूँ ? वही बातें हैं, वही तर्क वितर्क हैं ।

  24. Pankaj Bengani Says:

    “एक तुक्‍का मिला कि हिंदू मारे गये, तो ज़रूर मुसलमानों ने मारा होगा।”

    मै सहमत नही हुँ, गोधरा की घटना तुक्का नही थी. आप कभी गोधरा गए नही लगता है।

    “तब से नारद से जुड़े चिट्ठाकारों को देख रहा हूं। लेकिन इसमें एक भी मुझे मुसलमान साथी नहीं मिला।“

    शुएब को पढा है कभी?

    “कि हम बातें तो बड़ी बड़ी करेंगे, लेकिन दोस्‍तों के बीच में बाहरी कौम की घुसपैठ नहीं होने देंगे। ये आपका कैसा धर्मनिरपेक्ष चरित्र है संजय जी?”

    नारद संजय भाई की बपौती नही है! और नारद किसी को निकालता नही तो रोकता भी नही. कोई मुस्लीम अगर अपना चिट्ठा बनाकर नारद पर पंजिकृत करवाता है, तो क्या नारद उसका पंजिकरण नही करेगा???
    आपको क्या लगता है, सभी चिट्ठाकार साथी किसी धर्म विशेष के व्यक्ति के चिट्ठे की अवहेलना करेंगे? अरे उन सब की छोडिये शायद आप तरकश पर कभी गए ही नहीं, शुएब तरकश के मुख्य लेखकों में से है।
    बेसिरपेर की बेकार बांसुरी बजाना कोई आप से सिखे!!

    “न कि फासीवादी तरीकों से मोहल्‍ले को नारद से हटाने का प्रस्‍ताव देकर।“

    भाईसाहब नारद किसी फासीवाद, साम्यवाद, में नही मानता. बाकी का स्पष्टिकरण तो जितुजी स्वयं देंगे.

    “जिस विचारधारा ने गांधी को मारा, उसी विचारधारा वाले एक शख्‍स (संजय बेंगाणी जी) को गांधी जी के साथ खड़ा कर दिया!”

    संजय भाई को आप जानते ही नहीं!! आप उस व्यक्ति के बारे में यह कह रहे हैं, जिसके विचारों से हिन्दी चिट्ठाजगत का एक एक इंसान अच्छी तरह वाकिफ है। मुझे तो लगता है आपने कभी संजयभाई को पढा ही नहीं।

    आइना हम सब देखते हैं अविनाशबाबु, पर खुद को भी पहचानना सिखीए.

  25. Tarun Says:

    टिप्पणी थोडा बडी थी इसलिये पोस्ट ही लिख दी :)

  26. अतुल शर्मा Says:

    मोहल्ले वाले शुएबजी को नहीं जानते ये आश्चर्य और शर्म की बात है। नहीं जानते और फिर भी आंय बांय शांय लिखते रहते हैं। अविनाश भैया नारद पर किसी का धर्म देख कर पंजीकरण नहीं होता।

  27. Amit Says:

    वाह वाह संजय भाई, आपकी योजना कामयाब रही!! ;) :P यार मेरे को भी लगता है ऐसे ही जुगाड़ बिठाने होंगे ट्रैफ़िक और टिप्पणियों के लिए!! ;) कभी कभार किसी ब्लॉग पोस्ट का आईडिया मेरे को भी सरका दिया कीजिए, मेरा भी भला हो जाएगा!! :D

    वैसे मैं मोहल्ले को नियमित तो नहीं पढ़ता लेकिन मैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कद्र करता हूँ, इसलिए व्यक्तिगत रूप से मैं नहीं समझता कि मोहल्ले को नारद निष्कासित करे। :)

  28. आशीष Says:

    मेरे ख्याल से मोहल्ला को नारद से हटाना अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के खिलाफ होगा !

  29. श्रीश शर्मा 'ई-पंडित' Says:

    भाई कोई बंदा एकाध पोस्ट किसी के समर्थन विरोध में लिखे तो बात सही है लेकिन मोहल्ले वाले तो जन्म से ही हिन्दू विरोध की अलख जगाए बैठे हैं। वे साबित करना चाहते हैं हिन्दू मुस्लिम विरोधी हैं, सांप्रदायिक हैं, कट्टरवादी हैं, भारत की सभी समस्याओं की जड़ हिन्दू ही हैं। ऐसे में संजय भाई की ये बात एकदम सही लगती है कि,“मोहल्ला उद्देश्यपूर्ण तरीके से साम्प्रदायिकता फैलाने की कोशिश कर रहा है”

    मैं इस विषय में यही कहना चाहूँगा कि मोहल्ले वालों के आने से पहले हमारे चिट्ठाजगत का माहौल बहुत सौहार्दपूर्ण और मित्रवत था। मोहल्ले वालों ने आकर चारों तरफ सांप्रदायिकता का जहर फैलाकर इसे दूषित कर दिया है।

    बाकी रही बंदिश की बात तो जैसे भाईलोगों का बहुमत हो। लेकिन इतना तय है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी को भी ऐसे पूर्वाग्रह से ग्रस्त लिखकर जहर नहीं फैलाना चाहिए। अगर मोहल्ले वाले हिन्दू धर्मावलंबियों में व्याप्त बाल-विवाह, जाति प्रथा आदि कुरीतियों के विरोध में लिखते तो कुछ बात थी, लेकिन वे तो सभी हिन्दुओं को सिरे से ‘शैतान’ बताने पर तुले हैं। इस विषय में ऊपर ऊपर अभिषेक जी की टिप्पणी से मैं पूरी तरह सहमत हूँ।

    @अविनाश जी,

    ये दीगर है कि बहुमत अगर फैसला करे कि मोहल्‍ले पर नारद की नज़र न रहे, तो मैं उसे सहर्ष स्‍वीकार करूंगा।

    भैया आज आपका मोहल्ला जो चल रहा है तो नारद जी की कृपा से, कोई गलतफहमी है तो नारद से हटवा कर देख लो, कितने लोग आते हैं आपके मोहल्ले में।

  30. अमिताभ त्रिपाठी Says:

    मैंने शशि जी से इस पूरी चर्चा के सम्बन्ध में सुना था परन्तु आज अनूपजी का चिट्ठा देखकर संजयजी के इस चिट्ठे पर आया। मेरी दृष्टि में संजय जी ने मोहल्ला के लिये नारद पर प्रतिबन्ध लगाने का जो सुझाव दिया था वह इस दृष्टि से उचित है कि मोहल्ला वाले लिख नहीं रहे हैं वे चिढ़ा रहे हैं। मुझे नहीं पता कि अविनाश जी सहमत से जुड़े हैं या फिर पोलित ब्यूरो के सदस्यों के निकट हैं पर मुझे उनकी टिप्पणी में इस बात पर घोर आपत्ति है कि उन्हें संजय बेगाणी से इसलिये घृणा है कि वे गुजरात से हैं। उन्होंने संजय पर जिस प्रकार की व्यक्तिगत टिप्पणी की है वह उन्हें हिटलर की श्रेणी में लाकर खड़ा करती है।

    वाह रे अविनाश जी आप लोग तो क्षण भर में किसी को भी तराजू में तौलकर उसे तालिबानी, कट्टरपंथी, साम्प्रदायिक या फिर न जाने क्या क्य सिद्ध कर देते हैं। आपको ऐसे निष्कर्ष निकालने का अधिकार किसने दिया। जो आपसे असहमत वह दुनिया का सबसे बुरा आदमी। आखिर यह कहाँ की सहिष्णुता और लोकतन्त्र है। अविनाश मुखौटा उतारकर सामने आइये और लोकतन्त्र उदारवाद जैसे ढकोसलों का सहारा मत लीजिये। आप किस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं यह किसी से छुपा नहीं है। मैं संजय जी की बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ कि मोहल्ला वाले योजनाबद्ध तरीके से साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं।

  31. Deepak Says:

    Have read mohhala blogs, and they really are very offensive.. I think it should be banned fron Narad

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