अन्धा समर्थन, क्या बात है!!
परसों शाम को गुजराती समाचार देख रहा था. वडोदरा से समाचार थे, मल्लिका साराभाई जैसे बुद्धिजीवी लोग जैन की पेंटिंग हटाने के विरूद्ध विरोध प्रदर्शन के लिए आये हुए थे. मीडियाकर्मी ने उनसे पूछा,”क्या आपने पेंटींगे देखी है?”. जवाब था,”ना”. फिर दूसरे बुद्धिजीवी से यही सवाल पूछा,”क्या आपने पेंटींग देखी है?” उनका जवाब भी था, “ना”.
पेंटींग देखी नहीं मगर समर्थन जरूर करना है. अंधे समर्थन में विरोध रेली निकाल कर पेज थ्री पर छप जाना है. प्रोफाइल बढ़ा लेनी है.
ठीक ऐसे अंधे समर्थकों की तरह अंधे विरोधी भी होते है. झट पूतला दहन करने निकल पड़ते है. साथ ही साथ थोड़ी तोड़-फोड़ हो जाए तो प्रोफाइल बढ़ जाये, हो सकता है टीवी वाले दिखा भी दे. मामला कुछ भी हो सकता है. हुसैन की पेंटींग से लेकर पैगम्बर के कार्टून तक. अगर पूछोगे क्या आपने कलाकृतियाँ(?) देखी है. जवाब मिलेगा नहीं
क्या गजब साम्यता है, दोनो पक्षो में. दोनो ही अंधे समर्थक/विरोधी है. स्तर में कोई फर्क नहीं.
ये बेचारे जो पैगम्बर के कार्टून पर या भारतमाता की नग्न तस्वीर पर हल्ला मचाते है, उनकी बात तो फिर भी समझमें आती है, इनकी सोच समझ एक दायरे तक ही सिमित है, तो बेचारे थोड़ी बहुत तोड़-फोड़ कर शांत हो जाते है, मगर इन पढ़े-लिखे तथा कथित बुद्धिजीवीयों का क्या कहें? इनमें कुछ ज्यादा ही समझ है.
अरूंधति को कश्मीर में भारतीय सेनाएं दिखती है, मगर वहाँ के देशद्रोही आतंकवादी नहीं दिखते जिन्होंने लाखों को बेघर कर दिया, लोगो का जीवन नर्क-तुल्य बना दिया.
मानवाधिकारवादीओं को भी मारे गये गेंगस्टर,नक्सली तथा आतंकवादी के मानवाधिकार तो नजर आते है, मगर उनकि नजर में मारे जाते पुलिसकर्मी, सेना के जवान व आम नागरिक शायद ही मानव की श्रेणी में आते होंगे. वास्तविकता यह है की अपराधियों ने नेता, पुलिस, पत्रकार, कानून के जानकारो के साथ-साथ ऐसे संगठनो को भी साध लिया है, जो वक्त-बेवक्त उनके लिए ढ़ाल का कार्य करते है.













May 26th, 2007 at 9:58 pm
ये बुद्धिजीवी कौन होते हैं…? कोई मिले तो उसे ब्लौगर बना देना ..फिर ना बुद्धि रहेगी ना बांकी के जीव…
May 26th, 2007 at 11:46 pm
बड़ी आफ़त है!
May 27th, 2007 at 12:43 am
आपको नहीं पता संजय भईया कि आपने कितनी स्टीक बात कह दी है। कुछ समय पूर्व किसी समाचार पत्रिका में पढ़ा था जिसमें ऐसा ही कुछ लिखा था कि कई NGO आदि गैंगस्टरों आदि के पैसों से चलती हैं ताकि वक्त-बेवक्त उनका प्रयोग वे अपने लिए कर सकें। कितनी ही NGO दो नंबर का पैसा इधर-उधर करने के लिए एक फ्रंट होती हैं। उस समय यकीन नहीं आया था पर कुछ समय बाद ऐसे समाचर पढ़, इन लोगों के प्रदर्शनों आदि को देख 2 + 2 कर लिया तो समझ आया!
May 27th, 2007 at 4:51 am
ये पेंटिग का क्या किस्सा है? देश के सारे लफड़े इन्हीं अंध भक्तों की देन हैं जो आंख से ही नही दिमाग से भी पैदल होते हैं। अरूनधती ना जाने क्यों मुझे लगता है जानबूझकर हमेशा उल्टी गंगा बहाती हैं खासकर जब या तो उनकी कोई बुक आयी हो या आने वाली हो।
May 27th, 2007 at 7:13 am
स्टंट होता है यह सब..प्रायोजित टाईप.
May 27th, 2007 at 10:14 am
“आपको नहीं पता संजय भईया कि आपने कितनी स्टीक बात कह दी है। कुछ समय पूर्व किसी समाचार पत्रिका में पढ़ा था जिसमें ऐसा ही कुछ लिखा था कि कई NGO आदि गैंगस्टरों आदि के पैसों से चलती हैं ताकि वक्त-बेवक्त उनका प्रयोग वे अपने लिए कर सकें। कितनी ही NGO दो नंबर का पैसा इधर-उधर करने के लिए एक फ्रंट होती हैं। उस समय यकीन नहीं आया था पर कुछ समय बाद ऐसे समाचर पढ़, इन लोगों के प्रदर्शनों आदि को देख 2 + 2 कर लिया तो समझ आया!”बस अमित भाइ के कहे मे इतना और जोड ले”विदेशी पैसो से चलते ये NGO एक भारतीय की तरह नसोच सकते न ही व्यवहार कर सकते भै जहा से पैसा आता है वही से गाडी ड्राईव भी होती है ना”
May 27th, 2007 at 11:57 am
सत्य को जाने बिना की गई प्रतिक्रिया का कोई मुल्य नही होता। लेकिन यहाँ सत्य को भीड़ से तोला जाता है या अपने पूर्वाग्रहो से।पता नही भाई दुनिया किस दिशा मे जा रही है।