मुम्बई ब्लॉगर मीट – 1
समन्दर किनारे बसा लोगो का समन्दर यानी मुम्बई. बीते शनिवार को मैं भी मुम्बई के जन सैलाब का हिस्सा हो गया था. जहाँ मुझे जाना था उस इलाके को अंधेरी कहते है. आज तो यह क्षेत्र जगमगाता हुआ-सा है पता नहीं क्यों इसका नाम अंधेरी रखा गया है. इसके कुछ एक भागो को देख कर कहा जा सकता है की मुम्बई सचमुच शंघाई बन सकता है.
खैर, मुम्बई जाने से पहले ही तय था की अगर जाना हुआ तो शशिसिंहजी, कमलजी व युनुसजी से जरूर मिलना है. सबको ई-पत्र भेज दिया था तथा मिलने-मिलाने का तय कर लिया था. मगर महानगरीय विडम्बना ही कहे की जिसे जब मिलना था, तब न मिल सके. जिसे जहाँ मिलना था वहाँ न मिल सके. लेकिन ब्लोगर आपस में मिले जरूर. कैसे? अरे भई मजेदार किस्सा है, सुनिये.
मिलना शशिसिंह से
मुझे एक एड एजेंसी वाले बन्धू से मिलना था और शशिसिंहजी भी उन्हे पहचानते है, तो दोनो के लिए मिलने की एक ‘कोमन’ जगह तलाशनी नहीं पड़ी. मैं नियत समय वहाँ पहूँचा तो पता चला वे भाई अभी तक ऑफिस आये ही नहीं है. पूछ्ने पर बताया की आधे घंटे में आ जाएगें. आधे घंटे तक प्रतिक्षा कर मैं सुबह का खाना निपटाने चला गया. वापस लौटा तो देखा जिनसे मिलना था वे भाई साहब अभी तक नहीं आये है. मैने सोचा पता नहीं मुम्बई का आधा घंटा कितने मीनट का होता है और फिर से प्रतिक्षा करने बैठ गया. वहीं पास वाली कुरसी पर हरी टी-शर्ट पहने एक नौजवान बैठा हुआ था. हाथ में फण्डू सा मोबाइल था और सर पर सफेद टोपी धारण किये था. उसकि बैचेनी बता रही थी की वह भी मेरी तरह ही वह उन महाशय की प्रतिक्षा कर रहा है. तभी वहाँ कमलजी आ गए. उनसे मैं अहमदाबाद में मिल चुका था, और फोन पर पता भी चल चुका था की उस दिन उन्हे पुत्र की प्राप्ति हुई है. तो मैं तुरंत बधाई देने उनकी ओर लपका. साथ बैठा नौजवान भी उठा और मुझसे पहले कमलजी को बधाई टिका दी. जब मैं कमलजी को बधाई देने लगा तो नौजवान चौंका की मैं उन्हे कैसे जानता हूँ? कमलजी हम दोनो की शक्ले देख रहे थे और मैं नौजवान को पहचानने की कोशिश कर रहा था. अरे ये तो अपने शशि भाई है! कमाल हो गया फोटो के मुकाबले काफी जवान व उर्जावान लग रहे है, कुछ कुछ “यो टाइप”. उन्होने भी मुझे नहीं पहचाना. उनके अनुसार मैं फोटो में जैसा दिखता हूँ उतना सुदर्शन हूँ नहीं. जैसा लिखता हूँ उससे जो छवि बनती है उसके मुकाबले दिखने में मरीयल सा लगता हूँ. बाकी के विचार वे खुद ही समय निकाल कर लिखे तो पता चले. 
तो अभी तीन ब्लोगर एक जगह एकत्र हो गए. सामान्य अभिवादन का आदान-प्रदान ही हुआ की एड एजेंसी वाले महाशय आ गए. उनसे जरूरी विचार विमर्श कर मैं कमलजी के साथ एक अन्य जगह की और चल दिया जहाँ एक और व्यवसायिक मुलाकात होनी थी. वहाँ से लौट कर फिर शशिसिंहजी के साथ हो लिया.
हम ब्लोग जगत पर चर्चा करने में व्यस्त हुए तो साथ में एड एजेंसी वाले महानुभाव भी बैठे थे. वे आश्चर्य से हमारी बाते सुन रहे थे. उन से शशिसिंहजी ने कहा की हम ब्लोगरो का हजार लोगो वाला परिवार है. यहाँ हम जन्म से ले कर मरण तक सब मनाते है.
थोड़ा समय वहाँ गुजार मैं और शशिजी “निर्मल-आनन्द” से मिलने रवाना हुए. मुझे शाम की ट्रेन से वापसी करनी थी, मैने समय की ओर ध्यान दिलाया तो शशिजी बोले अरे यहीं तो है, अभी पहुँच जाएंगे. बादमें पता चला मुम्बई का “यहीं तो है” कोई नजदीक नहीं होता.
ओटो में शोरगुल के बीच हम बतियाते रहे. देबाशीष से लेकर अविनाश (क्षमा करना मगर बात हुई तो अविनाश का नाम लिखना ही पड़ रहा है, वैसे उनसे खाँमखा मेरा नाम न लिखने को कहा है, अतः मेरे द्वारा उनका नाम लिखना नैतिक रूप से गलत है.) तक तमाम ब्लोगरो की बात हुई. अक्षरग्राम व ब्लोगनाद, पोडभारती तथा तरकश पर भी चर्चा हुई. मेरा मानना था की पूराने ब्लोगरो को जब तक की हिन्दी ब्लोगरो की संख्या लाख को न छूने लगे लिखना बन्द नहीं करना चाहिए, तथा सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए. 
ओटो दौड़ता रहा, जाम में फसता-निकता रहा. हम गोरेगाँव पहूँचे जहाँ निर्मल-आन्नद वाले अभयजी का घर है. उस दिन जबरदस्त उमस थी, हम पसीने से तर-बतर लगभग दौड़ते से उनके घर के आगे पँहुचे और दरवाजे की घंटी बजाई….यहाँ मुझे दो झटके लगने वाले थे….













June 11th, 2007 at 7:45 pm
पढ़ कर अच्छा लगा, आप आज पता लगा कि शाशि भाई नौजवान है, मेरी धारणा तो फरवरी मे ही बदल गई थी
June 11th, 2007 at 7:45 pm
ह्म्म, ये ही ना बात। आगे भी इन्तज़ार रहेगा।
लटके हो या झटके पूरे दिखाइए, हम है ना।
शशि के तो मुझे कान खींचने है, अब देखो कम मौका मिलता है। दिल्ली तो वो आ नही रहा, मुम्बई मेरा जाना नही हो पाएगा, देखो कम मिलते है। कमल भाई से पार्टी वगैरहा ली की नही।
June 11th, 2007 at 8:41 pm
क्योंकि आप थे बहां अँधेरी में तब ही हो गई रोशनी
और मिलीम थीं पैने तेवर वाली अद्भुत वहां लेखनी
June 11th, 2007 at 9:07 pm
अगली कड़ी का इंतजार है।
June 11th, 2007 at 9:24 pm
अगली कड़ी का इन्तज़ार रहेगा
June 11th, 2007 at 9:31 pm
पढ़ कर आनंद आया.. आगे वाली कड़ी का इंतजार है…
काकेश
June 11th, 2007 at 9:51 pm
बहुत हाँफ हाँफ कर लिख रहे हो..अभी दरवाजे की घंटी ठीक से बजाई भी नहीं और लिखना बंद…आगे लिखो भाई!! अभी तक बढ़िया चल रहा है. शशी भाई और कमल जी से मुलाकात का विवरण और फोटो बढ़िया हैं.
टीशर्ट के हिसाब से फिर कुछ डांस वगैरह हुआ कि नहीं??
June 11th, 2007 at 11:08 pm
सही है अभी तक! ये कैसे हुआ कि शशिसिंह और संजय बेंगाणी एक दूसरे को मिलने पर पहचान नहीं पाये जबकि दोनों लोग अपने फोटॊ चिपकाये रहते हैं। इसकी क्या सजा दी जाये। फिलहाल तो दोनों लोग अपना आगे का विवरण बतायें तब देखा जायेगा।
June 12th, 2007 at 12:20 am
अरे ई का गजब किए रहे? अनूप जी ठीक कहते हैं, दोनों अपने-२ फोटू चिपकाए रहते हैं फिर भी नाही पहचान पाए एक दूजन का!!
आगे भी लिखिए, हमार तरह आपको भी एक से अधिक किस्तों में विवरण देने की लत लग गई!!
June 12th, 2007 at 8:35 am
बढ़िया वर्णन।
अगली किश्त की प्रतीक्षा रहेगी।
June 12th, 2007 at 10:52 am
ये जो फ़ोटो आज छापी है असली ही है ना..?और ये झटका आप खाये हो ठीक है पर हमे काहे झटके दे दे कर बतियाने के चक्कर मे हो,खुद खाये हो और बदला हम से लोगे का भाइ
क्या वहा पर जितेन्दर साहब की बिटिया से मिल लिये हो का…?
जो ब्लोगर मीट भी धारावाहिक की तरह,वो भी झटके दे दे कर दिखा रहे हो…?
June 12th, 2007 at 1:55 pm
यह शेष अगले अंक में वाली बात अन्याय है । इस पर सख्त पाबंदी होनी चाहिये । और यह कैसी और किसकी फोटो अपने नाम के आगे लगाते हो आप लोग कि कोई पहचान न सके ?
घुघूती बासूती
June 12th, 2007 at 7:48 pm
ये मुलाकात वाला किस्सा मजेदार रहा। पहचानेंगे कैसे भईया तमाम ब्लॉगरों की
फोटुएं पहले फोटोशॉप से गुजरती हैं।
सत्यवचन, पूर्णतया सहमत हूँ।
बाकी कहानी के अंत में कुछ क्रमशः जैसा तो लिख देते।
June 13th, 2007 at 1:28 pm
बढ़िया, अगली कड़ी की प्रतीक्षा।