| Mobile | RSS

बचपन की कीमत पर आत्मसंतुष्टि

July 17th, 2007 | 6 टिप्पणियाँ | श्रेणी में

पता नहीं आज के बच्चे किसके पाप का फल भोग रहे है. पाँच किलो का बच्चा पन्द्रह किलो का बस्ता उठाये घूम रहा है. हम उन्हे कुबड़ा बना रहें है.

इसके पीछे सबसे प्रमुख कारण है हमारा ब्राण्डों के प्रति मोह. आप कहेंगे इसमें ब्राण्ड और विज्ञापन कहाँ से आ गये? तो सुनिये. विज्ञापन व ब्राण्ड का नाम हमें संतुष्टि देते है. जैसे अमुक ब्राण्ड की चाकलेट के साथ अगर “आइ लव यू” बोला जाय तो लगता है संपूर्ण प्रेम प्रदर्शित हुआ है. खाली “आइ लव यू” बोलना तो मात्र औपचारिक ही लगता है. “आइ लव यू” के साथ अमुक ब्राण्ड की चाकलेट का नत्थी होना तसल्ली के लिए अनिवार्य है. वैसे ही अगर अमुक ब्राण्ड का अंडरवियर न पहना हो तो मर्द होने पर शक सा रहता है, अन्यथा कोई भी खुद को माचोमेन समझ सकता है. यही प्रभाव है ब्राण्ड का. बात संतुष्टि की है.

ऐसी ही संतुष्टि बच्चों की शिक्षा के मामले में चाहते हैं.

शर्माजी का बच्चा जिस सकुल (स्कूल) में जाता है वहाँ केवल राज्य के बोर्ड की किताबे ही पढ़ायी जाती है जबकि अपने बबलू के सकुल में सेंट्रल बोर्ड की भी साथ में पढ़ायी जाती है. इसलिए फीस भी ज्यादा है, पर बच्चे के भविष्य के सामने यह तो कुछ भी नहीं. साथ में कुछ किताबे तो ओक्सफोर्ड की भी हैं, एक एक किताब इत्ति महंगी है की एक किताब की कीमत में बाकी सारी किताबे आ जाए. पर बच्चे के भविष्य का सवाल है. स्लेट वगेरे तो आऊट डेटेड है, इंटरनेश्नल इसटेंडर्ड की सकुल है ठेर सारी कॉपियाँ चाहिए होती है. भई बच्चे के भविष्य का सवाल है. मैं तो कहूँ इस सकुल का नाम ही काफी है. अब बड़ी सकुल होगी तो किताबे भी ज्यादा होगी की नहीं, भले ही सारी किताबे न पढ़ाते हो, इसटेंडर्ड तो मेनटन होता ही है. वो भी कोई सकुल हुई जहाँ चार किताबे पढ़ाई जाती है. वो भी हिन्दी की हंह… तो

यहाँ ब्राण्ड है अंग्रेजी, ब्राण्ड है अमुक स्कूल, ब्राण्ड है महंगी किताबे.

संतुष्ट हैं हम. बोझ तले दबा है बचपन.

क्यों विचार करे एक ब्लॉगर पिता और हाँ माता भी.

(एक ब्लॉगर पिता होने के नाते राजेशजी की चिंता में मेरे सूर)

टिप्पणी करें 1678 बार पढ़ा गया, 1 बार आज पढ़ा गया |


ऐसी ही अन्य प्रविष्टियाँ

  • No Related Post
Follow Discussion

6 प्रतिक्रियाएं to “बचपन की कीमत पर आत्मसंतुष्टि”

  1. Rajesh Roshan Says:

    अगर मेरे लिखे से कोई एक प्रभावित होकर कोई दूसरा लेख लिखता है तो यह सम्मान कि बात है लेकिन हमे सम्मान नही अपने बच्चो कि खुशिया चाहिऐ । और उस ख़ुशी के लिए लेख नही स्कूल के प्रबंधको से बात करनी होगी ।

  2. sajeev Says:

    संजय जी यूं तो हम हर बात पर विदेशियों कि नक़ल करते हैं पता नही शिक्षा प्रणाली हम उन जैसी क्यों नही अपना पाते हैं, वैसे ऐसे स्कूल भी हैं जहाँ इन बस्तों का बोझ ( पढ़ाई का दबाब ) कुछ कम है पर वो सब आम आदमी की पहुंच से मीलों दूर है

  3. प्रियंकर Says:

    यह किताबों का नहीं . मां-बाप की आशाओं-आकांक्षाओं-उम्मीदों-कुंठाओं-
    असफलताओं का बोझा है जो बच्चे पीठ पर ढो रहे हैं . वरना पहली दो-चार कक्षाओं का क्या तो सिलेबस और क्या तो किताबें . अगर हों भी तो अंक-भाषा-सामाजिक परिवेश यानी इन तीन के अलावा चौथी किताब तो होनी ही नहीं चाहिए . पर ये बच्चे ईसा मसीह की तरह अपना क्रॉस खुद ढो रहे हैं . क्या हम हैं और क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था है !

  4. समीर लाल Says:

    शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन की आवश्यक्ता है.

  5. श्रीश शर्मा Says:

    क्या बताएँ बच्चों का बैग का बोझ देखकर तरस आता है। मैं रोज अपने छात्रों को कहता हूँ कि कमबख्तों बस टाइम टेबल के मुताबिक किताबें लाया करो, फिर भी कोई फायदा नहीं। :(

  6. परमजीत बाली Says:

    बिना परिवर्तन के कुछ नही होगा। समीर जी, सही कह रहे हैं।

अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें


sanjay-sameersanjay-ajadaksanjay-maithalisanjay-yashvantsanjay-delhi-bloggersanjaysanjay-narayanbhaisanjay-abid-surtiToshiba_Intense_Colors_1024 x 768Denise_Milani_sexy_1024 x 768