बड़ा रस है इन बातों में
पर-निंदा में बड़ा आनन्द है यह सब मानते हैं, मगर हमें राजनीतिक उठापटक की बातों में बड़ा रस मिलता है. इसलिए हमने जीरो कॉलम वाले योगेशजी को बहुत उकसाया की लिखना जारी रखे, हिन्दी की सेवा तो बहाना है, दरअसल गुजरात में चुनाव सर पर है. भारी उठापटक मची है, मजा लेने का समय है और वे कहीं गूम है. लिखते तो मजा आता.
अब देखिये राहुल बाबा गुजराती सिख रहे है, खुशी की बात है. चुनावों में बोलेंगे, “केम छो, मजामा ने?” करे भी क्या गुजरात सबको चाहिए. धन की पोटली जो ठहरी. मगर इसकी हवा कांग्रेस के ही शंकरसिंह वाघेला ने निकाल दी. अब गाँधी परिवार के हितैशी छाती-पिटा कर रहे है.
इधर पाँच साल पहले विपक्ष के अलावा सब मोदीजी के पक्ष में थे. आज कोई नहीं…मीडिया नहीं, खुद के पक्ष वाले कई लोग नहीं, आर एस एस नहीं, विश्वहिन्दु परिषद नहीं. फिर बची जनता. उसको तो कोई नहीं भाँप सकता, पता नहीं किसके नसीब का बटन दबा दे.
फिलहाल तो एक अनार सौ बिमार वाली हो रखी है. मायावती, लालूजी, पासवानजी, उमाजी, शरदपवारजी, ठाकरेजी, वाघेलाजी और उनके तमाम आधा दर्जन मुख्यमंत्री के कांग़्रेसी दावेदार सभी को गुजरात चाहिए.
अब तेरा क्या होगा कालिया..मेरा मतलब मोदीजी…













October 3rd, 2007 at 5:55 pm
जो होगा कुछ समय में स्पष्ट हो जायेगा!
October 3rd, 2007 at 6:40 pm
घड़ा भरा है या नहीं, इसी से तय होगा मोदी का भविष्य। वैसे जिस तरह बुश को दुनिया का सबसे ज्यादा नफरत किया जानेवाला राष्ट्रपति माना जाता है, वैसा ही पोल गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में भी होना चाहिए।
October 3rd, 2007 at 7:21 pm
आप अपनी पैनी नज़र बनाए रखिए इस चुनावी रंगमंच पर और इसी तरह कम शब्दों में खरी-खरी बात करते रहिए। गुजरात के राजनीतिक बियाबान में किस तरह के गुल खिल रहे हैं, इसके बारे में आपकी जुबान से सुनना कुछ अधिक ही दिलचस्प होगा।
October 3rd, 2007 at 7:41 pm
सुनाते रहिये चुनावी समाचार और प्रचार प्रसार के विषय में. हम यहीं से छाती पीट पीट कर सुन रहे हैं. क्या करें!!!
October 3rd, 2007 at 8:24 pm
जो पब्लिक तय करेगी, वो ही होगा जी। पब्लिक के दरबार में सबको आना है। भाजपा में जूतमपैजार है, पर गुजरात में कांग्रेस लाचार है। गुजरात की फाइट टाइट होगी। चुनाव आयें तो व्यंगकार तो भला होगा, एक से एक धांसू टापिकों का सिलसिला होगा। और जी आप ये इत्ती छोटी पोस्ट क्यों लिखने लगे।
October 3rd, 2007 at 9:08 pm
पिछली बार चुनाव के पहले जिस तरह का सांप्रदायिक तनाव था। वैसा इस बार देखने नहीं मिला है। मोदी कुछ समय पहले तक विकास को चुनावी मुद्दा बनाने की बात कर रहे थे। अब किसी भी पार्टी का कोई एजंडा साफ़ दिख नहीं रहा है। असंतुष्ट दोनों तरफ़ है, गुटबाज़ी भी दोनों तरफ़ है। मज़े की बात यह है कि इस बार कोई लहर वगैरह दिख नहीं रही है।
आप पोस्टाते रहिए। छोटी ही सही किंतु बढ़िया रोचक तरीक़े से। इतना वक़्त तो निकाल ही लोगे ना।
October 4th, 2007 at 12:31 am
ही ही ही, यही प्रश्न मोदीजी के दिमाग में भी घूम रहा होगा और उनके पक्ष वालों के दिमाग में भी!!