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क्योंकि नारद और ब्लॉगवाणी में फर्क है.

October 27th, 2007 | 27 टिप्पणियाँ | श्रेणी में

कुछ लोगों की माने तो नारद हुआ करता था, ठीक है मान लेते है. तो जो नारद हुआ करता था उसे कुछ उद्दंड किस्म के तानाशाही मानसिकता वाले लोग चलाते थे.

एक दिन एक चिट्ठा हटा दिया गया. क्यों? क्योंकि नारद ने अपने कुछ नियम बना रखे थे, उसी के तहत चिट्ठा हटा दिया गया. नारद पर गाली-गलौच या व्यक्ति विशेष पर अभद्र प्रहार करने वाले ब्लॉग को हटा दिया जाता था. मगर इससे पहले शिकायत करनी पड़ती थी, सच होने पर सबको सूचित करते हुए ब्लॉग को हटाया जाता था. प्रिय राहुल का एक चिट्ठा सबको बताते हुए नियमों के तहत हटा दिया गया था.

यह कार्यवाही बहुत से लोगो को तानाशाही लगी थी. श्री अफ्लातुनजी ने बाकायदा तानाशाही को समझाने के लिए कई पोस्टे लिखी. (आज भी उनकी दी हुई पुस्तक “तानाशाही को समझो” मेरे पास है और मुझे वह बहुत पसन्द भी आयी है.) किसी ने अपना चिट्ठा लिखना छोड़ दिया. आशा है प्रियंकरजी को भी एक अभद्र भाषा के ब्लॉग के लिए लिया गया अपना “स्टेंड” आज याद होगा.

यह दुखद है की आज गड़े मुर्दे उखाड़ने पड़े है. आशा है जो प्रेमभाव बाद के समय में हम सबके बीच स्थापित हुआ वह इससे प्रभावित नहीं होगा. फिर आप पर है.

एक समय एक चिट्ठा इसलिए हटाया गया क्योंकि वह नियमों का उल्लंघन कर रहा था. आज आलोकजी का चिट्ठा (9-2-11) ब्लोगवाणी से किस नियम के तहत गुपचुप हटाया गया है? ब्लॉगवाणी के ऐसे कौन से नियम है जिनका उल्लघंन सभ्य भाषा में लिखा जाने वाला तथा  हिन्दी का सबसे पूराना चिट्ठा कर रहा था. अगर तब कह कर हटाना तानाशाही था तो आज बिना कहे हटा देना क्या है? अफ्लातुनजी सुन रहें है आप?

अगर दूसरे एग्रीगेटर से सम्बन्धित होना ही अपराध है तो अनुप शुक्ल, देबाशीष, जितेन्द्र चौधरी, संजय बेंगाणी, प्रतिक पाण्डे, अमित गुप्ता इन सबको निकाल बाहर करो. कोई नारद से जुड़ा है तो कोई हिन्दी ब्लॉग से.

प्रतिस्पर्धी के साथ ऐसा व्यवहार लोकतांत्रिक और सह-अस्तित्व की भावना के अनुरूप तो कतई नहीं है.

झगड़ा अपनो से होता है इसलिए नारद के कर्णधारों से बहुत बार झगड़ा हूँ, मगर मैथलीजी की जो छवि है उसके चलते उन पर रोष नहीं आता, दुख होता है. घोर दुख.

ब्लॉगवाणी आपकी साइट है. किसे रखना, किसे न रखना यह आपके विवेक पर है. आप अगर चिट्ठाजगत की लिंक अपने यहाँ न भी रखेंगे तो उसे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला, मगर जो संदेश इससे जा रहा है, उसमें न ब्लॉगवाणी का भला है न हिन्दी की निस्वार्थ-सेवा कही जाने वाली भावना का. अच्छा हो ब्लॉगवाणी अपने नियम स्पष्ट कर दें ताकि वे लोग सावधान हो जाये जिन्हे अपना चिट्ठा ब्लॉगवाणी पर प्रतिबन्धित नहीं करवाना.

मैं निजी तौर पर आलोकजी के नौ दो ग्यारह चिट्ठे के समर्थन में ब्लॉगवाणी का बहिष्कार करता हूँ. अतः जोगलिखी ब्लॉगवाणी से हटाया जाता है तो इसका जिम्मेदार मैं स्वयं हूँ.

वे साथी भी अपना मत तय करे जो नहीं चाहते की भविष्य में एग्रिगेटर केवल अनर्गल प्रलाप करने वाले चिट्ठो का ही समर्थन करते रहे.

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27 प्रतिक्रियाएं to “क्योंकि नारद और ब्लॉगवाणी में फर्क है.”

  1. अफलातून Says:

    मुझे यह जानकारी है कि ब्लॉगवाणी नारद की भांति सामूहिक होने का दावा नहीं करती और न ही आलोकजी की दुकान की तरह चिट्ठा शामिल करवाने के लिए आवेदन करवाती है । “अनुप शुक्ल, देबाशीष, जितेन्द्र चौधरी, संजय बेंगाणी, प्रतिक पाण्डे, अमित गुप्ता इन सबको निकाल बाहर करो. कोई नारद से जुड़ा है तो कोई हिन्दी ब्लॉग से. ” यह ‘निकाल बाहर करो’ की माँग क्या ऊपर लिखे सभी की सामूहिक राय है?जिसे संजय पेश कर रहे हैं?

  2. गिरिराज जोशी "कविराज" Says:

    आदरणीय संजय भाई,

    अच्छा लिखा है! आपकी संयत भाषा, लिखने की शैली एवं पक्ष/तर्क सभी कुछ उम्दा है… मगर फिर भी मुझे खटक रहा है।

    आलोकजी से इस संबंध में मेरी भी वार्ता हुई थी, मैं भी “ब्लॉगवाणी” के इस कार्य से आश्चर्यचकित हूँ, निश्चित तौर पर मैथिलीजी की छवी जिस प्रकार की है उनसे ऐसी अपेक्षा कदापि नहीं की जा सकती मगर मैं इस पोस्ट का औचित्य भी समझ नहीं पा रहा हूँ!

    आलोकजी ने ब्लॉगवाणी को इस संबंध में मेल किया था, यह जानने के लिये कि उन्हें क्यों हटाया गया, क्या उसका कोई प्रतियूत्तर आया? आलोकजी यदि एक समय सीमा तय करने के बाद भी उनका प्रतियूत्तर नहीं आने पर इसे सार्वजनिक रूप से अपने चिट्ठे पर लिखते तो शायद ज्यादा उचित होता…….

    खेर!

    एक बात तो आप भी मानते हैं कि ब्लॉगवाणी निजी एग्रीगेटर है फिर गड़े मुर्दे उखाड़ना क्या ठीक है? नारद विवाद पर चिट्ठाजगत में बहुत घमासान हो चुका है, गाली-गलौच से लेकर धमकियाँ भी दी गई…. संदेह है कि कहीं आपकी यह पोस्ट उसी प्रकार की धटनाओं की पुनर्रावर्ति को हवा देने का काम न करें।

    मैं भी ब्लॉगवाणी के इस कदम का विरोध करता हूँ मगर व्यक्तिगत रूप से पुरानी घटनाओं का जिक्र करती आपकी यह पोस्ट मुझे जायज नहीं लगी…

    सप्रेम,

    - गिरिराज जोशी “कविराज”

  3. संजय बेंगाणी Says:

    @ अफ्लातुनजी

    आपने ठीक से पढ़ा नहीं या पढ़ना चाहा नहीं, जो भी हो. यहाँ लिखा गया मेरा अपना निजी मत है, कोई सामूहिक निर्णय नहीं है.

    मेरा आशय यह है की, आलोकभाई का चिट्ठा हटाने का मानदण्ड अगर किसी अन्य एग्रीगेटर से जुड़ा होना है तो बाकि लोगो के चिट्ठे क्यों आ रहे है? उन्हे भी हटा दो.

    विपुलजी की दुकान का मैं ठेकेदार नहीं हूँ, अपना दुःख हिन्दी सेवी द्वारा हिन्दी के पहले चिट्ठे के साथ हुए व्यवहार को लेकर है.

  4. Abhinav Says:

    मेरा ब्लाग चिठ्ठाजगत से क्यों हटाया गया?

    श्री संजय तिवारी ने एक प्रश्न उठाया था.
    ब्लागवाणी सारे ब्लाग नहीं दिखाता बल्कि ब्लागों में से खुद चुनकर ब्लाग दिखाता है.

    आज संजय बैंगाणी ने भी एक प्रश्न उठाया है.
    लेकिन मेरा ये ब्लाग चिठ्ठाजगत में जुड़ा हुआ था. मेरे पास चिठ्ठाजगत से ई-मेल भी है कि मेरा ये ब्लाग चिठ्ठाजगत में शामिल कर लिया गया है. मेरी कुछ पोस्टें चिठ्ठाजगत पर दिखीं भी पर अचानक मेरा ये ब्लाग चिठ्ठाजगत से हटा दिया गया?

    क्यों?
    क्योंकि मैं सिरिल गुप्त का छोटा भाई हूं?
    सिर्फ यही नहीं बल्कि इस परिवार के सभी ब्लाग हटा दिये गये?
    चिठ्ठाजगत सिरिल के ब्लाग क्यों नहीं दिखाता?

    नूर मोहम्मद खान का चिठ्ठा क्यों हटाया गया?

    तुम करो तो लीला
    कोई और करे तो छेड़खानी!

    तुम्हारा खून खून
    बाकी सब का खून पानी?

    ये कौन सा पैमाना है भाई?

    पुनश्च: अभी हम फीड बन्द कर रहे हैं ताकि सत्य बदला न जा सके

  5. संजय बेंगाणी Says:

    प्रिय अभिनव,
    मुझे पक्षपात न पसन्द है न मैं करता हूँ. आपका व सिरिल भाई का चिट्ठा चिट्ठाजगत से हटाया या शामिल नहीं किया है, इस बाबत आपने चिट्ठाविश्व को क्या मेल किया था? उनका क्या जवाब आया या नहीं आया बतायें. जब तक आप बताएंगे नहीं पता कैसे चलेगा. विपूलभाई से सार्वजनिक जवाब माँगा जायेगा. पीठ पीछे बात करना पसन्द नहीं.

    तकनीकि पंगा भी एक पक्ष है. तरकश के कॉलम ब्लॉगवाणी पर नहीं आते, क्या कभी इसके लिए मैने सार्वजनिकरूप में लिखा या गरियाया है? इतनी समझ तो है ही.

    आशा है आप धैर्य से विचार करते हुए आलोकजी के चिट्ठे का महत्व समझेंगे.

  6. Abhinav Says:

    क्योंकि नारद और ब्लॉगवाणी में फर्क है.

    कुछ लोगों की माने तो नारद हुआ करता था, ठीक है मान लेते है. तो जो नारद हुआ करता था उसे कुछ उद्दंड किस्म के तानाशाही मानसिकता वाले लोग चलाते थे.

    एक दिन एक चिट्ठा हटा दिया गया. क्यों? क्योंकि नारद ने अपने कुछ नियम बना रखे थे, उसी के तहत चिट्ठा हटा दिया गया. नारद पर गाली-गलौच या व्यक्ति विशेष पर अभद्र प्रहार करने वाले ब्लॉग को हटा दिया जाता था. मगर इससे पहले शिकायत करनी पड़ती थी, सच होने पर सबको सूचित करते हुए ब्लॉग को हटाया जाता था. प्रिय राहुल का एक चिट्ठा सबको बताते हुए नियमों के तहत हटा दिया गया था.

    यह कार्यवाही बहुत से लोगो को तानाशाही लगी थी. श्री अफ्लातुनजी ने बाकायदा तानाशाही को समझाने के लिए कई पोस्टे लिखी. (आज भी उनकी दी हुई पुस्तक “तानाशाही को समझो” मेरे पास है और मुझे वह बहुत पसन्द भी आयी है.) किसी ने अपना चिट्ठा लिखना छोड़ दिया. आशा है प्रियंकरजी को भी एक अभद्र भाषा के ब्लॉग के लिए लिया गया अपना “स्टेंड” आज याद होगा.

    यह दुखद है की आज गड़े मुर्दे उखाड़ने पड़े है. आशा है जो प्रेमभाव बाद के समय में हम सबके बीच स्थापित हुआ वह इससे प्रभावित नहीं होगा. फिर आप पर है.

    एक समय एक चिट्ठा इसलिए हटाया गया क्योंकि वह नियमों का उल्लंघन कर रहा था. आज आलोकजी का चिट्ठा (9-2-11) ब्लोगवाणी से किस नियम के तहत गुपचुप हटाया गया है? ब्लॉगवाणी के ऐसे कौन से नियम है जिनका उल्लघंन सभ्य भाषा में लिखा जाने वाला तथा हिन्दी का सबसे पूराना चिट्ठा कर रहा था. अगर तब कह कर हटाना तानाशाही था तो आज बिना कहे हटा देना क्या है? अफ्लातुनजी सुन रहें है आप?

    अगर दूसरे एग्रीगेटर से सम्बन्धित होना ही अपराध है तो अनुप शुक्ल, देबाशीष, जितेन्द्र चौधरी, संजय बेंगाणी, प्रतिक पाण्डे, अमित गुप्ता इन सबको निकाल बाहर करो. कोई नारद से जुड़ा है तो कोई हिन्दी ब्लॉग से.

    प्रतिस्पर्धी के साथ ऐसा व्यवहार लोकतांत्रिक और सह-अस्तित्व की भावना के अनुरूप तो कतई नहीं है.

    झगड़ा अपनो से होता है इसलिए नारद के कर्णधारों से बहुत बार झगड़ा हूँ, मगर मैथलीजी की जो छवि है उसके चलते उन पर रोष नहीं आता, दुख होता है. घोर दुख.

    ब्लॉगवाणी आपकी साइट है. किसे रखना, किसे न रखना यह आपके विवेक पर है. आप अगर चिट्ठाजगत की लिंक अपने यहाँ न भी रखेंगे तो उसे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला, मगर जो संदेश इससे जा रहा है, उसमें न ब्लॉगवाणी का भला है न हिन्दी की निस्वार्थ-सेवा कही जाने वाली भावना का. अच्छा हो ब्लॉगवाणी अपने नियम स्पष्ट कर दें ताकि वे लोग सावधान हो जाये जिन्हे अपना चिट्ठा ब्लॉगवाणी पर प्रतिबन्धित नहीं करवाना.

    मैं निजी तौर पर आलोकजी के नौ दो ग्यारह चिट्ठे के समर्थन में ब्लॉगवाणी का बहिष्कार करता हूँ. अतः जोगलिखी ब्लॉगवाणी से हटाया जाता है तो इसका जिम्मेदार मैं स्वयं हूँ.

    वे साथी भी अपना मत तय करे जो नहीं चाहते की भविष्य में एग्रिगेटर केवल अनर्गल प्रलाप करने वाले चिट्ठो का ही समर्थन करते रहे.

  7. Abhinav Says:

    प्रिय संजय जी

    यदि मेरा चिठ्ठा हटा दिया गया तो आप ये अपेक्षा क्यों करते हैं कि मैं दरवाजे पर खड़ा होकर अन्दर आने की गुहार करूं. क्यों ई-मेल करूं ?

    तकनीकी पंगा था तो मेरी तरह ब्लाग्स्पाट पर होस्टेड अन्य ब्लाग्स क्यों चलते रहे ?

    मुझे किसी को भी सार्वजनिक मंच पर लाकर सवाल जबाब की कोई अपेक्षा नहीं.

    उन्होंने हमें हटा दिया ये उनका मामला है.

    न हम मेल करेंगे, न सवाल पूछेगें.

    मेरे शेष परिवार की परिवार जाने, पर मेरी तो यही विनती है कि मुझे दुबारा न जोड़ा जाये.

  8. संजय बेंगाणी Says:

    उन्होंने हमें हटा दिया ये उनका मामला है.

    -और आपने हटाया वह किसका मामला है?

    न हम मेल करेंगे, न सवाल पूछेगें.

    - उन्होने तो मेल भी किया था और जवाब भी माँगा था. आपने जवाब क्यों नहीं दिया?

    प्रिय अभिनव, विपुलजी का चिट्ठा हटाया तब किसी ने कुछ कहा? आप अगर आलोकजी के चिट्ठे का महत्त्व ही नहीं समझ पा रहे हो तो मैं कुछ नहीं कर सकता. विरोध कर सकता हूँ, कोई साथ आये न आये, वह करता रहूँगा.

  9. बसंत आर्य Says:

    लग रहा है कौरवो की लडाई हो रही है और सबका विनाश होने वाला है. पाण्डव भी वन गमन करेन्गे.

  10. arun arora Says:

    दोस्त संजय मुझे आना पडा ..तुमहारे सवाल के जवाब मे .. ये क्या बात हुई कि ये पुराने ब्लोगर है इनका महत्व है..मेरे भाइ अगर आपके परिवार मे कोई आज जन्म लेता है तो उसका मह्त्व इसलिये समाप्त नही हो जाता कि आप पहले से इस दुनिया मे थे.. बल्की उस बालक का महत्व आप परिवार से पूछिये वह बतायेगे कि उस्का महत्व आपसे कम नही है आलोक जी से कहिये जरा बडे बने ये बालको जैसे काम उन्हे शोभा नही देते..मेरी हिंदी टूल बनाने पर उन्हे लगी मिर्ची और उनका लिखा नेट पर मौजूद है जरा देखिये उन्होने मेरा साहस बढाने के बजाय मुझे क्रिटीसाईज करना ज्यादा उचित समझा..मेरे भाइ यहा मौजूद इन स्वंयभू बडो की इन घटिया सोच और हरकतो की वजह से ही मैने यहा से विदा लेना उचित समझा…

  11. अतुल शर्मा Says:

    मामला शायद गम्भीर लगता है…

  12. अनूप शुक्ल Says:

    आज ही दोपहर को मेरी मैथिलीजी से बात हुयी। उन्होंने इस् बारे में आश्वासन दिया है। कुछ् चिट्ठे वहां से हटे, कुछ् यहां से। मुझे उम्मीद है कि सब ठीक् हो जायेगा। आलोक हमारे आदि चिट्ठाकार हैं। उनका ब्लाग आशा है जल्दी ही ब्लागवाणी पर् दिखेगा। सिरिल आदि के ब्लाग् भी चिट्ठाजगत् में दिखेंगे। संजय बेंगाणी अकेलापन न महसूस करें लेकिन , यह बात मुझे ऐसा लगता है, जल्द ही निपट जायेगी।

  13. rachna Says:

    नारद सबसे पुराने सूत्रधार है और जीतेंदर कई बार सर्च करके हिन्दी ब्लोग देखते है और फिर उस ब्लोग पर कमेन्ट मे नारद का उलेख कर के नारद पर आने का निमंत्रण देते है । नारद रजिस्ट्रेशन सबसे आसान है और नारद से बाहर निकालना भी उतना ही आसान है ।
    चिट्ठाजगत जब बना था तब लिंक अपने आप जोड़े गये और बाद मे रजिस्ट्रेशन करना पडा पर उस समय कोई भी सुविधा नहीं दी गयी ब्लोग को हटाने कि । ये सुविधा उन्होने चालू की मेरे कहने पर क्योंकी मे अपनी RSS फीड बंद नहीं करना चाहती थी पर इसके बाद मैने किसी भी और अपने ब्लोग को अपने सर्वर से रजिस्टर करना चाह तो नहीं हुआ और वोही ब्लोग मेरे मित्र ने अपने सर्वर से रजिस्टर कर दिया । जिसका सीधा अर्थ है कि रजिस्ट्रेशन स्वचालित नहीं है ।
    ब्लोग वाणी अपने आप लिंक जोड़ता है और सारी फीड रखता है । मेरे कहने पर सुभाष भदोरिया ने जो नारियों के प्रती आपति जनक पोस्ट लिखी थी उसे हटाया पर ब्लोग वाणी से वह पोस्ट आज भी नहीं हटाई गयी ।
    इस विषय मे मेने चित्ताहजागत और ब्लोग्वानी दोनो को ईमेल द्वारा कहा की इसी पोस्ट , ऐसा ब्लोग हटा देना चाही ये पर कुछ नहीं हुआ ।

    मै ना नारद मे करता धरता हूँ , ना और किसी भी सूत्रधार मे पर मेरा अपना मानना है की सूत्रधार हिन्दी कि निस्वार्थ सेवा नहीं कर रहें है वह तकनीक का फायदा उठा कर जो ब्लॉगर तकनीक नहीं जानते हैं उनके लिखे ब्लोग्स के वज़ह से अपने ब्लोग को आगे बड़ा रहे हैं ।

    गूगल सर्च मै पहले सूत्रधार का नाम आता है फिर हमारी पोस्ट दिखती है ।
    नारद के अलावा सबके अपने अपने मिशन है हिन्दी प्रमोशन तो बहुत पीछे हो गया है । नारद मे भी कुछ समस्या होगी , अपवाद कहा नहीं होते पर नारद मे ब्लॉगर का अपमान नहीं होता ।
    किसी भी ब्लॉगर को बिना बताये उसके ब्लोग का रोमन करना गलत गलत है । हिन्दी को प्रमोट करने के लिये उसको अशुद्ध रूप मे प्रस्तुत करना भी गलत है ।
    मेरे इंग्लिश मे कमेन्ट देने पर बहुत टिका टिपणी होती है , मेरी बातो का जवाब भी नहीं दिया जाता है पर क्योकि समय आभाव हमेशा होता है तो गलत हिन्दी टाइप करने से मे जल्दी और सही इंग्लिश लिखना चाहती हूँ । कितने ब्लॉगर अशुद्ध हिन्दी मे लेखन कर रहें है केवल हिन्दी लिखने से क्या हिन्दी का प्रमोशन होगा या सही हिन्दी लिखना हिन्दी को आगे ले जाएगा ??

    आज जब गूगल अपने वेबमास्टर टूल मे ये सुविधा प्रदान करता है की हम अपना कोई भी पेज उनकी इंडेक्स से हट व सकते है तो सूत्रधार क्या गूगल से भी ऊपर चले गये है ।
    अभी केवल दो महीने पहले आप सब सूत्रधार आपस मे गले मिल रहे थे एक दूसरे के ब्लोग को अपने पे डाल रहें the और आज एक दूसरे को गाली दी जा रहीं है । कमाल है हिन्दी जितनी मीठी भाषा हैं आप लोग उतनी karvaahat रहें है . वर्तनी की गलतीयों के लिये छमा करे
    और अनूप जी हमने तो कई बार मैथली जी से बात करनी चाही पर कभी भी बात नहीं हो सकी , लगता है आप लोग केवल आपस मे ही बात करते है !!

  14. राजीव Says:

    यदि किसी प्रकार की ग़लतफहमी से कोई चिट्ठा, किसी संकलक से हटाया गया है तो आशा है कि यह पोस्ट भला ही करेगी और इन ग़लतफहमियों के निदान का सु-अवसर मिलेगा। ऐसी आशा नहीँ है कि किसी प्रतिस्पर्धा के चलते ऐसा हुआ होगा। यदि प्रतिस्पर्धा ही है तब तो संकलक अधिक से अधिक चिट्ठों का संकलक बना कर उसे समृद्ध ही करने का प्रयास करेंगे। हमें तो पूर्ण विश्वास है कि न तो ब्लॉगवाणी और न ही चिट्ठाजगत किसी संकुचित मानसिकता से प्रभावित होंगे और शीघ्र ही सभी पाठकों को इन पर सभी पोस्टों का संकलन दिखेगा।

  15. Rajesh Roshan Says:

    मैं इस बहस का आनंद ले रहा हू. :)

    तो एक बार फ़िर से हिन्दी के कर्णधारो ने चिल्पो मचाना शुरू कर दिया. ये मेरा ये तुम्हरा. उसने ये किया, कोई जवाब नही देता, मैंने मेल किया था, जवाब नही मिला. फला फला…

    हमलोग कब सुधरेंगे. क्या बिना हल्ला गुल्ला किए नही सुधर सकते हैं. सीखने के लिए ये सब तिकड़म करने पड़ते हैं? हमे सीखना ही होगा. वो भी बिना लडे झगडे. इतना भी अहम् अच्छा नही है. जहा तक मैं मथिली जी के बारे में जानता हू वो वैसे सख्स नही हैं की किसी विवाद में पड़े. बाकि सिरिल भी अच्छे स्वाभाव के हैं.

    नारद और ब्लोग्वानी में कोई फर्क नही है. दोनों अग्ग्रेगाटर हैं. हा उनके कराताधार्ता के विचारो में फर्क हो सकता है. हो सकता है नही है. इसे समानांतर बनाना होगा क्योंकि आप कुछ ऐसी चीज चला रहे हैं जो कई अन्य लोगो से जुड़ी है. थोड़ा उदार बनिए और थोड़ा संयम रखिये. वैसे इसका अंत भी जल्दी हो जाएगा.

    वैसे मुझे या सब देख थोड़ा दुःख हो रहा है. :(

  16. जीतू Says:

    बहुत सही बहस हो रही है, आज हमारी छुट्टी है, उसे मना लें, कल तक देखेंगे क्या स्टेटस है, तब हम अपनी ’निजी’ राय देंगे।

    अंतरिम रुप से कुछ कहते है, ऊपर की बहस और ब्लॉगवाणी से अघोषित रुप के जुड़े लोगों की बातों से कुछ ऐसा लग रहा है कि ब्लॉगवाणी एक निजी सेवा है, उसे हिन्दी चिट्ठों को जोड़ने/हटाने मे मनमर्जी चलेगी, बहुत सही बात है भाई। ब्लॉगवाणी के व्यवस्थापकों से निवेदन है कि इस बात की बाकायदा कन्फरमेशन करें, कोई जोरी चकारी थोड़े किए हो, एक दो ब्लॉग ही तो हटाए हो, साफ़ साफ़ सीना ठोक कर बोलो, फिर कोई किसी को कुछ नही कहेगा। अलबत्ता एक बात जरुर कहूंगा, हिन्दी के आदि चिट्ठाकार का चिट्ठा हटाने से ब्लॉगवाणी की महत्ता ही कम होगी, बढेगी नही। क्योंकि जब जब हिन्दी चिट्ठाकारी की बात आएगी, आलोक भाई का नाम आएगा, ब्लॉगवाणी का नही।

    एक और अच्छी बात समझ मे आ रही है, कि लोगों को इस बात का अन्दाजा जरुर हो गया होगा कि एग्रीगेटर चलाना कित्ता मुसीबत भरा काम है, लोग तारीफ़ और डंडा एक साथ लेकर आते है, एक से काम नही चलता तो दूसरा चला देते है, है ना मैथिली-सिरिल/आलोक-विपुल जी?

    रही बात नारद की, तो भैया वो था नही है, और जल्द ही तीसरे वर्जन मे अवतरित हो रहा है। तब तक आप लोग ये उठापटक का खेल खेलिए।

  17. जीतू Says:

    एक बात दोनो एग्रीगेटर से पूछना भूल गया था, भैया मेरा चिट्ठा तो कंही हटा दिए दोनो लोग, हम तो नारद से जुड़े हुए थे, अगर हमारा चिट्ठा हटाया तो समझ लो हम भी झंडा लेकर आने वाले है।

  18. प्रमेन्‍द्र Says:

    यह ब्‍लागवाणी का अपना मामला है। ऐसा नही कि चिट्ठाजगत पाक साफ है। जहॉं तक बात मैथिली जी की है तो मैं किसी प्रकार की माध्‍यस्‍ता करना ठीक नही है। आलोक भाई का ब्‍लाग हटाया जाना दुखद है किन्‍तु उतना ही दुखद सिरिल जी का भी है।

    रही बात माध्‍यस्‍ता करने वालों की तो उन्‍हे हर मामले में तैयार रहना चाहिए, नही मामला कमजोर है तो कन्‍नी काट लेते है।

  19. anonymous Says:

    संजय जी आपने बहुत अच्छा सवाल उठाया है.

    मानना तो यही चाहुँगा की सब कुछ ठीक है पर फिर ध्यान से सोचें तो कुछ ठीक नहीं दिखता – अभिनव जी registered थे फिर क्यों हटाया गया – शायद उनका कहना सही है “यदि मेरा चिठ्ठा हटा दिया गया तो आप ये अपेक्षा क्यों करते हैं कि मैं दरवाजे पर खड़ा होकर अन्दर आने की गुहार करूं. क्यों ई-मेल करूं ?”

    कम से कम चिट्ठाकार को तो बताते की उसका चिट्ठा क्यों हटाया गया है ..
    साथ ही अन्य चिट्ठे भी, जैसे की अभिनव जी ने बताया …

    ब्लौगवाणी की अलग ही position है – ना यह बताते है की कब चिट्ठा जोड़ा गया
    ( http://maeriawaaj.blogspot.com/2007/10/blog-post_842.html )
    और ना ही कब हटा …

    ब्लोगवाणी एक पब्लिक साईट है – चल भले ही निज़ी मेहनत से रही हो, और उस मेहनत का मैं बेहद आदर करता हूँ, मेरी बात का बुरा ना माना जाये – पर है पब्लिक साईट – क्यों स्पष्ट नियम नहीं हैं ??

    क्या दूसरे चिठ्ठाकारों के चिठ्ठे भी, यह कभी भी हटा सकते हैं – आखिर शर्तें है क्या?
    रचनाकार की रचनायें ही संकलक को समृद्ध बनाती है मगर उन्हीं का निरादर है –
    1. ना यह बताया जाता है की कब उन्हें जोड़ दिया गया है (ब्लौगवाणी)
    2. ना यह की कब हटा दिया गया है.. (दोनों चिट्ठाजगत और ब्लौगवाणी)
    3. कब तक रचनायें रखी जाती हैं (दोनों)
    4. क्या पूरा रखा जा रहा है की कुछ कम – कहीं स्प्ष्ट नहीं है ..
    5. क्यों उन्हें रखा जा रहा है .. (ज्यागातर लोग केवल संकलक से खबर चाहते हैं की “ताज़ा” क्या लिखा है.. रचना / लेख तो ब्लौग पर ही जा कर पढ़ते हैं, फिर आप क्यों पूरी रचनाओं को जमा कर के रख रहें हैं?? आगे के क्या प्लैन हैं, कुछ तो उन्हें भी बतायें, जिनके लेख और कवितायें आप जमा कर के रख रहें हैं..)
    6. और अपनी मर्ज़ी से उस रचना का कुछ भी किया जा सकता है और नया कापीराईट तय हो जाता है – जैसे की चिट्ठाजगत रोमन लिपी. लिखने वाले से पूछा तक नही जाता की वह चाहता है की नहीं की उसकी रचना में बदलाव किया जाये – कल कुछ और भी होगा… अच्छा कदम है या बुरा, यह आप लिखने वाले से तो पूछ लें – क्यों लिखने वालों को बिल्कुल परे रख दिया गया है.
    क्यों रचनाकार की रचनाओं से खिलवाड़ है?

    ब्लौगवाणी चिठ्ठे अपने आप जोड़ लेता है. बहुत से लोगों को इसमें तकनीकी सहुलियत अवश्य दिखेगी, परंतु ऐसी रिपोर्ट है (http://masijeevi.blogspot.com/2007/10/blog-post_04.html) की अगर बाद में लेखक चाहे की उसकी रचनायें वहाँ से हटें, तो वो बेहद कठिन कार्य है. ऐसे मैं तो ब्लौगवाणी को इजाज़त जरुर लेनी चाहिये. तकनीकी सरलता के लिये अन्य माध्यम भी बन सकते है .. जब निकलना मुश्किल है तो बगैर बताये ना जोड़ें ..

    और अनूप जी का मैं बहुत आदर करता हूँ की उन्होंने अलग मेहनत करके, सब कुछ पता कर के, यहाँ टिप्प्णी लिखी – परंतु “कुछ् चिट्ठे वहां से हटे, कुछ् यहां से” – यह सब हो क्यों रहा है – तकनीकी कारण तो हो नहीं सकता, की चुन चुन कर तकनीकी शिकायत किसी विशेष चिठ्ठे पर ही आये .. बिजली चुन चुन कर गिरे??

    चिट्ठाजगत के कुछ “नियम”(खुलापन) हैं – की वो सब कुछ संकलित करेंगे .. और हटाने पर तो बकायदा “अड़ियलपन” और उदाहरणों के साथ स्पष्ट है
    http://chittha.chitthajagat.in/2007/08/blog-post_30.html
    “नियम” है की
    “अगर कोई चीज़ गैरकानूनी नहीं है, तो हम किस आधार पर निर्णय करेंगे कि वह नहीं छपे?”
    और
    ” यानी, अगर भारत सरकार हमें आदेश दे कि यह प्रविष्टि हटाओ, तो हमें मजबूरन हटानी होगी। वह भी हम बिना लड़े नहीं हटाएँगे।”

    तो फिर “कुछ् चिट्ठे वहां से हटे, कुछ् यहां से” क्यों हो रहा है?
    क्या जो चिट्ठे हटे वो गैर कानूनी थे??

    दिल तो कहता है सब ठीक है, पर कुछ तसल्ली नहीं हो पा रही है.. स्पष्ट नियम हों तो साधारण चिट्ठाकारों को भी पता रहे की क्या हो रहा है.. चिट्ठाकारों का ही लिखा हुआ संकलक को संकलक बनाता है – कम से कम चिट्ठाकार को यह तो मालूम हो की उसका लिखा हुआ कब आ गया, कब हटा दिया गया..

  20. प्रभात टन्डन Says:

    बाप रे बाप , बहुत टेन्शन है :)

  21. masijeevi Says:

    नया कुछ नहीं कह रहे हैं, हम ही पहले भी कह चुके हैं और दोस्‍त लागों ने ऊपर कह दिया है, दोहरा रहे हैं तो केवल इसलिए कि इसे दर्ज मान लिया जाए, वैसे तिवारीजी के ब्‍लॉग पर भी दर्ज किया था।
    साफ बात, नारद के समय खूब हल्‍ला मचाया था क्‍योंकि नारद का कथन ही था कि वह सामूहिक मंच है, अत: हमारा भी था इसलिए दबाब बनाया, सफल रहा कि असफल अलग बात है।
    ब्‍लॉगवाणी व चिट्ठाजगत के बारे में भी साफ करना जरूरी है कि भले ही ये सार्वजनिक न होकर निजी हों। पर हैं, चिट्ठों की ही वजह से इसलिए अच्‍छा हो कि शामिल करने पर विचार करें न कि हटाने पर।
    व्‍यक्तिगत रागद्वेष से किसी का हित नहीं सधेगा।
    और हॉं ताकि सनद रहे- हमारा साफ मत है कि ये ‘तुम हमें पसंद नहीं अत: हम तुम्‍हारा मुँह बंद करेंगे, नहीं दिखाएंगे, ये हमारी नजर में साफ तानाशाही है, चाहे जो करे। मैथिलीजी आदरणीय हैं, इस बात के सैद्धांतिक पक्ष को समझने में समर्थ हैं, विपुल भी। हमारा विरोध दर्ज मानें और संभव हों तो रोष के स्थान पर विवेक को महत्‍व दें।

  22. शास्त्री Says:

    मुझे खुशी है कि कई हिन्दी चिट्ठाकर मध्यस्थता की कोशिश कर रहे
    हैं. अन्य कई लोग “अरे छोडो भाई साहब” का काम कर रहे हैं. लेकिन
    यह व्यक्त है कि इन दोनों पक्षों के अधिकतर लोगों को असली समस्या
    का अनुमान नहीं है. असली समस्या सिर्फ तकनीकी गलती या
    गलती से चिट्ठों के हटनेजुडने आदि की नहीं है.

    असली समस्या निश्चित रूप से एक अस्वस्थ प्रतिद्वन्दिता की है. समस्या
    का हल सिर्फ एक है — आज से कुछ महीने पहले ब्लोगवाणी ने पहल कर
    के यह घोषणा की थी कि “हरकारों” मे कोई द्वेष नहीं है. सारथी पर खुल
    कर मैं ने इसका स्वागत किया था, एक सचित्र लेख लिखा था.

    अब जरूरत है कि एक बार और वही माहौल पैदा हों जहां यह कहा जा
    सके की आपसी प्रतिद्वन्दिता सिर्फ तकनीकी मामलों तक सीमित कर
    दी गई है एवं सारे व्यक्तिगत द्वेष एवं वैरभाव मिटा दिये गये हैं. जब तक
    यह नहीं होगा तब तक मध्यस्थता करने वालों एवं “अरे छोडो भाई साहब”
    कहने वालों की ऊर्जा व्यर्थ ही खर्च होगी.

    — शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है

  23. Amit Says:

    लो आज अपन सारा दिन ज़रा इंटरनेट से दूर क्या रहे, यहाँ तो “महाभारत कथा”(अब वो बी.आर.चोपड़ा का “महाभारत” के बाद यही तो धारावाहिक आया था) आरंभ हो गई!! मैं तो सोच रहा था कि अभी कुछ दिन और तूफ़ान से पहले की शांति रहेगी, लेकिन संजय भईया आपने तो बड़े वाला तीर चला ही दिया!! ;)

    चलो पढ़ लिए हैं बहुतों के विचार यहाँ, अपनी जो राय है उसको अपने तक ही रखेंगे या संबन्धित लोगों पर ही व्यक्त करेंगे, अब दूसरे एकाध ब्लॉग और छपे हैं उनको भी देख आएँ!! :)

  24. durga Says:

    संजय जी आपने बहुत अच्छा सवाल उठाया है.

    मानना तो यही चाहुँगा की सब कुछ ठीक है पर फिर ध्यान से सोचें तो कुछ ठीक नहीं दिखता – अभिनव जी registered थे फिर क्यों हटाया गया – शायद उनका कहना सही है “यदि मेरा चिठ्ठा हटा दिया गया तो आप ये अपेक्षा क्यों करते हैं कि मैं दरवाजे पर खड़ा होकर अन्दर आने की गुहार करूं. क्यों ई-मेल करूं ?”

    कम से कम चिट्ठाकार को तो बताते की उसका चिट्ठा क्यों हटाया गया है ..
    साथ ही अन्य चिट्ठे भी, जैसे की अभिनव जी ने बताया …

    ब्लौगवाणी की अलग ही position है – ना यह बताते है की कब चिट्ठा जोड़ा गया
    ( http://maeriawaaj.blogspot.com/2007/10/blog-post_842.html )
    और ना ही कब हटा …

    ब्लोगवाणी एक पब्लिक साईट है – चल भले ही निज़ी मेहनत से रही हो, और उस मेहनत का मैं बेहद आदर करता हूँ, मेरी बात का बुरा ना माना जाये – पर है पब्लिक साईट – क्यों स्पष्ट नियम नहीं हैं ??

    क्या दूसरे चिठ्ठाकारों के चिठ्ठे भी, यह कभी भी हटा सकते हैं – आखिर शर्तें है क्या?
    रचनाकार की रचनायें ही संकलक को समृद्ध बनाती है मगर उन्हीं का निरादर है -
    1. ना यह बताया जाता है की कब उन्हें जोड़ दिया गया है (ब्लौगवाणी)
    2. ना यह की कब हटा दिया गया है.. (दोनों चिट्ठाजगत और ब्लौगवाणी)
    3. कब तक रचनायें रखी जाती हैं (दोनों)
    4. क्या पूरा रखा जा रहा है की कुछ कम – कहीं स्प्ष्ट नहीं है ..
    5. क्यों उन्हें रखा जा रहा है .. (ज्यागातर लोग केवल संकलक से खबर चाहते हैं की “ताज़ा” क्या लिखा है.. रचना / लेख तो ब्लौग पर ही जा कर पढ़ते हैं, फिर आप क्यों पूरी रचनाओं को जमा कर के रख रहें हैं?? आगे के क्या प्लैन हैं, कुछ तो उन्हें भी बतायें, जिनके लेख और कवितायें आप जमा कर के रख रहें हैं..)
    6. और अपनी मर्ज़ी से उस रचना का कुछ भी किया जा सकता है और नया कापीराईट तय हो जाता है – जैसे की चिट्ठाजगत रोमन लिपी. लिखने वाले से पूछा तक नही जाता की वह चाहता है की नहीं की उसकी रचना में बदलाव किया जाये – कल कुछ और भी होगा… अच्छा कदम है या बुरा, यह आप लिखने वाले से तो पूछ लें – क्यों लिखने वालों को बिल्कुल परे रख दिया गया है.
    क्यों रचनाकार की रचनाओं से खिलवाड़ है?

    ब्लौगवाणी चिठ्ठे अपने आप जोड़ लेता है. बहुत से लोगों को इसमें तकनीकी सहुलियत अवश्य दिखेगी, परंतु ऐसी रिपोर्ट है (http://masijeevi.blogspot.com/2007/10/blog-post_04.html) की अगर बाद में लेखक चाहे की उसकी रचनायें वहाँ से हटें, तो वो बेहद कठिन कार्य है. ऐसे मैं तो ब्लौगवाणी को इजाज़त जरुर लेनी चाहिये. तकनीकी सरलता के लिये अन्य माध्यम भी बन सकते है .. जब निकलना मुश्किल है तो बगैर बताये ना जोड़ें ..

    और अनूप जी का मैं बहुत आदर करता हूँ की उन्होंने अलग मेहनत करके, सब कुछ पता कर के, यहाँ टिप्प्णी लिखी – परंतु “कुछ् चिट्ठे वहां से हटे, कुछ् यहां से” – यह सब हो क्यों रहा है – तकनीकी कारण तो हो नहीं सकता, की चुन चुन कर तकनीकी शिकायत किसी विशेष चिठ्ठे पर ही आये .. बिजली चुन चुन कर गिरे??

    चिट्ठाजगत के कुछ “नियम”(खुलापन) हैं – की वो सब कुछ संकलित करेंगे .. और हटाने पर तो बकायदा “अड़ियलपन” और उदाहरणों के साथ स्पष्ट है
    http://chittha.chitthajagat.in/2007/08/blog-post_30.html
    “नियम” है की
    “अगर कोई चीज़ गैरकानूनी नहीं है, तो हम किस आधार पर निर्णय करेंगे कि वह नहीं छपे?”
    और
    ” यानी, अगर भारत सरकार हमें आदेश दे कि यह प्रविष्टि हटाओ, तो हमें मजबूरन हटानी होगी। वह भी हम बिना लड़े नहीं हटाएँगे।”

    तो फिर “कुछ् चिट्ठे वहां से हटे, कुछ् यहां से” क्यों हो रहा है?
    क्या जो चिट्ठे हटे वो गैर कानूनी थे??

    दिल तो कहता है सब ठीक है, पर कुछ तसल्ली नहीं हो पा रही है.. स्पष्ट नियम हों तो साधारण चिट्ठाकारों को भी पता रहे की क्या हो रहा है.. चिट्ठाकारों का ही लिखा हुआ संकलक को संकलक बनाता है – कम से कम चिट्ठाकार को यह तो मालूम हो की उसका लिखा हुआ कब आ गया, कब हटा दिया गया..

  25. श्रीश शर्मा Says:

    आलोक जी का चिट्ठा हटाया जाना दुःखद घटना है। :(

    मौजदा घटनाक्रम से सचमुच हार्दिक दुःख हो रहा है लेकिन नारद वाले प्रकरण में ही दिल को समझा दिया था कि अब हिन्दी चिट्ठाजगत में पहले जैसा अपनत्व नहीं रहा। जैसा जीतू भाई कहते थे कि लोग बढ़ेंगे तो हर तरह के लोग आएँगे ही।

    बाकी किसी भी चिट्ठे को दिखाना न दिखाना एग्रीगेटर की मर्जी है, इसमें कोई शक नहीं। जीतू भाई की बात में भी दम है कि एग्रीगेटर चलाने की मुसीबत अब नए एग्रीगेटरों से जुड़े लोग समझ गए होंगे।

    नारद तो पहला प्यार है ही, साथ ही आलोक जी और मैथिली जी दोनों के प्रति आदर है। मेरी समझ यही है कि कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी के बीच गलतफहमियाँ फैलाई वरना दोनों एग्रीगेटरों के सञ्चालक भले आदमी हैं।

    बाकी उपभोक्तावाद की दृष्टि से देखें तो जो सर्वश्रेष्ठ होगा वही टिकेगा।

  26. parulk Says:

    इस माहौल मे मै भी अपनी बात कहना चाहूंगी की हटाना तो खैर दूर की बात है,मेरा ब्लाग तो आजतक नारद मे जुडने को ही मोह्ताज रहा है…।काफ़ी बार कोशिश की मगर नतीजा 0 ही रहा ।

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