अपने अपने स्वार्थ थे, अब क्या लिखें?
अब ऐसा अलग क्या लिखा जा सकता है जो किसी ने ना लिखा हो? मेरा यह तर्क वे मानने को तैयार नहीं थे. वे ही क्यों कल कई फोन-कॉल आये मिठाई की माँग के साथ मानो मैने सरकार बना ली हो. साथ ही एक “तड़का मार” पोस्ट की माँग भी संलग्न करना नहीं भूले.
इधर मैं लिखता दो पंक्तियों में दो-टूक हूँ, क्या खाक तड़का लगे, फिर कुछ प्रिय शुभचिंतको ने पंगेदार न लिखने की सलाह भी दे रखी है. काहे दिमाग खराब करना. रचनात्मक काम में लीन रहना चाहिए. मेरे ये तर्क “चार लोग” सुनने को तैयार नहीं, उकसाया की जिसको मानसिक खुराक पहुँचाई वो जीत गया, काँय काँय करने वालो के मुँह पर करारा चाँटा पड़ा है, लिखो यार…..मगर ऐसा की दूसरों ने ना लिखा हो.
ऐसा कुछ भी तो नहीं, फिर क्या लिखे भला इंसान. खेल बड़े हैं. खिलाड़ी भी कम नहीं. एक खिलाड़ी है मिशनरी. अगर मोदी का काम ऐसा ही चलता रहा तो उन्हे गुजरात में रो-मटेरियल मिलना बन्द हो जायेगा. तो दुकानें भी बन्द हो जायेंगी. ऐसे में एक “धर्मनिरपेक्ष” सरकार गुजरात में बने इसके लिए एक फादर तो अभियान भी चलाये हुए है. इस बार तो बे-असर हुए, आगे भगवान जाने. भगवान उनकी लगन बरकरार रखे.
एक पक्ष कथित समाज-सेवियों का है. ये संस्था के रूप में दुकाने चलाते है. चंदा तभी मिलेगा जब मुस्लिम समुदाय परेशान रहेगा. अब पाँच साल में ऐसा कुछ हुआ नहीं, और देर सवेर आँकड़े भी बोलेंगे की बाकी जगह से ज्यादा सुखी मुसलमान तो गुजरात में है. चन्दा बन्द तो धन्धा बन्द. इसलिए एक बहन तो चुनावो के दौरान कब्रे खोजती रही, मगर होती तो मिलती. मुसलमानों को दुखी रखने के लिए मोदी का जाना जरूरी था, इसलिए इनके पेट में दर्द होता रहा, हालाकी पीटते सर थे. भगवान इनको दर्द सहने की शक्ति दे.
एक अन्य पक्ष पत्रकारों का है, बेचारे भारत के जिस क्षेत्र से आते है, वहाँ जो देखा-सुना है उससे ग्रंथियाँ बन्ध गई है. चारों ओर मुस्लिम विरोधी, नारी विरोधी, जातिवादी ही नजर आते है. उनके लिए गुजरात समझ से बाहर है. इसलिए अपनी खुन्नस निकालते है. भगवान उन्हे सच्चाई हजम करने की शक्ति दे.
एक पक्ष विपक्ष का है. खुद नया क्या देंगे यह बताने के स्थान पर मोदी को विलन बनाने पर तुले रहे, अब जनता अपनी आँखो से जो देख रही है, उसे कैसे नकारे? फिर सोनियाजी ने ऐसे प्रचार किया मानो वे ही जीतने पर मुख्यमंत्री बनेंगी. लिखा हुआ पढ़ने वाले, चतुर मोदी का मुकाबला कर रहे थे. जिस चुनावी प्रक्रिया के हिस्सा रहे, उसी के परिणाम को लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे हैं. भगवान इनके बौराये दिमाग ठीक रखे.
अब बताईये मैं क्या लिखूँ, लिखने को कुछ भी तो नहीं. रात गई बात गई.













December 24th, 2007 at 6:01 pm
ये छद्म धर्म निरपेक्षता और कांग्रेसी सांप्रदायिकता पर राष्ट्रवाद की जीत है मित्र इसलिए लड्डू खाओ और वंदेमातरम गाओ
December 24th, 2007 at 7:14 pm
जब भगवा ध्वज लहराया है तब कमीनिस्टों का होश ठिकाने आया है। गुजरात की जीत भाजपा की जीत हैं, राष्ट्रवाद की जीत हैं, लोकतंत्र की जीत हैं, विकास की जीत हैं और कांग्रेसियों की हार हैं, कमीनिस्टों की हार हैं, सेकुलरिस्टों की हार हैं।
December 24th, 2007 at 7:42 pm
बढ़िया है। सबको तो लपेट लिया, और क्या लिखना था …
December 24th, 2007 at 8:22 pm
बहुत बढिया विचार
दीपक भारतदीप