कठिन डगर इस पनघट की
एक जगह पढ़ा की एक निजी कम्पनी में काम करने वाले एक युवक को पुलिस उठा ले गई और फिर वह अपनी नौकरी से भी हाथ धो बैठा. अन्दर की बात पता नहीं मगर पढ़ कर अच्छा नहीं लगा की शक के आधार पर पुलिस पकड़ ले तो आदमी की नौकरी भी जा सकती है, यह अन्याय है, ऐसे में अदालत में बिलकुल जाना चाहिए. वह युवक मुस्लिम है अतः आतंकियो के समर्थकों एक बहाना भी मिल गया आरोप चस्पाने का कि पुलिस कौम के लोगो को परेशान करती है.
पुलिस का अपना तरीका है, अच्छा है या बूरा है वह विवाद का विषय हो सकता है मगर जो है, उसके आधार पर देखें तो पुलिसीया-अन्याय (जहाँ होता है) धर्म नहीं देखता. नक्सली मारे जाते हैं या उन्हे जेलों में ठूँसा जाता है तब वे मुस्लिम बन्धु तो नहीं होते. आरूषी हत्याकाण्ड में उसके परिवारजनों को जिस तरह हत्यारा बना दिया गया था, उस पर क्या कहेंगे? वे तो मुस्लिम नहीं थे. शोराब्बूद्दीन का एनकाउंटर हुआ था, तब तुलसी भी मारा गया था, मगर यह मुस्लिमों को भड़काने वालो को नजर नहीं आया हाँ उनके लिए एक अपराधी जरूर महात्मा हो गया था. मजहब के चश्में से देखने वाले न भूले की हिन्दुओं के सबसे बड़े धार्मिक नेता शंकराचार्य को ही जेल हुई थी.
अब बात आती है हाल में कई शहरों में हुए विस्फोटों की. हर काण्ड के बाद पुलिस पर नाराजगी जाहिर की जाती रही है की वह अपराधियों को पकड़ नहीं पाती इसलिए उनके हौसले बढ़ते जाते है और वे अगली कार्यवाही कर और अधिक मासूम लोगो की जाने लेते है. और अब जब अहमदाबाद में हुए धमाकों के बाद पुलिस कार्यवाही कर रही है तो कहते है सिमि के प्रतिभावान लोगो को पुलिस उठा रही है, मुस्लिमों पर अत्याचार हो रहा है. मुस्लिमों को ही क्यों उठाया जा रहा है? समझ में नहीं आता फिर किसको उठाना चाहिए. ऐसे में पुलिस का काम दो धारी तलवार पर चलने जैसा हो गया है. एक तरफ उस पर दबाव है की अपराधियों को पकड़े और दुसरी तरफ देशद्रोहियों के हाथों यह मुद्दा भी नहीं देना है की मुस्लिमों पर अत्याचार हो रहा है. काम तब और जटिल हो जाता है जब लालू, मुलायम, मायावती व पासवान जैसे नेता पुलिस के काम में हस्तक्षेप करते है और इमाम बुखारी जैसे लोग देशद्रोहियों को शहीद बनाने पर तुले हुए है.
अहमदाबाद में विस्फोटों के बाद बहुत सारे मानवाधिकार वालो से लेकर कई तरह के सामाजिक कार्यकर्ता तक आ धमके है, मगर उनकी चाही बाते हुई नहीं और वे हाथ मलते रह गए. कोई दंगे फसाद नहीं हुए न ही पुलिस की कार्यवाही ने उन्हे आरोप लगाने का मौका दिया. तब आशंका थी की शहर में कुछ होगा जरूर. तो पत्थरबाजी हुई, जम कर हुई मगर दंगे फिर भी नहीं हुए. पुलिस ने कोशिशों को बेकार कर दिया. पत्रकार बन्धु भी अपनी ओर से कुछ लिखने-लिखाने का काम किया मगर बेअसर रहा. जैसे राजदीप सर देसाई को यहाँ अदृश्य दीवारें नजर आई, साथ ही खास क्षेत्रों में बैंक के एटीएम न होने के लिए मुख्यमंत्री को लताड़ा, मगर इस पर उनकी भारी थू थू हुई. सभी जानते है बैंको का इस मामले में अपना व्यवसायिक गणित होता है, वे धर्म नहीं देखती न ही किसी मुख्यमंत्री की इच्छा से एटीएम लगाती या हटाती है.
फिलहाल तो पुलिस को अपराधियों को सजा ही नहीं दिलवानी, इस आरोप का भी सामना करना है की विस्फोटों के लिए केवल मुसलमान ही गिरफ्तार क्यों किये जा रहे है?













August 22nd, 2008 at 6:19 pm
कुछ तो (सेकुलर) लोग कहेंगे, (सेकुलर) लोगों का काम है कहना, छोड़ो यार, अभी तो पुलिस का मनोबल बढ़ाने की आवश्यकता है… किसी के कहने पर कान दि्या तो हो चुका काम्…
August 22nd, 2008 at 7:31 pm
कुछ धर्म के ठेकेदार है जो चिंगारी को हवा देते है। उनके लिए धर्म, धर्म न हो कर पनौती है। ऐसे लोगों की कोई कमी भी नही है। इन पर ध्यान न देकर पुलिस को अपना काम करना चाहिए।
August 22nd, 2008 at 8:09 pm
समस्या ये है.. कि हर बात में हम राजनिति करते है/देखते है..
समस्या ये है.. कि हर बात मैं अपना फायदा ढुढते है..
August 22nd, 2008 at 9:10 pm
क्या हैं?? अफसोसजनक स्थितियाँ.
August 22nd, 2008 at 11:04 pm
संजय जी पुलिस अपने तरीके से काम करती है और उन्हें करते रहने देना चाहिए लेकिन किसी से पूछताछ तो सही है लेकिन उठा लेना गलत है। और नौकरी चली जाए तो और भी। सही कहा है कि कई मामलों में तो बहस हो सकती है।
August 22nd, 2008 at 11:38 pm
पुलिस सभी लोगों के लिए ज्यादती करती है। यह एक सही तथ्य है। लेकिन इस से उस का विरोध करना नाजायज कैसे हो गया? क्यों नहीं जनता पर इस आततायी तंत्र को समाप्त करने को एक हो कर आवाज उठाई जाती है? आतंकवाद को न रोक पाने की असफलता को ढकने का तरीका यह तो नहीं हो सकता कि निरपराधों की धरपकड़ शुरु कर दो। राजस्थान में पकड़े गए आधे से अधिक लोग छोड़े जा चुके हैं।
एक अधिक विश्वसनीय अन्वेषण तंत्र की आवश्यकता को क्यों नकारा जा रहा है। नेताओँ की रक्षा में सन्नद्ध पुलिस तो इस का मुकाबला ऐसे ही करेगी।
August 23rd, 2008 at 12:17 am
जो अपराधी है उनको तो पकड़ना ही पड़ेगा, अगर अब सारे अपराधी एक ही धर्म के निकल जाएँ तो पुलिस दुसरे धर्म वाले को क्यों पकडेगी?
पकड़ना और सजा देने का निर्धारण तो अपराध से होता है भाई, धर्म कहाँ से आ गया बीच में !
August 23rd, 2008 at 11:38 am
यदि शक के आधार पर पुलिस गिरफ़्तार करती है अथवा पूछताछ के लिए ले जाती है और बाद में व्यक्ति निर्दोष पाया जाता है तो उसकी नौकरी नहीं जानी चाहिए। ऐसी स्थिति में उसको अदालत में अमुक कंपनी पर मुकदमा करना चाहिए। कदाचित् यह भी संभव है कि व्यक्ति मुकदमा जीत जाए और कंपनी उसे नौकरी पर वापस रख ले, लेकिन क्या वह व्यक्ति दोबारा वहाँ चैन से नौकरी कर पाएगा? यदि प्रैक्टिकल नज़रिए से देखें तो मैं नहीं समझता कि वह व्यक्ति ठीक उसी वातावरण में उस कंपनी में कार्य कर पाएगा जिसमें वह पहले करता था, बहुत संभावना है कि उसको सहकर्मियों से नकारात्मक व्यवहार झेलना पड़े।
यह सब हमारे तथाकथित सभ्य समाज की एक और बुराई है, उसका एक और दोगलापन है। जेल से चुनाव लड़ रहे और सैकड़ों अपराधिक मामलों में शरीक नेता को वोट दिया जा सकता है क्योंकि वह तो नेता है और जेल की सैर करना उनके लिए ऐसा होता है जैसे तीर्थ/हज करना। लेकिन कोई आम आदमी यदि किसी गलतफ़हमी के तहत जेल हो आए तो उसके लिए समाज में जगह नहीं रहती। ऐसे में वह व्यक्ति कहाँ जाएगा सामाजिक बहिष्कार के बाद? या तो आत्महत्या करेगा या अपराध के मार्ग पर बढ़ेगा क्योंकि कोई भी व्यक्ति कैसी भी मानसिकता वाला हो, वह समाज के बाहर नहीं रह सकता, उसका मन नहीं मानता समाज से अलग किसी सन्यासी की भांति रहने को।
August 23rd, 2008 at 1:47 pm
आपने एक अच्छा मुद्दा उठाया है…दरअसल पुलिस की कार्यवाही को दोष देना बहुत आसन है और खुद उन परिस्थितियों में रहकर काम करना उतना ही मुश्किल! मैं नहीं कहती की पुलिस की कार्यवाही दोषपूर्ण नहीं है लेकिन कभी किसी ट्रैफिक पुलिस मैन के साथ खड़े होकर देखिये , एक एक चालान बनाने में कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है! हर व्यक्ति पचास रुपये के लिए दर्ज़नों फोन करा देता है! ऐसी न जाने कितनी व्यवहारिक समस्यायें हैं जो आये दिन फेस करनी पड़ती हैं!शक के आधार पर उठाना भी अब उतना आसान नहीं रहा!मानवाधिकार तो है ही….इसके अलावा समस्या ये है कि फरियादी यदि किसी पर शंका व्यक्त कर रहा है तो उसे बुलाना ज़रूरी है अन्यथा वह संतुष्ट नहीं होगा ..और दूसरी ओर यदि किसी व्यक्ति को शंका के आधार पर बुलाकर पूछताछ कि जाती है तो उसके अपने कॉन्टेक्ट हैं जो ऐसा करने से रोकते हैं!कई बार तोड़ फोड़ और कानून व्यवस्था के स्तिथि भी निर्मित हो जाती है….
पुलिस की कार्यवाही के पीछे दुर्भावना के अतिरिक्त भी कई कारण शामिल होते हैं..!
August 23rd, 2008 at 2:22 pm
पल्लवी जी, पुलिस को भी ऐसे ही क्लीन चिट नहीं दी जा सकती जैसे आप दे रही हैं। दोष बहुत बार पुलिस वालों का भी होता है। आप ट्रैफिक पुलिस की बात कर रही हैं, पुलिस विभाग में सबसे अधिक भ्रष्ट कर्मचारी आपको यहीं मिलेंगे। अधिकतर लोग ट्रैफिक पुलिस में आते ही इसलिए हैं क्योंकि इधर कमाई बहुत है, और वे भी ऐसे ही नहीं आते, ट्रैफिक पुलिस में आने के लिए उनको तगड़ी घूस देनी पड़ती है। ट्रैफिक पुलिस के कांस्टेबल और हवलदार क्या और कैसे अपना काम करते हैं यह मैंने दिल्ली में बहुत देखा है, इसलिए उसकी बात न ही करें तो बेहतर है।
बाकी जो आप कॉन्टेक्ट और फोन करवाने की बात कर रही हैं तो कोई भी आम व्यक्ति पुलिस के बुलावे पर घबरा जाता है क्योंकि बहुत से पुलिस कर्मचारियों के कर्मों के कारण पुलिस की छवि ऐसी धूमिल हो चुकी है कि आम आदमी टेन्शन में आ जाता है कि न जाने पुलिस वाले कैसा व्यवहार करेंगे और वह भी खामखा। इसलिए हर व्यक्ति प्रभावशाली व्यक्तियों के कॉन्टेक्ट रखने की कोशिश करता है ताकि उस पर पुलिस गरीबमार न कर सके, उसको खामखा हलकान न कर सके। यह मैं सुनी सुनाई बातों के आधार पर नहीं कह रहा परन्तु अपने अनुभव के आधार पर भी कह रहा हूँ कि बहुत से पुलिस वाले शरीफ़ लोगों को खामखा हलकान करते हैं, बिलकुल करते हैं!!
August 23rd, 2008 at 10:40 pm
इस मामले में पुलीस अच्छा काम करती नजर आती है।
August 29th, 2008 at 12:33 pm
राजदीपजी की मासूमियत पर वारी जाऊँ। मेरे शहर इन्दौर में कई ऐसे इलाके हैं जहाँ कोई मुस्लिम नहीं रहता फिर भी वहाँ किसी भी बैंक का एटीएम नहीं है और कोई भी बैंक (सरकारी, कार्पोरेट, सहकारी, ग्रामीण, या अन्य कोई) उन बस्ती के लोगों को वाहन, मकान या अन्य किसी भी प्रकार का कर्ज नहीं देती है।