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हे विधि आयोग, हम दास थे, हैं और रहेंगे

हनुमान अपनी शक्तियों को भूल गए थे? मगर एक समय आया जब उन्हे अपनी शक्तियों की आवश्यकता थी और अवचेतन अवस्था में पड़ी वे शक्तियाँ जागृत हो गई.

हम भारतीय भी हजार वर्षों की पराधिनता में स्वाभिमान की भावना को भूल चुके हैं. हनुमान ने तो अपनी शक्तियाँ पुनः पा ली थी, मगर हम अपना स्वाभिमान कभी नहीं पा सकते. क्योंकि अब वह अवचेतन अवस्था में नहीं पड़ा है, वह पूर्णतः मर गया है.

आज सुबह एक अंग्रेजी समाचारपत्र में (देसी भाषा वाले में यह अनावश्यक समाचार था ही नहीं, छापना शायद कागज व स्याही का दुरुपयोग ही होता) पढ़ा कि विधि आयोग ने देश पर अंग्रेजी की गुलामी ढ़ोते रहने का फ़ैसला लिया है। उसका कहना है कि उच्च एवं उच्चतम न्यायालयों में अंग्रेजी ही एकमात्र भाषा रहेगी और हिन्दी को अभी प्रवेश देना सम्भव (फ़िजिबल) नहीं है। (ये पंक्तियाँ प्रतिभास से साभार). पढ़ कर मन शोक व ग्लानी से भर गया. साठ साल बाद भी हम भारतीय इस प्रकार सोचते है? अपनी भाषा, अपने स्वाभिमान के लिए जरा सी मेहनत, जरा सा बलिदान नहीं कर सकते? हम किस हद तक मानसिक रूप से परतंत्र हो चुके है!

क्या विधि आयोग पूर्णतः गलत है? नहीं. क्योंकि जैसे ही बात हिन्दी की आएगी इसका सबसे ज्यादा विरोध होगा. इसे क्षेत्रिय भाषाओं पर हिन्दी को लादा जाना बताया जाएगा. देश फिर से भाषाई विभाजन के सम्मुख होगा. हम गुलाम थे-हम गुलाम हैं- हम गुलाम रहेंगे. हमें अंग्रेजी स्वीकार्य है, हम हिन्दी को नहीं स्वीकार सकते.

हमें एक जूट रखने के लिए विदेशी मालिक चाहिए.  वह भाषा, व्यक्ति, देश जैसे किसी भी रूप में हो सकता है. वह अंग्रेजी भी हो सकती है, वह मुस्लिम शासक भी हो सकते है, वे अंग्रेज शासक भी हो सकते है. वह अमेरिका भी हो सकता है, भविष्य में वह चीन भी हो सकेगा.

पाकिस्तानी इतिहासकार कितना गलत कह रहें है, जब वे कहते हैं, “हमने भारत और वहाँ रहने वाले हिन्दुओं पर ९०० (नौ सौ) साल राज किया। हिन्दुओं ने तो हमारी भाषा अरबी-फारसी और उर्दू भी सीखी। कई हिन्दुओं ने अपने घरों में अपने बच्चों के लिए इन भाषाओं को पढ़ाने का इंतजाम किया था। इसके लिए मौलवी लगवाए जाते थे। कई हिन्दू अपने बच्चों को पढ़ने के लिए मदरसों में भी भेजते थे। हमारा तो ये कहना है कि हिन्दुओं को बिगाड़ा तो सिर्फ अंग्रेजों ने….उन्होंने इनकी आदत बिगाड़ कर रख दी। १८५७ के गदर में भी अंग्रेजों के खिलाफ जब हिन्दुओं ने खड़े होने की सोचा तो उन्हें एक मुसलमान राजा की जरूरत महसूस हुई। उसके बिना उनका काम चल ही नहीं सकता था। तो उन्होंने उस बहादुर शाह जफर को अपना राजा बनाया जो ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाता था।“ (ये पंक्तियाँ सचिन की दुनिया से ली गई है)  क्या गलत कह रहे हैं, ये इतिहासकार? क्या आन-बान-शान के लिए मर मिटने वाले राजपुत (मैं भी इसी जाती से सम्बन्ध रखता हूँ) मुस्लिम शासकों के छत्र तले ही एकत्र नहीं हुए थे? उन्हे अपनी बहू-बेटियाँ नहीं दी थी? राणाप्रताप-शिवाजी जैसे कम ही हुए. जौहर करने वाली राणियों व केसरिया करने वाले लड़ाको ने जरूर मिट्टी की लाज रखी.

आज स्वयं को सॉफ्टवेर का सम्राट मानने वाला भारत जिन युवाओं के बल पर ऐसा है, वे हैं क्या? क्या वे बंधुआ मजदूरों से ज्यादा कुछ है भी? करोड़ों-अरबों कमाने वाली इस फौज का योगदान “भाषाई कम्प्यूटिंग” में  कितना है? भारत के लिए मुक्त स्त्रोत वरदान से कम नहीं, दुनिया भर के लिए सॉफ्टवेर बनाने वाली कम्पनियाँ अपने थोड़े संसाधन इस ओर लगाना पसन्द करेगी? कतई नहीं. क्योंकि हमने मजदूरी की है, गुलामी की है और वही करते रहेंगे.  अपने स्वाभिमान के लिए कुछ भी खोना नहीं चाहते, कुछ भी करना नहीं चाहते. तब लाटसाब बनकर इतराते थे, अब टाई धारण कर इतराते है.

अंतिम सम्पादन at .



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17 प्रतिक्रियाएं to “हे विधि आयोग, हम दास थे, हैं और रहेंगे”

  1. ताऊ रामपुरिया Says:

    ? भारत के लिए मुक्त स्त्रोत वरदान से कम नहीं, दुनिया भर के लिए सॉफ्टवेर बनाने वाली कम्पनियाँ अपने थोड़े संसाधन इस ओर लगाना पसन्द करेगी? कतई नहीं. क्योंकि हमने मजदूरी की है, गुलामी की है और वही करते रहेंगे.  अपने स्वाभिमान के लिए कुछ भी खोना नहीं चाहते, कुछ भी करना नहीं चाहते. तब लाटसाब बनकर इतराते थे, अब टाई धारण कर इतराते है.

    आपने बडा सशक्त लेख लिखा है ! बिना मातृभाषा को सम्मान  दिये आप क्या कर लेंगे ? आप जर्मनी को ही देख लिजिये ! कल मेरी जर्मनी राज भाटिया जी से बात हो रही थी उन्होने बातों बातों मे बताया किवो उनके बच्चे अपनी मातृभाषा के अलावा अन्गरेजी भी जानते हैं पर  जर्मनी मे अंग्रेजी बोलना अपमान जनक माना जाता है  सो वहां सब जर्मन ही बोलते हैं ! 

    एक हम हैं कि आज भी गुलाम ही हैं ! आपने सोफ़्टवेयर कम्पनीयों का बहुत बढिया उदाहरण दिया ! आपका सुझाव लाख टके का है अगर कोई अम्ल करे तो ! 

    भाई हम तो ब्लागिन्ग मे आये ही इस लिये थे कि हिन्दी को कम्प्युटर पर छपी देखना अच्छा लगता था ! हम कोई साहित्य कार या कवि तो हैं नही ! बस हिन्दी मे अपने विचार व्यक्त कर लेते हैं यहा ! आपने बहुत बढिया और सार्थक लिखा  इसके लिये धन्यवाद !

    रामराम !
     

  2. सुरेश चंद्र गुप्ता Says:

    आप ठीक कह रहे हैं. मानसिक गुलामी इतनी आसानी से नहीं जाती, उसके लिए तपस्या करनी पड़ती है. अंग्रेज चले गए. उनकी जगह अंग्रेजों की फोटोकॉपी ने ले ली. जब तक इस फोटोकॉपी को नष्ट नहीं किया जायेगा तब तक यह सब ऐसे ही चलेगा. 

  3. रतन सुराणा Says:

    कल मुझे मेरे एक मित्र ने क्रिसमस की बधाई भेजी. मैने भी प्रत्युत्तर में जो लिख भेजा, वही संजय की बात के समर्थन मे प्रस्तुत कर रहा हूं..
     
    क्रिसमस को ‘हैप्पी’ कहने में मुझे नही आपत्ति है .
    पर, लगता अपनी संस्कृति पर आई घोर विपत्ति है.
    अर्द्ध-रात्रि आजादी पाई, नही सवेरा दीख रहा,
    सबको हैप्पी हैप्पी करते, खो दी अपनी सम्पत्ति है

  4. दिनेशराय द्विवेदी Says:

    संजय भाई खबर ही खबर पढ़ी है। अभी मूल रिपोर्ट हाथ नहीं लग रही है। क्या कहा गया है उस में? जब तक पता नहीं चलता कुछ कह पाना संभव नहीं है। एक पंक्ति समझ में जरूर आई है कि हि्न्दी को सुप्रीम कोर्ट की अनिवार्य भाषा बनाया जाना संभव नहीं है। यह तथ्य तो सही है।

    पूरी रिपोर्ट की प्रतीक्षा है। जहाँ सब कानून अंग्रेजी में सुप्रीम कोर्ट की साइट पर उपलब्ध हैं वहाँ अभी हिन्दी का एक भी नहीं है। जो हैं वे गजट में छपी हिन्दी कानूनों की फोटो प्रतियां पीडीएफ में हैं। अभी तो हिन्दी प्रदेशों के उच्चन्यायालय यदि हिन्दी को अपनी अनिवार्य भाषा बना लें तो भी बहुत है। अड़चनें तो बहुत हैं पर उन्हें दूर करने का प्रयास तो होना ही चाहिए। हमें इस ओर गंभीर जनजागरण और प्रचार अभियान छेड़ना चाहिए।

  5. Gyan Dutt Pandey Says:

    भाषाई गुलामी पर आपकी सोच से सहमति है, पर मेरी अपनी खुद की समस्या है – काफी कुछ अंग्रेजी में होने वाली विचार प्रणाली को हिन्दी में बदल नहीं पाया हूं। यह तो आपने मेरे ब्लॉग पर सम्प्रेषण में देखा होगा। पर उसके बावजूद हिन्दी में अपने खुद के भाषाई प्रयोग जारी हैं।
    हम सभी हनुमान हैं। क्षमताओं ने अनावगत।

  6. नितिन Says:

    “हमने मजदूरी की है, गुलामी की है और वही करते रहेंगे.” यही हमारी संस्कृति हो गई है

  7. सुनीता शानू Says:

    बिलकुल सही लिखा है संजय भाई आपने…अभी लगता है वक्त लगेगा गुलामी से बाहर निकलने में, आज भी हममे से कुछ अंग्रेजी में बोलना अपनी शान समझते हैं…बहुत मुश्किल है उनके लिये हिंदी को अपनाना किन्तु असम्भव तो कुछ भी नही…हम हिन्दी भाषी है और सदा रहेंगे…

  8. जी विश्वनाथ Says:

    भावुक होकर लिखा है आपने।
    इसी वीषय पर दिनेशरायजी का लेख पढ़िए।
    उनकी राय से मैं सहमत हूँ।

  9. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी Says:

    @आदरणीय विश्वनाथ जी
    दिनेश राय द्विवेदी जी की बात सोलह आने सही है। लेकिन हम यहीं इति नहीं कर सकते। वहाँ एक बार फिर जाकर आगे की चर्चा भी पढ़ने का कष्ट करें। हमें इस जड़ता से निकलने का रास्ता सोचना होगा। जबतक हिन्दी हमारे न्यायालयों और सत्ता के ऊँचे पायदानों तक सहज रूप से प्रयुक्त नहीं होने लगेगी तबतक भारत एक राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान कतई नहीं बना पाएगा। हिन्दी ही भारत को एकता के सूत्र में पिरो सकती है।

  10. जी विश्वनाथ Says:

    त्रिपाठीजी,
    द्विवेदीजी के ब्लॉग पर लौटकर आपकी टिप्पणी पढ़ी।
    इस समय रात के सवा ग्यारह बज चुके हैं।
    कल रविवार को इस विषय पर आगे और लिखूँगा।

  11. जी विश्वनाथ Says:

    त्रिपाठीजी (और संजयजी),
    संक्षिप्त में
    1)कृपया हमें ग़लत न समझें। अहिन्दी भाषी होते हुए भी हमें हिन्दी से अपार प्रेम है और हम भी चाहते हैं कि भविष्य में हिन्दी संपूर्ण भारत की भाषा बनें और सर्वोच्च न्यायालय में भी हिन्दी का ही प्रयोग हो।
    2)मेरी राय में इसके लिए जो तैयारियाँ आवश्यक है वह पूरी नही हुई है। जैसा दिनेशरायजी ने कहा, आज हिन्दी में आवश्यक सामग्री उपलब्ध नहीं है।
    स्वयं हिन्दी बोलने वाले वकील भी हिन्दी में  केस लड़ने में आज असमर्थ होंगे।
    अहिन्दी भाषी वकील तो उच्च न्यायालय में प्रवेश भी नहीं कर सकेंगे।
    3)मुझे नहीं लगता कि सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेज़ी के प्रयोग से आम आदमी को किसी प्रकार की असुविधा होती है। पंचायतों में, सरकारी कार्यालयों में, बाज़ारों में इत्यादि हिन्दी या क्षेत्रीय भाषा न चलें तो अवश्य जीना दूभर हो जाएगा पर सर्वोच्च न्यायालय में तो आम नागरिक कभी प्रवेश ही नहीं करता।
    4)हिन्दी को सही अर्थ में देश की एकमात्र राष्ट्रभाषा बनने में और कई पीढियाँ लग सकती है। हमें चाहीए कि हम सब धीरज रखके इस लक्ष्य की ओर बढ़ें। हिन्दी को अपनी ही बल पर इस लक्ष्य तक पहुँचनी होगी और न सरकार की अध्यादेश की सहायता से। ज़बरदस्ती करने से देश की एकता को खतरा है।
    5)अवश्य इस दौड़ में हिन्दी को अँग्रेज़ी से मुकाबला करना होगा और यदि भाषा  में दम, गुणवत्ता और योग्यता है तो एक न एक दिन मेरा और आपका सपना साकार होगा। गौरतलब है कि अँग्रेज़ी आज अपनी ही बल पर टिकी हुई है।
    6)मैं नहीं चाहता कि महत्ता की इस दौड़ में किसी भी भाषा के लिए कोई आरक्षण हो। हमें हिन्दी को देश की एकता का सूत्र बनने देना होगा, फूट का कारण नहीं। यदि सौ साल बाद भी हिन्दी का यही हाल रहा (जो आज है) तो हमें समझ लेना चाहिए कि हिन्दी की किसमत ही खोटी है और हालात से समझौता कर लेना चाहिए। यदि हिन्दी का यही दुर्भाग्य रहा तो यकीन मानिए, संसार की कई अन्य भाषाओं का यही हाल होगा।
    7)ये बातें मैं दिल से कह रहा हूँ। यदि कडवी लगे तो क्षमा कीजिए।

  12. संजय बेंगाणी Says:

    एक बार इजराइल के इतिहास पर नजर डालें. हिब्रू मृत भाषा थी. आज वहाँ की कार्यभाषा है. यह कैसे सम्भव हुआ? हिन्दी तो फिर भी जीवित भाषा है. वास्तविकता यह है कि कहीं न कहीं हमारे अंदर हीन भावना है जो स्वीकारने नहीं देती कि हिन्दी भी अंग्रेजी का स्थान ले सकती है.

    हिन्दी के आने से न तो उत्तर का वर्चस्व बढ़ेगा न दक्षिण का जो पारंगत होगा उसी का बढ़ेगा. अगर दक्षिण भारतीय अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा सीख सकते है तो क्या हिन्दी जैसी देश की भाषा नहीं सीख सकते? हिन्दी किसी की मातृभाषा नहीं है. राजस्थान में बहुत सारी भाषाएं या बोलियाँ बोली जाती है. हरीयाणा में हरीयाणवी है. वैसे ही भोजपुरी, अवधी वगेरे है.

    आखिर कब तक एक विदेश चलेगा मगर देशी नहीं, यह भावना रहेगी?

  13. जी विश्वनाथ Says:

    इसरायिल का इतिहास, आबादी, और परिस्थितियाँ जिसके कारण देश का जन्म हुआ, भारत से बिलकुल भिन्न है और तुलना करना मेरी राय में उपयुक्त नहीं। इसरायिल की नकल नहीं कर सकते, उसे प्रेरणास्रोत मान सकते हैं। उस हिसाब से संस्कृत को संपर्क भाषा का दर्जा देना चाहिए था। यह तो और भी कठिन होता।
    दक्षिण भारत के आम लोग भी हिन्दी सीख रहे हैं। आज से पचास साल पहले की स्थिति और आज की स्थिति में बहुत अंतर है। समय अवश्य लगेगा। धीरज की आवश्यकता है। मैं मानता हूँ कि कुछ लोग (खासकर तमिल नाडु में) हिन्दी के कट्टर विरोधी हैं। उन्हें रहने दीजिए। अगली पाढ़ी  पर आशा रखिए।
    बहस जारी रखने के लिए धन्यवाद
     

  14. अतुल शर्मा Says:

    आम जनता की सोई हुई हनुमानी शक्तियों को तो कोई गाँधी ही जगा सकता है।

  15. SHUAIB Says:

    अब तो आदतसी होगई है। काहेकी ग़ुलामी। ;)
    जब अकसर लोग अंग्रेज़ी बोलना पसंद करते हैं, अंग्रेज़ जैसा रहना पसंद करते हैं, ग़ुलामी पर शर्मिंदा नहीं होते और शर्म भी नहीं आती तो फिर काहेकी ग़ुलामी?

  16. bhawna Says:

    You have visited at my blog…thanx…I like this posting.

    We know that basic hindi software is avialable in Computer Science in Hindi, but where we need to go deeper or at higher level, we feel handicapped…likewise we had books in Hindi medium up to schooling but for pursuing  higher eduction, we get dependent on English Texts.

    We don’t take inspiration from Japan, China which are developing higher machinery, engineering in their own language…but it’s not easy nut to crush…amogst many language china has opted madarin…Looking towards Indian Langaugues we think hindi can be appropriate medium…we don’t care about s. indians we say them to learn hindi…we north indian never tried to learn any of south indian languague.Whenever we argue that hindi is lingua franca…but it’s for north india…not for the N-E and south….If we see the origin of Indo-european language it orgiginates from Sanskrit…To this pointview all Indian should learn sanskrit…,but it’s not possible in a certain timeframe.

    rahi baat meri posting ki jise aap blog lekhan ka topic he nahi samjhte…ye hum logo ke so called high culture morals ka result hai…jo certain topics ko hamare  liye untouchable bana deta…have you ever talk with any eunuch..we just know them as a sort of begger group, troubling people in various auspicioius occasion…I have listned them…they also wish for the same disires like us…but those things which are easily made avilable to us becouse of specified gender of either male or female they don’t get, considering them rude and chaotic creature on earth.
    Coming to my posting on adult franchise of eunuch … you, me can vote, identifying us in male or female category…what abt their category…they dont’ have column as eunuch in any form, whereas we have categories for mentally retartded pple,disandants of freedom fighter, PH, SC, STs,Nationality etc.

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