सलाम लोकतंत्र
दुनिया ओबामामेनिया से ग्रस्त किसी परिवर्तन की आस में ओबामा का राजतिलक देख रही थी. मुझे अच्छा लग रहा था, बुश का एक सामान्य से विमान द्वारा विदा होना. नहीं, मुझे बुश से ऐसी कोई घृणा नहीं कि उनके जाने मात्र से खुशी होती हो. वास्तव में दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति का अपनी तमाम शक्तियों का इतनी आसानी से त्याग कर दूसरे के हाथ में सौंप देना एक चमत्कार है और उसका नाम है लोकतंत्र. इस व्यवस्था के प्रति मेरी आस्था ही मेरे खुश होने का कारण रही.
शक्तियों को छोड़ देना आसान नहीं. सत्ता एक नशा है. हमारे देश में इन्दिरा “गाँधी” (जो कि सत्ता के लिए अपनाया गया एक छद्म उपनाम है) ने भी सत्ता के लिए आपातकाल लागू किया था. तानाशाह फिर वह धार्मिक हो या अधार्मिक (कम्युनिस्ट) सत्ता की शक्ति ताउम्र नहीं छोड़ पाते. वहीं लोकतंत्र में दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति क्षणभर में बदल जाता है. अद्भूत.













January 21st, 2009 at 10:48 am
शायद उनमे और हममे यही फ़र्क है…
इंदिरा जी वाली बात के बारे में पता नही था.. आपने बताया तो नयी जानकारी मिली.. वैसे आजकल गाँधीस के बारे में कई जानकारिया मिल रही है..
January 21st, 2009 at 11:10 am
सही कहा आपने “उसका नाम है लोकतंत्र”| अब हमें तो “इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया” सुनाने की आदत है| मैं भी हैरान हुआ था|
January 21st, 2009 at 11:28 am
“लोकतंत्र” सुन्ने मे अच्छा शब्द है,
पुराने ज़मानों मे जब एक देश का राजा दूसरे देश के राजा की हत्य कर उसका देश हडप लेता है।
हमारे देश का ‘लोकतंत्र’ आंखों के सामने है। भारतय सियासत मे सब खान्दानी लोग जमा हैं।
बुश के जाने का मुझे ग़म है ना खुशी और ओबामा से किसी अच्छे काम की उम्मीद भी नहीं।
January 21st, 2009 at 11:43 am
सच कहा आपने.
वैसे दूसरे वाले पैरा में थोड़े में भी बहुत कुछ कह गए आप !!
January 21st, 2009 at 11:52 am
लोकतंत्र का यही एक गुण है कि तख्त से तख्ते पर आते देर नही लगती . और दोष यह है कि स्तरहीन व्यक्ति तख्त पर पहुच जाता है
January 21st, 2009 at 1:53 pm
वाकई, अद्भुत!!!
January 21st, 2009 at 2:24 pm
सच है।
शुएबजी की बात कुछ अस्पष्ट सी लग रही है।
January 21st, 2009 at 3:27 pm
<b>अतुल शर्माजी </b> कुछ अस्पष्ट?मैं समझा नहीं या मेरी टिप्पणी आपके समझ नहीं आईये अलग बात है कि मैं बातें ज़रा गोलमाल करता हूं।
January 21st, 2009 at 4:58 pm
इंदिरा गांधी वाली बात समझ नही आई क्यूंकि इंदिरा की शादी तो फिरोज गाँधी से हुई थी ना । तो वो नेहरू तो नही लिख सकती थी ।
हाँ आपकी इस बात से जरुर सहमत है कि उस उपनाम का इस्तेमाल सत्ता के लिए ही किया गया था ।
January 21st, 2009 at 5:52 pm
जनतंत्र का यही लक्षण होना चाहिए। जनतंत्र जिन्दाबाद!
January 21st, 2009 at 6:27 pm
सही कहा आपने. लोकतंत्र का यही करिश्मा उसे सार्वदेशिक और कल्याणकारी बनाता है. जहां तक बदलाव की बात है- “every old order changeth yielding place to new.-ELIOT”.
January 21st, 2009 at 6:49 pm
बिल्कुल सही लिखा आपने. एक तरह का चमत्कार ही है. आपने सही कहा कि इन्दिराजी ने भी आपातकाल के प्रयोग के बाद ही सत्ता छोडी थी. बडा मुश्किल होता है. और गांधी सरनेम का उपयोग बहुत सटीक बताया आपने.
रामराम.
January 21st, 2009 at 6:49 pm
सही कह रहे हैं, सत्ता को छोड़ना सत्ता को भोगने से बड़ी कला है। काश हमारे यहाँ भी यह कला देखने को मिलती!
घुघूती बासूती
January 21st, 2009 at 7:12 pm
सच है जी। सत्ता को बिना राग-द्वेष के छोड़ देने के लिये भी चरित्र चाहिये। अपने देश में वह विरल लगता है।
January 21st, 2009 at 9:19 pm
सच्चे लोकतन्त्र की यह सच्ची बात सचमुच अद्भुत है। लेकिन और भी बहुत सी बाते हैं लोकतंत्र की सच्चाई को सफल बनाने के लिए जो भारत में की जानी शेष हैं।
फिलहाल हम सच्चाई की विपरीत दिशा में बढ़ रहे हैं। जिस प्रकार के लोग भारतीय राजनीति की ओर आकर्षित हो रहे हैं, उससे बहुत आशा नहीं बँधती है। लगता है कि कुछ दिनों बाद शरीफ और ईमानदार और कर्मठ व्यक्ति राजनीति के गलियारों में ढूँढे नहीं मिलेंगे।