गा?धीजी के दोनो पक?ष
आशीष ग?प?ताजी, अन?प श?क?लाजी, नीरज भाई तथा खाली-पीली वाले आशीष भाई ने मेरी पिछली पोस?ट पर अपने विचार व?यक?त किये, इस पर मैं सभी का आभार व?यक?त करता हू? तथा अपना स?पष?टीकरण देना चाहता हू?. गा?धी को महान मानने के मेरे पास बह?त से कारण हैं और इसलि? मैंने हर जगह गा?धीजी को महानतम नेता कहा है. यह भारत की भूमि ही है जो महावीर, ब?द?ध तथा गा?धी पैदा कर सकती है.
गा?धीजी ने अस?पृश?यता को खत?म करने के साहसपूर?ण कदम उठाये थे, भारत को ?क राष?ट?र के रूप में देखते ह?? राष?ट?रभाषा के महत?व को सम?ा तथा हिन?दी को ब?ावा दिया. ग?राम स?वराज का सपना देखा. ?से अनेक-अनेक कार?य उन?होने किये थे. सच कहें तो वे महात?मा ज?यादा थे और राजनेता कम. पिछले लेख में इन सब बातों का कहीं भी उल?लेख नहीं किया था क?योंकि ?सा तो सभी करते हैं. अपने नायक का बखान करना तथा उसके उजले ग?णों को देखना सभी को प?रिय होता हैं परंत? क?या उतनी ही सहजता से उनके श?याम पक?ष को स?नने तथा स?वीकारने की सक?षमता भी उनमें है? कह सकता हू?, म?? में हैं. मैं गा?धीजी के प?रति ऊपर लिखे कारणों से श?रद?धाभाव रखता हू? बावजूद इसके कि मैं उनके दोषों से भी परिचित हू?.
कहना चाहता हू? की मैंने गा?धी को उनके ग?ण-दोषो के साथ स?वीकार किया हैं. मैने लिखा भी था कि,?हमें अपने नायक को उसके श?वेत-श?याम पक?षों के साथ स?वीकार करना सीखना चाहि??.
मैं बह?त बार साबरमती आश?रम की गया हू?, और बह?त ही रोमांचित महसूस करता रहा हू? की गा?धीजी भी कभी यहीं रहे थे. मैने पूरे श?रद?धाभाव से गा?धीजी पर भारत में निकली लगभग सारी डाकटिकटें भी संग?रहित कर रखी हैं.
होता यह हैं कि गा?धी के निंदक केवल उनके दोषो को आगे रखते हैं वहीं गा?धी के समर?थक केवल उनके उजले पक?ष को ही देखते रहना चाहते हैं. मेरी दृष?टि में दोनो ही गलत हैं. मैंने गोडसे को कभी महान नहीं कहा जबकि गा?धीजी के लि? ?सा हर जगह कहा हैं. इसलि? यह कहना कि गोडसे की त?लना गा?धी से कर रहा हू?, गलत होगा. अब गोडसे ने गा?धीजी की हत?या की थी इसलि? उनके साथ गोडसे का उल?लेख भी कर दिया. मैं मात?र इतना कहना चाहता था की हम जिस प?रकार गा?धीजी (या अपने किसी नायक) के सिर?फ ग?ण देखना पसंद करते हैं वहीं प?रतिनायक (या खलनायक) के मात?र दोष ही देखना पसन?द करते हैं. क?या हम गोडसे को हत?यारे के रूप में धिक?कारने से पहले कभी हत?या के कारण के बारे में भी सोचना पसन?द करते हैं?
आशीषजी जहा? तक म??े ज?ञात हैं रविन?द?रनाथ टैगोर ने सबसे पहले गा?धीजी को महात?मा कहा था. नेताजी स?भाष को गा?धीजी की वजह से ही पद तथा कांग?रेस दोनो छोड़ने पड़े थे, फिर भी उन?होंने अपने रेडियो प?रसारण में उन?हें भारत का महानतम नेता कहा था. जबकि गा?धीजी उनके बारे में क?या सोचते थे आप जानते होंगे.
भारत की आज़ादी की लड़ाई कई प?रकार से लड़ी जा रही थी, उसमें से ?क का नेतृत?व गा?धीजी कर रहे थे. बाद में सत?ता में आ? लोगो ने वामपंथियो के साथ मिल कर आज़ादी के लि? दूसरे प?रकार से लड़नेवालो को इतिहास से मिटा दिया. चंद लोग ही अपना स?थान पा सके. कितने लोग हैं जो श?यामजी कृष?ण वर?मा को या सावरकर को जानते हैं. इसलि? यह कहना गलत होगा कि पूरा देश गा?धीजी के पीछे चल रहा था. भारत का निर?माण गा?धीजी ने नहीं किया था कि उन?हे राष?ट?रपिता माना जा?. भारत सनातन देश हैं.













October 3rd, 2006 at 11:41 am
बह?त ख़ूब, बढिया जवाब दिया है आपने।
October 3rd, 2006 at 12:05 pm
संजय भाई,चिट?ठे की सीमायें होती हैं. सब क?छ सम?ा-सम?ाया नहीं जा सकता.खासकर ?से विषय पर जिसके पक?ष-विपक?ष में तमाम सामग?री उपलब?ध हों. लोगों की अपनी धारणायें बनी होती हैं सालों से उसी के अन?सार तर?क ग?े जाते हैं.आपने किसी जगह ख?द ईमानदारी से स?वीकार किया है आप स?वभाव से दक?षिणपंथी
हैं. इस लिहाज से आपके तर?कों पर उस सोच की छाया पड़ना स?वाभाविक है. गांधीजी भी हाड़-मांस के प?तले थे. उनके व?यक?तित?व में तमाम विसंगतियां थीं, स?वभाव में हठधर?मिता थी ,ब?रह?मचर?य के अटपटे प?रयोग थे और भी न जाने क?या-क?या. लेकिन यह सभी मानते
हैं कि वे ?क महान व?यक?ति थे.राष?ट?रपिता मानना न मानना कोई ?सी बात नहीं.यह तो मानद पद है ग?र?देव ने दे दिया सो चल रहा है. म??े लगता है कि क?छ
तर?कों के आधार पर गोडसे द?वारा गांधी की हत?या सही ठहराना और फ़िर -’गांधी-गोडसे दोऊ’ भले कहकर
कहीं न कहीं गांधीजी को गोडसे के बराबर बताने की बात ध?वनित होती है. अगर गोडसे ने इतने तर?क पूर?ण निर?णय के बाद गांधी को मारा तो उसकी राजनैतिक
सम? बेकार थी जो यह नहीं सम? पाया कि गांधीजी की अब कोई स?नता. तमाम द?स?तावेज बताते हैं गांधीजी को बड़े नेता शोभा की वस?त? मानने लगे थे.अगर वे जीवित रहते तो शायद उनकी स?थित वही होती जो जयप?रकाश नारायणजी की जनता सरकार बनने के बाद ह?ई थी.
बहरहाल बातें तो तमाम हैं और यह बात आप भी मानते हैं कि गांधीजी महान थे.और आज की तारीख में द?निया में ?सा कोई महाप?र?ष नहीं है जिसके खाते में क?छ श?याम पहलू न हों और ये पहलू भी समय-स?थान सापेक?ष होते हैं.
October 3rd, 2006 at 3:03 pm
सही है. वैसे यह व?यक?तिगत विचारधारा का मामला है. आप अपनी जगह अपने विश?लेषण के आधार पर सही हैं.
October 3rd, 2006 at 3:05 pm
महानतम नेता कहा हैं
यह भारत की भूमि ही हैं
जो महावीर, ब?द?ध तथा गा?धी पैदा कर सकती हैं
भारत सनातन देश हैं
सभी को प?रिय होता हैं
म?? में हैं
स?वीकार किया हैं
होता यह हैं
हर जगह कहा हैं
म??े ज?ञात हैं
हैं – है (ऊपर सबमें)
बावजूद इसके की
लिखा भी था की
आश?रम की गया
हू? की गा?धीजी भी
होता यह हैं की
यह कहना की
था की हम
गलत होगा की
की उन?हे
की – कि (ऊपर सबमें)
अस?पर?श?यता – अस?पृश?यता
उनमे – उनमें
उपर – ऊपर
दोषो – दोषों
हमे – हमें
मैने – मैंने
डाकटिकीटे – डाकटिकटें
उज?जले – उजले
दृष?टी – दृष?टि
दोनो – दोनों
उन?होने – उन?होंने
उन?हे – उन?हें
उसमे – उसमें
लोगो – लोगों
वामपंथीयो – वामपंथियों
लड़ने वालो को – लड़नेवालों को
(और कहने की ज़रूरत नहीं कि ठीक कर इसे मिटा दें)
October 3rd, 2006 at 6:53 pm
धन?य हैं विनय भाई हम आपको तो भूल ही गये!
October 3rd, 2006 at 10:26 pm
अगर वे जीवित रहते तो शायद उनकी स?थित वही होती जो जयप?रकाश नारायणजी की जनता सरकार बनने के बाद ह?ई थी.
पूरी तरह सहमत हूं।
?क और तथ?य यह भी है कि विभाजन के लिये गांधी जी को दोष दिया जाता है लेकिन वस?तूस?थिती यह है कि वे क?छ कर ही नही पाये। वे असहाय से देखते ही रह गये। आप कमलेश?वर की “कितने पाकिस?तान” पढें। विभाजन का जिम?मेदार कौन था, ?क अलग दृष?टीकोण से देखा गया है।
सारी दूनिया जानती है, जब हम आजादी का उत?सव मना रहे थे ये महात?मा कहां था और क?या कर रहा था।
October 3rd, 2006 at 11:22 pm
भाई आशीष मैंने यह कहीं नहीं कहा की बटवारे के लि? गा?धी जिम?मेदार थे. बटवारे के लि? वे म?सलमान जिम?मेदार थे जो सहअस?तित?व में विश?वास नहीं रखते थे. नेहरू जिन?हे सत?ता चाहि? थी. पटेल जो सोचते थे की बटवारे के बाद हम शांति से रह सकेंगे तथा विकास करेंगे.
जो बटवारे का विरोध कर रहे थे, वे थे साम?प?रदायिक हिन?दू तथा गा?धीजी.
October 4th, 2006 at 2:27 am
संजय भाईः
गांधी पर आपने अपने विचारों को बढिया अंदाज़ मे लिखा है।
विनय भाई और अनूप जी की टिप?पणी भी बह?त खूब रही।
October 4th, 2006 at 11:29 pm
संजय भाई,
बंटवारे के बारे मे और जनना चाहि?, यह किताब देखे – http://voi.org/books/mla/index.htm.
म?लतः 1947 मे सरदार ग?रबचन सिंह तालिब, प?रिंसिपल लयल?लप?र खालसा कॉलेज, ज?ल?ंदर के द?वारा।
बंटवारा वर?षो से चल रहे ?क म?हिम का नतीजा था। गांधी जी उन प?रम?ख नेताओ मे थे जिन?होने इसका विरोध किया। मगर इसको वे ख?द या सरदार वल?लभ भाई या नेहरू जैसे नेता बदल नही सकते थे। फ?रसत मे पढे, अच?छी किताब है। हा?, और साथ मे यह ?क छोटा सा लेख भी उस समय की घटनाक?रम के समयचक?र को सम?ने मे मदद करें: http://en.wikipedia.org/wiki/Pakistan_Movement. गौर करे म?स?लिम लीग की श?रूआत ह?ई है 1906 मे, लीग का पहला लेख था “To promote among the Mussalmans (Muslims) of India, feelings of loyalty to the British Government”, और इस लि? जिन?ना इसमे सामिल नही ह??, 1913 तक। और भी कई सारी जानकारी मिलेगी।
आप तो गांधी जी के विचारो से वाफिक है, घटनाक?रम से शायद क?छ रोशनी पडे कि क?यो गांधी जी ने “द?श?मन बने देश” को भी मदद करने की जिद की। हठधर?म को मैने भी कभी गांधी जी की कमी पाया था, मगर थोडा गौर करे तो शायद लगेगा कि यह ही उनकी सबसे बडी शक?ति थी। हा?, यह उनके जीवन मे इस तरह से शामिल था कि उनके आसपास के लोगो को भी प?रभावित करता था।
रही बात गांधी जी की निजी इच?छा कि नेहरू जी प?रधानमंत?री बने। तो इस बारे मे कभी क?छ मिला तो आपसे जरूर चर?चा जारी करेगे। म??े तो इस बात मे क?छ दम नही लगता। यह बात तो जरूर है कि नेहरू जी का प?रधानमंत?री बनना और बंटवारे मे क?छ तालमेल नही दिख रहा है।
આભાર