अरे! ? तो प?रेम छे, प?रेम छे, प?रेम छे.
हममें से प?रेम किसने नहीं किया? किसी को मौका नहीं मिला हो तो बात अलग हैं तथा हम इसमेंक?या कर सकते हैं, उन?हे ख?द ही मौके तलाशने होंगे. खैर यह प?रेम विशेष प?रेम था. मिडीया में आ जाने वाला प?रेम. आ? भी क?यों ना यह प?रेम था ?क साध?वी का प?रेम. भई उन?हे प?रेम हो गया और उन?होने अपना ?क संसार बसा लिया. इससे पूर?व उन?हे संसार असार लगता था, अब इसमें सार लग रहा हैं पर समय के साथ फिर से असार लगने लगेगा, इसकी गेरेंटी हैं. ?क बार घर गृहस?थी की गाड़ी खिंचने लग जा? बस.
अब आपने जन?म लिया हैं तो आपको भ?ख भी लगेगी और प?यास भी, प?रकृति आपसे प?रेम भी करवायेगी. पर ये सिर?फ भ?ख मिटाने को भोजन करते थे, प?यास ब??ाने को पानी पीते थे, पर प?यार नहीं करते थे. क?यों? क?योंकि प?रेम करना मोक?ष प?राप?ति में सबसे बड़ा बाधक हैं. चाहे दिवार से सर फोड़े, मन ही मन हजार कर?म करे मगर प?रेम ना करे. खैर अपने को क?या यह उनकी सोच हैं, न करे प?रेम. म?द?दा यह हैं की साध?वी मृत?य? का स?वांग रच कर क?यों भागी.
मैंने जैन साधू-साध?वीयों का जीवन काफी नजदीक से देखा हैं. जब दीक?षा ली जाती हैं तब बह?त उत?सव मनाया जाता हैं, जूल?स निकाले जाते हैं फिर बड़ी धूम धाम से दीक?षा दी जाती हैं. दीक?षा के बाद साधू या साध?वी को बह?त सम?मानीत स?थान मिलता हैं. साधू आजीवन स?त?रीयों को तथा साध?वीया? पूरूषो को छू नहीं सकते. यही वह विशेषता हैं जो उन?हे हम संसारी लोगो से ऊचा? स?थान दिलाती हैं. अब हम जैसे आम संसारीयों की तरह वे भी किसी के प?रेम में पड़ जा? यह कौनसा समाज सह सकता हैं, अतः ?सा होने पर समाज में उनका स?थान जितना ऊचा? होता हैं उससे कहीं ज?यादा नीचे गीर जाता है. सबकी अन?मति लेकर सन?यास लिया जाता हैं, पर सबकी अन?मति लेकर फिर से संसारी बनने का प?रावधान नहीं हैं. अब ?से में कोई ग?पच?प भागे नहीं तो क?या करे?
हमारा समाज चमत?कार को नमस?कार करता हैं, चमत?कारों से उसे बह?त लगाव है, इसलि? जाते जाते उस साध?वी ने भी ?क चमत?कार अपने पीछे छोड़ दिया. ?क दिन लोगो ने देखा साध?वीजी अपने कमरे में नहीं है, पर उनके बिछौने पर मानवाकार राख तथा क?छ हड?डीया? पड़ी हैं. लोगो ने सम?ा साध?वीजी तपोबल से सीधे मोक?ष को प?राप?त हो गई हैं. लोग लगे पूजा-पाठ में और कहीं दूर साध?वी लगी घर बसाने में. कमाना करता हू? उन?हे स?खी संसार मिले.
वैसे भी यह अच?छा ह?आ, अब पता चलेगा ?क संसारी अपने जीवन में कैसे कैसे तप करता हैं. वही मोक?ष का सच?चा अधिकारी हैं.













October 19th, 2006 at 6:30 pm
जैसे साध?वी जी के दिन बह?रे, भगवान करे सबके बह?रें.
October 19th, 2006 at 7:27 pm
चाहिये देवत?व पर इस आग को धर दूं कहां पर
कामनाओं को विसर?जित cयोम में कर दूं कहा पर
वह?नि का यह ताप यह उन?माद बोलो कौन लेगा
आग के बदले म??े संतोष बोलो कौन देगा
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मैं त?म?हारे वाण का मारा ह?आ खग
वक?ष पर धर शीश विश?राम करना चाहता हूं
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मैं त?म?हारे रक?त के कण में समा कर
प?रार?थना के गीत गाना चाहता हूं।
– “उर?वशी” से
यही प?रेम है। यह ईश?वर पथ का बाधक नहीं है – ईश?वर तक ले जाने वाला पथ है। स?माधि का मार?ग है। परमात?मा से साक?षात?कार है। मोक?ष है। स?वर?ग है। शून?य है – क?योंकि शून?य से ही उत?पत?ति है और शून?य में ही विलय।
ईश?वर का मार?ग संसार से भाग कर नहीं, संसार से हो कर जाता है – धर?म, अर?थ, काम, मोक?ष।
हिन?दू धर?म में ?क परंपरा है, मंदिर में ईश?वर के दर?शन को जाने से पहले हम मंदिर की परिक?रमा करते हैं फिर भीतर जा कर ईश?वर के दर?शन करते हैं।
खज?राहो के मंदिरों में इन बाहरी दीवारों पर पूर?ण कामसूत?र चित?रित है।
परंपरान?सार जब तक आप मन?दिर की परिक?रमा करते ह?ये, इन प?रणय लिप?त मूर?तियों को नहीं देखते हैं, तब तक आप मंदिर के भीतर जा कर ईशवर को ‘प?राप?त’ नहीं कर सकते।
ईश?वर मार?ग प?रेम या प?रणय मार?ग से होता ह?आ जाता है।
साध?वी जी को ज?ञान प?राप?त ह?आ है। उन?हें बधाई!
October 19th, 2006 at 11:53 pm
प?रेम का कोई विकल?प नहीं है .
October 20th, 2006 at 3:29 am
http://www.jagran.com/news/details.aspx?id=2793649