टीका-टिप?पणी
टिप?पणी के बारे में यह न तो पहली बार लिखा जा रहा है, न ही अंतिम बार. यानी ?क ?सा विषय जिस पर लिखने के लि? आप अभी भी स?वतंत?र हैं. जब और क?छ न मिले तो टिप?पणी पर लिख कर टिप?पणिया? बटोर लो.
बात सही भी है, सागर भाई को यह शिकायत थी की उन?होने बह?त मेहनत से लिखा तो कोई टिप?पणी करने आया ही नहीं और ?क पोस?ट बस यूं ही लिख दी तो टिप?पणियों की बरसात हो गई. हमारा भी यही अन?भव रहा है. बस ?से ही (!) लिखा तो मिली टिप?पणी और बह?त सोच सम? कर लिखा तो उस पोस?ट पर विराना छाया रहा.
पहले-पहल तो हम भी टिप?पणी करने से बचा करते, व?यर?थ के काम में कौन समय बर?बाद करे.. आपका लिखा प? लिया यही क?या कम है. ज?यादा ही हैं तो हीट काउंटर लगा लो. थोड़ी तसल?ली होती रहेगी की आपके चिट?ठे तक कोई आता तो है. साथ ही साथ आपको आपके लेखक होने का भ?रम भी यथावत बना रहेगा. आप लिखते रहेंगे और हिन?दी कि सेवा भी होती रहेगी.
फिर हमारी विचारधारा में थोड़ा परिवर?तन आया. ?क दिन ज?ञानचक?ष? ख?ले तो ज?ञात ह?आ हम अब तक बह?त गलत सोचते रहे, ?क साल खामखा? बिना टिप?पणी किये बर?बाद कर दिया. ह?आ यूं की ?क पोस?ट लिखी थी हमने, सोचा जिस किसी (अपने ही, और नहीं तो क?या) चिट?ठे पर प?रकाशित होगी उसका स?तर जरूर ऊपर उठेगा. लगे हाथ हिन?दी की सेवा भी हो जा?गी. पर यह क?या? हम प?रतिक?रियाओं का इंतजार ही करते रहे और किसी ने ?ांका तक नहीं. हम बेहद हतोत?साहीत ह?? तथा घोर निराशा ने आ घेरा. तब सोचा लिख नहीं सकते तो व?यर?थ में ई-कचरा क?यों फैला?ं. लिखना ही छोड़ देते हैं. फिर चिंतन किया किसी ने टिप?पणी क?यों नहीं की होगी. हम तो हरेक को टिप?पणी करते रहे हैं… हा?, पर शायद नहीं … क?या सचम?च हमने सभी को टिप?पणी की है.. नहीं. बिलक?ल नहीं. फिर कैसे आशा करते हैं कि कोई हमे भी टिप?पणी करेगा. और हमारे ज?ञानचक?ष? ख?ल ग?.
ज?ञान का प?रकाश फैला और हमारी उंगलीया? टिप?पणिया? टंकित करने लगी. श?रूआत में बस यही लिखते रहे
वाह, बह?त खूब.
लगे रहो.
आप तो छा ग?.
पर जल?दी ही उकता ग?. यह भी कोई बात ह?ई, रटी रटाई टिप?पणिया? करते रहो. श?रूआत स?निलजी से की. हमने उन?हे कहा आप फोटो वगेरे अच?छा लेते हो, अब हर बार क?या लिखे वाह बह?त स?न?दर. आज से सही मायने की टिप?पणी करेंगे. हो सकता हैं यह आलोचना भी हो. स?निलजी ?ट से राजी हो ग?. हम भी प?रसन?न ह??.
तो भैये इतनी रामायण का पाठ करने का तात?पर?य यह हैं की टिप?पणी की आशा रखे पर मात?र वाह वाही वाली टिप?पणियों से ख?श होने के लि? नहीं. अपनी आलोचना या न? स??ाव भी ?ेलने के लि? तैयार रहे, टिप?पणीकर?ता के गले न पड़े ?सा क?यों लिखा, वैसा क?यों कहा. यह मैं इसलि? भी लिख रहा हू? की अपन कोई आदी या महाब?लोगर नहीं ह?? हैं जो अंतर?ध?यान हो जा?ंगे और चिट?ठाजगत नई पोस?ट की राह ही देखता रहेगा. समिरलालजी जो भी सम?े या मन ही मन ह?से अपन ?क और वादा करते हैं, टिप?पणिया? करते रहेंगे.













October 31st, 2006 at 10:33 am
सही कहते है संजय जी, वाह-वाह से ज?यादा पोस?ट का विश?लेषण करती टिप?पणियां पढ़ने में मज़ा आता है, चाहे वो अपनी पोस?ट हो या दूसरे की। ब?लागगिंग की यही अच?छाई है कि प?रतिक?रिया त?रन?त मिलती है। उस प?रतिक?रिया पर सकारत?मक या नकारात?मक आचरण ही लेखन में स?धार की दिशा निर?धारित करता है।
October 31st, 2006 at 11:10 am
क?या टिप?पणी लिखूं………………..?
चलो लिख ही देते हैं। सबसे पहली बात कि म??े टिप?पणी ना मिलने से कोई शिकायत नहीं है, मैने तो यूं ही मजाकिया लहजे में समीर लाल जी से शिकायत की कि आपने मेरे चिठ?ठे की चर?चा नहीं कि इसलिये उसे मात?र दो ही टिप?पणीया? मिली!:) ( वैसे यह बात आपको कैसे पता चली?
यार टिप?पणी बह?त लम?बी हो रही है इसे चिठ?ठे पर लिख देता हू?।
October 31st, 2006 at 11:28 am
ब?लाग यानी आपका घर है और टिप?पणी मेहमान है
घर तो आपका है – जैसा भी खाना बनाओ ख?द खाओ – अगर कोई मेहमान (टिप?पणी) आ? तो वो आपकी किस?मत
पहले तो UAE मे बह?त से साइट?स ब?लॉक हैं और हमारे दफ?तर के लोकल नटवर?क मे भी बाकी साइट?स ब?लॉक हैं जिसकी वजह से मैं दूसरों के चि?ट?ठों पर टिप?पणी दे नही सकता खास तौर पर ब?लॉगस?पाट वाले चिट?ठों पर और जैसे समीर लाल जी का चिट?ठा जहां लॉग इन होकर टिप?पणी देनी है
यहां साइबर केफे मे ?क घंटा के Dhs 5 (65 रूपये भारती) हैं – अब आप ही बताओ कि जिन चिट?ठों के लेख दो मीटर से ज़?यादा लम?बे हों तो मैं वहां क?छ ?से ही टिप?पणीयां करता हूं



वाह बह?त खूब
लगे रहो
आप तो छा ग?
बह?त बढिया
वगैरह वगैरह
अब ये सम? मे नही आरहा कि आपके इस लेख पर क?या टिप?पणी लिखूं????????????
?क खामूश विषय पर आपने उंगलियां चलाई हैं – कल तक देखना है कि इस लेख पर बाकी लोगों के क?या विचार हैं
October 31st, 2006 at 12:04 pm
“समीर लालजी जो भी सम?े या मन ही मन ह?से अपन ?क और वादा करते हैं, टिप?पणिया? करते रहेंगे.”
-मन ही मन क?यू?, संजय भाई, हम तो ख?ल कर हंसेंगे, हंसने पर कोई टेक?स थोड़े ही है. और आपको तो ५१ टिप?पणियों वाला वादा भी पूरा करना है, तीन माह में, तो हम निश?चिंत हैं.
October 31st, 2006 at 1:04 pm
अब देखिये ये पोस?ट आपने हास?य विनोद के अंतर?गत की और हम टिप?पणी गंभीर करना चाहते हैं. है न लफ़ड़ा. असल में हम लोग टिप?पणी करने में क?छ संकोची और क?छ आलसी होते हैं. क?छ लोग सोचते हैं कि बाद में आराम से अच?छा कमेंट करेंगे.
क?छ लोग यह भी देखते हैं कि अगले ने कितने कमेंट किये मेरे ब?लाग पर!और भी तमाम बाते हैं लेकिन स?वत:स?फूर?त प?रतिक?रिया आनी चाहिये सब तरफ से.
October 31st, 2006 at 8:57 pm
“वाह, बह?त खूब.
लगे रहो.
आप तो छा ग?.”
October 31st, 2006 at 10:03 pm
टिप?पणी का शोर है देखो चारों ओर,
हर कोई शायद यही कहे होती ?क-आध मोर।
होती ?क-आध मोर, हम भी हाफ संचूरी बनाते,
समीर लाल का रिकार?ड तोड़, नंबर वन कहलाते।।
November 1st, 2006 at 12:38 am
सही बात कही । लिखते रहें टिपियाते रहें । यही ब?लॉग का मज़ा है ।
November 1st, 2006 at 1:29 am
लगता है चिट?ठाकारों को गीता का यह पाठ करते रहना होगा -
कर?मण?येवाधिकारस?ते मा फलेश? कदाचनः
November 1st, 2006 at 10:02 am
कांउटर से पता चलता है कि कितने लोग आपके चिट?ठे पर आ रहें हैं फिर भी टिप?पणी मिलती है तो अच?छा लगता है। लेकिन सच तो यह है कि लिखने में ही आन?नद की अन?भूति करना चाहिये।