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राष्ट्रपति चुनाव का दिलचस्प गणित |
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रोचक तथ्य और जानकारी
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सोमवार , , 04 जून |
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संजय बेंगाणी
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भारत के वर्तमान राष्ट्रपति महामहिम ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का कार्यकाल समाप्ति की ओर है. इसके साथ ही नए राष्ट्रपति को चुनने की कवायत तेज हो गई है. सत्ता पक्ष और विपक्ष की तरफ से कई नाम सामने आ रहे हैं, और लगभग सभी समाचार चैनलों पर विशेषज्ञ इस बात को लेकर उलझे हुए हैं कि देश का अगला राष्ट्रपति किसे बनना चाहिए.
इस बीच यदि आम नागरिकों की बात करें तो सभी सर्वेक्षण यही बताते हैं कि, देश की जनता श्री कलाम को ही फिर से भारत के राष्ट्रपति के रूप में देखना चाहती है.
देश का राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक भी होता है, और सर्वोच्च पद पर आसीन होता है. तो लोकतांत्रिक दृष्टि से देखा जाए तो राष्ट्रपति को चुनने का पहला अधिकार आम जनता का होना चाहिए.
लेकिन भारतीय संसदीय प्रणाली में, जनता को यह अधिकार नहीं है. लेकिन जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि देश के राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं. और इस चुनाव की गणित भी कम दिलचस्प नहीं है.
भारतीय राष्ट्रपति की चुनाव प्रक्रिया वास्तव में किसी अंक-गणित की पहेली से कम नहीं. लेकिन सच यह भी है कि यह प्रक्रिया वास्तव में लगती है उतनी पेचीदा है नहीं, आईये इसे सरलता से समझे.
मगर इससे पहले आइए समझते हैं कि इस प्रकार की परोक्ष चुनाव प्रक्रिया आखिर क्यों अपनाई गई? असामान्य सी लगती इस प्रक्रिया को अपनाने के पीछे क्या कारण रहें होंगे यह देखना भी कम दिलचस्प नहीं है.
हमारे देश का संविधान बनाने वाले विशेषज्ञ, राष्ट्रपति को संविधान का केन्द्र तो बनाना चाहते थे मगर सत्ता का केन्द्र नहीं.
अब अगर देश की जनता सीधे सीधे राष्ट्रपति का चुनाव मतदान द्वारा करती है तो वे सही अर्थों में जनता के प्रतिनिधि हो सकते है, मगर इसमें खतरा यह रहता है की इसी प्रकार के मतदान द्वारा जनता सत्ता की बागडोर भी अपने प्रतिनिधियों को सौपती है. दोनो एक प्रकार की ही प्रक्रिया होने से सत्ता के दो केन्द्र बनने का भ्रम या खतरा बन सकता है. इसलिए राष्ट्रपति का चुनाव सीधे सीधे जनता से करवाना उचित नहीं समझा गया.
दूसरा विकल्प था की संसद सदस्य मतदान कर राष्ट्रपति का चुनाव करे. मगर राज्यों का प्रतिनिधित्व करती राज्यसभा के सदस्यों की संख्या के मुकाबले लोकसभा के सदस्यों की संख्या 57% अधिक है. तथा लोकसभा में सत्तापक्ष को बहुमत होने से वह अपने पसंद के व्यक्ति को चुन सकता है. ऐसे में राष्ट्रपति सत्तापक्ष का प्रतिनिधि होगा न की राज्यों की जनता का.
अतः इन सब से भिन्न प्रक्रिया अपनाई गई, जो किसी पहेली से कम नहीं.
राष्ट्रपति का चुनाव सांसद व प्रत्येक विधान सभाओं के सदस्य मिल कर करते है. जहाँ आम आदमी के मत का मूल्यांकन 1 होता है, वहीं राष्ट्रपति को चुनने वाले सदस्यों के मत का मूल्य कहीं अधिक होता है.
उदाहरण के रूप में गुजरात राज्य को लेकर समझने की कोशिश करते है. 1971 में गुजरात राज्य की जनसंख्या 2,66,97,475 थी. नियमानुसार 1971 की जनसंख्या को ही आधार माना जाता है. इस जनसंख्या के अंक को 1,000 से भाग दिया जाता है. इस प्रकार जो संख्या मिलती है, वह है 26697.475. अब इसे विधानसभा की सीटों से भाग दिया जाता है. गुजरात की विधानसभा में 189 सीटें है. 189 से भाग देने पर जो उत्तर मिलता है वह है 146.689 जिसे पूर्णांक में परिवर्तित करने पर 147 मिलता है. यानी गुजरात के प्रत्येक विधायक के मत का मूल्य हुआ 147, और पूरी विधानसभा के मतों का मूल्य होगा 189*147=26,754.
इसी प्रकार देश की सभी विधान सभाओं के कुल मतों का मूल्य है 5,49,474.
अब लोकसभा व राज्यसभा के सदस्यों के मतों की कीमत कैसे निकाली जाती है वह देखते है.
सभी विधान सभाओं के कुल मतों की कीमत को सांसदों की संख्या से भाग दिया जाता है. यानी 5,49,474 / 776 = 708 (पूर्णांक में). यानी एक सांसद के वोट का मूल्य हुआ 708. सभी सांसदों के मतों का मूल्य हुआ 776*708=5,49,408.
और सभी विधायको तथा सांसदों के मतों का कुल मूल्य हुआ 5,49,474+5,49,408=10,98,882.
तो राष्ट्रपति का चुनाव इन्ही 10,98,882 मतों से होता है.
इस प्रकार से सत्ता पर आसीन दल राष्ट्रपति के चुनाव में अपनी मर्ज़ी तब तक नहीं चला पाता है, जब तक कि अधिसंख्य विधान सभाओं में भी उस दल का राज हो. वैसे देखा जाए तो राष्ट्रपति चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवार का भाग्य बहुत कुछ उत्तरप्रदेश के हाथों में होता है, क्योंकि उत्तरप्रदेश की जनसंख्या देश में सर्वाधिक है, साथ ही वहाँ पर सबसे अधिक विधानसभा सीटें भी है.
इसलिए जिस तरह से दिल्ली की गद्दी उत्तरप्रदेश के निर्भर करती है, उसी तरह से राष्ट्रपति का चुनाव भी बहुत कुछ उत्तरप्रदेश के विधायकों पर निर्भर करता है. जहाँ उत्तरप्रदेश 15.25% मतमुल्य के साथ सबसे ज्यादा प्रभावी है, वहीं 0.04% मतों के साथ सिक्कीम सबसे पीछे है.
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