जब तक एक भी मूर्ख हमारे बीच है
मेरे विचार
सोमवार , , 12 मई
मेरे विचार
manojkumar.jpg मनोज सिंह






सर्वेक्षणों पर विश्वास करें तो पिछले कुछ वर्षों में अर्थिक विकास की दर तेज हुई है, और लोगों के जीवनस्तर में सुधार हो रहा है। यही नहीं इसके साथ-साथ शिक्षा का प्रसार भी तीव्र गति से हुआ है। लेकिन असल में मौज-मस्ती का जमाना है। अच्छे शब्दों में कहें तो व्यावसायिक युग है और चालू भाषा में बोलें तो जीवन अब एक बाजार बन चुका है जिसमें हर एक अपना-अपना धंधा कर रहा है। तो मन में यह सोचकर दुविधा होती है कि असल सच क्या है? क्या यकीनन आदमी का संपूर्ण विकास हो रहा है? कार व मोटर गाड़ियों की बढ़ती संख्या, हर हाथ में मोबाइल, ब्रांडेड कपड़े को देखें तो यह सच है कि समाज ने इन क्षेत्रों में हर स्तर पर प्रगति की है। घर-घर में चल रहे टीवी व उसमें आने वाले कार्यक्रमों को देखें तो यह हमें प्रभावित करते हैं। इन सबके बावजूद कहने वाले लेकिन कह जाते हैं कि ये सब भौतिक पक्ष है, सतही है। समाज में असल परिपक्वता शायद नहीं आयी है। अंतरात्मा से निकलने वाले इन शब्दों से सवाल उपजता है कि ऐसा क्यूं? तो क्या यह सत्य है कि आदमी का विकास मानसिक रूप से, समझ के रूप में नहीं हुआ? शायद, हां। पढ़े-लिखों की संख्या तो जरूर बढ़ी है मगर समझदार शायद कम ही हुए हों। तभी तो एक तरफ फिल्मी हीरो-हीरोइन के झलक मात्र के लिए या फिर दूसरी तरफ किसी धार्मिक बाबा के आने पर लोगों की भीड़ लग जाती है। जबकि दोनों ही विपरीत ध्रुव हैं। दोनों की लोकप्रियता का विकास लगातार हो रहा है। तो फिर क्या वजह है जो ऐसा हो रहा है? क्या कारण है जो शिक्षा के स्तर पर, आर्थिक स्तर पर सुधार होने पर भी लोगों की समझ में अंतर नहीं आ पा रहा है? वैसे ऐसा कहने पर पाठक वर्ग नाराज हो सकता है और लेखक को मानसिक रूप से दिवालिया घोषित कर उसके विरोध में खड़ा हो सकता है। लेकिन फिर सवाल उठता है कि इस विकसित युग में रातों-रात आइटम गर्ल चर्चित क्यों हो जाती हैं? प्रजातंत्र तो प्रजा का शासन होता है। और जब प्रजा के बौद्धिक स्तर में सुधार हो रहा है तो शासन व्यवस्था का हाल दिन-प्रतिदिन क्यूं बिगड़ रहा है? अधार्मिक व अनैतिक काम क्यूं बढ़ रहे हैं? सामाजिक संतुलन क्यूं बिगड़ गया है? जबकि धर्म गुरुओं व उनको सुनने वालों की संख्या तो बढ़ रही है। अब देखिए, ब्रिटनी स्पीयर्स पागलपन की हरकतें अमेरिका में करती है लेकिन दौरे पूर्वी देश में पड़ने लगते हैं। ऐसा तो नहीं होना चाहिए। दर्शनशास्त्री कह सकते हैं कि असल में जो दिखाया जा रहा है वो मृगतृष्णा ही सही लेकिन उसे ही सत्य मानकर आदमी पागल हो रहा है। वो अपने सपनों में डूबा हुआ है और प्रतिबिंबों के सहारे मस्ती करता है। तो यह तो इसी बात को प्रमाणित करता है कि आज के मानव को यथार्थ को समझने की समझ नहीं। तो फिर सवाल एक बार फिर उठता है कि इन अनगिनत गुरुओं का क्या रोल? जवाब दिया जा सकता है कि सपनों से टूट कर गिरने से लगी चोट पर मलहम लगाने लोग तुरंत इनकी शरण में पहुंच जाते हैं। अब चूंकि सपनों के संसार में पहुंचने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है तो गिरने वालों की संख्या भी उतनी रफ्तार से ही बढ़ती जा रही है। और फिर गिरते-पड़ते इनको सुनने और पागलों की हद तक विश्वास करने वालों की संख्या में बढ़ोतरी होना स्वाभाविक है। ये इस विरोधाभास को भी विश्लेषित करते हैं कि एक तरफ क्रिकेट के तमाशे, नाच-गानों में मारकाट मची हुई है तो दूसरी तरफ किसी भी बाबा के प्रवचन में हजारों से लाखों की भीड़ क्यूं दिखाई देती है। लेकिन फिर इसे क्या कहेंगे कि पूर्व में न तो इतने बाबा थे न ही भक्तों की संख्या, फिर भी लोग धार्मिक थे, कम पढ़े-लिखे मगर ज्यादा मानवीय थे। तो कहीं हमारी शिक्षा पद्धति में दोष तो नहीं? कहा जा सकता है।
उपरोक्त बातों से भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। धर्म व धर्म गुरुओं के प्रसार के बावजूद धार्मिक सहिष्णुता के कम होने पर बुद्धिजीवी वर्ग हैरान है मगर डर के मारे चुप हैं। वास्तविकता में देखा जाए तो किसी भी एक धर्म के बाद दूसरे धर्म की आवश्यकता ही नहीं। क्या किसी भी बाबा ने आज तक कोई नयी बात कही है? जब सभी ने वही बात की है तो फिर रोज नये-नये चेहरे क्यूं? इस बात से इन सबके अस्तित्व पर खुद प्रश्नचिह्न लग जाता है। क्या आपने कभी किसी महान धार्मिक गुरु को किसी दूसरे समकालीन धार्मिक गुरु की सभा में जाते हुए देखा है? सवाल ही नहीं।
अब सिर्फ धर्म ही क्यूं, प्रकृति को ही देख लें। यह तो मनुष्य के अस्तित्व से जुड़ा है। लेकिन हम सब जानते हैं, पढ़ते हैं और समझते भी हैं कि मनुष्य प्रकृति का आज की तारीख में सबसे बड़ा दुश्मन बन बैठा है। और तो और पूर्व से कहीं अधिक तीव्रता से इस बर्बादी को विकास का नाम देकर प्रकृति का दोहन कर रहा है। रोज सैकड़ों-हजारों मकान, हरेक के पास कार, खरीदने और बेचने वाले लोगों की कतार लगी है। क्या कोई भी रुकने को तैयार है? नहीं। उलटे इसे ही विकास का पैमाना घोषित कर दिया गया। हजारों लाखों की तादाद में रोज बढ़ने वाले मोबाइलों की संख्या, क्या इनके तरंगों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता होगा? जरूर पड़ता होगा। लेकिन हमने इसे न केवल विकास की पहचान दे दी बल्कि बड़ी चतुराई से इसे आवश्यक वस्तु तक बना डाला।
असल में देखें तो आदमी का नहीं बाजार का विकास हुआ है। बाजार को निमंत्रण करने वाली शक्तियों का विकास हुआ है। पहले अस्त्र और शस्त्र के द्वारा राजा शासन करता था। भूमि पर कब्जा करता था। आज अर्थ व पैसों के द्वारा व्यवसायी शासन कर रहे हैं। बिना जमीन पर कब्जा किए हुए इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने कई राष्ट्रों को अपने नियंत्रण में कर रखा है। ये आधुनिक साम्राज्यवादी हैं। जो अपने विस्तार के लिए सभी हथकंडे अपनाने को तैयार हैं। खरीदने वाला यह समझ नहीं पा रहा कि उसकी एक छोटी-सी राशि से ही सही, इन छोटे-छोटे उत्पादों ने ही कई बड़े रईस उद्योगपति पैदा कर दिए। सौ-सौ रुपए के मोबाइल में से ही पचास-पचास रुपए इकट्ठा करके कई अरबपति बन गए। आज का व्यवसायी अधिक से अधिक ग्राहक बनाना चाहता है। यह ठीक उसी तरह है जिस तरह से पहले राजा सभी से टैक्स वसूला करता था। फर्क सिर्फ इतना है कि आज के राजा फुसलाकर लोगों से वसूलते है। ग्राहक को दिल-दिमाग से मोहित कर मजबूर कर दिया जाता है। अन्यथा एक रिक्शाचालक इन्हीं सौ रुपयों से चार वक्त का खाना भी खा सकता था। उसके लिए मोबाइल के रिचार्ज कूपन और फिल्म व क्रिकेट की टिकट से अधिक शरीर की भूख महत्वपूर्ण है। मगर इन चीजों पर अधिक बल दिया जाने लगा। क्या पहले लोग जिंदा नहीं थे या उनके कार्य नहीं होते थे? होते थे। मगर आज उसके सोचने-समझने की शक्ति पर किसी और का नियंत्रण है। वो स्वतंत्र रूप से सोच नहीं पा रहा।
ऊपर दिए गए उदाहरण काफी हैं यह सिद्ध करने के लिए कि हम कितने समझदार हैं, कितने विकसित हैं। आज नागरिक प्रजातंत्र के नाम पर मूर्ख बन रहा है तो खरीदार विज्ञापनों के माध्यम से। प्रजातंत्र की बड़ाई तो की जाती है मगर दबी जुबान से सब कहते हैं कि यह भीड़तंत्र है। क्या प्रजातंत्र में प्रजा की असल भलाई का काम किया जा सकता है? नहीं। जब तक जनता खुद न चाहे तब तक सब व्यर्थ है। असल में जो वो चाहती है वही देना पड़ता है। और इतिहास ही नहीं हमारा वर्तमान गवाह है कि हम छोटी-छोटी बातों में उलझकर व्यक्तिगत स्वार्थों से आगे नहीं जा पाते। और इसीलिए समाज के वृहत परिप्रेक्ष्य में अच्छाई की राह को नहीं चुना जा पाता।
ध्यान से समझें तो उपरोक्त सभी परेशानियों के जड़ में एक छोटा-सा कारण है कि आदमी के गुण-अवगुण उसके साथ आज भी बड़ी मजबूती से जुड़े हैं। होशियार के साथ मूर्खों की कमी नहीं और वे सदैव रहेंगे। और जब तक एक भी मूर्ख उपस्थित है तब तक उपरोक्त परिस्थितियां बनती रहेगी। शासन करने वाले पैदा होते रहेंगे। बस उनके नाम बदलते रहेंगे। चेहरे बदलते रहेंगे। शिकार व शिकारी का स्वरूप जरूर बदल सकता है। अगर हमें वास्तविकता में उन्नत होना है तो इन्हीं कमजोरियों को कम करना होगा।
***
मनोज सिंह
425/3, सेक्टर 30-ए, चंडीगढ़।
www.manojsingh.com


 

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