Saturday, May 20, 2006

एक अच्छी ख़बर

आज सुबह गुजराती समाचारपत्र दिव्य भास्कर में एक अच्छी ख़बर पढने को मिली.

ख़बर थी दो बलात्कारीयों को 12 साल की सज़ा होने की. अब यह ख़बर आज के दौर में सामान्य सी लगती है, पर इसमें कुछ असामान्य तथ्य हैं. यह घटना संक्षिप्त में इस तरह से है:

अगस्त 2004 में दो युवकों ने एक मुक बधीर तथा मानसिक रूप से विकलांग महिला के साथ बलात्कार किया. युवती उस समय लोगों को कुछ भी बताने में असमर्थ रही. घटना के पाँच महिनों बाद जब उस युवती के अभीभावकों को पता चला कि वो गर्भवती है तो वो उसे पागलखाने छोड आये. वँहा उसकी हालत और ख़राब हुई तो संचालकों ने पुलिस बुलाई. पुलिस इंस्पेक्टर को निरिक्षण के बाद लगा कि युवती के साथ कुछ बुरा हुआ है तो उन्होने खुद ही प्राथमिकी दर्ज कराई तथा अहमदाबाद मुक बधीर शाला के एक अध्यापक की मदद से युवती से बात की. इशारों में युवती ने बताया कि उसके साथ क्या हुआ है. पुलिस उसे घटनास्थल भी ले गई, जँहा युवती ने वो वाहन भी पहचान लिया जिसमें बिठाकर वे दो युवक (वाघेला और लड्डु चौहान) उसे सुनसान जगह लाए थे. पुलिस इस तरह दोनों आरोपियों तक पहुँची.

अदालत में युवती ने एक महिला वकिल के दुपट्टे को जमीन पर बिछाकर बताया कि उसके साथ क्या हुआ था, तथा आरोपीयों की तरफ इशारा भी किया.

जाँच से पता चला कि युवती गीरीश वाघेला नाम के युवक से गर्भवती थी.

कहानी में मोड तब आया जब वाघेला के घरवालों तथा युवती के माँ बाप ने अदालत के बाहर समझोता कर लिया और वो लडका युवती से विवाह करने को राजी हो गया.

पर न्यायाधीश सोनियाबेन ने यह दलील अस्विकार कर दी तथा दोनों युवकों को 12 साल कैद की सज़ा सुना दी. उन्होनें कहा कि इस तरह से केस को बन्द कर देने से लोगों को न्यायतंत्र से विश्वास उठ जाएगा. बलात्कार करके शादी रचा लेना पाप को ढकना नही हो सकता.

यह ख़बर असामान्य है क्योंकि:

  • एक मुक बधीर एवँ मानसिक रूप से विकलांग युवती के इशारों को मान्य रखा गया.
  • DNA टेस्ट कराके सुनिश्चीत किया गया कि गर्भ किसका है
  • अदालत के बाहर समझौता होने के बावजुद आरोपीयों को सज़ा हुई


3 Comments:

Udan Tashtari said...

यह वाकई न्यायतंत्र मे विश्वास की पुर्नस्थापना की दिशा मे अच्छी खबर है.अन्यथा तो फ़ंस गये तो शादी कर बच गये कि तर्ज पर इस तरह की घटनाओं की बाढ आ जायेगी.

11:42 PM, May 20, 2006  
संजय बेंगाणी said...

यह भुतकाल में न्यायालय द्वारा दिये गये फैसलो को सुधारने जैसा हैं. पहले कई बलात्कारीयों कि शादी हमारा न्यायालय करवा चुका हैं.
हर्ष कि बात यह हैं कि एक मुक-बधीर को इंसान माना गया.

10:40 AM, May 21, 2006  
रजनीश मंगला said...

बहुत अच्छी खबर है।

4:27 PM, May 22, 2006  

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