Tuesday, June 27, 2006

ये हमारे पथ प्रदर्शक पंथ


पथ प्रदर्शक पंथ. जो हमें जीने की राह दिखाते हैं. हमें जीवन का मूल्य समझाते है. और अपना व्यापार चलाते हैं.



भारत में धर्मों की कमी नही है. ढेर सारे धर्म. और उनसे ज्यादा पंथ या सम्प्रदाय या गुट जो भी समझ लिजीए. कोई आशाराम बापु के पीछे पागल है, कोई इस्कोन के, कोई श्री श्री रविशंकर की सुदर्शन क्रिया का लाभार्थी है, कोई ब्रह्माकुमारीज का अनुयायी, कोई फलाँ बाबा का चेला कोई ढींकला बहन का सेवक. कोई कमी नहीं. 120 करोड लोगों का देश, अभी तो कई और पंथ शुरू किए जा सकते हैं. भक्तों की कोई कमी नहीं.

कोई एक नई चीज सोचने की जरूरत है. व्यापार के नियम भी तो यही कहते हैं. सफल होना है आज के स्पर्धात्मक माहौल में तो आपकी प्रोडक्ट कुछ अलग होनी चाहिए.

उदाहरण देखिए:
  • ये सीधा स्वर्ग पहुँचाते है. आबु में मैं ब्रह्माकुमारीज के केन्द्र में गया था. वहाँ एक स्वयंसेवक अवतरीत हुआ. मुस्कुराता हुआ, हँसता हुआ. मैने सोचा यह भाईसाहब बिना बात क्यों हँस रहे हैं. बात में ज्ञात हुआ, ब्रह्माकुमारीज वाले गुस्सा नही करते. चाहे कुछ भी कह लो. मैने सोचा चलो प्रयोग के तौर पर कुछ अगडम बगडम बोल कर देखुं, पर हिम्मत नही हुई. पर एक टोपीवाला हिरो टाईप लडका थोडा ज्यादा अवारा किस्म का था. थोडी दूर खडी लडकीयों (पढें बहनों) को टुकुर टुकुर ताक कर कुछ बकने लगा. स्वयंसेवक बोला, "ऐसे ना करें". मवाली बोला "आप अपना काम करें". मुझे लगा झगडा होने वाला है. पर स्वयंसेवक तो हँसते हुए बोला "आप निकल जाएँ". मवाली तो यही चाहता था.

    खैर, फिर स्वयंसेवक ने हमें समझाया कि दुनिया खत्म होने वाली है. मुझे उसमे नास्त्रेदमस दिखाई दिया. वो बोला, आप गुस्सा छोड दें, बडों की सेवा करें.. जब प्रलय आएगी तो कुछ लोग ही बच पाएंगे जो स्वर्ग में जाएंगे. ये स्वर्ग और कहीं नहीं धरती पर ही होगा. कलयुग खत्म होगा. नया युग आएगा.

    मेरी पत्नी बहुत प्रभावित हुई. मैने उसे दिखाया कि मैं भी प्रभावित हो रहा हुँ. पर मैं वहाँ लगी पेंटींग देख रहा था. ब्रह्माकुमारीज के दिवंगत प्रमुखश्री हर रूप में मौजुद थे. शिवजी के रूप में, विष्णु के रूप में... माफ किजीए पर बडे हास्यास्पद लग रहे थे.

    लेकिन उनका व्यापार अच्छा चल रहा है. हज़ारों अनुयायी हैं. कुछ दिन पहले मेरी ऑफिस की बिल्डींग में कुछ स्वयंसेविकाएँ आई. किसी के घर आ रही होंगी. वो सिढीयों से उपर चढ रही थी, मै नीचे उतर रहा था. हमेंशा की तरह मेरी धून में. बस एक स्वयंसेविका से जरा सा छुकर निकल गया. उसने बडी ही हेय दृष्टि से मुझे देखा. मैने सोचा माफी मांग लूं (हालाँकि जानबुझ कर तो नहीं टकराया था), पर फिर सोचा ये लोग तो गुस्सा नहीं करते ना! पर उसे बडा गुस्सा आ रहा था मुझपर.. और वो हंसी भी नहीं. नहीं.. मेरी पहचानने में भूल भी नही हुई थी. वो थी तो ब्रह्माकुमारीज की सेविका. इन लोगों का एक बेज़ होता है, सूरज वाला. खैर, बिचारी नई होगी. उसे पता नहीं होगा गुस्सा करने से स्वर्ग नहीं मिलता.

जारी......

4 Comments:

Sunil Deepak said...

ब्रह्मकुमारियों के मंदिर में गये तो मुझे बहुत साल हो गये पर यह सच है कि मन में कहीं यह भावना छुपी रहती है कि कोई सच्चा गुरु मिल जाये जिससे इस जीवन में कुछ ऐसा बदलाव आ जाये. कोई पूछे तो बताना मुश्किल है कि क्या ढूँढ रहा हूँ पर खोज चलती रहती है. श्री श्री रविशंकर का नाम बहुत सुना था, उनका बीबीसी की एशियन सर्विस पर लम्बा साक्षात्कार सुना, तो थोड़ी निराशा हुई उनके उत्तर सुन कर. उनका कहना कि उन्होने सुदर्शन क्रिया का पैटेंट इसलिए बनाया ताकि सारा पैसा उनकी फाऊँडेशन का अपना बने तथा उसका अन्य लोग पैसा न कमा सकें, सुन कर लगा मानो किसी व्यापारी की बात हो, न कि कि महात्मा या गुरु की!

5:39 PM, June 27, 2006  
Jagdish Bhatia said...

बाबा लोग अगर व्यापार न करें तो लोग भी बड़ा नहीं मानते। ओशो राम देव से लेकर श्री श्री रविशंकर सब की नजर अमीरों पर ही होती है।

7:11 PM, June 27, 2006  
Ravi Kamdar said...

रविशंकर तो पता नही मुझे क्यों औरत या करण जोहर जेसे लगते है। उनके प्रवचन एकदम घटिया होते है। यह इसलिये अमीरो के गुरु है क्योकि यह इतने नाजुक दिखते है की गरीबो के गुरु नही बन सकते क्योकि गांवो मे जाने के लिये ताकत चाहिये!! खेर इनको हम प्रसिध्धि के भूखे इस लिये कह सकते है क्योकि यह भी अपने आगे श्री श्री लगवाते है!! अब ये केसे गुरु जो अपने भक्तो को इतना भी आदेश ना दे सके की मेरे आगे श्री श्री ना लगाओ!! पहले लोग ओशो के दीवाने थे, विनोद खन्ना की तरह , लेकिन विनोद खन्ना बाद मे ओशो से पक गये और वापस लौट आये। और एक गुरु थे, चंद्रास्वामी, जिन्होने देश को चूना लगाया, साले गद्दार कही के...।

अभी लेटेस्ट मे ये स्वाध्याय परिवार का कांड देख लो। या फिर होमो सेक्सुअल स्वामिनारायण साधु देख लो। हमाम मे सब नंगे है। लेकिन ये नंगे धर्मगुरु राजनेताओ से भी घटिया है क्योकि राजनेता जितना लूंटते है उतना तो ये लोग भी लूंटते है लेकिन ये लोग आगे बढ कर आध्यात्मिक रुप मे भी लूंटते है। अभी जो गुरुजी की असलियत सामने नही आयी है उनके समर्थक बाकी के गुरु को नंगे करके खुश होते है, अरे भाइ, सब्र करो, आपके गुरु भी वेसे ही निकलेंगे!!

मेरे ख्याल से गुरु का चक्कर छोडो सुनिल जी, खुद ही पढ कर ग्यान लो,अगर किसी धर्म गुरु पे विश्वास करके सट्टा लगाया ओर ये स्वाध्याय परिवार की दीदी की तरह वो भी बादमे निकम्मे निकले तो कहा जाओगे, पुण्य तो ठीक है, उल्टा पाप कर बेठोगे!!

2:02 AM, June 28, 2006  
Neeraj said...

हरिशंकर परसाई जी शब्दों में ये टार्च बेचने वाले लोग हैं. जीवन में अंधेरा है कहकर भयादोहन करना कई गुरू-घंटालों का व्यवसाय है. कालांतर में बहुत संत-महात्मा हो चुके हैं. सुझाव है आप झेन कथाएं पढ़ें.. नया अनुभव होगा.

11:31 PM, June 29, 2006  

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