Tuesday, August 15, 2006

बापु आज हम सठिया गए हैं





बापु हमारे धर्मनिरपेक्ष देश में आज,

सिख प्रधान है, मुस्लीम सरदार है।
और एक इंडिइटालीन मेम भी है,
बापु अब हम सठिया गए हैं।

स्टींग ऑपरेशन में दिखते हजारों घोटालें हैं,
पर केमरे के पीछे सब जीजा-साले हैं,
बापु अब हम सठिया गए हैं।

खाने की कोई कमी नहीं पर फिर भी,
राशन छोड खाते घास चारें हैं,
क्या दिल्ली, क्या बम्बई, कुछ याद नही,
उन्हे तो शारजाह दुबई प्यारे है,
बापु अब हम सठिया गए हैं।

रोज मार खाते हैं,
और रोज गाना गाते हैं।
कि कल जो मारा तुने तो, देख लेना,
नही मारेंगे नहीं.. फिर गाना गाएंगे,
कि देख ले नालायक लगी ही नही,
और कितना मारेगा, थक जाएगा,
पर हम मार खाकर नही थकेंगे, क्योंकि 2000 साल से वही तो खाया है।
खाना नही तो यही सही,
बापु हम सठिया गए हैं।

अच्छा हुआ तुम मर गए बापु!
एक बार ही मरे.. नही तो आज रोज रोज मरते!!

लेकिन बापु सिर्फ अन्धेरा नही हैं, कुछेक किरणे भी है।

राजीवभाई कहते थे टेक्नोलोजी लाएंगे
तब हम हंसते थे कम्प्युटर लाएंगे
आज तो हर जगह वही लगाए बैठे हैं,
कहाँ सोचा था, उसीकी खाएंगे।
बापु अब हम सठिया गए हैं।

एक उपग्रह गिर गया तो क्या, कल हम चाँद पर भी जाएंगे,
रोज गिरते हैं, रोज सम्भलते हैं,
पुरानी बातें क्या याद करें, गीत नया अब गाएंगे।

बापु मत सोचना हम वैसे ही सठियाए हैं, उम्र से थोडे ही बुढे होते हैं।
कर्मो से होते हैं, मन से होते हैं।
हम तो अभी जवान हैं।

3 Comments:

Jagdish Bhatia said...

वाह पंकज भाई दिल को छू लिया। मन भर गया पढ़ कर।

6:16 AM, August 16, 2006  
Udan Tashtari said...

'बापु मत सोचना हम वैसे ही सठियाए हैं, उम्र से थोडे ही बुढे होते हैं।
कर्मो से होते हैं, मन से होते हैं।
हम तो अभी जवान हैं।'
--:) ठीक कहा.

समीर

7:17 AM, August 16, 2006  
रजनीश मंगला said...

बहुत सही लिखेले हो। इश्को अपनी मुफ़्त बंटने वाली इस छोटी सी पत्रिका में डालेला हूँ। आसा है कोई आपत्ती नहीं होगी।

2:53 AM, September 10, 2006  

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