Friday, September 08, 2006

अहमदाबाद के मुसलमान और वन्दे मातरम का गान

कल वन्दे मातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्विकृत करने के सो साल पुरे हुए थे और पुरे देश में इसे पुरी आत्मीयता के साथ गाया गया था।

जहाँ कोंग्रेस शासित प्रदेशों में इसे गाना वैकल्पिक था, वहीं भाजपा शासित प्रदेशों मे अनिवार्य था। मिडिया और लोगों के आश्चर्य के बीच इस बार नरेंद्र मोदी की तरफ से कोई बयान नहीं आया। वैसे भी वो मुँह बन्द ही रखते हैं! लेकिन अविश्वसनीय बात यह थी कि गुजरात के सभी स्कुलों तथा मदरसों में केन्द्र सरकार का ही नोटीस दिया गया जिसमें वन्दे मातरम का गान करने की बात थी, अगर चाहें तो!!

आखिर कल यहाँ हुआ क्या?

लगभग सभी मदरसो तथा अल्पसंख्क (हालाँकि मैं मुस्लीमों को अब अल्पसंख्यक नहीं मानता) मुस्लीमों की विद्यालयों में वन्दे मातरम गाया गया। कोई विरोध नहीं!!

विद्यालयों की तो छोडिए.. जुहापुरा जो भारत की सबसे बडी मुस्लीम बस्ती है, वहाँ भी सैंकडों लोगों ने जमा होकर वन्दे मातरम गाया।

आम मुस्लीम लोगों के कुछ बयान देखिए:

"हम दिखाना चाहते हैं कि हम वन्दे मातरम गा सकते हैं, मुसलमान कम राष्ट्रभक्त नहीं हैं"

"इस तरह का जब भी कुछ होता है, हम उलझन में फँस जाते हैं। यदि विरोध करें तो गद्दार हो जाते हैं और विरोध ना करें तो फतवे बीच में आ जाते हैं।"

"मैं जानता हुँ कि फतवे इस समस्या की जड हैं। कुछ हिन्दुवादी ताकतें भी मौलिवीयों को उकसाती है"

"मैं जब विद्यार्थी था तब इसे गाता था, आज अपने विद्यार्थीयों को गवा रहा हुँ। कुछ धार्मिक नेता विरोध करते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि हम गाएँ ही नहीं"

"हमारे माँ बाप ने हमेंशा हमें इसे गाने के लिए प्रोत्साहित किया है"


अंजुमन ए इस्लाम विद्यालय में वन्दे मातरम गाते छात्र

जुहापुरा (अहमदाबाद) में वन्दे मातरम गाते आम लोग

कल कोंग्रेस की सभा में वन्दे मातरम गाने के लिए ना तो मनमोहन सिंह मौजुद थे ना मेडम सोनिया गान्धी। नहीं उनकी देशभक्ति पर सवाल नहीं उठा रहा। भई बडे लोग हैं, कितना काम होता है। वन्दे मातरम गाया ना गाया क्या फर्क पडता है? वैसे इन नेताओं को यह गाना कितना याद है यह मैं कल समाचार चैनलों में देख चुका हुँ।
दुसरी बात - कल नरेन्द्र मोदी और उनकी केबिनेट ने तथा अधिकारीयों ने (जिनमें मुस्लीम भी थे) सम्पूर्ण वन्दे मातरम गाया था। गौर करें - सम्पूर्ण!!

6 Comments:

अनुनाद सिंह said...

धिक्कार है उन लोगों पर जिन्होने एक कुटिल विदेशी को भारत के भविष्य के साथ खेलने के लिये चुन रखा है। इतना जल्दी अपने गुलामी की कहानी भूल गये?

3:18 PM, September 08, 2006  
neerajdiwan said...

|||कल वन्दे मातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्विकृत करने के सो साल पुरे हुए थे और पुरे देश में इसे पुरी आत्मीयता के साथ गाया गया था।'|||


१८७६ में यह गीत लिखा गया था.. १९०५ में सात सितम्बर को कॉग्रेस अधिवेशन ने इसे स्वीकार किया.. किस हिसाब से राष्ट्र के इस गीत को सौ साल पूरे हुए. क्या मेरा हिसाब ग़लत है या मीडिया वालों का? या इतिहासकार आड़ा-टेड़ा कर रहे हैं. विकीपीडिया और बीबीसी पर भी नज़र डालें.

3:56 PM, September 08, 2006  
unmukt said...

विवाद तो कुछ लोग अपने फायदे के लिये शुरु करते हैं।

4:20 PM, September 08, 2006  
Udan Tashtari said...

मेरे व्यक्तिगत नजरिये से यह एक सियासी मामला है. बात देश भक्ति की भावना की है, तो क्या वह सिर्फ़ गीत गाने या न गाने से ही प्रदर्शीत होती है?

6:12 PM, September 08, 2006  
Pankaj Bengani said...

अनुनादजी, सोनिया जैसी भी हों अब कानुनी रूप से भारतीय है।

नीरजबाबु मैं आपसे सहमत हुँ। पर अधिकारीक तौर पर यही कहा जा रहा है।

समीरजी, एक गाना गाने या ना गाने से देशभक्ति व्यक्त नहीं होती, सच है, पर ना गाने की बेतुकी वजह क्यों?

कल को कहेंगे तीरंगा मंजूर नहीं, अशोक चक्र मंजूर नहीं। अनुशासन तो होना चाहिए ना!!

6:19 PM, September 08, 2006  
Sagar Chand Nahar said...

पंकज भाई कानूनन भले ही मैडम भारतीय हों परन्तु देश में नेताओं का अकाल नहीं पड़ा है कि हमें नेता आयात करने पड़े।
धिक्कार है उन नेताओं से जो उनके तलुए चाटते फ़िरते हैं, जिन्हें वन्दे मातरम गाने का समय नहीं मिला!
कौन देश भक्त है और कौन नहीं यह आपका चिट्ठा ही साबित कर देता है।

8:22 PM, September 08, 2006  

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