Friday, February 23, 2007

मुझे हिन्दु होना पसन्द नहीं!

दृश्य 1
सूरत के मुस्लीम बहुत मौहल्ले में रहने वाला बच्चा, अपने जिगरी दोस्त इमरान को देख रहा है. आज वो इतना उदास क्यों है?
बच्चा: क्या हुआ?
इमरान: पाकिस्तान हार गया.
बच्चा: हाँ लेकिन इंडिया कल जीत गई. सचीन को देखा?
इमरान: तो क्या?
बच्चा: तो क्या मतलब? तु खुश नहीं?
इमरान: हमारा मुल्क पाकिस्तान है!
बच्चा: किसने बोला?
इमरान: मौलवी साहब ने. (इमरान मदरसे में भी जाता था) वो कहते हैं हमारा मुल्क पाकिस्तान है।
बच्चे को अब गुस्सा आ रहा होता है, वो कहता है: तो यहाँ क्यों हो?
इमरान जवाब नहीं दे पाता, थोडी देर बात बोलता है: पता नहीं, अबु जाने? शायद कमाने के लिए!!
हर शाम को बच्चा अपने दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने मोहल्ले के बीचों बीच स्थित मैदान में जाता है। वो बेहतरीन स्पीन बोलर है और अपने तमाम मुस्लीम दोस्तों के बीच अकेला जैन. बाकि दो और हिन्दु भी हैं।
बेटिंग करने वाला मुन्ना है। मुन्ना सबसे सम्पन्न मुस्लीम परिवार की बिगडेल औलाद है। अचानक वो बेट लहराता हुआ चिखता है: अल्लाह ओ अकबर!
पास की छत से आवाज आती है, "बस जीतने ही वाले हैं मुन्नाभाई, वसीम भाई ने छक्का मारा है"
मुन्ना खुशी से बेट लहराता है: पाकिस्तान..... पास की छत से आवाज़ आती है: जिन्दाबाद!
-------------
आज पाकिस्तान वर्ल्ड कप जीत गया है, बच्चा टीवी पर देखता है, वसीम अकरम कैसे हारा हुआ मैच जीता देता है। तभी उसे पटाखों का शोर सुनाई देता है, बच्चा बाल्कनी से नीचे देखता है, उसका दोस्त इमरान खुशी से झूम रहा है।
======================================
दृश्य 2
आज बकरीद है। माँ सुबह सुबह ही खिडकी दरवाजे बन्द कर लेती है। उन्हे गोश्त की बदबु (महक) सहन नहीं होती।
कल बच्चा और उसकी छोटी बहन बाल्कनी में खडे हुए थे और नीचे गली में घुमते बकरों को देख रहे थे. कल ये सब कटने वाले हैं!
एक लंगडे बकरे को देखकर उसकी छोटी बहन जोर जोर से हंसती है, ये तो गफूर मियाँ का होगा!
आज बच्चे का स्कूल बन्द है, वह इमरान के साथ खेलने को उत्सुक है, पर वो देर से आएगा, और आकर बडाई झाडेगा कि उसे कितनी ईदी मिली है और उसने कितना गोश्त खाया है।
तभी उसकी छोटी बहन दौडती हुई घर में आती है, उसका चेहरा सफेद हो चुका है।
बच्चा माँ से लिपटी हुई अपनी बहन से पुछता है: क्या हुआ? कहाँ थी तुम?
बच्ची: छत पर!
माँ: क्या जरूरत थी, छत पर जाने की?
बच्ची: खेल रही थी, माँ.... सामने वाली मौसी की छत पर बकरा काट रहे हैं.
माँ आगे सुन नहीं सकती, वो चली जाती हैं, बच्चा उससे पुछता है: किसका बकरा?
बच्ची: पता नहीं, इमरान ने बकरे के पाँव पकड रखे थे... वो कितना फड फड कर रहा था बकरा. वो अफसाँ ताली बजा रही थी...
बच्ची उस दिन दोपहर का खाना नहीं खाती, उसे उबकाइयाँ आती है।
======================================

दृश्य 3
मुन्ना (आसीफ) मेमण के घरवाले बहुत अमीर हैं। वे लोग जितने सम्पन्न हैं, उतने ही उज्जड भी हैं।
गली में खेलते हुए बच्चे की गेन्द उनके घर में चली जाती है। उसके दोस्तों मे हिम्मत नहीं कि वे लोग जाकर गेन्द ले आएँ. हिम्मत तो बच्चे में भी नहीं पर उसको तो जाना पडेगा क्योंकि गेन्द आखिर उसीकी है, और वो आज गेन्द नहीं लाएगा तो कल माँ उसे नई गेन्द नहीं दिलाने वाली.
बच्चा मुन्ना के बंगले के गेट के आगे खडा हो जाता है। मुन्ना की माँ बाहर आती है और पुछती है: क्या हुआ?
बच्चा: मेरी बॉल...
मुन्ना की माँ इधर उधर देखती है, फिर कुटील मुस्कान लिए कहती है: पहले अपना पायजामा खोल के जा फिर बॉल ले जा.
बच्चा कुछ नहीं बोलता, चुपचाप खडा रहता है।
अन्दर से आवाज़ आती है, कौन है शायरा?
मुन्ना की माँ कहती है: वो हंसराजजी का बेटा.
मुन्ना के पिता की आवाज आती है: उसको बोल अपनी चोटी काट के जा, फिर ले जा..
अन्दर से ठहाकों की आवाज आती है...बच्चा वापस लौट जाता है, जाते जाते सोचता है, उसके चोटी तो है ही नहीं. उसे एक बार उनके बंगले के दिवानखाने में नजरें घुमा लेने का भी सौभाग्य प्राप्त होता है, वहाँ दिवार पर बेनजीर भुट्टो की तस्वीर लगी है।
======================================

दृश्य 4

बच्चे ने अपने दोस्त इमरान से नमाज पढना और उसका मतलब सीख लिया है. रात को सोते समय वो हनुमान चालीसा के साथ साथ दो तीन आयतें भी पढ लेता है, और अपनी छोटी बहन को इम्प्रेस करने के लिए नमाज पढने का स्वांग भी करता है.
मौहल्ले की मस्जीद के आगे खडे होकर वो नमाजीयों को देखता है, सब एक साथ बैठते हैं और एक साथ खडे होते हैं, वो सोचता है काश हिन्दु भी ऐसी ही पुजा करते।
वो मस्जीद में जाना चाहता है, पर गफूर मियाँ उसे उसके हिन्दु होने का अहसास दिलाते हैं: हिन्दु मस्जीद में नहीं जाते।
बच्चा घर आकर माँ से पुछता है, हम आखिर हैं कौन?
माँ कहती हैं, हम जैन हैं; पिताजी कहते हैं, हम हिन्दु हैं; बच्चा सोचता है, आखिर हम "कुछ" हैं ही क्यों??
======================================

दृश्य 5

बाबरी का ढांचा गिरा दिया गया है. सूरत शहर दंगो की लपटों में जल रहा है। बच्चा मुस्लीम बहुल मौहल्ले में रहता है।

उसका परिवार शहर छोडकर जाना चाहता है, उसके पिता डरते हैं। बसो और ट्रेनों से लोगों को उतारकर जलाया जा रहा है।

एक तरह से उनका परिवार सुरक्षित है। वे लोग जिस अपार्टमेंट में रहते हैं वो मुसलमान का है, और रहने वाले सभी हिन्दु हैं, इसलिए हिन्दु और मुसलमान दोनों उसे नहीं जलाएंगे.

बच्चे के पिता उसे अखबार नहीं पढने देते, पर वो चोरी छिपे पढ लेता है। गुजराती अखबारों का धन्धा जोरों पर है, वे एक सम्प्रदाय और दुसरा सम्प्रदाय ऐसे नहीं लिखते. वे सिधे सिधे लिखते हैं इतने हिन्दु और इतने मुसलमान। कल पास के पांडेसरा इलाके में मुसलमानों के टोले ने मजदूर हिन्दुओं के घरों को जला दिया था और महिलाओं के साथ... .... बच्चा अखबार बन्द कर देता है।

वे लोग रात को सो नहीं पाते, लोगों की चीखें सुनाई देती हैं। कई दमकल की आवाजें, पुलिस के सायरन सुनाई देते हैं। बच्चा गली में देखता है, कर्फ्यु लगा है, सेना का फ्लेग मार्च होने वाला है।

रात को वो जागा हुआ है, उसे डर लग रहा है। इतना डर की उसे हनुमान चालीसा भी याद नहीं आ रहा!

इतने में उसकी छोटी बहन चीख के साथ जाग जाती है। वो बुरी तरह से डरी हुई है।
बच्चा पुछता है: क्या हुआ?

बच्ची: वो मुझे मार डालेंगे.

बच्चा: कौन?

बच्ची: इमरान.. .. वो लोग.... मुझे बहुत डर लग रहा है भैया... अफसाँ ताली बजा रही थी... भैया....

वो बच्चे से लिपट जाती है, बच्चा थर थर काँपता है और जार जार रोता है। वो अपने बडे भाई को याद करता है, जो असम में रहते हैं।

======================================


  • उपर लिखे सारे दृश्य वास्तविक हैं, थोडा भी काल्पनिक नहीं है।
  • वो बच्चा और कोई नहीं "मैं" खुद हुँ।
  • उसकी छोटी बहन खुशी है, जिसे आप तरकश पोडकास्ट पर सुनते हैं।
  • इमरान आजकल भरूच के पास अंकेलेश्वर में रहता है, और इलेक्ट्रोनिक्स की दुकान चलाता है। उसे शायद अब अपने भारतीय होने का अहसास हो गया है। मैने उससे बरसों पहले बोलचाल बन्द कर दी थी।
  • मैं खुद को हिन्दु नहीं मानता, मुझे हिन्दु कहलवाना ही पसन्द नहीं है। अगर हुडदंग मचाते बजरंगी, गंगा को अपवित्र करते नंग धडंग पंडे, अघोरी, देवदासी प्रथा चलाने वाले, ऊँच नीच में मानने वाले हिन्दु हैं तो मुझे हिन्दु पसन्द नहीं हैं।
  • अगर हर आधे घंटे में फतवे निकालने वाले, मदरसों मे जहर उगलने वाले मौलवी, औरतों के मुँह पर कोडे मारते तालिबानी, लोगों का जीना हराम करने वाले कट्टरपंथी मुसलमान हैं तो मुझे मुसलमान भी पसन्द नहीं है।

  • मैं भारतीय हुँ जैसे शुएब भारतीय है। मैं खुश हुँ। बस!!

यह मानना (http://mohalla.blogspot.com/2007/02/blog-post_22.html) कि अत्याचार सिर्फ अल्पसंख्यकों में बहुसंख्यक मुसलमानों के साथ होता है, गलत है।

20 Comments:

धुरविरोधी said...

गणपति बप्पा मोरिया.
जिन्दा था जब एक भिखारी तरसा रोटी खाने को
मरा, बढे कुछ उसे जलाने, कुछ आये दफ़नाने को
दंगा भडका खूब चले लाठी बल्लम घनघोरिया.
गणपति बप्पा मोरिया.

कितना दुर्बल धर्म हमारा एक पशु गन्दा कर जाता
और एक पशु की खातिर ही भारत आपस में लड जाता
इससे तो मैं भला नास्तिक चादर ताने सो रिया
गणपति बप्पा मोरिया.

12:11 PM, February 23, 2007  
संजय बेंगाणी said...

मंतव्य का अब तक का सर्वोत्तम लेख.
पढ़ते समय आँखे भर आयी.
दुष्टो को सार्थक जवाब की देश से बड़ा धर्म नहीं हो सकता, शिकायत करने से पहले अपने गिरबान में झांक लेना चाहिए.

12:31 PM, February 23, 2007  
अभिनव said...

आपके अनुभव पढ़कर अनुभव हुआ कि बाल मन पर जो चित्र अंकित हो जाते हैं वे हमारा साथ बहुत दूर तक देते हैं। आपने जितनी ईमानदारी से इन बातों को सामने रखा है उससे आशा जगी है कि और भी लोग अपने वास्तविक अनुभव सामने लाएँगे तथा हम इस सामाजिक जटिलता के नए आयामों से परिचित हो सकेंगे। मेरे भी कुछ अनुभव हैं, कुछ बहुत अच्छे भी और कुछ बहुत बुरे भी किसी दिन फुरसत से लिखेंगे।
एक बात है कि बड़ा सरल है भावनाओं में बह कर किसी एक पक्ष के साथ हो लेना। पर जो रास्ता सही है वो शायद कहीं से भी कट्टरता के पक्ष का नहीं है। और अच्छा या बुरा होना व्यक्ति का अपना व्यक्तिगत चुनाव है। अपनी एक पुरानी ग़ज़ल के कुछ शेर याद आ रहे हैं,

साथ मिल कर के अगर घर को सजाया होता,
सबसे सुन्दर यही आंगन नज़र आया होता,
हम मोहब्बत के समन्दर कई लुटा देते,
तुमने इक बार हमें अपना बनाया होता।


इस आशा के साथ कि ये कट्टरता की डायन हमारी धरती को छोड़ कर व्योम में विलीन हो जाएगी,

आपका
अभिनव

1:05 PM, February 23, 2007  
Pratyaksha said...

बहुत बहुत अच्छा लिखा !

1:55 PM, February 23, 2007  
rachana said...

पंकज भाई, आपने अपने अहसास लिखे..मुझे कई लोग याद आ रहे हैं...चचा, शकूर मियाँ, मिर्जा सर, खान साहब .... कभी लिखूँगी सबके बारे मे..आपने क्रिकेट की बात की तो...
एक दिन मैने भारत और पाकिस्तान के मैच के बाद शरारत से शकूर चचा से कहा- आप तो आज बहुत खुश होंगे आज तो पाकिस्तान जीत गई और चचा का जवाब था- नही बेबी मेरा काहे का ----, मै तो हिन्दूस्तानी हूँ!!
और धुर विरोधी की पन्क्तियाँ बहुत पसँद आईं!

1:57 PM, February 23, 2007  
mahashakti said...

पंकज जी मुझे विश्‍वास नही हो रहा है कि यह आपने लिखा है। पर अन्‍त चार बाते आपके ही लेख होने बात प्रमाणित करती है। आपने प्रराम्‍भ से लेकर अन्‍त तक बाधे रखा, बीच मे कही कही शब्‍दों का भटकाव हुआ किन्‍तु अपने आप मे सर्वश्रेष्‍ठ लेख

2:05 PM, February 23, 2007  
अनुनाद सिंह said...

एक बार ऐसे ही अपने एक मुस्लिम मित्र से मैने बहस के दौरान ताव में आकर कह दिया कि मै इस्लाम को दुनिया का सबसे गैर-सेक्युलर और गैर सह-अस्तित्ववादी मजहब मानता हूँ। जिस दिन इसलाम सभी मतों का आदर करना शुरू कर देगा, उस दिन सचमुच धरती पर स्वर्ग जैसा माहौल आ जायेगा। मेरे मित्र का जवाब भी सुनने लायक था - आज दुनिया में जो कुछ हो रहा है वह शायद इसी प्रयत्न का हिस्सा है।

2:17 PM, February 23, 2007  
Shrish said...

वाह पंकज भाई आज जाना कि आप इतने संवेदनशील लेखक भी हो। घटनाएं तो हम में से कईयों के साथ होती हैं लेकिन उन्हें शब्दचित्रों में पिरोना सब के बस की बात नहीं। पोस्ट पढ़ते हुए आंखों के आगे दृश्य उभर रहे थे।

शुरु में ही अंदाजा हो गया था कि वो बच्चा खुद लेखक ही है। खूब जवाब दिया आपने मोहल्ले वालों को।

और जैसा संजय भाई ने कहा, "शिकायत करने से पहले अपने गिरबान में झांक लेना चाहिए."

3:19 PM, February 23, 2007  
Sagar Chand Nahar said...

ये पंक्तियाँ बहुत कुछ कह गयी
बच्चा सोचता है, आखिर हम "कुछ" हैं ही क्यों??
सच है मुझे भी कई बार यह महसूस होता है कि हम कुछ है ही क्यों? क्यों हम इन्सान नहीं है? पर जिस तरह के अनुभव आपके इरफान के और मेरे साथ होते हैं तब मन एक बार फिर से विद्रोह कर देता है कि क्या यह सब मुझ अकेले को सोचना चाहिये?
निदा फ़ाजली सही कहते हैं
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो, यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये

3:22 PM, February 23, 2007  
संजीत त्रिपाठी said...

बचपन की कोरी स्लेट पर जो एक बार लिख जाये वो तमाम उम्र ताज़ा सी लगती है।
मर्मस्पर्शी!!!

5:39 PM, February 23, 2007  
Anonymous said...

पंकज भईया,

आपके पास् यथार्थ के सटीक चित्रण का अद्भुत् कौशल है...
लेकिन जब आपके दृश्यो का पात्र 'वह बच्चा' जैन है तो आप हिन्दू कैसे हो सकते हैं ??? आप एक जगह यह कह्ते है कि 'मैं खुद को हिन्दु नहीं मानता, मुझे हिन्दु कहलवाना ही पसन्द नहीं है। अगर हुडदंग मचाते बजरंगी, गंगा को अपवित्र करते नंग धडंग पंडे, अघोरी, देवदासी प्रथा चलाने वाले, ऊँच नीच में मानने वाले हिन्दु हैं तो मुझे हिन्दु पसन्द नहीं हैं।'
बेहतर हो कि आप स्वयं जैन ही माने या जैन ही ना माने ...वैसे मेरा हिन्दू धर्म बजरंगियों, नागा साधुओं,अघोरियों,देवदासियों, मनुवादियों ( ऊंच- नीच को मानने वालों)से बहुत परे है... इतना परे कि .......
ऐसा नही है कि आप या तमाम टिप्पणीकार हिन्दू या सनातन धर्म की महानता और विराटता से अनभिज्ञ होंगें, लेकिन कुछ विकृतियों, विसंगतियों को ही मान्यताओं का सम्पूर्ण आधार बना कर के किसी भी धर्म की आलोचना या विवेचना ही करने लगना बौध्दिक लफ्फाजी के अतिरिक्त कुछ नही है . एसा करके आप में से प्रत्येक स्वयं को स्वयं के बौध्दिक, उदारमना, स्वस्थ पपरम्परा का समर्थक होने का केवल भ्रामक अहसास ही करा पाता है और कुछ नही... यह स्थिति और बुरी तब हो जाती है जब सभी सुधीजन जैसे हमारे धुरविरोधी भइया जो कि विरोध का ठेका लिये बैठे है,( जो कि चिठ्ठा जगत के rationals के प्रतिनिधि प्रतीत होते हैं ) उस समय चादर तान के सो रिये है जब उन्हे तमाम विसंगतियो, विकृतियों और पूर्वागृहों के बारे में बिना किसी पूर्वागृह ( जो कि लगभग असम्भव है ) के विरोध का धुर मज़बूत करना चाहिये...हां लेकिन साथ ही उन्हें इन तमाम विसंगतियो, विकृतियों और पूर्वागृहों कारणों को भी स्पष्ट करना पड़ेगा...

6:22 PM, February 23, 2007  
गिरिराज जोशी "कविराज" said...

पंकज भाई,

बचपन की यादों का इतना संजीव चित्रण! पढ़ते समय दृश्य उभर आये। आज आपको पढ़कर 7 साल बाद आँख में पानी आया है, ज्यादा कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हूँ।

आपकी लेखनी के इस रूप को नमन।

6:36 PM, February 23, 2007  
राजीव said...

पंकज जी,

संवेदनात्मक लेख जो के विवश कर देता है आपको सोचने पर कि हम क्यों "कुछ" हैं? चलो हम यदि मानते भी रहे हैं अपने "कुछ", तो भी बच्चों को तो उन्हें स्वयं के "कुछ" मानने से बचायें। आखिर हमारे पास से भारतीय और उससे भी ऊपर मानव होने का बिल्ला कहाँ गुम हो गया है?

6:43 PM, February 23, 2007  
SHUAIB said...

पांचवां दृश्य पढ कर मैं रो दिया और शुरू की चार लाईनों से ही पता चल गया कि बच्चा कौन था।
आ मेरे यारः हम हिन्दुस्तानी भाई हैं

6:53 PM, February 23, 2007  
Udan Tashtari said...

पंकज

तुम्हारे संवेदनशील मन से तो पूर्व परिचित हूँ, मगर तुम मन में अंकित भावों को इतनी सहजता से शब्द दे सकते हो, यह आज मालूम चला. बहुत मार्मिक चित्रण से, सच्चाई के साथ बिना किसी लाग लपेट के की गई प्रस्तुति.
काश, सब इसी तरह सोच पाते.

इसे प्रिंट मिडिया में भी छपवाने की कोशिश करो. बहुत सार्थक लेख.

पुनः,तुमने अपने दिल की बात कही है और पूर्ण इमानदारी से. बहुत बधाई.

7:05 PM, February 23, 2007  
रजनी भार्गव said...

आपका लेख बहुत सजीव और मर्मस्पर्शी लगा. आपके लेख से इंसानियत से फ़िर से पहचान हुई. बहुत अच्छा लगा.

10:06 PM, February 23, 2007  
Manoshi Chatterjee said...

वाह! पंकज। अपनी लेखन शक्ति का परिचय दिया है आपने।

10:18 AM, February 24, 2007  
Pankaj Bengani said...

@ धुरविरोधीजी,

नास्तिक भी कही ना कही आस्तिक ही तो होता है, उसे आस्था होती है अपने नास्तिक होने की. मुझे नास्तिकता में विश्वास नही है.

मै दिवाली में परिवार के साथ पूजा अर्चना भी करता हुँ, परिवार वाले जाते है तो मन्दिर भी जाता हुँ, गुरूद्वारा भी गया हुँ, और अहमदाबाद की जुम्मा मस्जीद का कोना कोना खंगाल चुका हुँ, नमाजीयों से चर्चा कर चुका हुँ..

मुझे कोई फर्क नही पडता. पर आपकी बात भी सही है.


@ संजय बेंगाणी जी,

भाई.. . .. . . . . . .


@ अभिनवजी,

हाँ, बचपन मे लगे घाव जल्दी नही भरते. पर मेरे मन मे कोई कडवाहट नही है. मै पुर्वाग्रही नही हुँ.


@ प्रत्यक्षाजी,

धन्यवाद.


@ रचनाजी,

सारे मुसलमान खराब होते हैं यह मानना मुर्खता से अधिक कुछ नही है. अहमदाबाद मे मेरा एक मुस्लीम मित्र है, उसके जैसा देशभक्त मैने दुसरा नही देखा.


@ महाशक्तिभाई,

धन्यवाद. शब्दों के भटकाव के लिए क्षमा.


@ अनुनादजी,

सहअस्तित्व का स्विकरण ही समस्या का अंत है. बस कोई करता ही नहीं. इस मामले मे पारसी समुदाय उदाहरण देने लायक है, वे कैसे रच बस गए हैं यहाँ.


@ श्रीश,

कुछ लोग अपने आपको सेक्युलरिता का ठेकेदार समझ कर पक्षपाती हुए जाते हैं। ऐसे लोग कितने साम्प्रदायिक हैं वे खुद समझते हैं।


@ सागरभाइसा,

जरूरत है हम अपने बच्चों को मिलजुल कर रहना सिखाएँ. जैन सम्प्रदाय के बच्चे भी स्कुलों में प्रार्थना करते है, उनको तो कोई तकलीफ नही होती.


@ संजीतजी,

धन्यवाद.


@ anonymouse jee,

मुझे पसन्द नही कि कोई अपने विचार रखने से पहले खुद को नकाबपोश बना ले.

मेरा परिवार जैन-हिन्दु है. हम (परिवार) जैन धर्म भी मानते हैं, और हिन्दु भी. जैन धर्म को हिन्दु धर्म से अलग करना वैसे भी गलत लगता है मुझे.


@ गिरीराजभाई,

आपतो हंसाते हैं, मैने आपको रूलाने की गुस्ताखी कर दी. क्षमा. :)


@ राजीवजी,

क्या ही अच्छा हो कोई कुछ ना रहे!



@ शुएब,

मै सारी उम्र तेरे साथ हुँ यार.


@ लालाजी,

आप तो मेरे पिता समान हैं। आपका आशिर्वाद है.


@ रजनी जी एवं मानोशीजी,

धन्यवाद. :)

11:04 AM, February 24, 2007  
Shrish said...

आज नारद पर पुराने चिट्ठे देख रहा था तो देखा पंकज भाई की फोटो लग गई है। इस पोस्ट पर आया तो दोबारा से सारी पोस्ट पढ़ गया।

@Anonymous,
अज्ञात जी आप जैनियों को हिन्दुओं से अलग कैसे कर सकते हैं। क्या आपको मालूम नहीं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी का हिन्दू जैन दोनों ही संस्कृतियों में अद्वितीय स्थान है।

5:12 AM, February 25, 2007  
me... said...

पूरा द्रिश्य पध कर रोन्ग्टे खडे हो गये! बचपन के अनुभव का इतना जीवन्त वर्णण ...अपने लेखन के लिये आप बधाइ के पात्र है.
एक बार विद्यालय मे शब्बीर से मैने कहा कि अगर विश्व कप भारत नहि जीत पा रहा (भारत १९९२ मे पहले ही बाहर हो चुका था) तो कम से कम पाकिस्तान हि जीत ले, आखीर पडोसी है हमारा... लेकिन शब्बीर आवेश मे आते हुये बोला कि भले हि कोइ और जीत ले लेकिन पाकिस्तान ना जीते, और उपर वाला ऐसा पडोसी किसि को ना दे!... खैर वो अक अलग अनुभव था...
शब्बीर के अब्बा काशी हिन्दु विस्वविद्यालय(बी.एच.यु.) मे प्राध्यापक थे और शब्बीर सेन्ट्रल हिन्दु स्कूल मे मेरा सह्पाठि था!

12:20 PM, June 01, 2007  

Post a Comment

Links to this post:

Create a Link

<< Home