11.
''दूध ले ले बेटी।''
ललन की आवाज़ थी। सुनते ही रोज़ की तरह अमित ने माँ से कहा था,
''माँ मैं ला देता हूँ।''
और फिर स्टील के छोटे से कटोरे में वह दूध लेने लगा तो बीच में ललन ने पूछा था,
''माँ कहाँ है बेटा?''
''माँ, दीदी के पास है।''
अमित के चेहरे पर मासूमियत थी। बहुत छोटी उम्र से ही वह ललन को घर पर दूध देता हुआ देख रहा था। और इसीलिए उसके साथ सहजता से मिलता। वैसे भी गाय के दूध को बेचते-बेचते काफी हद तक ललन का आचरण और व्यवहार गाय जैसा बन चुका था। कहने लगा,
''मैं खड़ा हूँ, माँ को बोलना ज़रा बात कर लें।''
अमित कटोरा अंदर लेकर गया तो देखा माँ सुप्रिया के पास बिस्तर पर बैठी थी।
''ललन पूछ रहें हैं आपको।''
मालती सिर पर पल्ला रखते हुए बाहर निकली थी। साड़ी के किनारों को हाथों की उँगलियों में लपेटते हुए हल्के से नमस्कार किया था। आज ललन हिचकिचाया था और कुछ देर बाद ही बोल पाया,
''बहन मैं समझता तो हूँ, मगर क्या करूँ, मेरी गाय नहीं समझती, उसे तो दूध देने के लिए कुछ न कुछ खिलाना पड़ता है ...और खिलाने के लिए बेटा उसका चारा भी तो खरीदना पड़ता है। ...वैसे मुझे कोई जल्दी नहीं है फिर भी अगर थोड़े-बहुत पैसे मुझे भी दे देती तो मेरा भी काम चलता रहता।''
मालती के लिए यह अप्रत्याशित नहीं मगर अकस्मात अवश्य था कुछ न सूझा तो उसने आँखों को नीचे करते हुए कहा था, ''मैं कुछ न कुछ करती हूँ।''
''मुझे कोई जल्दी नहीं है। बहन तू मुझे ग़लत न समझना। ये गाय जो है मेरी, उसका मुँह बहुत चलता है, ये नहीं समझती। फिर भी तू चिंता न करना।''
साइकिल पर ललन जाते हुए कह गया था। मालती कुछ समझ नहीं पा रही थी कि वह अब क्या करे... मना किया तो था दूध देने से।
''क्या हुआ री, क्यों परेशान हो रही है?''
सुबह-सुबह की सजी-धजी सुनीता, घर के बाहर निकलते हुए पूछ रही थी।
''कुछ नहीं बस यूँ ही।''
''मैंने तुझे कहा था न, किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो मुझे बताना। आगे तेरी मर्ज़ी।''
सुनीता की बातों में एक स्वाभाविकता थी तो शब्दों में उलाहना, परंतु अंदर प्यार था। जिसे देखना इतना आसान नहीं। मोहल्ले की सभी औरतें उससे बात तो ज़रूर करती मगर उसके जाने के बाद उसके बदचलन होने पर अपनी मोहर तुरंत लगाती। और साथ ही अपने आपको सावित्री का रूप साबित करने की सफल कोशिश करती। एक स्वनिर्मित आत्मप्रशंसा, एक अभिमान, इस तरह सुनीता से अपने आपको अलग बताने की चेष्टा ज़रूर की जाती। पर मालती कभी भी उसके लिए अपशब्द नहीं कहती, और यह बात सुनीता भी जानती थी।
गीता और मालती अच्छी दोस्त थी। जहाँ गीता बहुत कम बोलती एक सीधी-सादी और कुछ-कुछ मालती जैसी समझौता परस्त औरत थी, तो उसका पति बहुत ही उच्छृंखल और तेज़ स्वभाव का था। अकेली औरत देख हरकत करने से बाज नहीं आता। उसे सुनीता ने कई बार धमकाया था। एक बार हद कर दी तो सुनीता ने उसकी गर्दन पकड़ ली थी और फिर गीता के हाथ जोडऩे पर ही उसने उसे छोड़ा था। उसी शुक्ला जी ने मालती के साथ भी कुछ ज़्यादा ही रुचि दिखाते हुऐ अपना संपर्क बढ़ाने की कोशिश की थी। मालती सब जानती और समझती थी, साथ ही गीता ने भी सचेत किया था। अपने पति को वह खूब पहचानती थी। तभी मालती शुक्ला जी से थोड़ा दूर ही रहती थी। घर के दूसरी तरफ़ रहने वाली कमला तेज़-तर्रार, ज़ुबान की बहुत कड़वी, वहीं पति गुप्ता जी बहुत ही नेक दिल इंसान थे। गीता ने मालती से कई बार कहा था,
''तुम गुप्ता जी से सहयोग ले लिया करो, मेरे पति को तो तुम समझती ही हो।''
मालती ने पिछले तीन-चार महीनों में इतना सब कुछ देख व समझ लिया था, जितना वह पूरे जीवन में समझ नहीं पाई थी। पहले गीता, कमला और मालती तक़रीबन रोज़ सुबह, घर के मर्दों के जाने के बाद, कुछ न कुछ गप्पें मार लिया करती थीं। कमला जहाँ सिर्फ बोलती, गीता और मालती उसकी बातों को चुपचाप सुन लिया करती थीं। मोहल्ले के एक कोने में रहने वाली सुनीता आते-जाते इन तीनों से दो मिनट ज़रूर बतिया लिया करती थी। मोहल्ले के और लोग भी आते जाते दुआ-सलाम तो करते थे, परंतु इन तीनों परिवारों में निकट संबंध बन चुके थे। उसी पारिवारिक संबंधों की खातिर मालती ने एक बार गीता के कहने पर कमला के पति गुप्ता जी से एक-दो बार छोटे-मोटे काम करवा लिये थे। तभी कमला ने अपने पति गुप्ता जी की घर में वो खिंचाई की थी कि दीवार से आती हुई आवाज़ों ने मालती को अंदर तक झकझोर दिया था।
''...क्यों बहुत चक्कर लगाते हो आजकल, ख़बरदार जो उसके घर में आज के बाद गये। हाथ-पैर तोड़ दूँगी।''
गुप्ता जी की कोई आवाज़ नहीं आई थी। मालती सब कुछ सुनकर हैरान थी। एक आदमी के जाने से, क्या इतना सब कुछ बदल जाता है। इतने सालों के संबंध में क्या इतनी समझ भी नहीं थी। क्या एक औरत दूसरी औरत को इतने ज़्यादा ग़लत तरीक़े से सोच सकती है। उसके बाद से मालती ने गुप्ता जी से बात करना एकदम बंद कर दिया था। गुरुजी कभी-कभार आ जाया करते थे, हालचाल पूछ जाते। उनके आने जाने में भी कमला की तीखी बातों ने मालती को अंदर तक ठेंस पहुँचायी थी। गीता के समझाने पर उसे राहत मिलती थी। जहाँ सुनीता बदनाम थी परंतु उसकी बातों में एक प्यार था, वहीं कमला उसकी सहेली थी उसके बाबजूद उसमें एक तिरस्कार था।
''गीता मैं क्या करूँ... जितने पैसे थे, वो सब खत्म हो गए हैं। कर्ज़ा बढ़ता जा रहा है।''
उस दिन मालती ने पहली बार मायूस होकर कहा था। वह वैसे भी बहुत बुद्धि वाली नहीं थी, और फिर अधिक बुद्धि होने पर शायद अधिक परेशान भी होती। कम बुद्धि रखने से उसकी परेशानी भी कम थी। उधर, साहू ने भी, धीरे-धीरे सामान देने से इंकार तो नहीं किया था, परंतु नज़रों में परिवर्तन था। उसकी बातें मालती में एक हद तक हीन भावना पैदा कर देती। फिर भी बच्चों को पालना था। मरने वाले तो मर चुके थे, मगर जीते जी न तो मरा जा सकता है और न ही इन बंधनों को तोड़ा जा सकता है। शायद यही फर्क है मानव में और जानवरों में। पक्षियों, पशुओं, कीड़े-मकोड़ों में जैसे ही उनके बच्चे चलने-फिरने लायक, खाने-पीने लायक हो जाते, माँ और बच्चा, दोनों स्वतंत्र हो जाते हैं। परंतु मानव का शिशु और माँ, कभी भी पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं होते। कमला भी घर के बाहर सब सुन रही थी, झट से बोल पड़ी,
''मैंने तो तुझसे पहले ही कहा है, दूसरी शादी कर ले। कैसे पालेगी? सुप्रिया भी तो है, फिर अभी तो अमित बहुत छोटा है। नहीं तो फिर देख ले, सुनीता का क्या हुआ था।''
कमला की बातें मालती के कानों में सीसा घोल रही थीं। परंतु प्रतिक्रिया करना मालती का न तो स्वभाव था, न ही वह कर सकती थी। और न ही वह इस अवस्था में थी।
आँखों में रोज़-रोज़ आँसू नहीं आते। परंतु दिल, दिन-पर-दिन कमज़ोर होता जा रहा था। कई महीने बीत चुके थे। आय का कोई साधन नहीं, पेट के लिए खर्चा रोज़ चाहिए। तो फिर क्या होगा? ससुराल के नाम पर कुछ नहीं था। सास-ससुर का देहांत पहले ही हो चुका था। अन्यथा उन्हीं के पास चली जाती। कोई खेतीबाड़ी नहीं, देवर अपना घर ही किसी तरह चला पा रहे थे। फिर इन तीनों का बोझ कहाँ ढो पाते। माँ-बाप चल बसे थे। भाई, भाभी के हाथों में मजबूर, वैसे भी वह कभी भी मालती के पास नहीं आया था। मालती का कम पढ़ा-लिखा होना भी अभिशाप बना हुआ था। किसी भी जगह काम करने के लिए वह उपयुक्त नहीं थी। गुरुजी चाहते हुए भी मदद नहीं कर पा रहे थे और वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे। गीता कई बार अपने घर से, पति से छुपाकर, कुछ न कुछ खाने का अनाज और सामान प्यार में दे जाया करती थी। वह जानती थी कि उसके पति को जैसे ही इसका पता चलेगा, वह इस अवस्था का पूर्ण रूप से फ़ायदा उठाने की कोशिश करेगा। सहेली होते हुए भी वह मालती से इस बारे में खुलकर ज़िक्र नहीं करना चाहती थी। मगर फिर उसकी भी अपनी कुछ सीमाएं थी। फिर भी वर्षों के संबंधों को वह ज़िम्मेदारी से निभाने की कोशिश करती। उधर, कमला उसी संबंध को अपनी तीखी और तेज़ ज़ुबान के साथ निभाना चाहती थी। लेकिन आज की बातों ने तो मालती के साथ-साथ गीता को भी ठेस पहुँचाई थी और वह पूरा दिन परेशान हुई थी।
''तुम एक बार अलका से क्यों नहीं बात करती। स्कूल में हैडमास्टरनी लगी है। खुद भी तो अपने भाइयों को पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया। माँ को पाल रही है। वह सुलझी हुई है, औरत है, समझेगी।'' भरी दोपहरी में गीता को समझ आया तो मालती के पास तुरंत पहुँचकर राय दी थी। यह बात मालती को जँची थी और उसने गीता को दिल से धन्यवाद दिया था।
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.