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बन्धन: खण्ड 2 / अध्याय 12
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
मंगलवार , , 11 मार्च
manojkumar.jpg मनोज सिंह



एक घर छोडक़र अलका अपनी बूढ़ी माँ के साथ अकेले रहा करती थी। वह कुछ अनाथ बच्चों को पढ़ाया भी करती थी। मालती ने सोचा कि वह आज ही शाम को, अलका के स्कूल से आने के तुरंत बाद, उससे ज़रूर मिलेगी। एक तरफ़ घर के हालात और साहू की बातों से वह परेशान होने लगी थी तो दूसरी तरफ़ कमला के ताने उसे तंग करते।
मालती अब कुछ-कुछ पैसों के बारे में समझने लगी थी। आय के स्त्रोत न हो तो जमा पूँजी बहुत जल्दी खत्म होने लगती है। राजा-महाराजाओं के रजवाड़े क्यों न हों, अगर व्यवस्थित व नियमित आय नहीं है तो उनकी संपात्ति भी खत्म हो जाती है। फिर ग़रीब की जमा पूँजी क्या होती है। जो थोड़ा-बहुत एक स्कूल टीचर होते हुए मास्टर जी जमा कर गए थे, वो और बीमा के पैसों में से आधे से अधिक तो समाज के रीति-रिवाज़ों, क्रियाकलापों में ही ख़र्च हो गए थे। कितना ज़रूरी है यह क्रिया-कर्म, मालती नहीं जानती थी। परंतु उस वक्त न तो वह इतनी समझदार थी, न ही इस क्रिया-कर्म को रोकने की उसमें कोई क्षमता थी। उसके बाद के कुछ महीने तो कट गए पर ज़िंदगी बहुत लम्बी है। और वह सोचने पर मजबूर हुई थी... अमित तो अभी सिर्फ कक्षा चार में ही है और फिर सुप्रिया को भी पूरी ज़िंदगी पालना है।
शाम का इंतज़ार करते-करते पथरीली आँखों ने आकाश की ओर देखा तो वो बहुत दूर दिखाई दिया था। उसे लगा कि आज शाम तक वह अगर पैसों का इंतज़ाम नहीं कर पायी तो कल ललन को क्या जवाब देगी। घर में रखा खाने का ज़रूरी सामान तक़रीबन ख़त्म-सा हो रहा था। मालती को यूँ लगने लगा था कि घर पर आजकल सामान भी जल्दी-जल्दी खत्म होता है। सुप्रिया को कम खिलाए या अमित को, या फिर खुद न भी खाये, परंतु घर का अनाज पता नहीं कहाँ जल्दी खत्म हो जाता है। शायद ऐसा ही होता है कि जब ज़रूरत हो तो सामान कम होता चला जाता है। गीता की बात को सुनकर वह अलका का इंतज़ार तो करने लगी, परंतु अंदर ही अंदर वह ललन के डर से सुबह न होने का ख़्वाब भी देखने लगी थी। दिन बहुत बेचैनी से कट रहा था। हर पल के बाद उसकी आँखों घड़ी की ओर चली जाती थी। उसने पता लगा लिया था कि अलका शाम चार बजे आया करती है ...अमित स्कूल से तब तक आ जायेगा ...सुप्रिया के पास उसे छोडक़र, अलका से मिलने जाएगी। ...इसी उधेड़बुन में थी कि अलका से क्या बात करेगी, उधर घड़ी है कि चलने का नाम नहीं ले रही थी। शाम चार बजते ही उसे लगा मानो उसकी सभी परेशानियों का हल मिलने वाला है। वह तुरंत तैयार होकर, अमित को सुप्रिया के पास बिठाकर, घर से एक मकान छोडक़र अलका के घर पहुँच गई थी। अभी दरवाज़ा खटखटाया ही था कि अंदर से आवाज़ आई थी, ''कौन है?''
मालती ने थोड़ा रुककर धीरे से कहा था, ''मैं, मालती...''
अगले ही पल किसी ने तुरंत दरवाज़ा खोला तो वह अलका थी।
''मालती!! आओ-आओ, कैसी हो?'' बड़ी सहजता से अलका ने पूछा था। उसकी ड्रेस से लग रहा था कि स्कूल से आने के बाद शायद उसने अपने कपड़े भी नहीं बदले हैं।
''माँ, देखो, कौन आया है?'' अंदर ले जाकर उसने मालती को अपनी माँ के पलंग के नज़दीक बिठा दिया था। बुजुर्ग महिला को देखकर मालती को लगा, जैसे कि उसने अपनी माँ को देख लिया है। दुःख में माँ-बाप, प्यार करने वाले बहुत याद आते हैं। उधर, अलका की माँ की आँखों में आँसू थे। जिसे देखते ही मालती को लगा कि वह उसकी पीड़ा समझ रही है।
''चाय लोगी?'' अलका ने सहजता से पूछा था।
''नहीं आप कष्ट मत कीजिए।''
''कष्ट कैसा, अपने लिये बना रही थी, आप के लिए भी बना दूँगी।''
''ठीक है।''
मालती ने घर के चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई। साफ़-सुथरा,सिर्फ ज़रूरत का सामान। दीवारों से टकराकर नज़रें जब भी सामने वृद्ध महिला तक पहुँचती तो पाती कि कोई निगाहें उसे प्यार से निहार रही हैं। जिसमें दर्द है, प्रेम है और बहुत कुछ करने की इच्छा है मगर मजबूर है। और फिर वो अपनी नज़रों को शरम से चुरा लेती। चारों तरफ अब तक शांति थी मगर बूढ़ी आँखों ने बिना शब्द के बहुत कुछ कह दिया था। तभी अलका तीन कप चाय का प्याला बिस्किट के साथ, ट्रे में डालकर लायी थी।
''और बतायें। कैसी हो?'' अलका ने मालती के हाथों में चाय पकड़ाते हुए पूछा था।
मालती की आँखों झुक गई थी। उनमें आँसू तो नहीं थे। मगर ख़ालीपन को देख कर अलका बहुत कुछ समझ चुकी थी। आज मालती के आँसू तो अलका की माँ की आँखों से बह रहे थे। मालती ने हिम्मत कर अपने सिर का पल्ला ठीक किया और फिर एक साँस में बोल गई थी,
''क्या आपके स्कूल में मुझे कोई काम मिल सकता है?''
सोचकर तो बहुत कुछ आई थी पर इतना ही कह पायी। मालती की अलका के साथ इसके पहले कभी भी नमस्कार से ज़्यादा कोई बात नहीं हुई थी। अलका मोहल्ले की सबसे ज़्यादा पढ़ी-लिखी औरत थी, उसके पास वक्त भी कम ही होता था। मोहल्ले के सभी लोग उसकी बड़ी इज़्ज़त करते थे। अलका और मालती के बीच में मानसिक अवस्था का इतना अंतर था कि उनके बीच में अब तक कोई संपर्क सूत्र नहीं बन पाया था। आज उन्हीं मानसिक अवस्था में फ़र्क़ की वज़ह से मालती अपनी परेशानियों को सही ढंग से नहीं कह पाई थी। वह वैसे भी बहुत कम बात करती थी।
''आप कितनी पढ़ी-लिखी हैं?'' अलका ने कुछ-कुछ समझते हुए पूछा था
''मैं बस थोड़ी बहुत... कभी इस तरह से किसी ने सोचा ही नहीं था।''
मालती ने सहजता से कहा और अलका की माँ की और देखकर नज़रें झुका ली।
''नहीं, नहीं बेटी, आजकल तो बच्चों को, चाहे वह लडक़ा हो या लडक़ी ज़रूर पढ़ाना चाहिए। समय का कोई पता नहीं। ज़िंदगी बहुत कठिन है। पेट और समाज, दोनों की आग औरत को ज़्यादा तंग करती है।'' अनुभवी आवाज़ ने बहुत कुछ कह डाला था।
''आपके पास मैं...'' एक बार फिर मालती पूरा वाक्य नहीं कह पाई थी।
''अच्छा एक बिस्किट तो लीजिए। देखिए अगर आप मुझे सब कुछ खुल कर नहीं बतायेंगी, तो मैं आपकी कैसे मदद करूँगी।''
अलका ने बड़ी सरलता से कहा था।
''दीदी मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि अब मैं क्या करूँ।''
मालती पहली बार अलका के स्वामित्व को स्वीकार करते हुए अपनी कमज़ोरी का इज़हार कर बैठी थी।
''...अमित अभी छोटा है। गुरुजी, जो मास्टरजी के स्कूल के प्राचार्य हैं, उनसे भी बड़ी उम्मीद थी। परंतु मेरी कम पढ़ाई-लिखाई या पता नहीं किस कारणवश वह भी मेरी मदद नहीं कर पा रहे हैं। मैं क्या कर सकती हूँ, मुझे भी नहीं पता।''
मालती ने पहली बार इतना बड़ा वाक्य एक झटके में कह दिया था। उसकी आँखों में अब भी मासूमियत थी, मायूसी नहीं। एक विरक्ति तो थी, पर साथ में मंज़िल की तलाश भी थी। साँसों में तेज़ी थी जिसमें जीवन का एहसास था। बौद्धिक रूप से परिपक्व होने के कारण अलका सब कुछ समझ चुकी थी। अब उसके सामने सारी बातें स्पष्ट थीं।
''देखिए मालती बहन, मैं आपको कोई झूठा दिलासा तो देना नहीं चाहती। परंतु हाँ, मैं ज़रूर कुछ न कुछ करूँगी।''
ये शब्द मालती के सारे सपनों पर हथौड़े के समान थे। वह तो अब एक पल का भी इंतज़ार नहीं कर सकती थी। ललन कल सुबह फिर आयेगा और साहू का चेहरा उसकी आँखों के सामने से गुज़र गया था। वे उसे अब तक कष्ट तो नहीं दे पाए थे, परंतु वह खुद उनका सामना नहीं कर पाने की स्थिति में पहुँच चुकी थी। वह बिखर के बोल पड़ी,
''दीदी हम तो अब...'' और उसकी आँखों से आँसू अचानक निकल पड़े थे। आज उनकी तीव्रता मास्टर जी के देहांत वाले दिन से कहीं ज़्यादा थी। उस दिन मास्टरजी के छूटने का ग़म मात्र था, परंतु आज जीने की व्यवस्था उससे कहीं अधिक विकराल थी। अलका ने उठकर मालती के चेहरे को अपनी बाहों में लिया तो मालती फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने अपना मौन अलका की बाहों में समर्पित कर दिया था। उसके लिए यह आख़िरी आशा थी।
''देखिए मैं आपकी सभी परेशानियाँ समझती हूँ। लेकिन उसका हल अतिशीघ्र तो नहीं निकल सकता। फिर भी मैं कुछ जल्दी करने की कोशिश करूँगी।''
अलका ने मालती की आँखों से निकल रहे आँसुओं को अपने हाथों से पोंछा तो एक पल में ही वह मालती की माँ के स्वरूप बन चुकी थी। मालती ने अपने आप को संभाला और दौड़कर घर से बाहर निकल पड़ी थी। रास्ते में सुनीता कहीं से आ रही थी। जिसे देखकर वह नज़रें चुराते हुए, तुरंत अपने घर के अंदर घुस गई थी। सुनीता कैसे आँखें बंद करती पीछे-पीछे वो भी मालती के घर में घुस गई थी। अंदर पहुँचने पर अमित और सुप्रिया को देखकर उसने कहा था,
''क्यों बच्चो, क्या चल रहा है?''
सुनीता घर के सामने से जब भी निकला करती, अपनी चंचलता से बच्चों को हमेशा छेड़ा करती थी। बच्चे भी उसे सुनीता चाची कह कर प्यार पाया करते थे। बच्चों को यह नहीं पता था कि सुनीता कौन है? वह क्या काम करती है? औरतों में वह चर्चा का विषय हो सकती थी। बदचलन कहने में औरतें मज़ा ले सकती थी, परंतु बच्चों में सुनीता चाची सदैव प्यारी और अच्छी मानी जाती थी। सुनीता ने सुप्रिया के सिर पर हाथ फेरा और अमित को गाल पर छेड़ते हुए कहा था,
''जल्दी बड़ा क्यों नहीं होता? जल्दी बड़ा हो जा।'' कहते हुए सुनीता मालती को हाथ पकड़कर अंदर के कमरे में ले गई थी। और रसोई घर में पहुँचकर अपने पर्स से सौ-सौ के दो नोट निकालकर मालती के हाथ में रखकर कहने लगी,
''ये पैसे हैं, इससे पेट भरता है। कुछ और न समझना। कमाये कैसे भी गए हों, पर तेरे काम आयेंगे। अगर तुझे ख़राब लगे तो बाद में लौटा देना। ...पर तू अभी इसे चुपचाप रख ले।''
जिस अधिकारपूर्वक सुनीता ने मालती के हाथों में नोट रखे थे, वह कुछ नहीं कह पाई थी। पैसे देने के तुरंत बाद सुनीता तो घर से निकल गई परंतु मालती वहीं के वहीं खड़ी रह गई थी। जो उसकी हालत थी, जैसे हालात थे, जो उसकी अवस्था थी, उन सभी के मद्देनज़र वह मना करने की स्थिति में भी नहीं थी। परंतु पहली बार सुनीता पर अन्य औरतों द्वारा लगाये जाने वाले बदचलन की कालिख उसके आँसुओं से धुल रही थी। आँखों से निकलने वाली अश्रुधारा और तेज़ होने लगी तो उसने अपने आप को सँभालते हुए चेहरे पर पानी के छींटे डाले थे और बाहर आकर बच्चों के सामने सामान्य बनने की कोशिश करने लगी।
''अमित स्कूल में कैसा रहा?'' आज पहली बार माँ ने उससे पूछा था।
''हाँ, माँ अच्छा था।''
''खूब पढ़ाई करना बेटा। तुझे जल्दी से जल्दी अच्छी से अच्छी पढ़ाई करनी है।''
''माँ, मैंने कहा न, मैं डाक्टर बनूँगा।''
अमित के जवाब ने मालती के ज़ख़्मों को सहारा दिया था। पेट की मरोड़ों ने बच्चों की भूख याद दिलाई तो वह तुरंत साहू किराने वाले के यहाँ जाने के लिए निकल पड़ी। जाते-जाते कह गई थी,
''बेटा मैं कुछ सामान लेकर आती हूँ।''
घर से बाहर कदम रखे तो आज पैरों में जान थी। मुट्ठी में भींचे हुए पैसे अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान कर रहे थे। किराने वाला साहू उसे देखकर नज़रें चुराने लगा था। इससे पहले वह कुछ कहता, मालती ने धीरे से एक नोट उसकी ओर बढ़ा दिया था।
''साहू जी अभी ये रख लीजिए, बाकी बचे हुए मैं धीरे-धीरे लौटा दूंगी। ...थोड़ा-सा अगर ज़रूरी सामान मिल जाता तो...''
''हाँ, हाँ मैंने, मना कब किया है।''
साहू की सफेद दाढ़ी से निकली हुई मुस्कुराहट की लकीर मालती को काफी कुछ समझ में आने लगी थी। ज़िंदगी की हक़ीक़त से वह रोज़ दो-दो हाथ हो रही थी। जीवन की वास्तविकता सब कुछ सिखा देती है। परंतु फिर भी उसने अपनी गरिमा अब तक बनाये रखने की पूरी कोशिश की थी। ज़रूरी सामान लेकर घर पहुँची और फटाफट सिगड़ी जलायी थी। पिछले कुछ दिनों से सब्जी और दाल में से एक चीज़, दिन में एक बार बनाकर ही पूरे दिन का काम चलाया करती थी। पेट भरना ज़्यादा ज़रूरी है। फिर दो बार चूल्हा जलाने पर खर्चा भी तो होता है। मगर आज से किफायत बढ़ा दी गई थी। सिर्फ रोटी वो भी गिनकर... साथ में अचार... नहीं, नमक और प्याज ज़्यादा सस्ता पड़ेगा। और उसने रोटी बनाकर, साथ में प्याज को मसलकर उस पर नमक छिड़क दिया था। अमित ने थाली में देखा तो एक मिनट तो समझ नहीं पाया फिर जब खाया तो जीभ ने कुछ भी समझने से इंकार कर दिया था। पेट की ज्वाला मुँह तक पहुँच चुकी थी। एक रोटी को हाथ में रखकर उसे दूसरे हाथ से तोड़कर सुप्रिया के मुँह में डाला तो सूखे निवाले ने खाँसी पैदा कर दी थी। तुरंत पानी का गिलास मुँह से मालती ने लगा दिया था। और फिर सुप्रिया ने अगले निवाले तक अपने आप को तैयार कर लिया था। मालती सुप्रिया को खिलाते-खिलाते सोचने लगी थी... अगर अलका, जो उसको आख़िरी सहारा दिखाई दे रही थी उसने भी मना कर दिया तो वह क्या करेगी? उसे अब धीरे-धीरे सुनीता पर अधिक विश्वास हो चला था। परंतु वह सुनीता से भी इस तरह का सहयोग कब तक ले सकती है और कितने दिन? ...एक मिनट के लिए उसके शरीर में डर के मारे कंपन आ गई थी। कब उसने सुप्रिया को अपने हिस्से की रोटी भी खिला दी उसे पता ही नहीं चला और बैठे-बैठे वह रात पर बढ़ रही काली स्याही में अपनी चिंताओं को समेटने लगी थी। अमित पास बैठा पढ़ रहा था। वह बीच-बीच में उसे किताब से ज़ोर-ज़ोर से पढ़कर सुनाने की कोशिश भी करता। उसे आज पहली बार महसूस हुआ कि जीना कितना कठिन है और मरना कितना आसान। पूरी रात उसने छत पर शून्य को ढूँढ़ते हुए बिताई थी। सुबह की चिड़ियों की पहली आवाज़ से ही उठ बैठी। सबसे पहले स्नान किया और दुर्गा माँ की फोटो के सामने हाथ जोडक़र उसने प्रर्थाना की और फिर इस बात का इंतज़ार करने लगी कि कब अलका स्कूल जाने के लिए घर से निकले। वह एक बार फिर से उससे मिलेगी। वह जानती थी कि समय उसका खराब है पर अभी उसमें लड़ने की शक्ति बची थी। अमित को भी उसने आज जल्दी उठाकर तैयार कर दिया था। जैसे ही रिक्शावाला आया और अलका घर से बाहर जाने के लिए निकली वह उसकी तरफ़ दौड़ पड़ी थी।
''दीदी आप ज़रूर कुछ कीजिएगा।''
वह यह बिल्कुल भी नहीं जानती थी कि कोई भी व्यवस्था इतनी जल्दी नहीं हो सकती।
अलका उसकी परेशानियाँ पहले ही जान चुकी थी परंतु इस वक्त उसकी मासूमियत को बहुत अच्छी तरह पढ़ रही थी। दुःख से खुद गुज़र चुकी थी सो कोई झूठा दिलासा नहीं देना चाहती थी। जीवन की वास्तविकता को समझती थी इसीलिए अंधेरे में भी नहीं रखना चाहती थी। परंतु उसका इस तरह सुबह-सुबह भागकर आना उसे बहुत कुछ कह गया था।
''देखो मालती परेशान मत हो, मैंने कहा तो, मैं पूरी कोशिश करूँगी।''
''आप जो भी कहें, मैं करूँगी, लेकिन आप मुझे मना मत कीजिएगा।''
''मालती मैं तो...''
''नहीं, मैंने अब कुछ भी नहीं सुनना।''
मालती अब एक ज़िद्दी बच्चे के समान उसका हाथ पकड़कर खड़ी हो गई थी। जिस औरत से उसने पिछले दस-बारह साल में कोई खास बात नहीं की थी उसी से अचानक आज वह पूरे हक़ से बात कर रही थी। अलका जिसने अपने भाइयों और बहनों को पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया था, अपनी पूरी ज़िंदगी अपना परिवार चलाने में लगा दी थी, इस नयी ज़िम्मेदारी से ज़रा भी विचलित नहीं हुई। उसे पता था कि ज़िंदगी कितनी मुश्किल है और जीना कितना कठिन। उसने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा था,
''तुम चिंता मत करो...''
सुनते ही मालती को तो जैसे अमृत मिल गया हो।
''...मैं तुम्हें कुछ न कुछ बताऊँगी। वैसे क्या तुम कोई भी काम कर सकती हो।''
मालती को हाँ कहने में ज़रा भी वक्त नहीं लगा था। उस हाँ में, उसकी न तो कोई सोच थी और न ही वह सोचने की स्थिति में थी। यह उसका एकमात्र आख़िरी रास्ता था। जिन संबंधों के साथ वह कई सालों से जी रही थी वे आज उसके किसी भी काम के लायक नहीं थे। वहीं जहाँ कोई भी बंधन नहीं था, वो संबंध आज सबसे ज़्यादा उम्मीद प्रदान कर रहे थे। अलका ने उसे पुनः एक बार कहा था,
''आप धीरज रखो।''
मालती के दोनों हाथ प्रणाम की मुद्रा में जुड़ गए थे। अलका ने हाथ हिलाते हुए उससे विदा ली थी। मालती सिर का पल्ला ठीक करते हुए अपने घर की ओर मुड़ गई थी। उसने अमित को स्कूल रवाना किया और सुप्रिया को सुबह का प्राकृतिक कार्य कराने के बाद वह फिर से अलका का बेसब्री से इंतज़ार करने लगी। बीच में ललन के आने पर सुनीता के दिये पैसे में से कुछ उसने उसे भी दे दिये थे।
''आ, आ।''
सुप्रिया की आवाज़ ने उसे चौंकाया था। वह यह भी भूल गई की आज उसने सुबह से बेटी को खाना तो दूर पानी भी नहीं पिलाया है। सुप्रिया अपनी माँ की परेशानियों को पिछले कुछ दिनों से दूर से देख रही थी। कह तो वह वैसे भी नहीं सकती थी, परंतु समझ वह सब जाती थी। उसकी आँखों में उन सभी का एहसास था जिसे पढ़कर मालती ने उसके सिर पर हाथ रखा था। सुप्रिया अपने हाथों से उसको पकड़ तो नहीं सकती थी, माँ को सहारा भी नहीं दे सकती थी। उसे तो सदैव खुद किसी न किसी सहारे की ज़रूरत होती थी। उसने अपना सिर माँ के कंधे पर रख दिया था। मगर आज का यह स्पर्श सहारे के लिए नहीं था वो यह दर्शाने के लिए था कि... माँ तेरे दुःख में मैं पूर्णरूप से शामिल हूँ। ईश्वर मुझे शक्ति दे कि मैं तेरे इस दुःख को कम कर सकूँ। ...भावनाएं आँखों से भी प्रदर्शित की जा सकती है और आज उसकी आँखें कामयाब थीं।
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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