tarakash-universe-logo
बन्धन: खण्ड 2 / अध्याय 13
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 3
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
बुधवार , , 12 मार्च
manojkumar.jpg मनोज सिंह



मालती के साड़ी से पूरे शरीर को ढकने में कुछ भी फर्क नहीं आया था न ही सिर का पल्ला अभी उतरा था। बस फ़र्क़ सिर्फ इतना था कि अब वह कुछ तेज़ चाल से सड़क पार करने लगी थी। उधर, घर पर अंतर ज़रूर आया था... फ़ाँके की नौबत आ चुकी थी। एक वक्त का खाना भी अब कभी-कभी बनता। कई बार पानी से काम चलता। अब बच्चे भूख को खाने लगे थे। मालती माँ थी, हर दूसरे दिन कम से कम एक रोटी गीता के यहाँ से ज़रूर ले आती। दोनों बच्चों का आधी रोटी से कुछ देर काम चलता। हाँ, मालती की भूख पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। अँतड़ियाँ सूख रही थीं। सिर्फ पानी ने गले और आँतों को गीला कर रखा था। आँखों के नीचे की स्याही ने चेहरे पर पैर पसार लिये थे। ललन को दूध के लिए मना कर दिया था। साथ ही कह दिया था... जो पैसे उधार हैं अगर ज़िंदा रही तो लौटा दूँगी। ...सुनकर ललन की आँखों में भी आँसू थे। पर क्या करता। उधर, सुनीता भी कितना करती, थोड़ा-बहुत जो भी होता उसी के दिये से अब तक हो रहा था। भीख और मौत, दो के अलावा तीसरा विकल्प नहीं था। कमला अपनी बातों से उसकी बची हुई साँसों को बंद कर दिया करती थी। आजकल गीता की दिन में एक कप चाय मालती के लिए अब दिनभर के खाने के बराबर होती थी। दूसरे मोहल्ले वाले अपनी-अपनी परेशानियों में घिरे हुए थे। सभी कोई धन्ना सेठ तो थे नहीं। हाँ, उषा भी एक-दो बार खाने का थोड़ा सामान देकर मदद कर गई थी।
उस दिन शाम को अलका ने आकर उसके आख़िरी आसरे को भी छीन लिया था। क्या करती? स्कूल में दो-दो बाइयाँ पहले से ही लगी हुई थीं। स्कूल का मैनेजमेंट तीसरी के लिए तैयार नहीं था। कह रही थी आसपास के दूसरे स्कूलों में बात करेगी। थोड़ी उसकी जान-पहचान है। पर कितना वक्त लगेगा पता नहीं। उधर, अमित ने स्कूल से आकर, फीस के बारे में कहा था। कक्षा के अध्यापक कह रहे थे कल आख़िरी दिन है। फीस अब लानी ही पड़ेगी। घर पर बिजली भी कट गई थी। अंधेरों ने घर में पैर पसार लिये थे।
मालती एकदम टूट चुकी थी, लेकिन साँसें और हिम्मत अभी बची थी। सोचने लगी एक बार गुरुजी से बात कर लेती हूँ, कम से कम अमित की पढ़ाई तो बंद न हो। इन्हीं सपनों पर उसकी साँसे चल रही है। अगर वह भी नहीं रहा तो फिर सब कुछ खत्म। बिना खाये-पिये तो वह जी सकती है और जी भी रही है, परंतु सपनों के बिना शायद एक पल भी नहीं जी पायेगी। और वह घर से निकल पड़ी थी। वो पहले किसी के पीछे-पीछे सड़कों को पार किया करती थी। अब उसने सड़क अकेले पार करना शुरू कर दिया था। बोल अभी भी वह कम पाती थी, परन्तु अब अपनी बातों का इज़हार कुछ लाइनों में ही कर देती थी। एक बार पुनः वह गुरुजी के पास पहुँच चुकी थी। हर बार चक्कर लगाने पर वह यही कहा करते थे। और आज भी यही कह रहे थे,
''बेटा मैंने संस्था के अध्यक्ष एवं सेक्रेटरी से बात की है। आश्वासन तो उन्होंने पूरा दिया है कि कुछ न कुछ करेंगे, परन्तु अभी कुछ कहा नहीं जा सकता।''
मालती हर बार आँखें नीचे करके सुन लेती थी। परंतु आज तो मसला ही कुछ और था।
''गुरुजी, अमित के फीस के पैसे नहीं जमा हो पाये हैं। स्कूल में तीन बार टीचर कह चुके हैं।''
''ओहो! इन स्कूल के अध्यापकों को इतनी भी अक्ल नहीं है, सब कुछ जानते और समझते हुए भी नियम के हिसाब से ही चलेंगे। मुझे तो याद ही नहीं रहा। यह कोई बड़ी चीज़ नहीं है। बेटा इतना तो मैं कर ही सकता हूँ। मैं आज ही अमित का केस बनाता हूँ। स्कूल की फीस तो माफ करा ही दूँगा। तू इसकी चिंता छोड़। और हाँ, इसकी पढ़ाई-लिखाई के अलावा, किताब अगले वर्ष से संस्था ही देगी। कक्षा में सदैव अव्वल भी तो रहता है। बहुत होशियार है। स्कूल की फीस माफ करने में ज़्यादा परेशानी नहीं होगी। मैं इतना तो देख ही लूँगा।''
यह सुनकर मालती के चेहरे पर थोड़ी रौनक लौट आई थी। हाथ जोड़कर प्रणाम करने लगी।
''अरे इसकी आवश्यकता नहीं है। यह तो मेरा फ़र्ज़ है बेटा। यह भाग्य का विधान है, किसी के साथ भी हो सकता है। बाकी मैं कोशिश करता रहूँगा, तुझे कहीं न कहीं काम दिलवाने के लिए। असल में बेटा, आजकल नौकरियों की वैसे भी बहुत मारा-मारी है। फिर प्राइवेट स्कूलों में स्थितियाँ वैसे भी ठीक नहीं है। मैं तुझे कैसे समझाऊँ।''
मालती अब थोड़ा-थोड़ा समझने लगी थी।
''परन्तु एक बात का ध्यान रखना बेटा, अमित को पढ़ाना ज़रूर है। बहुत होनहार लडक़ा है। वैसे मैं इस स्कूल में ही उसकी पढ़ाई की पूरी व्यवस्था कर दूँगा।''
'जब तक ज़िंदा हूँ, उसे पढ़ाने की ज़रूर कोशिश करूँगी।' यह सोचती हुई मालती निकलने लगी तो गुरुजी कह बैठे,
 ''जाते-जाते बेटा, अमित की कक्षा के अध्यापक को कह देना कि उसकी फीस की बात मुझसे हो गई है। उसकी फीस की वह चिंता न करें।''
मालती पहली बार स्कूल में ढूँढ़ते-ढूँढ़ते, पूछते हुए, अमित की कक्षा में जा पहुँची थी। देखते ही अमित के एक दोस्त ने उससे कहा था,
''तेरी माँ आई है।''
अमित की निगाह दरवाज़े पर पहुँची तो वह खुशी से उठ खड़ा हुआ था और फिर अपने अध्यापक से कहने लगा,
''सर मेरी माँ आई है।''
मिलने पर अमित के अध्यापक से मालती ने वही सब कुछ कहा जो गुरुजी ने बताया था।
''बहनजी आप चिंता न करें...''
मास्टरजी को स्कूल में यों तो सभी जानते थे, परन्तु बहुत ज़्यादा न किसी से दोस्ती थी, न ही ज़्यादा आना जाना। फिर कम ही लोग मालती को जानते थे।
''...आपका लड़का बहुत होनहार है।''
यह सुनकर मालती का चेहरा अक्सर खिल जाता था अध्यापक अमित की बड़ाई कर रहा था। और आज तो मानो रेगिस्तान में हरियाली छा गई थी। अध्यापक के कहने पर वह अमित को लेकर वापस घर को रवाना हो गई थी। आज थोड़ा खुश थी। पहली राहत मिली थी। चलते-चलते अमित से रास्ते में एक बार फिर कहने लगी थी,
''बेटा तुझे बहुत पढ़ाई करनी है, बड़ा आदमी बनना है।'' शब्द कदमों के साथ धीरे-धीरे मगर मज़बूती से निकल रहे थे। मानो कुछ ही देर में मंज़िल तक पहुँच जाएँगे।
अमित बस इतना ही जवाब दे पाया था,
''हाँ हाँ मैं खूब पढ़ाई करूँगा, ...पर ...यह बड़ा आदमी! यह बड़ा आदमी क्या होता है?''
मालती के पास इसका जवाब नहीं था। हाँ, उसने एक मिनट के लिए रुककर बड़े प्यार से अमित के सिर पर हाथ ज़रूर फेरा था। और फिर वो उसे लेकर रास्ते में माँ दुर्गा के मंदिर चली गई थी। धन्यवाद जो देना था। पैर थे कि धीरे-धीरे जवाब देने लगे थे। शरीर और साँसों ने साथ छोड़ने की कोशिश की थी। मंदिर पहुँचकर हाथों को ऊपर उठाया तो आज वो काँप रहे थे और थोड़ा झुककर उसने माँ दुर्गा को धन्यवाद दिया था। नीचे ज़मीन पर निगाह पहुँची तो पैर उखड़ने से लगे थे और उसने तुरंत सिर उठाकर माँ की प्रतिमा की ओर देखा भर था, ...माँगती क्या? उसे तो भगवान से भी कुछ माँगने की चालाकी का पता नहीं था। पैर लड़खड़ाने लगे तो जल्द बाहर निकलकर सीढ़ी के किनारे बैठ गई थी। अमित पास ही खड़ा था। बाहर धूप तेज़ थी और आज सूरज की किरणें मालती को तकलीफ़ देने लगी थीं। उसे लगा कि आज उसकी जान निकल जाएगी। सिर तेज़ी से घूमने लगा तो उसने दोनों हाथों से उसे पकड़ा था। आँखें बंद की तो चक्कर-सा महसूस हुआ था तुरंत आँखें खोली तो आगे अँधेरा था। बेटे की ओर देखा तो उसका चेहरा भी धुँधला दिखाई दिया था। अंदर माँ की मूर्ति को देखना चाहा तो उसने भी उसे दूर से दिखना बंद कर दिया था। अमित के हाथों को एक हाथ से पकड़कर उठने की कोशिश की तो ज़मीन पर वह गिरने की स्थिति में पहुँच चुकी थी। दूसरे हाथ की मुट्ठी में बंद मंदिर का प्रसाद ज़मीन पर न गिर जाये, झट से मुँह में डाल लिया था। बहुत दिनों से मुँह में कुछ गया नहीं था। जीभ खाने का स्वाद भूल चुकी थी और गले में कुछ पहुँचते ही एकदम से खाँसी का दौर उठा था। अमित माँ की ऐसी हालत देख तुरंत अंदर मंदिर से एक गिलास में पानी ले आया था। और फिर घबराकर कभी माँ के चेहरे को कभी उसकी पीठ को पीछे से सहलाने लगा था। प्रसाद के ऊपर थोड़े से पानी ने मालती को एक मिनट के लिए ऊर्जा दी थी फिर भी उसकी उठने की हिम्मत नहीं हो रही थी। आँखों को हाथों से रगड़ा तो धुँधलापन कम हुआ था तभी उसे दिखाई दिया कि एक सज्जन मंदिर से निकलकर बाहर सभी को खाने का पैकेट बाँट रहे हैं। पास पहुँचकर उसने एक पैकेट मालती को भी दिया तो उसे पता नहीं कहाँ से एकदम सुप्रिया की याद आई थी,
''साहब एक और दे दीजिये, बेटी घर पर है।''
दूसरे हाथ में दूसरा पैकेट पहुँचते ही उसके अंदर एक अतिरिक्त ऊर्जा का संचार हुआ था और फिर वह बदहवास हालत में अपने बेटे से कहने लगी,
''ले ले बेटा, तू भी ले ले, प्रसाद है।''
...और आज अमित ने दोनों हाथ आगे बढ़ा दिये थे।
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
टिप्पणियाँ (2)add
...
द्वारा प्रेषित sumit , मार्च 19, 2008
:cry
report abuse
vote down
vote up
Votes: +0
...
द्वारा प्रेषित manisha , मार्च 28, 2008
it is really touchy
report abuse
vote down
vote up
Votes: +0
टिप्पणी लिखें
quote
bold
italicize
underline
strike
url
image
quote
quote
smile
wink
laugh
grin
angry
sad
shocked
cool
tongue
kiss
cry
smaller | bigger

busy
 





Subscribe Newsletter

हमारे बारे में : About Us

Tarakash Universe Ideas

Copyright 2007-08 Tarakash.com, All Rights Reserved | Tarakash Universe is powered by: Chhavi Media Services