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बन्धन: खण्ड 2 / अध्याय 15 |
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उपन्यास
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शुक्रवार , , 14 मार्च |
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मनोज सिंह
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एक नया जीवन, एक नयी राहें, मालती अमित के साथ स्कूल जाने लगी थी। शुरू-शुरू में कुछ अजीब ज़रूर लगा, कष्ट भी हुआ था। कुछ स्कूल के अध्यापकों ने उसे स्वीकार किया तो किसी ने चुहलबाजी की थी। शुरुआत में कुछ अनचाहे अनुभव भी हुए। फिर धीरे-धीरे चीज़ें व्यवस्थित होने लगी थीं। वह न तो किसी बात का शोर मचाती न ही किसी से बहुत अपेक्षा करती। उस स्कूल को अपने घर के जैसे मानते हुए उसकी साफ़-सफ़ाई करती। जिसने जो भी कार्य दिया वो खुशी-खुशी करना और धीरे-धीरे स्कूल में उसकी उपस्थिति दर्ज होने लगी थी। शुरू-शुरू में अमित को बहुत अच्छा लगा था। परन्तु कई बार स्कूल के दूसरे छात्र जो उसकी पढ़ाई से जलन किया करते थे, उसे अक्सर कुछ ऐसा कह देते थे कि उसके दिल में बात चुभ जाती। और वह मन ही मन कराह उठता। उसके दिल में एक ज्वाला-सी उठती जो फिर खुद के शरीर को अंदर ही अंदर जला कर राख कर देती। इसी में दबी कोई चिंगारी उसे और अधिक पढ़ने के लिए प्रेरित कर देती, और वह और अधिक नंबरों से हर कक्षा में अव्वल आता। इस तरह वह धीरे-धीरे बड़ा हुआ था। पढ़ाई का खर्च और किताबें जहाँ स्कूल से मिलती थी वहीं घर पर अब दो वक्त की रोटी भी मिलने लगी थी। मालती की भी इससे अधिक न तो चाहत थी और न ही इच्छा। अब उसकी एक ही अभिलाषा थी बेटे को पढ़ाना, खूब पढ़ाना और बड़ा आदमी बनाना। अमित इन्हीं सब बातों के बीच बड़ा हो रहा था। स्कूल में वाद-विवाद हो, सांस्कृतिक कार्यक्रम या खेलकूद, सभी में वह बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता। माँ भी अमित के स्कूल में इस तरह के विकास को नज़दीक से देखती और फिर खुशी से फूली नहीं समाती। जो सकारात्मक सोच के व्यक्ति थे वे मालती को अमित के नाम से बधाइयाँ देते, जो नकारात्मक थे उन्हें भी मजबूरीवश मुस्कुराना पड़ता। उनके पास जलने के अलावा कुछ नहीं था। ...और ज़िंदगी इस तरह से धीरे-धीरे समय के साथ कदम मिलाते हुए आगे बढ़ती चली गई थी।
उधर, सुनीता ने जीवन में अपनी परिभाषाएं सीमित कर ली थीं। उसके पास अपने संबंधों के कारण पैसों की कोई कमी नहीं थी।
अदिति छोटी-सी थी। शायद तीन या चार वर्ष की रही होगी... गुडिय़ा कहते थे सभी... कि अचानक उसके पिता का देहांत हो गया था। सडक़ दुर्घटना थी। सुनीता कई दिनों तक पागल-सी रही थी। मगर कोई भी साथ नहीं मरता। फिर बेटी भी तो थी। कोई रिश्तेदार नहीं कोई सगा-संबंधी नहीं। सिर्फ मोहल्ले वालों ने कुछ दिनों तक देखभाल की थी। धीरे-धीरे सेठ जी आने लगे। गुडिय़ा को प्यार करते। कुछ पैसे दे जाते। जहाँ वह घर और घरवाली से बेहद परेशान थे, वहीं सुनीता सुंदर, आकर्षक, ज़रूरतमंद थी। कब नये संबंध बन गए, पता ही नहीं चला। गुड़िया जब थोड़ी बड़ी हुई तो माँ को उसकी ज़िम्मेदारी का एहसास शुरू हुआ था। मगर तब तक वह सेठ जी के लिए समर्पित हो चुकी थी। बिना नाम के बंधन में बंध चुकी थी। बेटी को ताड़ की तरह बढ़ता देखती तो डर जाती... बड़ी हो जाएगी तो पता नहीं क्या सोचेगी। सेठ जी संबंधों को नाम दे नहीं सकते थे और वह सेठ जी को छोड़ नहीं सकती थी। उसे अपनी बेटी से भी बहुत प्यार था। वही तो उसके जीवन की एकमात्र आशा थी। सेठ जी से एक दिन सलाह-मशविरा किया और दिल पर पत्थर रखकर, दूर बड़े शहर में बोर्डिंग में डालने का निश्चय कर लिया। पैसों की कमी नहीं थी। वहीं स्कूल वालों ने नया नाम दे दिया 'अदिति'। इस तरह से लाड़ली बेटी गुड़िया, अदिति बन गई थी।
सेठ जी ने सभी सुविधाएं घर पर दे रखी थीं। धीरे-धीरे गैस का चूल्हा, फ्रिज़ सभी कुछ आ गया था। सेठ ने तो नये घर के लिए भी कहा था, मगर सुनीता ने ही मना किया था... कहती रही थी... यहाँ दो-चार लोग जान-पहचान के तो हैं... फिर शुरू से ही एक-दूसरे को जानते हैं... नयी जगह नयी परेशानी होगी। ...सो दिनभर तैयार होना, गाने सुनना और इधर-उधर घूमना। बस यही था। दिनभर सेठ जी का इंतज़ार, कभी आए कभी नहीं। कोई शिकायत नहीं थी, मगर समय कैसे काटे। बदनामी के डर से बिटिया को घर से बाहर तो भेज दिया मगर हमेशा मन ही मन उसको याद कर लेती। गर्मी की छुट्टियाँ हों या दीवाली, बेटी घर आती रहती थी, फिर चली जाती। ...और अदिति सब जानते और समझते हुए धीरे-धीरे बड़ी होने लगी थी। सेठ जी को अंकल पुकारती थी। और फिर जब सब कुछ जान ही गई तो फिर बेटी दूर रहे माँ को पसंद नहीं आया। बेटी भी माँ के साथ अपना अकेलापन बाँटना चाहती थी। छोटी-सी उम्र से ही हॉस्टल में रहकर रूखापन आ रहा था। उसे भी अपनी माँ से बेहद प्यार था। हाँ, हॉस्टल में रहने से, ज़रूरत से ज़्यादा समझदार और मज़बूत ज़रूर बन गई थी। मोहल्ले से प्यार तो था मगर बहुत ज़्यादा नहीं। फिर एक दिन ज़िद्द करके माँ की खातिर जबलपुर वापस आ ही गयी। शहर के कॉनवेंट स्कूल में सेठ जी ने एडमिशन भी करा दिया था। पढ़ने में होशियार थी। माँ की भी इच्छा थी कि अदिति खूब पढ़े और कम से कम उसकी जैसी न बने। वह उसे इतना ज़्यादा पढ़ाना चाहती, इतनी ऊँचाई पर देखना चाहती कि उसे समाज में इज़्ज़त मिले। पैसे की वैसे ही उसके पास कमी नहीं थी। और वह अदिति की पढ़ाई में किसी भी तरह के खर्चे से पीछे नहीं हटती।
अदिति अमित के बराबर की कक्षा में थी। मगर स्कूल भिन्न था। वह देसी स्कूल में था और यह कॉनवेंट में। ...कॉनवेंट स्कूल, जहाँ शहर के तमाम बड़े लोगों के बच्चे पढ़ा करते थे। जहाँ पैसा ही सब कुछ बोलता था। वैसे तो पैसे अदिति को भी जितने चाहिए, उतने मिल जाते, परन्तु बड़ा बनने की चाहत सुनीता ने अदिति में इस तरह से डाल दी थी कि वह भी अपनी कक्षा में सदैव अव्वल ही रहती। मगर उसे भी कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ता। जिसमें प्रमुख था उसकी पारिवारिक अवस्था, जो सभी छात्रों से भिन्न थी, इसलिए उसे कई बार निम्न घोषित कर दिया जाता। कुछ हद तक यह भी उसकी पढ़ाई-लिखाई और होशियारी के कारण ढक जाता। लेकिन फिर यही उसके समकालीन दोस्तों में जलन का कारण भी बन जाता था। परिणामस्वरूप अक्सर साथ पढ़ने वाली दूसरी छात्राएं उससे अच्छा व्यवहार नहीं करती। कोई सहेली भी नहीं बन पाई थी। और इसीलिए ज़्यादातर वक्त वह अकेले ही रहती, दूसरों की कही बातें चुपचाप सुन भी लेती, पर कई बार बहस कर बैठती थी। बहस में उसे कुछ फ़ायदा तो नहीं होता, परन्तु हाँ उसकी ज़िद्द उसे और ज़्यादा पढऩे के लिए मजबूर ज़रूर कर देती थी।
अदिति अपनी माँ से भावनात्मक रूप से पूर्ण रूप से जुड़ी हुई थी। अपनी माँ को उसने कभी ग़लत नहीं समझा था। उसकी उपस्थिति में भी आने वाला वह शख्स, जिसे वह अंकल कहा करती थी, माँ के कहने पर और समझाने पर उसके लिए बहुत ही आदरणीय हो चुके थे। अंकल के द्वारा दिया जाने वाला प्यार, अपनापन और उसकी हर ज़रूरतों को पूरा करने से, वह उसके लिए पिता के समान होते चले गए थे। अब तो वह भी उनके लिए कोई भी शब्द ग़लत सुनने के लिए तैयार नहीं थी। उधर, अदिति और अमित के बीच में रिश्ता साधारण और सहज था। किसी तरह की प्रतिस्पर्द्धा नहीं थी। दोनों के बीच समानताएं कम असमानताएं अधिक थी। हाँ, सिर्फ मंज़िल एक थी, आस्थाएं एक थीं, जीवन के मूल्य एक थे। अन्यथा अमित के पास कुछ भी नहीं था वहीं अदिति के पास सारे सांसारिक सुख थे। पढ़ाई में अमित सदैव अदिति से बीस ही पड़ता था। वह इस बात को स्वीकार भी करती थी। पर उससे होड़ लगाना उसे अच्छा नहीं लगता था। दोनों विभिन्न अवस्था में पल रहे थे, पर सामंजस्य अच्छा था, हालात एक से थे। दोनों के स्कूल, उनके रहन-सहन, यहाँ तक की बोली भी अलग थी। जहाँ अदिति अंग्रेजी माध्यम में पढ़ रही थी तो अमित हिन्दी में। अदिति मोहल्ले में लोगों से कम मिलती-जुलती, पर उसे प्यार सभी से था और लोग भी उसे भरपूर स्नेह देते। मालती को अदिति का घर आना-जाना कभी बुरा नहीं लगता और वह अक्सर अमित से पढ़ाई के सिलसिले में मिल लिया करती थी। ...और इस तरह धीरे-धीरे दोनों परिवार, मोहल्ले वाले समय के साथ-साथ आगे बढ़ते चले गए थे।
...खट्टे-मीठे अनुभव के साथ, अदिति जहाँ कॉनवेंट में धीरे-धीरे स्मार्ट होती चली गयी। वहीं पर अमित के व्यक्तित्व में ग़रीबी की रेखाएं साफ़ झलकती। सुप्रिया को घर में अकेले रहते-रहते, एक आदत-सी हो चुकी थी। अक्सर मोहल्ले के लोगों का सहयोग मिल जाता था। सैनी की बहू उषा या गीता घर का काम करते-करते कभी-कभी बीच में उसे देख जाती थी। परन्तु सुनीता सदैव सुप्रिया के लिए तैयार-सी रहती थी। वह मालती की अनुपस्थिति में उसका बेहद ध्यान रखती। सुप्रिया भी सुनीता के इस सहयोग पर हक़ जमाने लगी थी और धीरे-धीरे उसे माँ के समकक्ष मानने लगी थी। समय कभी रुकता कहाँ है और ज़िंदगी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी। परिवर्तन प्रकृति का नियम है और अदिति इस सत्य की सबसे बड़ी उदाहरण बन रही थी। लड़कियाँ जल्दी बड़ी व परिपक्व हो जाती हैं और उसमें शारीरिक परिवर्तन तेज़ी से हो रहा था। वहीं अमित के दसवीं कक्षा में पहुँचने तक, उसकी भी हल्की-हल्की दाढ़ी उगने लगी थी। शरीर भी उम्र के हिसाब से बढ़ रहा था। अब वह छोटी-छोटी बातों पर भी, माँ पर अपना हक़ जताने लगा था। उसके पुरुषत्व में विकास को देखकर मालती और सुप्रिया फूली नहीं समाती थी। सुनीता आँटी से भी उसे बेहद प्यार था। वैसे तो वह उनके घर कम जाता था। परन्तु सुनीता आँटी के द्वारा उसके लिए बनाये गए नये-नये खाने का आनन्द, उसे घर बैठे ही मिल जाता था। कभी सुनीता तो कभी अदिति या फिर दोनों अक्सर उसके लिए कुछ न कुछ बनाकर ले जाते और फिर दोनों परिवार घंटों गप्पें लगाता।
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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