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बन्धन: खण्ड 2 / अध्याय 16 |
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उपन्यास
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सोमवार , , 17 मार्च |
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मनोज सिंह
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दसवीं की मध्यप्रदेश बोर्ड की परीक्षा थी। रात-रात भर जागकर अमित ने बड़ी मेहनत से पढ़ाई की थी। बड़ा आदमी जो बनना था। वैसे बड़े की परिभाषा वह आज तक नहीं जान पाया था। हाँ, डाक्टर बनना है ज़रूर सोचा था। सुप्रिया सारी-सारी रात उसके साथ जागा करती थी। परीक्षा खत्म होने के बाद, अपने घर में वह सुप्रिया के साथ बैठा हुआ था। गर्मी का मौसम था। एसी की तो कल्पना भी क्या करना, कूलर भी नहीं था। पंखा भी समय के हिसाब से चलाना पड़ता था। बिजली का बिल जो बढ़ जाता था। वैसे तो खपरैल के मकान फिर मोटी-मोटी पुरानी दीवारें, गर्मी कम करती हैं। फिर भी ज़्यादातर पुरुष सिर्फ लुंगी-बनियान में ही घर पर बैठे रहते। औरतों का कष्ट असहनीय होता है। फिर चूल्हे में आप न तो पंखा लगा सकते और न ही कोई और उपाय था। माँ सुबह ही खाना बनाकर नहा-धोकर स्कूल चली जाती और अमित बाद में खुद भी खाता, सुप्रिया को भी खिलाता। आज गर्मी बढ़ने लगी तो उसने लुंगी तो पहने रखी मगर ऊपर की बनियान उतार दी थी। सुप्रिया से बात करते-करते भी थक गया था। लाइब्रेरी से लायी हुई किताबें पलट रहा था। मालती छुट्टियों में भी साफ़-सफ़ाई के लिए स्कूल जाया करती थी। उम्र के पड़ाव और हालात से बाल थोड़े जल्दी सफेद होने लगे थे। भरी दोपहरी में अमित दरवाज़े के खटखटाने पर चौंका था। राजू, पड़ोसी सोनकर जी का बेटा, आवाज़ लगा रहा था,
''अमित भाई तेरे से कोई मिलने आया है।''
अमित ने बाहर आकर देखा, दो सज्जन स्कूटर पर खड़े हुए थे।
''आप, अमित हैं?''
अमित ने बड़ी सहजता से सिर हिलाया था।
''हमें आपसे कुछ बात करनी है।''
सुनकर वह थोड़ा घबराया था। फिर भी पूछ बैठा,
''बताइये! किस संदर्भ में?''
''दसवीं की परीक्षा में, मध्यप्रदेश बोर्ड में आपने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। हम प्रेस से हैं। आपका इंटरव्यू लेने आए हैं।''
एक मिनट के लिए तो अमित समझ ही नहीं पाया। सबसे पहले दौडक़र अंदर से बनियान ऊपर से कमीज़ डालने लग पड़ा था। बटन लगाते हुए वापस बाहर पहुँचा तो अगला सवाल सुनकर शरमाया था,
''क्या आपके पास, आपकी कोई फोटो है?''
''जी नहीं, मेरे पास तो फोटो नहीं है।'' आँखों में मासूमियत उभर रही थी और अगले ही पल उसने नज़रें झुका ली थी। तभी साथ का दूसरा सज्जन कह बैठा,
''कोई बात नहीं, आप अच्छे कपड़े पहन आइये। मैं आपकी फोटो यहीं ले लेता हूँ।''
अमित एकदम से झेंप गया था। और कुछ न समझ आया तो तुरंत लुंगी उठाकर वापस अंदर दौड़ा था। पैंट के नाम पर स्कूल की ड्रेस के अलावा बस एक, दो साल पुरानी पैंट थी, वही पहन ली। शर्ट बदलने की आवश्यकता कहाँ थी और फिर थी भी तो एक ही। हाँ, बालों को कंघी से समेटा ज़रूर था और फिर कुछ देर तक अपने चेहरे को आईने में देखता रहा। अबकी बार बाहर जाने लगा तो पहले सुप्रिया को उसके माथे पर चूमा था। सुप्रिया जो उसे पिछले कुछ पल से जल्दबाजी में कपड़े बदलते हुए देख हैरान थी अब भी कुछ समझ न पाई थी।
''दीदी...'', यह शब्द सुनकर तो वह और अधिक हैरान हुई थी। जिसे वह ज़्यादातर वक्त सुप्रिया कहा करता था, आज दीदी कह रहा था।
''...मैंने दसवीं परीक्षा में, पूरे राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त किया है।''
सुप्रिया वैसे तो ज़्यादा कुछ नहीं समझती थी। पर थोड़ा बहुत अमित की दिनभर की बातें सुनते-सुनते कुछ-कुछ जानने लगी थी। यह ख़बर सुनते ही खुशी में, ''आ आ'' चिल्लाने लगी थी। बाहरी दो व्यक्तियों के आने से मोहल्ले के लोग भी इकट्ठा होने लगे थे। और अधिक शोरगुल होने लगा तो अदिति और सुनीता भी घर से बाहर निकले थे। अमित के घर बाहर लगी भीड़ देख अदिति ने कौतूहलतावश पूछा था,
''क्या हुआ?''
बाहर से आए हुए दोनों प्रेस रिपोर्टर ने तुरंत जवाब दिया था,
''अमित जी ने हाई स्कूल की परीक्षा में, पूरे मध्यप्रदेश राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। हम उनका इंटरव्यू लेने आए हैं।''
सुनते ही अदिति खुशी से उछल पड़ी थी और ताली बजाते हुए अमित के घर के अंदर घुसने लगी तो अमित बाहर निकल रहा था। इसी बीच उसने खुशी-खुशी में ज़ोर से अमित को एक मुक्का मारा था। अदिति की निश्छल हँसी उसके दिल की खुशी को ज़ाहिर कर रही थी। और उसने बिना किसी हिचकिचाहट के आगे कहा था,
''कांग्रेचुलेशन... मैं तो आज ही आँटी से बहुत सारी मिठाई खाऊँगी।''
अमित अब तक खुशी महसूस ही नहीं कर पाया था तो व्यक्त कैसे करता। हाँ, अदिति की बात सुनते ही मानो उसे कुछ अचानक याद आया हो,
''मैं माँ से मिलकर आता हूँ।''
और वह भीड़ को चीरता हुआ स्कूल की ओर, चप्पल पहनकर ही दौड़ पड़ा था। स्कूल प्रांगण में छुट्टियाँ होने के कारण चहल-पहल नहीं थी। माँ स्कूल की बिल्डिंग के किनारे के बागीचे में सफ़ाई कर रही थी। उसने दौड़कर माँ को पीछे से पकड़ लिया था। मालती कुछ समझ ही नहीं पाई थी।
''क्या हुआ? सब ठीक तो है।''
अब तक अमित के चेहरे पर खुशी उमड़ने लगी थी और कुछ छुपाने की कोशिश में वह धीरे से कह उठा,
''माँ दसवीं परीक्षा का रिज़ल्ट आ गया है।''
मालती कुछ समझ न पायी तो साधारण रूप में पूछने लगी थी,
''अच्छे नंबरों से पास हो गया होगा?''
स्कूल में इतने साल से कार्य करने से वह कुछ-कुछ समझने लगी थी। अमित माँ की बात सुन अचानक ज़ोर से उछलने लगा और फिर कहता चला गया,
''माँ, केवल पास ही नहीं हुआ हूँ... स्कूल में ही नहीं, पूरे राज्य में प्रथम भी आया हूँ। घर में पेपर वाले आए हुए हैं। मेरे से बातचीत कर रहे हैं। कल मेरा नाम और फोटो पेपर में छपेगा।'' अमित ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था।
यह सुनते ही मालती के हाथों से झाड़ू छूट गया था। पल्ला माथे से ठीक करते हुए उसने अमित को अपने सीने से लगा लिया था। आज आँखों के आँसू अचानक फिर उमड़े तो थे पर कहानी कुछ और कह रहे थे। अमित को इतना खुश उसने पहली बार देखा था। और वह पल्ले से अपने आँसुओं को पोंछने लगी थी।
''चल, सबसे पहले गुरुजी से उनका आशीर्वाद ले ले।'' यह कहते हुए वो उसे पकड़कर गुरुजी के कार्यालय की ओर ले गई थी। आज कदमों में एक उत्साह था, ज़मीन भी तो साथ दे रही थी तो फिर आवाज़ क्यों न निकले और उसके कदम तेज़ी से आगे बढ़े थे। आज वह कमरे से बाहर एक पल के लिए तो रुके और फिर बिना कुछ समझे अंदर हो लिये थे। मालती कुछ कह पाती इसके पहले ही अमित ने कहना शुरू कर दिया था,
''सर बोर्ड का परिणाम आ चुका है और मैंने दसवीं परीक्षा में राज्य में टॉप किया है'' और वह उनके चरण स्पर्श करने झुका था। गुरुजी के हाथ उसके सिर पर पहुँचे तो हटने का नाम ही नहीं ले रहे थे। और फिर शब्द थे जो भीगी आवाज़ में कुछ यूँ निकल पड़े,
''शाबाश। ...बेटा, इसी तरीक़े से अपनी माँ का नाम आगे भी रोशन करना। यह सब इसी की मेहनत का फल है।''
सुनकर मालती ने पलकें झुका ली थी। अमित कुछ समझ पाता, इसके पहले गुरुजी ने आवाज़ लगाई तो क्लर्क दौड़ा हुआ आया था।
''स्कूल में जो भी स्टाफ आया हुआ है सबको बुलाओ भाई, और मिठाई लेकर आओ।'' उनकी आवाज़ में जोश था और जेब से सौ रुपए का नोट निकालकर क्लर्क की ओर बढ़ाने लगे।
''क्या हुआ सर?''
क्लर्क स्वाभाविक रूप से पूछ रहा था, तो गुरुजी ने उसका विस्तार से उत्तर दिया और बाद में अमित को देखकर कहने लगे,
''...भगवान की विशेष कृपा है इस पर, इसने तो कमाल कर दिया, स्कूल का नाम रोशन कर दिया, ये हुई न बात... देखना यह एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा...''
सुनते ही अमित इस बड़े आदमी की परिभाषा से उलझ रहा था और उधर उतने में क्लर्क अति उत्साहित हो चुका था। सौ का नोट लेकर वह तुरंत मार्केट की ओर भागा था। सभी स्कूल के अध्यापक इकट्ठा हो रहे थे और मिनटों में ही अमित सभी का चहेता बन गया था। सबके साथ कुछ देर रुकने के पश्चात अमित घर जाने की ज़िद्द करने लगा था। उसे सुप्रिया और माँ के साथ अकेले दो पल बिताने की इच्छा हो रही थी। वैसे भी घर पर पेपर वाले इंतज़ार कर रहे थे और वह सबकी इज़ाज़त लेकर माँ को कंधे से पकड़कर प्रिंसिपल के कमरे से बाहर ले जाने लगा तो सभी की निगाहें उसी ओर निरंतर देख रही थीं।
घर पहुँचने पर अमित ने पाया कि सुनीता आँटी प्रेस वालों के लिए चाय बनाकर ला रही थीं। घर और मोहल्ले में उत्सव का माहौल था। सारे पड़ोसी इकट्ठे हो चुके थे। क्या छोटा, क्या बड़ा, क्या बूढ़े सभी घर के बाहर जमा थे। सुनीता आगे बढ़कर खुशियों का चिल्ला-चिल्ला कर इज़हार कर रही थी। वह यह भी भूल गई थी कि उसकी अपनी बेटी का भी रिज़ल्ट आना है। अदिति भी दो पल के लिए सब भूल चुकी थी। निम्न मध्यमवर्गीय समाज में ईर्ष्या द्वेष कम होता है। प्रतिस्पर्धा नहीं होती। सुख और दुःख बराबरी से बाँटे जाते हैं। फिर आदमी जब भावनात्मक रूप से जुड़ा हो, बचपन से एक साथ बड़ा हुआ हो, तो दूसरे की खुशियों में अपनी खुशी भी ढूँढ़ने लगता है। दूसरे की उँचाइयों में अपनी उँचाइयाँ महसूस करने लगता है। मोहल्ले का हर आदमी अपनी-अपनी बातें कह रहा था...
''मुझे तो पहले ही पता था कि अमित एक दिन नाम रोशन करेगा...।''
किसी ने कहा, ''अब तो भाई, मालती के बुरे दिन खत्म...।''
तो कोई कहने लगा, ''भाई अमित, हमें न भूल जाना...।''
हर तरह की बातें, हर तरह की सोच, अपनी-अपनी समझ और बुद्धि के हिसाब से प्रदर्शित हो रही थीं।
पेपर वाले ने जब अमित से पूछा, ''आप अपनी पढ़ाई का श्रेय किस को देते हैं?''
तो उसने बड़े सहज ढंग से कहा था,
''सारा श्रेय माँ को जाता है।''
''आपकी भविष्य की क्या योजनाएं हैं?'' प्रेस रिपोर्टर ने दूसरा सवाल दागा तो अमित बस इतना ही कह पाया था,
''मुझे तो खूब पढ़ना है।''
पेपर वाला प्रोफेशनल तरीक़े से पूछ रहा था।
''क्या बनना चाहते हैं आप?
''एक बड़ा आदमी।''
''बड़े से मतलब, बहुत पैसा कमाना चाहते हैं आप?''
अमित भोलेपन से इस बात का जवाब नहीं दे पाया था। बस इतना ही कह पाया,
''नहीं-नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं। मैं तो डाक्टर बनना चाहता हूँ।''
कुछ देर पश्चात, प्रेस वाला अमित की फोटो खींचकर, सब को नमस्कार करके जा चुका था। अमित की ज़िंदगी का यह पहला स्वर्णिम दिन था, एक बहुत बड़ा सकारात्मक परिवर्तन, एक ऐसा मोड़ जहाँ से नयी मंज़िल दिखाई देती। अदिति का स्कूल, सीबीएससी से संबंधित होने की वज़ह से उसका रिज़ल्ट आने में अभी वक्त था। इसके बावजूद उसे क्यों खुशी हो रही थी, इसका कारण उसे खुद भी नहीं पता था। घर के अंदर सभी महिलाएं इकट्ठा हो चुकी थी। गीता, कमला... मगर सर्वाधिक खुशी सुनीता के चेहरे से साफ़-साफ़ झलक रही थी, उत्साह से उठते उसके कदम को ज़मीन पर मानो ठिकाने की ज़रूरत नहीं थी। वैसे तो सैनी की बहू उषा भी आ गई थी। बंगाली के यहाँ से, सोनकर के यहाँ से सारी बहुएँ और सारे छोटे बच्चे जमा थे परंतु किसी को इसकी असल महत्वता का पता न था सिवाय इसके कि सारे ज़िद्द करने लगे कि अब तो मालती भाभी को मिठाई खिलानी ही पड़ेगी। मालती भी बहुत देर तक समझ न सकी तो चुप रही, वर्षों से दुःखों की आदत जो पड़ चुकी थी। खुशियों को स्वीकार करने में वक्त लग रहा था। कुछ देर बाद ही धीरे से बोल पाई थी,
''क्यों नहीं, मैं अभी मंगवाती हूँ।''
किसी को वह इसके लिए कह पाती कि बीच में सुनीता ने आगे बढ़कर कहा था,
''मैं कहती हूँ, किसी को लाने के लिए।''
गीता भी बहुत खुश थी। परन्तु कमला को यह कैसे बर्दाश्त होता कि खुशी में सारे आगे रहें और वह पीछे। सुनीता की तेज़ी उसे वैसे भी बर्दाश्त नहीं होती थी। वह हर चीज़ में सुनीता की बराबरी करने में लगी रहती थी। आगे बढ़कर कहने लगी,
''कौन जायेगा? मैं मंगवाये देती हूँ। ...अरे सुनते हो, जा के ज़रा शक्ति भंडार से बूंदी के लड्डू ले आओ।''
गुप्ता जी ठहरे सीधे सरल इंसान। उम्र के इस पड़ाव पर पहुँच चुके थे कि अब तो उनको अपनी धर्मपत्नी का कहना वैसे भी मानना पड़ता था। साइकिल उठायी, खुशी-खुशी आगे बढ़कर पूछने लगे,
''कितना लाना है?''
''अरे सब के लिए ले आइए और जल्दी जाइए।''
सुनीता ने चुटकी ली थी, ''चलो भई! आज तो कमला खिला रही है।''
''क्यों नहीं, मेरे बेटा जैसा है।''
बात-बात पर लोगों को ताने मारने वाली, जिसने कभी भी किसी को अपनी तरफ़ से एक प्याला चाय का भी न पिलाया हो, आज जोश में कह रही थी। यह देख सारे इसका मज़ा ले रहे थे।
एक ही पल में अमित की ज़िंदगी बदल चुकी थी। बातों का दौर चल ही रहा था कि एक सभ्य पुरुष ने मोहल्ले में अमित के बारे में पूछते हुए प्रवेश किया था। मोहल्ले में जो भी आ रहा था, उसे अब भीड़ का सामना करना पड़ रहा था। अब तक सोनकर के घर में स्पीकर लगा दिया गया था और कैसेट पर गाना तेज़ी से बजने लगा था। ...यह जबलपुर का रिवाज़ है ...इस शहर का एक बड़ा ही मनोरंजक पहलू। जब भी कोई खुशी का इज़हार करने का अवसर हो, उसका प्रदर्शन घर में तेज़-तेज़ आवाज़ में गाने लगाकर किया जाता है। और सोनकर भाई ने घर के दोनों बड़े-बड़े स्पीकरों को बाहर मोहल्ले के बीच में लगा दिया था। बातों का शोर ऊपर से तेज़ आवाज़ में गाने। यह मनोरंजन करने का अपना अचूक और अनूठा साधन है। किसी को किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं। सिवाय इसके कि बाहर से आए उस मेहमान को तेज़ हल्ले-गुल्ले के बीच बच्चों से पूछने में परेशानी हो रही थी,
''ये... अमित जी यहीं रहते हैं? ...उनसे मुलाकात हो सकती है?''
थोड़ा-सा आश्चर्य हुआ था बच्चों को, ...ये अमित जी कौन है? कुछ देर बाद ही पास खड़ा सोनकर का बेटा समझ पाया था,
''बड़े भाई, अपना अमित।''
''अरे वह अमित जी कैसे बन गया।'' पहला लड़का मुस्कुरा के मज़े ले रहा था।
''सामने घर में जहाँ भीड़ लगी है। वहीं रहता है अपना अमित भाई।'' दूसरे ने आगे बढ़कर कहा तो पहला बीच में बोल पड़ा था,
''बड्डे, जा तू मिलवा ला।''
अमित कुछ-कुछ आनन्द में डूबा हुआ था। तेज़-तेज़ गानों की आवाज़ में आज उसे भी मस्ती आ रही थी। वह इसी तरह के वातावरण में बचपन से पला और बड़ा हुआ था। नवागंतुक को अमित से मिलवाया गया और उसने कहने की कोशिश की तो बहुत देर तक अमित कुछ सुन न सका। कुछ सुनने व समझने का समय भी तो न था। मेहमान अपने हाथ में मिठाई का डिब्बा और फूलों की माला लिये हुए था। अमित को माला पहनाने के बाद, मिठाई का डिब्बा देने लगा तो मालती ने ज़रूर टोका था,
''मिठाई तो हमें खिलानी चाहिए।''
मालती घर से बाहर क्या निकली कुछ-कुछ बोलना और लोगों से बातें करना सीख चुकी थी। फिर भी किसी ने यह जानने की अब तक कोशिश नहीं की थी कि यह नवआगंतुक कौन है। कुछ देर बाद उस मेहमान ने अमित की ओर देखते हुए धीरे से खुद ही कहा था, ''जी मैं एक कोचिंग इंस्टिच्यूट का मैनेजर हूँ। सबसे पहले मैं आपको इतनी बड़ी सफलता के लिए बधाई देता हूँ।''
अमित अभी भी बाल्य अवस्था में ही था। अचानक मिली इतनी सारी खुशियाँ, उससे समेटी नहीं जा रही थी।
''ठीक है ठीक है। धन्यवाद!''
कुछ देर ठहरकर मैनेजर ने उसके कान में जब कहा कि, ''आपसे हमें एक काम है।'' तो बिना किसी समझ के अमित ने ज़ोर से कहा था,
''किस तरह का?''
''क्या आप हमें यह लिखकर दे सकते हैं कि आप हमारे कोचिंग इंस्टिच्यूट से पढ़ते थे।''
अमित को बात कुछ पल्ले नहीं पड़ी थी। बिना कुछ समझे ही कह बैठा,
''परन्तु मैं तो आपके कोचिंग इंस्टिच्यूट को जानता भी नहीं। फिर मैंने तो वहाँ से पढ़ाई भी नहीं की, फिर मैं क्यों लिख कर दूँगा?''
''नहीं! नहीं! आपकी बात तो ठीक है। पर हम आपको इसके बदले में कुछ पैसे देंगे।''
मैनेजर अब शरमाने लगा था। मालती अब तक नज़दीक पहुँच चुकी थी। कौतूहलता नये आदमी को लेकर उसे भी थी। अंतिम शब्द सुनते ही वह बीच में ही बोल उठी। उसे बात कुछ ठीक-सी नहीं लगी थी।
''भाई साहब! पैसे किस बात के, जब हमने आपके इंस्टिच्यूट से कुछ किया ही नहीं।''
मैनेजर इस बात का जवाब ठीक से सबके सामने नहीं देना चाहता था। सो अमित के पूछने पर भी बस इतना ही कहता रहा,
''जी अभी आप खुशियाँ मनायें, मैं फिर आऊँगा।'' यह कहकर मैनेजर तो चला गया मगर मालती को इस वक्त ज़्यादा दिमाग़ पर ज़ोर डालना ठीक नहीं लगा था और फिर वो सहेलियों से बात करने लग पड़ी थी।
शुक्ला जी का दिमाग़ तेज़ था। छोटी-छोटी बातों पर कान लगाये भी खड़े रहते थे, आदत थी। सुनते ही सब समझ गए थे। तुरंत कहने लगे, ''सुनिये, भाभी जी, यह जो इंस्टिच्यूट वाला है न, अब अमित का नाम उपयोग करेगा। लोगों को बतायेगा कि हमारे इंस्टिच्यूट में पढ़ने से ही यह लडक़ा पूरे राज्य में अव्वल आया है। जिससे लोग उसकी कोचिंग में ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ाई करने आयें। बस इतनी-सी बात है।''
मालती को बात समझ आई थी मगर चुप ही रही। कुछ देर ठहरकर सोचते हुए सुनीता ने ज़रूर कहा था,
''यह तो बहुत ग़लत बात है।''
कमला कैसे पीछे रहती... ''इसमें ग़लत क्या है, पैसे मिल रहे हैं, ले लो।''
मालती मुस्कुरा रही थी। अमित समझ नहीं पा रहा था। पैसे किसे बुरे लगते हैं। लेकिन ज़रूरत न हो तो आदमी उसके पीछे नहीं भागता। वैसे भी पैसे के पीछे भागना और चाहत दोनों ही मालती के स्वभाव में नहीं था। अमित तो फिर अभी छोटा ही था, परन्तु फिर भी एक मिनट, सोचने के लिए वह मजबूर हुआ था। मन ही मन सोचने लगा कि गुरुजी से इस बारे में सलाह करूँगा।
सभी लोग गुप्ताजी का इंतज़ार कर रहे थे। बीच में ही मालती उषा से कहने लगी,
''अरे, जो मैनेजर साहब मिठाई दे गए हैं। एक काम करो, उषा तुम इसे ही बाँट दो।'' उषा ने सबसे पहले मिठाई अमित को देनी चाही, लेकिन अमित ने सबसे पहले माँ को मिठाई खिलाई थी।
मालती ने धीरे से कहा था, ''बेटा दीदी को भी...''
अमित ने जब अपने हाथों से सुप्रिया को खिलाया तो सभी ने ताली बजाकर खुशी का इज़हार किया था। मालती और सुप्रिया की आँखों में आँसू थे। अदिति चुपचाप सारा नज़ारा देखकर मन ही मन प्रसन्न थी।
दूसरे ही दिन अमित, माँ के साथ स्कूल गया और मैनेजर एवं इंस्टिच्यूट के बारे में गुरुजी से चर्चा की थी। गुरुजी के अनुभवी दिमाग़ ने भविष्य की सोची थी... आगे की पढ़ाई करनी है तो पैसे भी लगेंगे... फिर एकदम कहाँ से पैसे आयेंगे? ...ऊपर से मेडिकल में पढ़ाई बहुत महंगी होती है। ...सोचने लगे, क्यूँ न अमित ट्यूशन पढ़ाने लगे। पैसे मिलेंगे। अब तो हर माँ-बाप अपने बच्चे को अमित से पढ़वाना चाहेंगे। कोचिंग वाले को भी क्या नुक़सान होगा। अमित का नाम देखकर वैसे ही लोग अपने बच्चे को वहीं भेजेंगे। सारी बातों पर सोच-विचार करके गुरुजी ने सलाह दी थी,
''कोचिंग वाले से बात कर लो, अगर शाम को अमित एक या दो घंटे उनकी कोचिंग में पढ़ाने में सहायता करे तो बदले में वो जो भी पैसा दें, उसे आगे के लिए जमा करो। मेडिकल में बहुत खर्चा होता है।''
गुरुजी के मार्गदर्शन पर ही अमित ने इंस्टिच्यूट के मैनेजर से बात की थी। मैनेजर को क्या चाहिए। फट से हाँ कह दी। और अमित ने अगले हफ्ते से ही इंस्टिच्यूट जाना शुरू कर दिया था।
उधर, कुछ दिनों बाद ही सीबीएससी का रिज़ल्ट भी आ गया था। अदिति ने भी बहुत अच्छे नंबरों में परीक्षा उत्तीर्ण की थी। अपने स्कूल में प्रथम थी सारे विषयों में विशिष्ट योग्यता। ...सुनीता फूली नहीं समा रही थी और सारे मोहल्ले में बिना माँगे ही मिठाई खिला आई थी। और फिर अपनी खुशियों का इज़हार वह क्यूँ न करे, उसके जीवन की भी वो पहली सफलता थी।
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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