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बन्धन: खण्ड 2 / अध्याय 17 |
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उपन्यास
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मंगलवार , , 18 मार्च |
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मनोज सिंह
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अमित अब कुछ दिनों के लिए शहर में चर्चा का विषय था। मोहल्ले और आसपास के हर माँ-बाप अपने बच्चे को अमित से पढ़वाने के लिए लालायित थे। स्कूल की संस्था ने भी अमित को बहुत कुछ देने की कोशिश की थी... पारितोषिक, सर्टिफिकेट, स्कॉलरशिप और कुछ पैसे भी। स्कूल में एक समारोह किया गया था। अपने ही स्कूल को, अपने बेटे के लिए, शाम को सजता हुआ देखकर, मना करने पर भी मालती ने सफ़ाई कुछ ज़ोर-शोर से की थी। उधर, ज़्यादातर अध्यापकों और दूसरे कर्मचारियों ने कहना शुरू कर दिया था।
''मालती अब तुम छोड़ दो यह सब काम।''
कोई कहता, ''अब यह अच्छा नहीं लगता।''
मालती चुपचाप मुस्कुराकर रह जाती। उसमें कहीं भी घमंड का लेशमात्र अंश नहीं था। उसके कम बोलने को सभी जानते थे। परंतु बात-बात पर, सिर और आँखें नीचे करने पर, भोलेपन और सादगी के सभी अब कायल होने लगे थे। कमर से लेकर सिर तक पहुँचने वाली साड़ी के पल्लू को हाथों से बार-बार व्यवस्थित करना उसके व्यक्तित्व का एक हिस्सा बन चुका था। जीतने वाले की शराफ़त अच्छी लगती है, हारने वाले की यह कमज़ोरी कहलाती है। ...दुनिया के देखने की नज़र में आज फ़र्क था मगर मालती इससे अंजान थी।
शाम को, जब अपने बेटे के बारे में स्कूल की संस्था के चेयरमैन और मैनेजर ने मंच पर अमित की तारीफ़ के पुल बाँधे, तो पीछे खड़ी भीड़ में मालती की आँखों में आँसू थे। उसे भी मंच पर बुलवाया गया था। चेयरमैन साहब से मिलवाने का उद्देश्य था। चेयरमैन ने बहुत तारीफ़ और प्रशंसा की थी। परंतु, हर प्रशंसा में कहीं न कहीं स्कूल, मैनेजमेंट की भी भूमिका बताने से वह नहीं चूक रहे थे। जिसको कहने की आवश्यकता बिल्कुल भी नहीं थी। हाँ, गुरुजी ने निश्छल मन से अमित और मालती सिर्फ दोनों की बड़ाई की थी और ईश्वर का धन्यवाद भी किया था। घर पहुँचकर अमित ने सारी बात सुप्रिया को बताई थी। अमित बहुत सारी फूलमालाएं, सर्टिफिकेट, शील्ड और पैसे सुप्रिया को दिखा रहा था। तीनों आज बहुत खुश थे। उनके जीवन में अचानक खुशियों की बहार आ गई थी। चूंकि इस परिवार की न तो बहुत ज़्यादा चाहत थी और न ही कोई बहुत बड़ी इच्छा तो फिर बिना चाहत और इच्छा के अगर कुछ मिल जाए तो खुशी का होना स्वाभाविक था।
अमित 11वीं में और ज़ोर-शोर से तैयारी करने लगा था। उसे बताया गया था कि पीएमटी की परीक्षा और 12वीं का बोर्ड बहुत कठिन होता है। शाम को कोचिंग इंस्टिच्यूट जाना, रात को पढ़ाई करना, सुप्रिया से लंबी बातें, इस तरीक़े से दो साल कब बीत गए उसे पता ही नहीं चला। अदिति से उसकी मुलाकात तो रोज़ होती पर हर बात के केंद्र में पढ़ाई होती। दोनों का स्कूल, माध्यम और किताबें सब अलग थी। हाँ, दोनों एक-दूसरे की किताबों को कौतूहलवश ज़रूर देख लेते। अदिति भी अपने स्कूल में आगे बढ़ती जा रही थी। 12वीं बोर्ड के साथ-साथ प्रदेश पीएमटी की परीक्षा दोनों दे चुके थे। अब बस रिज़ल्ट आने का इंतज़ार था।
अमित अपनी पढ़ाई से संबंधित सभी बात अदिति से बाँटता था। अदिति हमउम्र होते हुए भी उससे अधिक परिपक्व थी। वह अपनी अधिक जानकारियाँ, अधिक किताबें, बेहतर वातावरण और विभिन्न स्त्रोत कि वज़ह से उसे मार्गदर्शित करती रहती थी। दोनों के मध्य न तो कोई बैर था न ही प्यार। एक बेहतर सामंजस्य, जिसे अच्छे दोस्त की संज्ञा दी जा सकती है। अच्छे तालमेल से दोनों ने मिलकर पीएमटी दी थी। अमित पूर्णरूप से जवानी में कदम रख चुका था। दाढ़ी और मूँछ आ तो गए थे मगर उसे काटने की न तो उसने सोची, न ही इसका ज्ञान था उसे। वह बेहद शर्मीला, भावुक, दुनियादारी से दूर, आत्मविश्वास में थोड़ा कमज़ोर, मगर मेहनती और होशियार था। वहीं अदिति भी जवान तो हो चुकी थी मगर उसका ध्यान सजने सँवरने में बिल्कुल नहीं था। काली बिंदी, दो चोटी, ऊपर से शनिवार और रविवार में सिर पर खूब सारा तेल। ब्यूटी पार्लर का चलन तो उस वक्त बहुत कम था मगर कॉनवेंट की छात्राओं में थोड़ा-थोड़ा आ चुका था। स्कूल और क्लास में वह पिछड़ी और झल्ली मानी जाती थी। मगर आत्मविश्वास से भरी हुई, अच्छे विचारों की चमक चेहरे पर पढ़ी जा सकती थी। दुनिया की सारी बातें समझते और जानते हुए भी उनमें उसकी दिलचस्पी ही नहीं थी। उसे तो जीवन में कुछ बनना है बस। बहुत अधिक होशियार थी, ऊपर से मेहनत और लगन में कोई कमी नहीं थी। माँ ने सारी सुख-सुविधाएं ज़रूर दे रखी थी, लेकिन उसकी उसमें कभी दिलचस्पी नहीं होती। सीधा स्कूल के बाद घर और फिर पढ़ाई। मोहल्ले में सभी से समय-समय पर ज़रूरत के हिसाब से बात करती थी। मगर मालती आँटी और सुप्रिया उसकी पहली पसंद थे। बचपन से साथ-साथ पलते बढ़ते अमित पर उसका दोस्ती का अधिकार धीरे-धीरे कब जम गया, समय को भी पता न चला।
एक रात काफी बड़ी तादाद में लोग इकट्ठा होकर अमित के घर पहुँचे थे। पूछने पर पता चला कि शाम के न्यूज़पेपर में पीएमटी का रिज़ल्ट आ चुका है और अमित ने पीएमटी में भी सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया है। घर में उत्सव का माहौल हो गया था। पूर्व की भाँति सोनकर भाई बड़े-बड़े स्पीकर लगा चुके थे और आज स्पीकर के सामने नाच भी हो रहा था। इसका भी जबलपुर में खास प्रचलन है। शहर के तमाम न्यूज़पेपर वाले आज ज़्यादा बड़ी तादाद में अमित के घर थे। मालती को एक बार अनुभव हो चुका था। भीड़ देखकर उसने अंदाज कर लिया था। आज कोई कसर नहीं छोड़ी गई थी। पैसे की अब उतनी कमी भी नहीं थी उलटे ज़रूरत से अब थोड़ा ज़्यादा ही था। जबकि ज़रूरतें बिल्कुल नहीं बढ़ी थीं। अमित की कोचिंग के पैसे उसके पास सदैव भविष्य में मेडिकल कालेज की पढ़ाई के लिए सुरक्षित रहते। उसने फटाफट सोनकर के लड़के राजू को भेजकर दो-तीन किलो लड्डू मंगवा लिये थे। अब ललन भी थोड़ा बहुत दूध दे जाया करता था। रात को कई बार अमित को चाय की आवश्यकता हो जाती थी। मगर इतने से क्या होता, सड़क पार होटल से चाय भी मंगवा ली गई थी। आधुनिक युग है चाय के बिना आदर-सत्कार की कल्पना करना संभव नहीं। सब कुछ खिलाया, चाय नहीं पिलाई तो सब गड़बड़। दुनिया के लिए दुनिया के हिसाब से थोड़ा-बहुत तो करना ही पड़ता है।
अमित पुनः न्यूज़पेपर वालों के सामने था। अब तक वह भी पहले से अधिक परिपक्व और समझदार हो चुका था। अमित के ज़्यादा दोस्त नहीं थे। स्कूल के कुछ साथी कभी-कभी थोड़ा-बहुत पढ़ाई करने और उससे पूछने आते जाते रहते थे। आसपास से वे भी इकट्ठा होने लग थे। एक-दो तो न्यूज़पेपर भी ले आए थे। आज सुनीता को अदिति की चिंता थी। अदिति भी थोड़ी परेशान थी। न्यूज़पेपर के मोहल्ले में पहुँचते ही अदिति अपना रोल नंबर उसमें ढूँढऩे लगी थी। नीचे से ढूँढ़ना शुरू किया तो जैसे-जैसे वह ऊपर बढ़ रही थी, ढूँढ़ते-ढूँढ़ते नंबर न मिलने पर उसकी घबराहट बढ़ती चली गई थी। पर अंत में देखती है कि ऊपर से तीसरी चौथी लाइन में ही उसका भी रोल नंबर है। बस देखते ही वह ज़मीन से ऊपर उछल पड़ी थी।
माँ को चिल्लाते हुए उसने कहा था, ''माँ, मैं भी आ गई...''
''अच्छा!!! ...तेरा भी नाम आ गया बेटा?''
''हाँ माँ।''
सुनीत आज पहली बार भावुक हुई थी। उसका वर्षों का सपना पूरा हुआ था। अदिति दौड़ते हुए माँ की बाँहों में लिपट गई थी। अमित भी एक मिनट के लिए अपनी खुशियाँ भूलकर अदिति की ओर गया था और सुनीता और अदिति के पास पहुँचकर धीरे से कहने लगा,
''आँटी मुबारक हो। अदिति बधाई हो।''
अदिति अमित के कंधे को पकडक़र ज़ोर से कूद पड़ी थी और फिर उसने अमित के हाथों पर ताली मारकर अपनी खुशी का इज़हार किया था। मालती ने पीछे से अदिति के कंधों पर हाथ भर रखा था। सुप्रिया अंदर से आवाज़ लगा रही थी।
इस दृश्य को कैमरामैन ने कैमरे में तुरंत कैद किया था और दूसरे दिन के अखबार में अदिति और अमित प्रमुखता से छपे थे।
किसी न्यूज़पेपर की हेडलाइन थी, 'कीचड़ में कमल' तो कहीं 'ग़रीब मोहल्ले से दो डाक्टर'
वहीं किसी ने यह तक लिख दिया था, 'पढ़ाई किसी की मोहताज नहीं।'
अमित से ढेरों सवाल पूछे गए थे। सबका एक ही जवाब था।
''मुझे खूब पढ़ना है।''
''आप कहाँ जाएंगे? आगे की पढ़ाई करने।''
''मैं तो अपनी माँ और बहन के साथ यहीं रहूँगा।''
कोई कह बैठा, ''टॉपर है, जहाँ चाहेगा वहाँ एडमिशन ले सकता है।''
अगले दिन का सूरज दोनों परिवार के लिए विशेष रूप से उगा था। सुनीता ने आज खुलकर मिठाइयाँ बाँटी थी।
दोपहर में अदिति ने अपनी माँ से जब धीरे से कान में कहा,
''अंकल जी को भी बता देना।''
तो सुनकर सुनीता ने पहली बार अपनी बेटी से आँखें चुराई थी। शरमाकर कहने लगी ''तू ही बता दे, वह पूछते भी रहते हैं।''
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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