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बन्धन: खण्ड 2 / अध्याय 18 |
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उपन्यास
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बुधवार , , 19 मार्च |
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मनोज सिंह
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शाम होते-होते सेठ जी पेपर में ख़बर पढक़र खुद ही आ गए थे। थोड़ा अधेड़ हो गए थे। कुछ-कुछ शारीरिक तकलीफें रहने लगी थीं। चलने में भी तकलीफ़ होती थी। उधर, मोहल्ले वाले अमित और अदिति को उसी दिन से डाक्टर और डाक्टरनी कहकर पुकारने लगे। वैसे तो ज़्यादातर बच्चे अमित को बड़े भाई ही कहा करते थे। जबलपुर में अपनों को संबोधन करने का 'बड्डे' के अलावा यह एक और प्यारा तरीक़ा है। अब अमित अपने मोहल्ले, घमापुर बस्ती ही नहीं, पूरे शहर और संपूर्ण राज्य में एक चर्चा का विषय बन चुका था। कई जगह से उसे बधाइयों का ताँता लग गया। क्षेत्र के विधायक ने, आसपास के डाक्टरों ने, बड़ी-बड़ी संस्थाओं ने उसे मुबारकबाद दिया। बधाइयाँ, बड़े लोगों का आना-जाना, दर्जनी मोहल्ला कुछ दिनों के लिए शहर में प्रसिद्ध हो चुका था। अमित को कोचिंग इंस्टिच्यूट ने भी काफी कुछ देने की पेशकश कर डाली थी और क्यूँ नहीं देते। उनके तो दोनों हाथों में लड्डू थे। उनका इंस्टिच्यूट रातों-रात अमित के साथ प्रसिद्ध हो गया था। कोचिंग के मालिक ने इस बात को खूब उछाला था। अमित के फोटो के साथ इंस्टिच्यूट का नाम कई बड़े पेपरों में कई बार छपवाया गया और फिर कई महीनों तक छपता रहा। व्यावसायिकता थी। कोचिंग का उनका धंधा अचानक रातों-रात कई गुणा बढ़ गया। कोचिंग के मालिक, मैनेजर, दूसरे शिक्षकों का अमित के घर कई बार चक्कर लगा। अब वह उनका हीरो था। जिसका नाम वह अधिक से अधिक बेचना चाहते थे। बदले में जितना भी अमित को देते, कम ही था। इन सबके बावजूद एक मुख्य बात जो बार-बार उभरती वो थी अमित के पाँव अब भी ज़मीन पर ही थे, घमंड तो लेशमात्र भी नहीं आया था।
गुरुजी की खुशी का तो जैसे ठिकाना नहीं था। बूढ़े होते जा रहे थे। रिटायरमेंट नज़दीक थी। अपने बच्चों से अमित के बारे में कहते रहते थे। उनके बच्चे पढ़ाई में साधारण ही थे। उनके मन में भी कभी-कभी यह विचार ज़रूर आता कि भगवान बेटा दे तो ऐसा। परन्तु ईश्वर को कुछ और ही मंजूर होता है। सबका भाग्य अलग-अलग होता है। इस परम सत्य को गुरुजी जानते भी थे और समझते भी थे, इसीलिए तो अमित को देखकर भी उन्हें कभी कोई ईर्ष्या नहीं हुई थी। उलटा मन ही मन उसके लिए सदा दुआ करते। उन्हें उस पर गर्व था। बड़ी शान से लोगों को उसके बारे में बताते थे। अपने बच्चों के साथ अमित के घर बधाई देने के लिए भी आए थे। मालती ने दिल खोलकर उनका आदर सत्कार किया था। इस परिवार पर, उनका बहुत बड़ा एहसान था।
स्कूल की संस्था के मालिक और मैनेजर भी बारी-बारी से अमित के घर आए थे। आना ही था, अमित सफल जो हो चुका था। अब सभी कुछ न कुछ देने के लिए तत्पर थे। मगर आज हर देने वाले हाथों में कहीं न कहीं स्वार्थ छुपा था। क्या करें यही समाज की रीत है।
अमित के जीवन में अब परिवर्तन आ चुका था। लोगों के बताने पर वह कालेज की तैयारी करने लगा। उसके दिमाग़ में और कुछ था ही नहीं। फार्म में भी उसने अपनी पहली प्राथमिकता जबलपुर मेडिकल कालेज ही भर रखी थी। कुछ दिन पूर्व ही, वह एक बार अपने दोस्तों के साथ मेडिकल कॉलज भी घूम आया था। पास के घमापुर चौराहे से ही टैंपो, मिनी बस सीधे मेडिकल के लिए मिल जाया करती थी। शहर के दूसरे छोर पर मेडिकल कालेज था। कालेज की भव्य इमारत को देखकर अमित काफी उत्साहित हुआ था। चारों तरफ़ भीड़-भाड़, सफेद ऐप्रन पहने स्टेथिस्कोप लगाये हुए डाक्टरों की चहल-पहल, वार्डों में नर्स, वार्ड ब्वॉय, विभिन्न बीमारियों से ग्रसित रोगी और उनके रिश्तेदार और कुछ ठीक होकर वापस जाते हुए लोग, वह देखकर उनमें खो गया था। मेडिकल कालेज के आसपास काफी भीड़ थी। एक पल के लिए उसे लगा था कि वह शायद इस भीड़ में गुम हो जाएगा। घर से मेडिकल कालेज काफी दूर पड़ता था। लेकिन वहां पहुँचते ही उसके मन में कालेज पहुँचने की इच्छा बढ़ गई थी।
डाक के द्वारा मेडिकल कालेज के एडमिशन लैटर का इंतज़ार था। डाकिया अब दर्जनी मोहल्ले को ज़्यादा अच्छी तरह से पहचानने लगा था। पेपर में पढ़-पढ़ कर और अमित के लिए आने वाले बधाई लेटरों को देते वक्त वह भी कम खुश नहीं होता था। लैटर देने में उसे भी खुशी होती थी। एक बार तो वह मालती से बख़्शिश लेने भी आ गया था। देने को मालती क्या दे सकती थी, परन्तु अपनी खुशी में उसे भी मिठाई खिला दी थी। ललन कैसे पीछे रहता, एक दिन शाम को तैयार होकर वह भी साइकिल पर आया था। अबकी बार दूध देने नहीं, मिठाई खाने। अमित को बचपन से देख रहा है, सो बहुत प्यार किया और आशीर्वाद भी दे गया था। मालती ने भी कोई कमी नहीं रखी थी। मिठाई के साथ-साथ नमकीन और चाय भी साथ रखी गई थी। इतना अपनापन देख उसकी आँखों में भी पानी था।
घर पर सुप्रिया की खुशी का तो बयान ही नहीं किया जा सकता था। चेहरे पर चमक देखते ही बनती थी। शरीर में उत्तेजना को उसने महसूस भी किया था। मगर इन सब से अधिक और प्रभावशाली थी, उसकी आँखों में आशा की किरण। भाई डाक्टर बनेगा और सबसे पहले उसका इलाज़ करेगा। फिर वह भी ठीक होकर सबके जैसे जी सकेगी। बचपन से माँ और अमित ने उसके साथ मिलकर सपना देखा था। वो सपना उसका साकार होने जा रहा है। सपनों की दुनिया ही निराली है। इसकी कोई सीमा नहीं होती। किसी का इस पर ज़ोर नहीं।
जिस दिन पीएमटी का रिज़ल्ट आया था। अमित उसी दिन हाईकोर्ट के हनुमानजी के मंदिर और दुर्गा मंदिर गया था। मगर आज प्रसाद लेने नहीं, पहली बार प्रसाद चढ़ाने। हाथ जोड़कर ईश्वर की ओर नज़र की तो लगा मानो वो मुस्कुरा रहे हैं। मालती ने पूरे मनोयोग से भगवान का शुक्रिया अदा किया था। मंदिर का पुजारी अमित को जानने लगा था। वो मंदिर में कभी-कभी झाड़ू भी लगा दिया करता था। पंडित जी प्रसाद भी अपनी तरफ़ से ज़्यादा दे देते थे। कभी नहीं खाया था उसने प्रसाद मंदिर में। सदैव घर ले जाता था। आज मालती ने पुजारी के पैर छूकर आशीर्वाद लिये तो पंडित के चेहरे पर भी प्रसन्नता थी। मालती ने पूरे एक किलो लड्डू चढ़ाये थे और अमित को प्रसाद बाँटने में उस दिन बहुत आनंद आया था। सदा लेने वाले हाथ देने के लिए थोड़े ऊपर क्या उठे, काँपने लगे थे, जिसे देख मालती अपने आँसू रोक नहीं पाई थी लेकिन उसे आज छिपाने की कोई वज़ह दिखाई नहीं दे रही थी।
...दुर्गा और हनुमान जी के मंदिर याद आते ही, अमित वर्तमान में लौट आया था। उसकी आँखों में आँसू थे। ...कितने वर्ष हो गए उसे मंदिर गए हुए? सोचते ही उसका दिल बेचैन हो उठा। माँ हर बार जाने को कहती थी। कालेज तक तो अक्सर चला जाया करता था। मगर इधर कुछ वर्षों से... शायद माँ के देहांत के बाद तो बिल्कुल नहीं गया था। उसे लगा कि उसने ग़लती की है। अस्पताल से निकलकर ज़रूर जायेगा। मगर क्यों? अब क्या है ज़िंदगी में... कुछ भी तो नहीं। फिर ज़िंदगी से मिला भी क्या? क्या दिया भगवान ने? सिवाय दुःख के...। उसे याद भी नहीं आता कि उसने कभी कोई ग़लत काम किया हो। फिर उसे किस बात की सज़ा मिली? ...जहाँ तक रही निकिता की बात, तो उसने सदैव उसका साथ ही दिया। मगर बदले में भगवान ने उसे क्या दिया? ...उसे याद नहीं आता कि उसने कभी जी भर के खुशी देखी हो, सदैव संघर्ष ही रहा। हाँ, शुरू-शुरू में कालेज में ज़रूर मज़ा आया था। ...उसने आँखें खोली, सामने अदिति सोफे पर, अब भी आँखें बंद किए हुए बैठी थी। आकांक्षा उसकी गोदी पर सिर रखकर लेटी हुई थी। कमरें में शांति थी। घड़ी की आवाज़ बहुत ध्यान से सुनने पर ही सुनाई देती। काल का क्या, वो तो बिना आवाज़ के भी चलता रहता है। वर्तमान में अमित का मन नहीं लग रहा था, भूतकाल ने मस्तिष्क को हिला रखा था। आँखें बंद की तो पुरानी बातें फिर ताज़ा होने लगी थी। अमित पुनः अतीत में प्रवेश कर रहा था। उसे याद आ रहा था, कालेज का पहला दिन। वह अदिति के साथ ही तो गया था और वहीं सबसे पहले उसने निकिता को देखा था।
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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