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बन्धन: खण्ड 3 / अध्याय 19
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
गुरुवार , , 20 मार्च
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



 अमित को मेडिकल कालेज जबलपुर से कॉल लैटर आ गया था। उसी दिन अदिति को भी मिला था। दोनों को एक निश्चित तारीख़ पर जबलपुर मेडिकल कालेज जाना था। उसमें एडमिशन की फीस और दूसरी तमाम विस्तृत जानकारियाँ थी। फीस के पैसे देखकर अमित परेशान हुआ था। दो साल में कोचिंग इंस्टिच्यूट में पढ़ाने के पैसे, माँ की समझदारी से बैंक में जमा होते रहे थे। परन्तु फिर भी पैसे कम ही पड़ रहे थे। गुरुजी से चर्चा की थी। गुरुजी ने स्कूल की संस्था से, उसे एडमिशन फीस का कुछ हिस्सा एक पारितोषिक के रूप में, दिलवाने का वादा करवाया था। गुरुजी आज तक हर परेशानी में उसके साथ खड़े थे। बाकी बचा कोचिंग के मालिक ने देने का वादा कर दिया था। आगे के पाँच साल पढ़ाने का कांट्रेक्ट भी कर लिया था। अदिति को इन सब चीज़ों की कोई परवाह नहीं थी। सुनीता ने सेठ से बात कर ली थी। वह तो वैसे भी इस खुशी में ज़रूरत से ज़्यादा आनंदित थे। उनके खुद के बच्चे पढऩे-लिखने में तो होशियार नहीं थे, परन्तु घर का व्यापार संभालने में दिलचस्पी लेने लगे थे। उनका सुनीता के घर, उम्र के कारण आना-जाना कम तो हो गया था परन्तु दोनों परिवार पर वह एक-सा अधिकार और प्यार रखते थे।
मालती स्कूल में अब चर्चा का विषय बन चुकी थी। लोग उसे अब मज़ाक में कहने लगे थे, ''अब तो छोड़ दो यह सब, ...अब तो घर में आराम से बैठो।''
लेकिन मालती इस बात को हँस के टाल देती थी। बहुत ज़रूरी हुआ तो बस इतना कहती ...अब ज़्यादा ज़रूरत है। ...कालेज में अधिक खर्चा आता है। मोहल्ले में, सहेली गीता और उषा उसकी खुशियों को समझ सकती थीं। अलका से भी अमित को सदैव प्यार और मार्गदर्शन मिलता रहता। मगर कमला ज़रूर बातों-बातों में ताने मार दिया करती थी। ईर्ष्या प्रमुख कारण था। उसके बच्चे कुछ ज़्यादा पढ़ नहीं पाये थे। इसलिए अब अमित और अदिति खीज का कारण बनते जा रहे थे। इस खीज को वह अब, अमित और अदिति के संबंधों पर मज़ाक उड़ाकर, शांत कर लिया करती थी। यह उसका स्वभाव था। मोहल्ले के लोग उस पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते थे। दोस्तों और अदिति के समझाने और बताने पर, अमित के लिए दो पैंट और शर्ट के कपड़े बाज़ार से खरीदे गए थे। जूते उसके पास स्कूल के ही थे। वे ही कालेज में भी चल जाएँगे... ऐसी भावना थी। वैसे भी जूते काफी महंगे आते हैं। पहले से कुछ बेहतर पैंट-शर्ट सिलवाई गई थीं। दर्ज़ी से विशेष रूप से कहा गया था। बस्ती के दर्जी ने भी ज़्यादा कारीगरी दिखाते हुए अच्छे से अच्छे सिलने की कोशिश की थी। अमित अब एक नये जीवन में प्रवेश करने जा रहा था तो मन का उत्साह से भरा होना स्वाभाविक था।
कालेज के पहले दिन सुबह-सुबह माँ अमित के साथ, दुर्गा और हनुमान मंदिर हो आई थी। सुनीता और अदिति उनका इंतज़ार कर रहे थे। सेठ ने गाड़ी भेज दी थी। अमित ने कहा तो था,
''अदिति तुम चली जाना, मैं टैंपो से आ जाऊँगा। रोज़ तो फिर टैंपो से जाना ही है।''
 लेकिन अदिति के ज़िद्द करने पर और सुनीता आँटी के कहने पर वह मान गया था। मालती ने खुशी-खुशी विदा किया था। सुनीता ने साथ चलने के लिए तो मालती से भी कहा था मगर वह तैयार नहीं हुई थी। सुप्रिया से गले मिलकर, उसके माथे को चूमकर, अमित आज पहली बार कार में बैठा था।
कार में बैठने में उसे संकोच था। अब तक कभी बैठा नहीं था। बैठते ही उसे लगा कि मानो वह उड़ रहा है। वह गेट के हैंडल को पकड़कर काफी देर तक सीधे बैठा रहा, घबराहट में पीछे सीट से टिका भी न था। पीठ एकदम सीधे गर्दन सख्त, आँखें सामने स्थिर मगर डरी हुई। कुछ देर बाद ड्राइवर ने बड़े प्यार से दरवाज़े का हैंडल छोड़ने के लिए कहा तो सकपका गया था। 'गलती से भी हैंडल घूम गया तो खुल जाएगा', सुनकर एक मिनट के लिए हड़बड़ा गया था। चेहरे की हवाइयां उड़ने लगी थी। उसे यह भी नहीं पता कि हैंडल के घूम जाने पर गेट खुल सकता है। ...इतनी-सी बात ने हीन भावना को पैदा किया था। मानो दसियो बाल्टी पानी सिर पर डाल दिया गया हो। अच्छे मौसम में भी पसीना चू रहा था। और फिर वह नज़रें चुराने लगा था। ग़रीबी तो नहीं मगर कम जानकारी को अब छुपाने की कोशिश करने लगा था। थोड़ा बड़ा जो हो गया था। स्कूल में तो साथ के लोग उसे काफी हद तक जानने लगे थे। उनसे उसे परेशानी नहीं होती थी। बचपन से साथ-साथ बड़े हुए थे। परन्तु नये ज़माने के नये लोगों के बीच, जहाँ हर तरह के, हर समाज के, हर वर्ग के लोग आयेंगे, इतनी बड़ी विशाल और नयी दुनिया के बारे में सोच-सोच कर उसके मन में कहीं न कहीं डर भरा था। छोटे होने का एहसास था। आत्मविश्वास में कमी थी वह इस भावना को दुनिया से छुपाना चाहता था। उधर, अदिति आत्मविश्वास से भरी हुई थी। उसे हर तरह के लोगों के बीच में रहने की आदत थी। वह जानती थी कि नये लोगों का मुकाबला कैसे किया जाता है।
अमित ने यह भी सुन रखा था कि कालेज के प्रथम वर्ष में और खासकर मेडिकल कालेज में बहुत रैगिंग होती है। जिसमें आपको आपके ही कालेज के सीनियर, तरह-तरह से परेशान करते हैं। उसके मन में इस बात का भी बेहद डर था। कार की सामने की सीट पर बैठ कर उसने रोड के ट्रैफिक को पहली बार महसूस किया था। तेज़ी से दौड़ती गाड़ी लगता मानो बगल की साइकिल से भिड़ जाएगी। सामने से आती गाड़ियां लगता उस पर चढ़ जाएंगी। हर बार वह अपनी आँखें बंद करता और जब खोलता तो देखता कार अपना रास्ता बनाते हुए तेज़ रफ्तार से भागी चली जा रही है। मंज़िल पर बहुत जल्दी पहुँच गया था। कालेज की विशाल इमारत के सामने उतरा तो पाँव काँप रहे थे। शरीर जड़ हो रहा था मस्तिष्क में डर हावी होने लगा था। आज उसे इस बिल्डिंग के अंदर प्रवेश करना था। चारों तरफ़ नज़र घुमाई भीड़ ही भीड़। देखकर उसे ऐसा लगा कि वह इसमें कहीं गुम हो जाएगा। उसके स्कूल का एक भी दोस्त मेडिकल की परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाया था। उसको पहचानने के नाम पर सिर्फ सुनीता आँटी और अदिति साथ थे। लोगों की नज़रें बचाता हुआ, ज़मीन की ओर देखता हुआ, शर्माता, डरता वह एडमिन ब्लॉक में पहुँच गया था।
छात्र-छात्राओं की लंबी-चौड़ी भीड़ थी। सभी के साथ कोई न कोई था। अदिति पूछताछ कर आगे बढ़ रही थी। अमित पीछे-पीछे चल रहा था कि किसी के लड़ने की आवाज़ ने उसका ध्यान आकर्षित किया था। नज़र उधर पहुँची तो देखता है कि एक सज्जन पुरुष ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे हैं। कालेज के ऑफिस में, किसी बात पर लड़ाई कर रहे थे। बाबू ने हारकर झल्लाते हुए रजिस्ट्रार के पास जाने के लिए कहा तो तभी ऊँची-ऊँची आवाज़ सुनकर कोई भद्रपुरुष भीड़ को चीरते हुए वहाँ पहुँचा था। जिसे देखते ही बाबू उठ खड़ा हुआ और फिर बोल पड़ा,
''देखिये न सर, ये बेवज़ह मुझसे बहस कर रहे हैं।''
रजिस्ट्रार ने सारा मामला समझकर समझाने की कोशिश की, फिर भी वह सज्जन ऊँचा-ऊँचा बोल रहे थे। तभी साथ ही खड़ी सुंदर और आकर्षक लड़की ने बीच में अचानक टोका-टाकी की थी,
''छोड़िए न डैडी।''
''नहीं, इन लोगों को समझना चाहिए, मैं अपनी लडक़ी को कहाँ छोड़कर जाऊँगा?''
''हमने आपको लैटर में पहले ही बता दिया था कि हमारे पास लड़कियों के हॉस्टल में कमरों की कमी है, आपको अपना इंतज़ाम भी करना पड़ सकता है।'' रजिस्ट्रार समझाने की कोशिश कर रहा था।
''मैं अभी दिल्ली से फ़ोन करवाता हूँ, सरकारी कालेज है, आपकी मनमानी नहीं चलेगी। क्या समझ रखा है। हमें क्या बेवकूफ समझते हैं। मैं भी सरकारी अधिकारी हूँ।'' सज्जन लड़ने के मूड में दिख रहा था।
''जी देखिए, यह कोई मेरा कालेज तो है नहीं। और आप बेवज़ह नाराज़ हो रहे हैं। सरकारी है, नियम से ही हॉस्टल का कमरा अलॉट होगा। उसमें एक-दो दिन भी लग सकता है। आपको तो खुद वापस जाने की जल्दी है, अब अगर आप नहीं रुक सकते तो हम क्या करें। ...पहले सभी लोग जिनको हमने कॉल लैटर भेजा है, सब का सुनिश्चित तारीख़ तक इंतज़ार करना होगा। अगर मैरिट में ऊपर की छात्रा में से कोई नहीं आती है या किसी ने हॉस्टल नहीं लिया तो आपकी लड़की को मिल जायेगा। अन्यथा आपको स्वयं कुछ इंतज़ाम करना होगा।''
रजिस्ट्रार ने अंतिम कोशिश में विस्तार से समझाकर वहाँ से निकल लेने में ही अपनी भलाई समझी थी। मगर उस सुंदर और स्मार्ट छात्रा के पिताजी नहीं माने थे। बड़बड़ाते रहे। लडक़ी के बहुत समझाने पर ही वहाँ से हटे थे। तब कहीं जाकर लाइन में पीछे खड़े दूसरे छात्र-छात्राओं को मौका मिल पाया था। अमित ने उड़ती निगाहों से चारों ओर नज़र घुमाई थी उसने पाया कि लड़कियों की संख्या अपेक्षाकृत काफी अधिक थी। कालेज में आने से पहले उसने अब तक कम ही लड़कियों से बात की थी। उसका स्कूल भी सिर्फ लड़कों का ही था। उसके मन में लड़कियों के लिए झेंप और शरम थी। आज अचानक इतनी बड़ी तादाद में लड़कियां देखकर उसके मन में भी प्राकृतिक कौतूहलता तो जागी थी पर वह उसे अपने दिल के अंदर छुपा गया था।
अगले दिन उन्हें प्रथम वर्ष की प्रथम कक्षा में बैठना था। सुबह मालती ने अमित को खूब अच्छा नाश्ता कराया था। साथ में पहली बार टिफन में रोटी और सब्जी भी रख दी थी। नया-नया टिफन लेकर आई थी। उधर, अदिति ने अपनी माँ को समझाने की कोशिश की थी, परन्तु सुनीता कहाँ मानने वाली, वह आज फिर बेटी के साथ हो ली थी। कहने लगी... 'बस आज। वहीं कहीं बैठी रहूँगी और फिर तेरे साथ ही आ जाऊँगी। मुझे भी देखना है डाक्टर लोग कैसे पढ़ते हैं।' अदिति को अंत में मानना पड़ा था। अमित उसके साथ कालेज पहुँचा तो अदिति ने ही लोगों से पूछताछ की थी और फिर दोनों प्रथम वर्ष की कक्षा में जा पहुँचे थे। अमित के कालेज पहुँचते ही आज उसे दुनिया कुछ बदली-बदली सी लग रही थी। प्रथम आने का उसका सारा उत्साह, आत्मविश्वास, इस भीड़ में खत्म हो रहा था। काफी घबराया हुआ था। जितने भी लोगों से बात करता, अपने आपको उनके सामने छोटा महसूस करता। कुछ तो प्राकृतिक रूप से शर्मीला था और कुछ हालात के कारण भी आत्मविश्वास की कमी थी। छोटे स्कूल का, ग़रीब घर का, इतनी परेशानी तो होगी ही। क्लास रूम में घुसा तो अंदर से वो बहुत बड़ा लेक्चर हॉल था, जिसे देखकर वह दो मिनट के लिए चकराया था। वैसे तो अदिति उसके साथ थी फिर भी घबराहट में पसीना सिर पर उभरने लगा था। चारों ओर धीरे से नज़र घुमायी, वहाँ छात्र-छात्राओं की भीड़ इकट्ठा थी। उनके रंग-बिरंगे तरह-तरह के फैशनेबल कपड़ों को देखकर, वह एक बार फिर हीन भावना से ग्रसित होता चला गया था। एक पल के लिए उसे लगा कि वह इस भीड़ से दूर कहीं भाग जाये। अपने कपड़ों पर निगाह गई तो फ़र्क़ साफ़ महसूस हो रहा था। यह उसकी सोच थी। वैसे तो उसे कोई भी नहीं देख रहा था, परन्तु उसे ऐसा लग रहा था कि सब उसे घूर रहे हैं। और वह सबसे नज़रें चुराने लगा था। उन सभी में वह अपने आपको सबसे छोटा महसूस कर रहा था। छोटा होना और बड़ा होना यह आपकी अपनी मानसिक सोच होती है ...यह उसकी बुद्धि में अब तक नहीं आया था। वहीं अदिति आत्मविश्वास से भरी हुई थी। उसने अंदर जाते ही अमित से कहा था,
''तुम उधर बैठो, मैं इधर लड़कियों के साथ बैठती हूँ।''
अदिति सामने की लाइन में जहाँ बहुत सारी लड़कियाँ बैठी थी, उनके साथ ही बैठ गयी। पड़ोस की लड़कियों से वह थोड़ा बहुत बात भी करने लगी थी। अमित ने जब सुना कि वे सब आपस में अंग्रेजी में बात कर रही हैं तो उसके हाथ-पैर फूलने लगे थे। पैरों ने आगे बढ़ने से मना कर दिया था, लगता था ज़मीन में धँस जायेंगे। उसे तो अंग्रेजी में बात करना ही नहीं आता। आम बातचीत में न बोल पाने के कारण, उसमें एक डर और भय था। रोज़मर्रा की अंग्रेजी तो उसे बिल्कुल भी नहीं आती थी। वह चाहते हुए भी नहीं बोल सकता था। फिर आज तक इसकी आवश्यकता भी नहीं पड़ी थी। समझ तो थोड़ा जाता था। अदिति ने फिर से जैसे ही उसे मुड़कर देखा, वह शरम और डर से बगल की सीढ़ियों से चढ़ते हुए हॉल में सबसे पीछे की पंक्ति में जाकर बैठ गया था। वहाँ बैठकर सामने नज़र दौड़ाने की कोशिश की तो देखा लड़के चारों तरफ़ खूब एक-दूसरे से बातें कर रहे हैं, यह देखकर उसे थोड़ा चैन आया था कि उसकी तरफ़ पीछे कोई नहीं देख रहा था। शोरगुल बढ़ रहा था। लड़कियाँ अधिक बातें कर रही थीं। लड़के लड़कियों को देखकर उत्साहित थे। कुछ लड़के लड़कियों से कुछ न कुछ बात करने की कोशिश में भी थे। उठ-उठ कर लड़कियों की पंक्तियों में जाकर मिलते। वह बहुत देर तक इस नज़ारे को देखता रहा था। जब उसे यकीन हो चला कि उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं तब जाकर पाँच मिनट बाद उसने राहत की साँस ली थी। तभी उसके कंधों पर एक हाथ अचानक आकर पड़ा था।
''हाय... मुझे नेमा कहते हैं। श्याम नेमा और आप?''
उसके लिए यह सब बहुत अप्रत्याशित था। हद से ज़्यादा घबराते हुआ खड़ा होकर बोल बैठा,
''जी, सऽऽऽर, मैं अमित।''
''अरे यार मैं भी इसी क्लास में हूँ, सीनियर नहीं हूँ, बैठ-बैठ ...कहाँ से हो?'' नेमा बगल में बैठता हुआ पूछ रहा था।
''जबलपुर से।'' धीरे-धीरे बैठते हुए अमित ने कहा था।
''अच्छा, तो बड्‌डे जबलपुर के हो।'' बड्‌डे सुनकर अमित का चेहरा खिल गया था। उसने भी अंदाज लगाया... पक्का यह जबलपुर या उसके आसपास के क्षेत्र का छात्र है।
''...मैं पास ही नरसिंगपुर का रहने वाला हूँ। वैसे 12वीं मैंने जबलपुर से ही की है।''
 यह कहते हुए नेमा उसके और नज़दीक आ गया था। इतना नज़दीक कि पान से भरे हुए उसके मुँह में से तंबाकू की दुर्गंध सूंघी जा सकती थी। वह बड़ी बेफ़िक्री से बीच-बीच में सुपारियों को भी चबाने लगता। उसका देसी स्वरूप, सरल स्वभाव और हिन्दी को देखकर अमित को जैसे कि सहारा मिला था।
''...हमारी वहाँ पर ज़मीन है। पिता जी खेती करते हैं साथ में दुकान भी है। तुम लोग क्या करते हो?'' नेमा पान को चबाकर उसके रस को पी रहा था। थूक तो सकते नहीं और वह आदत से मजबूर था। मुँह खोलता तो सफेद दाँत लाल होते दिखाई पड़ते, चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी और हो भी कैसे अभी मेडिकल कालेज की रैगिंग होनी बाकी थी।
पूछे गए सवाल पर अमित ने आँखें नीची की थी और फिर धीरे से ही बोल पाया था,
''पिता बचपन में ही गुज़र गए थे।''
''ओह, आई एम सॉरी, यार।''
नेमा के चेहरे पर दुःख अचानक उभरा था और फिर आगे एक पल के लिए उन दोनों के बीच मौन ने स्थान ले लिया था। अभी एक-दो बार पान चबाया ही था कि अचानक कुछ याद आने पर कहने लगा, मानो जर्दा के असर ने दिमाग़ के दरवाज़े खोले हों,
''बड़े भाई, कहीं तुम वही अमित सक्सेना तो नहीं, एमपी टॉपर?''
''जी।''
''अरे यार तुम ने पहले नहीं बताया। ...बड्डे बधाई, पढ़ने-लिखने वाले बंदे हो... खूब पढ़ाई की होगी?''
अमित ने शरमाते हुए ''जी'' भर कहा था।
''बड़े भाई मज़ा आ गया, तेरे से मिलकर।''
नेमा की आँखों में खुशी थी। उसने एक हाथ से अमित को अपनी ओर खींचकर आत्मीयता और प्रसन्नता प्रकट की थी। अमित नेमा की ओर खिंचता चला गया था, जाने-अनजाने उसकी बातों में, अपने आप को सुरक्षित महसूस करने लगा था। और उसके साथ बातचीत में धीरे-धीरे भाग लेने लगा, बीच-बीच में ही वह अदिति को भी देख लेता। अबकी बार निगाह सामने गई तो अदिति अपनी सीट से ग़ायब थी, कुछ सोच ही पाता कि देखता है कि वह उसी की ओर बढ़ी चली आ रही है।
''तुम ठीक तो हो?''
अमित हड़बड़ा के खड़ा हो गया था।
''हाँ, हाँ।''
''ठीक है, मैं वहाँ बैठी हूँ। कोई बात हो तो मुझे बता देना।''
बड़े हक़ से बोलते हुए अदिति वापस चली गई थी। श्याम नेमा की आँखों में शरारत उभरी थी, पूछ बैठा, ''बड़े भाई, इनकी तारीफ़?''
''मेरे मोहल्ले की है। पड़ोस में रहती है।''
नेमा ने आँखों को घुमाते हुए कहा था,
''क्या बात है... ठीक है भाई...''
यह बात अमित को कुछ अटपटी लगी थी। फिर भी वह चुपचाप ही रहा। चारों तरफ़ नेमा ने नज़र दौड़ायी, एक से एक खूबसूरत और स्मार्ट लड़कियाँ, तरह-तरह के सुंदर वेशभूषा में वहाँ बैठी हुई थीं। और वह चुहलबाजी के मूड में आ चुका था अमित से पूछ बैठा,
''सबसे सुंदर तुझे कौन-सी लग रही है? ...तेरे मोहल्ले वाली को छोडक़र।''
अमित ने शरम के मारे अपनी आँखें नीचे कर ली थीं।
''ओ यार, देख वो तीन लड़कियाँ देख, क्या बात है, क्या चीज़ है।''
नेमा के कोहनी मारने पर उसने लगभग चोर नज़र से धीरे से उस ओर देखा था। ...ठीक कह रहा है नेमा, सोचने लगा था... ये तो कुछ ज़्यादा ही स्मार्ट और सुंदर है। अलग से बैठी हुई तीन लड़कियाँ आपस में बातें कर रही थीं। बात करने के ढंग और वेशभूषा से लग रहा था कि वह इस शहर की नहीं, बाहर की हैं। उसमें से एक वही थी जिसके पिता ने डीन ऑफिस में चिल्ला-चिल्ला कर सारा ऑफिस सिर पर उठा लिया था। उस छात्रा की सुंदरता देखते ही बनती थी, गोरा रंग, काले लंबे बाल, गोल चेहरा, चंचल आँखें और सुराहीदार गर्दन। शरीर और श्रृंगार खजुराहो की याद दिलाते, मानो मूर्तियां आधुनिक वस्त्र धारण कर इतरा रही हों ...एक बार देख लो तो बार-बार देखने का मन करता, और इस आकर्षण से अमित भी नहीं बच पाया था। कई बार तिरछी निगाह जाने-अनजाने उधर चली ही जाती।
''हैलो, ब्वॉयज'' एक स्मार्ट से लड़के ने तेज़ी से चहलकदमी करते हुए पास आकर, नेमा के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा था।
नेमा ने फट से अपना हाथ बढ़ाया था ''हैलो''
''मुझे विक्रम कहते हैं, विक्की, दिल्ली से।''
''मैं श्याम नेमा, नरसिंगपुर से।''
''यह नरसिंगपुर कहाँ है यार?''
''यहीं जबलपुर के पास।''
''अच्छा और आप डाक्टर साहब?''
विक्रम ने अमित की ओर इशारा करके पूछा था।
''जी, मैं अमित सक्सेना, जबलपुर से।''
''और भाई क्या चल रहा है आपके शहर में...'' विक्रम पास बैठते ही लगभग कुर्सी पर पसरने लगा था। अगले पल कुछ और बात न निकली तो श्याम ने ही बात आगे बढ़ाई थी,
''यह अमित है। एमपी पीएमटी का टॉपर।''
विक्रम ने उस बात को ज़्यादा तवज्जह नहीं दिया था। अब तक उसकी नज़र लड़कियों की पंक्तियों में उलझकर वहीं रुक गई थी। एकटक देखता हुआ कहने लगा
''अरे यार इस क्लास में तो बहुत ज़्यादा लोग हैं, यहाँ तुम लोग पीछे बैठकर क्या कर रहे हो। आगे चलो।''
''भई हम तो यहीं ठीक हैं।'' नेमा ने एक बार फिर बड़ी बेतकल्लुफी से पान को दांतों से रगड़ा और उसकी बातों को कोई ध्यान नहीं दिया था। अमित ने अपने आपको फिर छुपाने की कोशिश की थी। विक्रम के आने के बाद वह पुनः परेशानी-सी महसूस करने लगा था। विक्रम का आकर्षक व्यक्तिव, महंगे कपड़े, लंबा डील-डौल उसके दिल में कहीं न कहीं हीन भावनाओं को पुनः जागृत करने के लिए काफी था। कक्षा में शोरगुल धीरे-धीरे बढऩे लगा था। इतना बड़ा हॉल उसमें इतने सारे छात्र-छात्राएं, आवाज़ तो होनी ही थी। ...और फिर डीन व अन्य प्रोफेसर के आते ही शांति ने तुरंत कमरे पर कब्जा कर लिया था।

यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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