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बन्धन: खण्ड 3 / अध्याय 20
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
शुक्रवार , , 21 मार्च
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



...पुराने कालेज के दिन याद आते ही, अमित को एक बार फिर बेचैनी हुई थी। सुबह का उजाला छन-छन कर, अस्पताल के कमरे तक आ रहा था। रोशनी कमरे में दस्तक दे चुकी थी, मगर रात का अंधेरा उसके दिल से हटने का नाम नहीं ले रहा था। ध्यान बंटाने के लिए उसने चारों ओर नज़र घुमाई लेकिन अदिति वहाँ नहीं थी। आकांक्षा उठकर बैठी तो थी, मगर सिर को पीछे दीवार से टिकाया हुआ था। आँखें बंद और चेहरा शांत, सिर्फ साँसों से शरीर में होने वाले हलचल से उसके ज़िंदा होने का एहसास होता। आसपास से वार्ड ब्वॉय और आया की आवाज़ें धीरे-धीरे आ रही थीं। वार्ड में सफ़ाई शुरू हो चुकी थी। रेलवे का सरकारी अस्पताल होते हुए भी यहाँ दूसरे अस्पतालों से साफ़-सफ़ाई काफी बेहतर थी। लेटे-लेटे अमित और क्या करता... एक बार फिर अपने में लौटने लगा था। जीवन में इतनी शांति से वो पहली बार लेटा था। लेकिन वो भी एक मरीज़ के रूप में। अपनी सेहत की उसे कोई चिंता नहीं थी। हाँ, रह-रह कर निकिता की याद आते ही चिंता होने लगती। शरीर जब बीमार हो तो मन अधिक डरपोक और मस्तिष्क ज़्यादा चलायमान हो जाता है। अक्सर बिस्तर पर लेटे-लेटे पुरानी यादों के साये आँखों से गुज़रने लगते हैं। फिर दिल और दिमाग़ उनका अपने-अपने ढंग से विश्लेषण करता है। अच्छी चीज़ याद आने पर प्रसन्नता और बुरी बात पर दुःख मनाया जाता है। कई बार जीवन से प्यार तो कई बार पश्चाताप। आदमी एक दर्शक की भांति सिर्फ देखता ही रह जाता है, कुछ कर नहीं पाता। वैसे भी क्या किसी के करने से सचमुच में कुछ होता है? पता नहीं। कोई नहीं जानता। कोई भी विश्वास से नहीं कह सकता। और दिल और दिमाग़ के इसी द्वँद्व में पुनः पड़कर अमित एक बार फिर अपने जीवन को झाँकने लगा था...
निकिता का कालेज का सुंदर व मासूम चेहरा आँखों के सामने से तेज़ी से घूम गया था। ...विक्रम, अमित और श्याम, दोस्त तो नहीं पर हाँ, इन तीनों का एक ग्रुप बन गया था। अदिति अमित की वज़ह से बाकी दोनों लड़कों से बात कर लेती तो दिल्ली का होने की वज़ह से निकिता और राधिका से विक्रम ने जान-पहचान कर ली थी। इस तरह से अदिति, निकिता और राधिका का भी जाने-अनजाने एक ग्रुप बन गया था। ऐसा नहीं कि इनमें भी कोई दोस्ती थी। राधिका को तो हॉस्टल में कमरा पहले दिन ही मिल गया था। नर्सिंग हॉस्टल के कुछ कमरे अस्थायी रूप से अंडरग्रेजुएट फीमेल डाक्टर के लिए कर देने से, निकिता को भी कमरा शायद दूसरे दिन ही मिल गया था। राधिका ने भी साथ की वज़ह से अपना कमरा बदलवा लिया था। और वह निकिता के साथ ही हो गई थी। शुरू-शुरू में ही समझ आने लगा था कि राधिका काफी भोली और सीधी सादी है जबकि निकिता स्मार्ट और आकर्षक के साथ-साथ खूब बोलने वाली। अपने पिता की तरह उसे भी हमेशा तेज़ी और जल्दी रहती। पहली मुलाकात में ही कोई भी उसके पिता के प्रति यह भावना आसानी से बना सकता था कि वह काफी तेज़ इंसान हैं। हर बात पर अपनी बात को रखना और स्वयं को सबसे अधिक चतुर समझना। दिल्ली, एक ही शहर के होने के कारण शुरू से ही निकिता, राधिका और विक्रम में अच्छी समझ हो गई थी। निकिता के पिता के वापस जाने से पहले ही विक्रम ने निकिता से अच्छी दोस्ती कर ली थी। वो भी तो काफी तेज़ था।
''...अंकल आप चिंता न करें, फिर यहाँ इतनी दूर हम एक ही शहर से, एक-दूसरे का ख़याल नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा। आप बिल्कुल निश्चिंत होकर जायें। फिर हम लोग दिल्ली भी इकट्ठे ही आ जाया करेंगे। और जहाँ तक हॉस्टल की बात है तो निकिता को कमरा मिल चुका है और राधिका तो साथ है ही। हम सब मैनेज कर लेंगे।''
और फिर विक्रम ने अगले कुछ मिनटों में ही अपना सारा परिचय देकर निकिता के पिता का दिल जीत लिया था। दिल्ली की बिज़नेस फैमिली का लड़का था। साउथ दिल्ली में कोठी थी। मि. सूद, निकिता के पिता आकर्षित क्यों नहीं होते। विक्रम ने सूद अंकल से पास ही खड़े दोनों श्याम और अमित को भी मिलवाया था। अपनी जान-पहचान और ग्रुप भी दिखाना था। अमित के कारण अदिति भी पास ही खड़ी थी। ...अमित को अच्छी तरह याद है ...कालेज के शुरू-शुरू के दिनों में बना वो ग्रुप, काफी हद तक आख़िरी समय तक चला था। विक्रम ने बड़ी आसानी से, शुरू में ही निकिता को अपनी ओर आकर्षित कर लिया था। मि. सूद तो प्रभावित थे ही। अमित ने महसूस किया था कि मि. सूद विक्रम के सामने बड़ी आत्मीयता से पेश आ रहे थे। जबकि अब तक वह किसी और को इंसान ही नहीं समझ रहे थे। दिल्ली का स्मार्ट, बड़े बिज़नेसमैन का बेटा, पैसे वाला, शायद उनकी प्रवृत्ति में आकर्षित होने के लिए यह सब उसके पास आवश्यकता से अधिक था।
विक्रम ने शुरू से ही बाहर कमरा लिया था, कालेज के पास, शास्त्री नगर में। श्याम हॉस्टल में था। सरकारी कालेज, वह भी तक़रीबन तीस चालीस वर्ष पुराना। हॉस्टल की हालत अच्छी नहीं थी। कमरे शायद विक्रम के जीवनशैली के लिए छोटे थे। पर ज़्यादातर लड़के फिर भी हॉस्टल ही पसंद करते। अलग से बाहर रहने पर खर्चा अधिक आता है, सब नहीं कर सकते, फिर झंझट भी है। वैसे हॉस्टल में रहकर पढ़ने में फ़ायदा होता है पढ़ाई के साथ-साथ दोस्तों में समय कट जाता है। मैस का खाना शुरू-शुरू में बुरा नहीं लगता, फिर बाद में जब तक घर की यादें आती हैं, तब तक कालेज की पढ़ाई और रैगिंग से सब की आदत-सी पड़ जाती है।
अमित और अदिति रोज़ ही तक़रीबन एक साथ टैंपो से कालेज आते-जाते थे। एक बार काफी बेइज़्ज़त होकर मार खायी थी अमित ने। अमित को सीनियर पकड़कर हॉस्टल ले गए थे। टॉपर का नाम सुनते ही काफी पिटाई हुई थी। अमित समझ ही नहीं पाया था, उस दिन उसे टॉपर होना गुनाह लगा था। मासूमियत और भोलेपन की कीमत चुकानी पड़ी थी। कम बोलने को चालाकी समझकर, चेहरे पर थप्पड़ अधिक पड़ गए थे। फैंटम बनने के लिए शरीर के सारे कपड़े उतारने पर तो उसे लगा कि उसका हार्ट फेल हो जायेगा... किसी पराये के सामने नंगा होना फिर पैंट और शर्ट को उलटा कर पहनना उसके लिए मरने के बराबर था और फिर अधोवस्त्र को इनके ऊपर पहनते-पहनते तो फिर वह फूट-फूट कर रोने भी लगा था। उसकी ग़रीबी उसकी फटी हुई अंडरवियर और तार-तार बनियान में से झांक रही थी जिसे अब तक ऊपर के कपड़ों ने ढक रखा था। मज़बूत और तगड़े दो थप्पड़ खाने पर ही सीधे खड़ा हो पाया था। वैसे भी यह उसके जीवन का पहला तमाचा था। बहुत शरम आई थी उस दिन, जब लड़कियों का, खासकर अदिति का पूरा शारीरिक ब्योरा व नाप उसे देना पड़ा था। झूठ-सच बोलने पर ही देर रात छूट पाया था। घर पहुँचने पर सूजा हुआ चेहरा देखकर माँ भी घबराई थी। हाँ, अदिति के समझाने पर ही इसे कुछ दिन का कष्ट समझकर वह चुप हो पाया था। अदिति के नाम से सीनियर उसका अक्सर मज़ाक उड़ाते थे। और यही कारण था जो वह पहले डर फिर शरम के मारे अदिति से कटने लगा। उसके मन में चोर घर कर गया था। कोई मज़ाक न उड़ा पाये, वह अदिति से थोड़ा दूर रहने की कोशिश करता। टैंपो या बस से उतरते ही झट अलग हो जाता परंतु अदिति फिर भी उसके साथ ही रहने की कोशिश करती। उधर, राधिका और निकिता एक साथ कमरे में रहने से अच्छे दोस्त बन गए थे। विक्रम निकिता का पहले दिन से ही, कुछ ज़्यादा ही ख़याल रखता था। हाँ, श्याम अमित को पसंद करने लगा था और विक्रम को श्याम और अमित के साथ कोई परेशानी नहीं थी। परिणामस्वरूप इन छह का ग्रुप, क्लास की ज़्यादातर प्रैक्टिकल में, कैंटीन में, कॉफी हाउस में, लाइब्रेरी में एक साथ ही रहता था।
कैंटीन, कॉफी हाउस या फिर जैन होटल की कड़क चाय या ठाकुर होटल के भजिये, श्याम अमित के भी पैसे दिया करता था। हॉस्टल की चाय में मज़ा ही नहीं आता था। यहाँ की चाय या खाने का स्वाद ठेकेदार की इच्छा पर निर्भर करता, उसे कहाँ मतलब होता, वह तो पैसे कमाने आया है। श्याम अक्सर कालेज के ठीक सामने, सड़क पार के होटलों में चला जाता। और क्या करता? रैगिंग के बाद, पान खाने की तलब मिटाने यहाँ आना ही पड़ता था। अमित साथ जाने से अक्सर मना करता मगर श्याम जबरदस्ती करता था। हाँ, लड़कियाँ साथ कम जाया करती थीं।
निकिता को शुरू से ही बहुत सारी चीज़ों से परेशानी रहती थी। जबलपुर शहर उसकी सोच में बहुत छोटा, घटिया और पिछड़ा शहर था। बात-बात पर वह जबलपुर की खिल्ली उड़ा देती। विक्रम उसकी हर हाँ में हाँ मिलाता था। उसके हर नख़रे को सिर पर चढ़ाना उसकी आदत हो गई थी। छह के ग्रुप में तीन दिल्ली और तीन जबलपुर क्षेत्र के। निकिता की बात ही मानी जाती। दिल्ली से जबलपुर वैसे भी छोटा शहर है। यह बात सभी जानते और मानते थे, फिर इसमें बहस कैसी। मगर निकिता को दूसरों को छोटा साबित करने में आनंद मिलता था। वह अपनी हर बात को सही ठहराने की कोशिश शुरू से ही करती। अमित, श्याम और राधिका को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। मगर निकिता के बार-बार इस तरह से, हर चीज़ में नुक्स निकालने पर अदिति ज़रूर टोक देती थी। उसके स्वाभिमान को ठेस लगती थी। मगर एक बार निकिता ने बोलना शुरू किया तो रुकती नहीं, और फिर विक्रम को पूरा साथ देता देख अदिति भी एक-दो बार अपनी बात रखकर फिर चुप हो जाती थी।
अमित जवान तो हो चुका था मगर कुछ बातों से अब भी अंजान था। इस बात का तो उसे बिल्कुल भी पता नहीं था कि मेडिकल कालेज में ज़्यादातर लड़के अपने लिये जीवनसाथी, कालेज में ही, पहले दिन से ढूँढ़ना शुरू कर देते हैं। कुछ जोड़े बन भी जाते हैं और फिर बाद में शादी भी कर लेते हैं। लड़कियों का सहयोग मिलेगा या नहीं, बहुत-सी बातों पर निर्भर करता है। अदिति सादगी से रहती थी पर प्राकृतिक रूप से तो सुंदर ही थी। कालेज के सीनियर शुरू-शुरू में उसका काफी हाल बुरा कर देते थे। परंतु अदिति को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। उसका उद्देश्य पढ़ना और सिर्फ पढ़ना था। धीरे-धीरे सेकंड प्रौफ में आने तक लोगों ने उसकी ओर ध्यान देना बंद कर दिया था। लड़के, लड़कियों को एक सीमा तक ही तंग कर पाते हैं। अगर लड़की अपना काम करते रहे और उस ओर ध्यान ही न दे तो फिर लड़के भी हार कर नये शिकार की तलाश में निकल पड़ते हैं। उधर, राधिका इतनी सुंदर नहीं थी कि उसे कोई परेशान करे। साधारण तो थी ही और कुछ इस तरह से रहती भी नहीं थी कि वह और अधिक आकर्षक लगे।
निकिता पूरी तरह से विक्रम के ढाँचे में ढलने लगी थी। वह क्लास की सबसे सुंदर और आकर्षक छात्रा थी। सभी तरह के ड्रेस उस पर फबते। वैसे तो अक्सर जींस व टॉप ही पहनती मगर कभी-कभी अधिक कसे हुए छोटे-छोटे टॉप में से जवानी निकलने को बेताब दिखती। जिसे देख लड़के पागल हो जाते। फ़र्स्ट प्रौफ में ही वह सारे कालेज में चर्चा का विषय बन चुकी थी। सभी दिलचस्पी रखने वाले छात्रों ने एक-एक बार प्रयास किए थे। परंतु उसकी तुनक मिज़ाजी और बेहद आक्रमक रुख से अच्छे-अच्छे महारथी सहम जाते थे। शायद उसकी रैगिंग भी कम ही हो पाई थी। हर किसी ने हर तरह के हथकंडे अपनाये, मगर कोई भी सफल नहीं हो पाया था। हाँ, विक्रम साये की तरह उसके साथ रहता था। विक्रम के बाहर रहने से, साथ ही दबंग व्यक्तित्व और फिर जल्दी दोस्त बनाने की क्षमता से, उसकी भी रैगिंग कम ही हो पाई थी। वह तो यहाँ तक कहा करता था कि उसे एक बार भी रैगिंग में फैंटम नहीं बनना पड़ा था। एक बार भी नंगा नहीं हुआ था। निकिता के साथ-साथ वह भी कालेज में शुरू से ही चर्चा का विषय हुआ करता था। विक्रम ज़्यादातर वक्त निकिता को मोटरसाइकिल पर घुमाता रहता था। दोनों की अनुपस्थिति में श्याम अक्सर सुनाता रहता था, राधिका भी बताती कि वे अक्सर शाम को देर तक मोटरसाइकिल पर शहर में घूमते रहते थे। पिक्चर देखना, रात को बाहर खाना खाना, सेकंड प्रौफ आते-आते रोज़ का ही काम हो गया था। गर्मियों की छुट्टी में विक्रम, निकिता और राधिका को अपने साथ ही दिल्ली ले गया था। रास्तेभर उसने शायद राधिका से पानी तक के लिए भी नहीं पूछा था। उधर, निकिता के लिए सारे रास्ते हर काम के लिए तत्पर था। दोनों घंटों अकेले में रहकर बात करना पसंद करते और राधिका खिड़की से बाहर झांकती रहती। मगर राधिका को इससे कोई परेशानी नहीं हुई थी। हाँ, उसने श्याम से यह ज़रूर बताया था कि विक्रम दिल्ली में निकिता के घर भी कई बार हो आया है।
श्याम नेमा ज़मींदार घर से था। रैगिंग खत्म होते ही वह भी स्कूटर ले आया था। और राधिका को लेकर निकिता और विक्रम के साथ भेड़ाघाट भी घूम आया था। भेड़ाघाट शहर से 15-20 किलोमीटर दूरी पर, नर्मदा नदी के किनारे-किनारे संगमरमर की चट्टानों का आकर्षक दर्शनीय स्थल है। मेडिकल कालेज की दिशा में ही होने से, वहाँ से नज़दीक पड़ता है। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच सँकरी नर्मदा नदी में नाव की सवारी का अपना ही आनंद है। अमित और अदिति को भी चलने के लिए कहा गया था। परंतु अमित ने ही जाने से मना कर दिया था। उसके पास एक तो जाने के लिए साधन नहीं था और दूसरे उसे रविवार को ही अपने कोचिंग इंस्टिच्यूट में जाने का मौका मिलता था। कुछ पैसे मिल जाते थे। कालेज में खर्चे वैसे भी बढ़ गए थे। श्याम ने वापस आकर बताया था, 'विक्रम और निकिता काफी ज़्यादा नज़दीक आ चुके हैं।' निकिता बेहद आकर्षक तो थी, पर उसका स्वभाव बड़ा विचित्र था। बात-बात पर गुस्सा हो जाना, किसी को कभी भी कुछ भी कह सकती थी। अगर एक बात भी उसके दिल की न हो तो गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच जाता था। खाने में ज़रा-सी खराबी हुई नहीं की, चिल्ला-चिल्ला कर सारा हॉस्टल सिर पर उठा लेती थी। राधिका ने एक दिन बताया था, कमरे में ज़रा-सी गंदगी के लिए, उसने उससे एक दिन भरपेट लड़ाई की थी। बेवज़ह। पहले तो राधिका उसे समझाती रही जब वह नहीं मानी तो कमरे में सफ़ाई करने लगी थी। पर निकिता ने पूरे हॉस्टल में हंगामा मचा दिया था। राधिका ने उसे शांत करने की बहुत कोशिश की थी, परंतु वह उस पर चिल्लाती रही। उस दिन राधिका काफी परेशान हुई थी। दिनभर क्लास में भी मन नहीं लगा था मगर निकिता के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी।
''तुम क्यों उसकी बातें सुनती हो, फिर अगर उसे ज़्यादा ही शौक है तो तुमसे अलग दूसरे कमरे में रह ले। फिर उसका भी तो फ़र्ज़ है, कमरे में सफ़ाई करने का।''
अदिति ने बिल्कुल साफ़-साफ़ सीधी-सीधी बात कह दी थी, परंतु राधिका ने कोई भी जवाब नहीं दिया था। उधर, निकिता को तो जैसे कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ा था। मस्ती से विक्रम के साथ कॉफी हाउस में नाश्ते के लिए चली गई थी। दोपहर में जब श्याम को पता चला कि राधिका ने सुबह से कुछ नहीं खाया है तो वो ही उसे जबरदस्ती कैंटीन ले गया था। श्याम और राधिका भी कब से धीरे-धीरे नज़दीक आते चले गए, अंत तक अदिति और अमित को भी पता नहीं चला था। यहाँ तक की अंतिम प्रॉफ में सगाई के कार्यक्रम की घोषणा होने तक उन्हें भनक भी नहीं हो पाई थी। दोनों ने जहाँ अंत तक रिश्तों की गरिमा बनायी रखी वहीं विक्रम और निकिता पूरे कालेज में एक आकर्षक जोड़े के रूप में, बिना किसी नाम या बंधन के, अपनी पहचान बना चुके थे।
निकिता विक्रम के फ्लैट पर आने जाने लगी थी। शुरू-शुरू में कालेज में बहुत चर्चा हुई, फिर धीरे-धीरे दोनों को लोगों ने स्वीकार कर लिया था। एक से एक आकर्षक कपड़े, निकिता पर हर ड्रेस बहुत अधिक जँचती थी। वह विक्रम के साथ अक्सर घूमने-फिरने में ही सारा समय बिताती थी। वहीं पढ़ाई के लिए अमित का सहयोग लेती, उस पर पूरा अधिकार समझती। ज़रा-सी कोई भी बात होती तो अमित पर अपना पूरा रौब दिखाने लगती थी। अमित को क्लीनिकल में उसके हिस्से का प्रैक्टिकल भी करना पड़ता तो कई बार नॉन-क्लीनिकल के लिए नोट्स भी लिखना पड़ता। और अगर वह नहीं करता तो हाथ पकड़ लेती फिर घंटों उससे बहुत बहस करती। विक्रम को इस बात से ज़रा भी तकलीफ़ नहीं थी। निकिता, अगर श्याम और अमित से बातें करें या घूमने जाये तो उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, उन पर पूरा विश्वास था। मगर कोई और निकिता के नज़दीक आये उसे पसंद नहीं था। वहीं विक्रम किसी और लड़की से बात भी नहीं कर सकता था। निकिता यह बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पाती।
विक्रम मस्त स्वभाव का था। स्वयं, कभी भी, किसी भी बंधन में, बंधना नहीं चाहता था। परंतु निकिता के झगड़ालू स्वभाव की वज़ह से वह उसके सामने किसी और लड़की से बात भी नहीं करता। शायद निकिता को खोना नहीं चाहता था या हो सकता है डरता हो। परंतु सीनियर होने पर सुंदर और आकर्षक जूनियर लड़कियों को छेड़ता रहता और छुप-छुप कर बातें भी कर लेता और उनसे मिलता भी था। अकेले में, श्याम और अमित के सामने अक्सर अन्य लड़कियों का ज़िक्र किया करता था।
कई बार तो श्याम और अमित बड़ी मुसीबत में पड़ जाते। निकिता के लड़ने पर विक्रम, श्याम और अमित से गवाही के लिए कहता। जब तक अमित यह नहीं कह देता कि विक्रम किसी से भी नहीं मिलता, बात भी नहीं करता, तब तक वह नहीं मानती थी। अमित कई बार बताने की सोचता कि वह झूठ कह रहा है, परंतु निकिता के सामने उसे कहने की हिम्मत ही नहीं हो पाती थी।
अमित को शुरू से ही बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ी थी। स्कूल में तो सब कुछ हिन्दी में था। यहाँ अंग्रेजी अपने आप में उसके लिए एक परेशानी थी। धीरे-धीरे मेहनत से अंग्रेजी में वह पढ़ने तो लगा था, होशियार तो था ही। परंतु अंग्रेजी में बातचीत करने में हिचकिचाहट से, निकिता उसका मज़ाक उड़ा दिया करती थी। जिसके कारण उसमें हीन भावना बढ़ जाती। वैसे लगन, परिश्रम और तेज़ दिमाग़ से पढ़ाई में सदैव आगे रहता। सभी प्रोफेसर और वरिष्ठ डाक्टरों की निगाह में आ चुका था। उसकी पढ़ाई की पकड़ के आगे सब कुछ फीका-फीका सा हो जाता था। उसने अपनी भाषा की कमज़ोरी को कभी भी आड़े नहीं आने दिया था। वह सभी का चहेता था। सीधा-सादा और सब के लिए आसानी से उपलब्ध। कई बार निकिता को विक्रम के साथ गायब हो जाने पर, प्रोफेसर की निगाह से बचने के लिए, लैब की प्रॉक्सी मारने में, अमित का सहयोग लेना पड़ता। लैब इंचार्ज अमित की बातों को अक्सर मान जाया करते थे। वह क्यूँ ऐसा करता, उसे भी नहीं पता था। शायद ग्रुप में होने की वज़ह से दोस्त होने का फ़र्ज़ अदा करता था या फिर साथ-साथ रहने से भावनात्मक रूप में जुड़ गया था। वैसे भी वह बचपन से बहुत भावुक था।
प्रथम प्रौफ के अंतिम दिनों में एक बार एनाटॉमी हाल में लैब अटेंडेंट ने पकड़ लिया था। निकिता के व्यवहार से उसे पहले भी कई बार चोट पहुँची थी। एक बार तो वह कई दिनों तक लोगों में बड़बड़ाता रहा था,
''पता नहीं अपने आप को क्या समझती है। यहाँ तो अच्छे-अच्छे डाक्टर इस तरह से बात नहीं करते। ...मुझे सफ़ाई करना सिखाएगी। ...फार्मलीन की गंध आती है तो डाक्टर क्यूँ बनने चली आयी। ...मेरी कम्पलेंट करके देखे फिर बनकर देख ले डाक्टर।''
बात दूसरे लैब अटेंडेंट तक न फैल जाए उससे पहले ही श्याम और विक्रम ने बात सँभाल ली थी। उस बार तो मान गया था मगर अब मानने को तैयार नहीं था। एनाटॉमी के प्रोफेसर बहुत सख्त मिज़ाज के थे। लैब अटेंडेंट ने प्रोफेसर से शिकायत की तो वह बहुत नाराज़ हुए थे। दूसरे दिन निकिता और विक्रम की पेशी थी। साथ में अमित को भी बुलाया गया था, प्रॉक्सी के लिए वह ही ज़िम्मेदार था। अमित बुरी तरह डर गया था। मगर विक्रम और निकिता के चेहरे पर कोई चिंता या शिकन नहीं थी। यह देखकर अमित चकराया था। किसी और ने ग़लती की, मस्ती भी की और सज़ा वह भुगते। प्रोफेसर के सामने, श्याम के समझाने पर, अमित ने निकिता के लिए मुर्दे से डर का बहाना बनाया था। अमित की पढ़ाई और टॉपर होने के कारण, प्रोफेसर ने निकिता को तो छोड़ दिया था। लेकिन विक्रम कई दिनों तक एनाटॉमी हाल में मुर्दों के साथ सिर पीटता रहा और बहुत मुश्किल से पास हो पाया था।
दूसरे प्रौफ में भी यह सिलसिला पैथोलॉजी और गायनी क्लीनिकल लैब में चलता रहा। अमित से हाथ-पैर जोड़कर विक्रम और निकिता अपना काम निकलवा लेते थे। परंतु सर्जरी के क्लीनिकल में अमित ने मना कर दिया था। प्रोफेसर, नर्स, लैब अटेंडेंट सभी सख्त मिज़ाज के थे। अदिति जहाँ इन सब बातों को बहुत ज़्यादा तवज्जह नहीं देती, सदैव अपनी पढ़ाई से मतलब रखती, वहीं राधिका और श्याम हंसमुख स्वभाव के थे, सकारात्मक सोच में सदैव मुस्कुराते रहते और समय-समय पर दोस्तों का साथ देते रहते। उधर, विक्रम और निकिता के बीच में आपस की नोकझोंक भी चलती रहती। जिसे देख अदिति को कभी-कभी गुस्सा आता, मगर श्याम और राधिका अक्सर चुपचाप सब कुछ देखते रहते और जहाँ ज़रूरत होती मस्ती कर लेते और जहाँ ज़रूरत होती पढ़ लेते थे।

यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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