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बन्धन : खण्ड 3 / अध्याय 21
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 2
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
सोमवार , , 24 मार्च
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



द्वितीय प्रौफ के प्रिवेंटिव मेडसिन में श्याम उलझा हुआ था। हॉस्टल से बाहर कमरा लेने से काम बढ़ गया था। ऊपर से इम्तिहान सिर पर थे। कुछ समझने के लिए अमित के साथ लाइब्रेरी में था कि तभी निकिता गुस्से में विक्रम को ढूँढ़ते हुए वहाँ आ धमकी थी। श्याम ने मुस्कुराते हुए जान-बूझकर मज़ाक में कहा था,
''हमें क्या पता, तुम्हारे साथ ही होना चाहिए।''
''श्याम मज़ाक नहीं करते, किसी लड़की के साथ तो नहीं देखा?''
''अरे भाई हम क्यों देखने लगे।''
सुनकर निकिता का गुस्सा बढ़ने लगा था। आँखें गर्मी फेंकने लगी तो श्याम ने शांत करते हुए पूछा था, ''क्या हुआ?''
''पता नहीं, सुबह से गायब है।''
इतने में ही दूर से विक्रम को आता देखकर श्याम के साँस में साँस आई थी,
''वह लो, आ तो गया।''
''कहाँ थे? किसके साथ मस्ती कर रहे थे, तुम।''
निकिता बैठे-बैठे अचानक पीछे मुड़ी और विक्रम को देखते ही ज़ोर से चिल्लाते हुए पूछा था। लाइब्रेरी की शांति में ज्वारभाटा आ गया था, सभी उस ओर देखने लगे थे। विक्रम ने उसे कंधे से पकड़कर धीरे से मुस्कुराते हुए कहा था,
''धीरे बोलो, सब लोग देख रहे हैं?''
''क्यूँ, तुम्हें शरम आती है क्या? कहाँ हो सुबह से?'' आवाज़ की तेज़ी में कोई कमी नहीं थी। विक्रम ने चारों ओर देखा... सभी बड़ी तीखी नज़रों से उसे घूर रहे थे। श्याम ने दोनों को बाहर चले जाने के लिए धीरे से कहा तो निकिता झल्लाते हुए बोली थी,
''तुम बीच में मत बोलो श्याम, मैं विक्की से बात कर रही हूँ।''
''अच्छा चलो बाहर बात करते हैं।''
विक्रम उसे हाथ से पकड़ता हुआ बाहर ले गया था। और फिर कॉरिडोर में काफी देर तक दोनों में झगड़ा होता रहा। बाद में किसी तरह विक्रम ने उसे मनाया था और अंत में साथ कहीं बाहर ले जाने में सफल रहा था मगर शाम कॉफी हाउस में आया तो कुछ परेशान-सा लगा था। वो एक अलग बात है कि कुछ देर बाद खुद ही बोल पड़ा,
''बहुत तेज़ दिमाग़ है यार, क्या बताऊँ, हिटलर है। हर बात पर तानाशाही। हर बात पर झगड़ा। प्यार से बात ही नहीं करती। कई बार लगता है प्रेमिका नहीं किसी हेडमास्टरनी से मिल रहा हूँ। मैं कोई बंधुआ मज़दूर तो हूँ नहीं। फिर सभी को हर संबंध में थोड़ी-बहुत तो स्वतंत्रता होनी ही चाहिए, और मिलती है यार...। मगर ये तो मुझे लोहे की जंजीर में बाँधकर रखना चाहती है। कोई साला इस तरह से थोड़े न बँधता है। ख़ैर, छोड़ यार... आज तो बच गया।''
उसकी बातों में क्रोध के साथ-साथ विद्रोह था।
हर तीसरे चौथे दिन, निकिता बात-बात पर किसी न किसी से भिड़ जाती। जहाँ उसकी सुंदरता से सभी आकर्षित होते वहीं उसके गर्म मिज़ाज से कोई भी उसका दोस्त नहीं बन पाता। राधिका रूम पार्टनर और एक ही शहर की होने के साथ-साथ समझौतावादी होने के कारण उससे अंत तक जुड़ी रही। श्याम उसके कारण उससे जुड़ा हुआ था। निकिता अमित पर पूरा हक़ समझती, जिस अधिकार से वह बात करती, वह कभी मना नहीं कर पाता। अदिति अमित की वज़ह से ही इस ग्रुप में रहती, अन्यथा निकिता का व्यवहार उसे पसंद नहीं था। राधिका ने एक दिन सब को बताया था कि निकिता के पापा भी काफी गर्म मिज़ाज के हैं। दिल्ली जब उसके घर वो एक बार मिलने गई थी तब उसकी माँ ने उससे उसका ख़याल रखने के लिए कहा था। राधिका ने जब दबी ज़ुबान से उसके गुस्सा होने वाली बातें बताई तो माँ ने हंसकर टाल दिया था बस इतना भर कहा था,
''छोटी है, लाड़ली भी, क्या करे बेटा थोड़ी जिद्दी है...''
अमित को आज भी अच्छी तरह याद है... कभी-कभी निकिता अचानक बहुत खुश हो जाती और खूब बातें करती, साथ में तेज़-तेज़ बोलती तो अचानक ही कुछ दिनों के लिए चुप हो जाया करती थी। जब भी गुमसुम होती, सभी सोचते ज़रूर विक्रम के साथ कोई बात हुई होगी। राधिका अक्सर बताती थी कि निकिता को नींद कम आती है और उसे भी कई बार साथ ही जागना पड़ता है।
विक्रम अपनी मटरगस्ती और उच्छृंखलता के कारण कालेज में बदनाम होता जा रहा था। हरेक प्रौफ में उसकी सप्लीमेंटरी आती। वहीं अमित, अदिति, राधिका और श्याम अच्छा परफार्म कर रहे थे। निकिता मुश्किल से पास हो पाती। हरेक रिज़ल्ट से पहले श्याम विक्रम को ज़रूर छेड़ता।
''अबकी बार कितनी जुलाई लगनी है।''
''अरे ये जुलाई, क्या होता है...?''
निकिता ने शुरू-शुरू में पूछा था। उसके चेहरे पर उत्सुकता उभर रही थी।
''सप्लीमेंटरी को कहते हैं।''
''अच्छा!''
सुनकर वो मुस्कुराई थी। पास बैठा विक्रम हँस रहा था।
''पढ़ाई नहीं करोगे तो यही होगा। ख़ैर, विक्रम को क्या ज़रूरत है। बड़े बाप का बेटा है। डाक्टर बनने के बाद बड़ा अस्पताल बनाकर, हम से ज़्यादा कमायेगा।'' अदिति ने छेड़ने की कोशिश की थी।
''तो तुम भी कमा लेना, तुम्हें किसी ने रोका है, ...मगर जबलपुर जैसे शहर में कौन देगा? ग़रीबों से पैसे थोड़े मिलते हैं। हमारी दिल्ली ...वो तो बड़ा शहर है, वहां बड़े-बड़े लोग रहते हैं...।'' बीच में निकिता बोल पड़ी थी। उसे पसंद नहीं था कोई विक्रम को मज़ाक में भी कुछ कहे। स्थिति को सँभालते हुए विक्रम ने बीच-बचाव किया था। और बात को खत्म करने के उद्देश्य से बोलने लगा,
''मैं तो दिल्ली में भी नहीं रहूँगा। विदेश जा रहा हूँ, यहाँ क्या करना इंडिया में।''
''और मैं?'' निकिता ने विक्रम की ओर देखते हुए बड़ी आशाभरी निगाहों से कहा था।
''तुम भी चल पडऩा। अपने पापा से कहकर रखो।''
''पापा, क्यूँ?''
''अरे भाई, तुम्हारी आगे की पढ़ाई के लिए तुम्हारे पापा ही तो इंतज़ाम करेंगे। मैं उसमें क्या कर सकता हूँ।'' सीधे और सपाट भाव से क्या कहा, निकिता गुस्से में बड़बड़ाती हुई, बाहर चली गई थी। मगर आज विक्रम उसके पीछे-पीछे नहीं गया था।
''आप कहाँ जाएंगे टॉपर भाई?''
विक्रम ने अमित की ओर देखकर पूछा था। आज पहली बार ऐसा था कि उसने निकिता की ओर ध्यान ही नहीं दिया था। मगर अमित निकिता को बाहर जाता देख रहा था। और फिर बिना कुछ सोचे बस इतना ही कह पाया था,
''पता नहीं।''
अमित को अक्सर विक्रम व निकता, दोनों का व्यवहार अजीब-सा लगता था। मगर दिल सदैव कहता कि विक्रम निकिता से ठीक व्यवहार नहीं करता है। ...कहीं यह निकिता के लिए सॉफ्ट कार्नर तो नहीं? ऐसा है भी तो क्यूँ...? यह उसे खुद पता नहीं था। मगर हाँ, उसने इस बात को कभी बाहर ज़ाहिर नहीं होने दिया था। निकिता की बातें उसे कभी तंग नहीं करती थी। उसके हिसाब से उसका झगड़ना, चिल्लाना सदैव व्रिक्रम की ग़लती की वज़ह से होता। वह चाहता कि निकिता खुश रहे। और इसीलिए वह जब भी उससे पढ़ाई में कुछ मदद मांगती, वह आगे बढ़कर सहयोग करता। ...और धीरे-धीरे निकिता पढ़ाई में पूरी तरह अमित पर आश्रित हो चुकी थी।
अमित ने तीसरे प्रोफ में विक्रम को प्रथम प्रौफ की एक छात्रा के साथ घूमते हुए देखा, तो उसने श्याम से चर्चा की थी। जवाब तुरंत बिना किसी हिचकिचाहट के आया था,
''हम क्या कर सकते हैं। निकिता को कहेंगे तो मानेगी नहीं। उल्टा हमीं पर चढ़ बैठेगी।''
अमित ने राधिका से जानना चाहा तो वो चिंतित हुई थी,
''पता ही नहीं चलता, कभी तो बहुत खुश रहती है और कभी एकदम गुमसुम, पर अक्सर रात देर से आती है। वार्डन मैडम भी नाराज़ ही रहती हैं। शायद उसके घर दिल्ली कम्प्लेंट भी गई है। ...पता नहीं आगे क्या हुआ। ...लगता है शायद उसके घर वालों की भी रज़ामंदी है। ...हो सकता है दोनों शादी करने की सोच रहे हों?''
''कब कर रहे हैं?'' श्याम को उत्सुकता हुई थी।
''पता नहीं..., पर लगता है विक्रम को शायद जल्दी नहीं है। निकिता तो जल्दी में है। तभी तो रोज़ लड़ती है विक्रम से। मगर लगता है कि वो आनाकानी करता रहता है। मुझे तो कुछ गड़बड़ी लगती है, तुम लोग विक्रम से क्यूँ नहीं पूछते...।''


शाम को कॉफी हाउस में अमित और श्याम बैठे थे। विक्रम वहाँ पहुँचा तो चेहरे पर आज मुस्कुराहट थी।
''क्या बात है? आज बड़े खुश लग रहे हो। डाँट नहीं पड़ी शायद। ...अच्छा शादी के बाद कैसे करोगे।'' श्याम ने चुटकी ली थी।
''शादी! किसकी शादी?'' विक्रम कुर्सी पर बैठने वाला ही था कि एक मिनट के लिए रुका था।
''तुम्हारी और किसकी।''
''किसके साथ?''
''निकिता के साथ, और किसके साथ।''
''पागल हूँ क्या...'' विक्रम की हँसी में अब तीखापन था।
''फिर इतने दिनों से जो तुम लोगों का चक्कर है?'' अमित रोक नहीं पाया तो बीच में ही बोल पड़ा था, निकिता की भोली सूरत अचानक उसकी आँखों में उतर आई थी।
''कैसा चक्कर? अच्छे दोस्त हैं। थोड़ा बहुत पसंद करते हैं। फिर उसे मेरे साथ घूमना पसंद है, इसलिए घूमते हैं। जहाँ तक शादी की बात है, अभी तो मैंने सोचा ही नहीं। पर हाँ, निकिता गर्लफ्रेंड तक तो अच्छी है।''
और बोलते-बोलते विक्रम ने ज़ोर से आँख मारी थी। देखकर अमित को लगा कि जैसे वह चक्कर खा जायेगा। भावुक था, सोचने लगा ...ऐसा भी हो सकता है। नहीं। ...विक्रम को धोखा नहीं देना चाहिए। उधर, श्याम ने विक्रम के हाथों पर एक ज़ोरदार ताली मारी थी और फिर दोनों साथ-साथ हँस पड़े थे।
अमित के मन में उसी दिन से निकिता के प्रति अपनेपन की भावना उमड़ पड़ी थी। भावुक होने के कारण इसकी वज़ह दया ही थी। किसी अपने को दुःख पहुँचे वह बर्दाश्त नहीं कर पाता था। ...और वह उसकी ज़्यादा पूछताछ करने लगा था। उस दिन के बाद से बात-बात में पूछता और ध्यान रखने की कोशिश करता। कई बार मन में विचार आता... निकिता को दोस्त होने की हैसियत से आगाह कर देना चाहिए..., मगर दूसरों के बीच में उसे बोलने का क्या हक़? और अंत में इतना ही पूछ पाया था, ''तुम ठीक तो हो?''
निकिता अक्सर झल्लाते हुए जवाब देती, ''हाँ-हाँ ठीक हूँ।''
मगर कभी-कभी मुस्कुराकर चुप हो जाती, और कभी तो एकदम खामोश। अमित उसकी खामोशी देखकर परेशान हो जाता। और फिर चिंतित निगाहों से उसे देखता... प्रथम प्रौफ की निकिता और आज की निकिता में कितना अंतर आ गया है। तीन-चार वर्षों में मस्ती से घूमने-फिरने और भरपूर आनंद से शरीर में चर्बी इकट्ठी हो चुकी है... शायद। एक फर्क और आया था जिसे ग्रुप में दूसरों ने भी महसूस किया था। वो था कि... निकिता आजकल दिन-दिन भर विक्रम के पीछे-पीछे भागती रहती मगर विक्रम का ध्यान उसकी ओर से कम होता चला जा रहा था।

यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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