tarakash-universe-logo
बन्धन : खण्ड 3 / अध्याय 22
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
मंगलवार , , 25 मार्च
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



मेडिकल की पढ़ाई कोई ध्यान से करे तो साल के 365 दिन और चौबीस घंटे कम पड़ते हैं। जितना भी पढ़ो कम है। दुनिया में इधर-उधर देखने की फुर्सत ही नहीं मिल सकती। प्रकृति के एक मात्र जीव, सिर्फ मानव को ही पूरी तरह से समझने की कोशिश करे तो कई जीवन समाप्त हो सकते हैं। मेडिकल विज्ञान ने वर्षों की निरंतर और सतत प्रयास से अपने ज्ञान भंडार में बहुत वृद्धि की है। मगर जितना समझा गया शायद उससे अधिक समझने की ज़रूरत है। अपने आप में यह अनंत दिखाई देता है। ऐसा नहीं कि इससे मानव जीवन को फ़ायदा नहीं पहुँचा, बहुत लाभ हुआ है। मगर जितनी बीमारियों पर विजय प्राप्त की उतनी ही विकट और नयी बीमारियाँ पैदा हो गयी। फिर मानव के जीवनशैली और भावनाओं पर जीव-विज्ञान का कोई ज़ोर नहीं। जीव विज्ञान शरीर को तो देख और समझ सकता है, कुछ हद तक ठीक भी कर सकता है, चीर-फाड़ कर सकता है, मगर शरीर के अंदर की भावना, आत्मा के लिए, करने को उसके पास अभी कोई साधन नहीं। वो तो अपने हिसाब से ही धड़कता है।
एक दिन श्याम कहीं गया हुआ था। अमित उसके फ्लैट में अकेला था। वो अक्सर पढ़ाई के लिए यहाँ रुकने लगा था। आने-जाने में समय बहुत खर्च होता था फिर यहां से लाइब्रेरी जाने की सहूलियत होती। फाइनल प्रौफ में नाइट ड्‌यूटी भी लगा करती थी। घर से रोज़ आना संभव नहीं हो पाता था। अभी हार्ट की आर्टिलरी के कैरेक्टर को पढ़ना शुरू ही किया था कि घंटी बजी थी, सोचने लगा था... श्याम राधिका के साथ देर से आने का कह के, पता नहीं जल्दी क्यों आ गया? उठकर दरवाज़ा खोला तो देखते ही उसकी आँखें फटी रह गई थीं... निकिता बड़ी बुरी हालात में सामने खड़ी थी। बाल बिखरे हुए थे। कपड़े अस्तव्यस्त हो रहे थे। चेहरे के भाव बता रहे थे कि शायद कुछ अनहोनी घटी है। आँखों से आँसू लगातार निकलकर पूरे चेहरे पर बिखर रह थे। उसने अमित को एक पल के लिए देखा और फिर कमरे में घुसती चली गई थी। और फिर बदहवास हालत में अंदर आते ही कुर्सी पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगी थी। अमित बहुत देर तक कुछ समझ नहीं पाया था। उसे पकड़कर रोने से मना करने का साहस भी नहीं बटोर पा रहा था। बड़ी हिम्मत करके दूर से वह सिर्फ इतना ही पूछ पाया था,
''...क्या हुआ?''
निकिता कुछ बोलने के स्थिति में नहीं थी। उसने कुर्सी पर पीछे सिर रखने की कोशिश की तो लगा कि शायद बेहोश हो जाएगी। अमित देखकर बुरी तरह से घबरा गया था। कुछ देर और समझ न पाया तो थोड़ा ज़ोर से बोल पड़ा,
''कुछ बताओगी भी कि हुआ क्या है?''
बड़ी मासूम नज़रों से निकिता ने आँसुओं में भीगकर उसकी ओर देखा था।
''विक्रम को...''
''क्या हुआ विक्रम को?'' नाम सुनते ही अमित चिल्लाया था। किसी अनिष्ट की आशंका ने अचानक उभरकर मस्तिष्कपटल पर प्रहार किया था।
''उसे कुछ नहीं हुआ... तुम्हारा दोस्त है न?''
सिसकियों के बीच उसकी आवाज़ धीरे थी। मगर एकटक वह अमित को ही देख रही थी। आँसू चेहरे को भिगोकर तंग करने लगते तो वह यंत्र के समान अपने ही हाथों से उसे रगड़कर पोंछ देती। कुछ देर तक भी अमित द्वारा कोई जवाब न देने पर निकिता ने उठकर उसे ज़ोर से पकड़कर फिर पूछा था, ''...वह तुम्हारा दोस्त है न?''
आवाक स्थिति में खड़ा अमित सिर को हिलाते हुए सिर्फ इतना ही कह पाया था,
''हाँ, हाँ।''
''...तो उसे समझाते क्यूँ नहीं।'' निकिता ने झकझोर कर धक्का देते हुए उसकी कमीज़ की कॉलर को मरोड़ दिया था और फिर झुकते हुए ज़ोर से रोते-रोते मुँह को अपने ही हाथों से छुपाने की कोशिश की थी।
''क्या समझाना है। वो ऐसा ही है, तुम्हारे लायक नहीं है, छोड़ दो उसे।''
अमित, पता नहीं कैसे, जो बात इतने दिनों से नहीं कह पाया था, आज एक ही झटके में कह गया। कहना तो और भी बहुत कुछ चाहता था, परंतु सुनते ही बीच में निकिता ने रोना बंद करते हुए आवेश में आकर कहा था,
''क्यों! इतने सालों से मेरे साथ है, ऐसे कैसे छोड़ दूँ...। और अब तो बिल्कुल भी नहीं। ...तुम समझते क्यूँ नहीं।'' आँसुओं का स्थान क्रोध से निकलती अंगारों ने ले लिया था।
''क्या समझूँ?''
अमित के शब्दों में झुँझलाहट उतर रही थी, रोज़ वही बातें सुन-सुन कर परेशान हो उठा था। वह इसमें क्या कर सकता है। विक्रम को वह जानता था, मगर निकिता को कैसे समझाये।
''मैं इस हालात में पहुँच चुकी हूँ कि अब उसे नहीं छोड़ सकती।''
''मत छोड़ो, किसने कहा छोड़ने के लिए? ...इस में परेशानी क्या है? ...पर अभी क्या हुआ है?'' ...अमित ने अपनी कमीज़ को व्यवस्थित किया और एक लंबी साँस खींचते हुए बगल की कुर्सी में बैठने के लिए आगे बढ़ा था।
''धक्का देकर आज उसने घर से निकाल दिया। कहता है एबार्शन करा लूँ।''
''...क्या?''
सुनते ही अमित के पाँव ज़मीन से चिपक गए थे। एक झटके में चेहरे ने घूमकर निकिता की ओर देखा था। कान सुन्न हो चुके थे। वो अब और कुछ सुनने की स्थिति में नहीं रह गया था। कैसे जाकर कुर्सी पर बैठ पाया उसे होश न था। हाँ, हाथों में कुर्सियों की पकड़ पहली बार महसूस की थी। मुट्ठी भींच रही थी, कुर्सी की लकड़ी मुलायम होती तो शायद दम तोड़ देती। चेहरे पर आश्चर्य के भाव तो सिर की नसों में गुस्सा पहली बार धीरे-धीरे उफान ले रहा था। ...ऐसे कैसे हो सकता है? वह यकीन ही नहीं कर पा रहा था। कोई और होता तो कह सकता था... 'तुम्हारा कसूर है। मैं क्या करूँ? तुम्हें देखना चाहिए।' हो सकता है दोनों का कसूर बताता। ...परंतु इस वक्त अमित को विक्रम पर गुस्सा आ रहा था। क्यूँ और कैसे? इन बातों से वह अनजान था। कहीं इतने सालों से साथ-साथ कालेज में पढ़ने भर से सभी के साथ एक अपरिभाषित बंधन तो नहीं...? हो सकता है। ...मगर इस बात के जवाब के लिए उसके पास वक्त न था। इस घड़ी तो एक ही सवाल बार-बार उभरता... विक्रम यह कैसे कर सकता है?
निकिता की हालत खराब होती जा रही थी। ऐसा लगा कि वह कुर्सी पर बैठे-बैठे गिर जाएगी। अब उसने बोलना छोड़ दिया था, नज़रें नीची मगर होंठों ने सहारे की उम्मीद माँगी थी। अमित खुद सकते में आ चुका था। भावनाएं अति तीव्र हों तो उनका अपना प्रवाह होता है और अपनी दिशा, मस्तिष्क काम नहीं करता। नारी की पीड़ा देखकर, कमज़ोर और भावुक पुरुष में भी पुरुषत्व जाग उठता है और फिर वह नारी की सहायता के लिए आगे बढ़ जाता है। अगर नारी पहले से जान-पहचान की हो तो भावनाएं तीव्र होती हैं।
''अभी कहाँ है विक्रम...?''
कोई जवाब नहीं था उधर से।
''तुम इधर ही रुको मैं अभी उससे बात करके आता हूँ।''
अमित की आवाज़ के साथ शरीर में भी क्रोध ने प्रवेश किया था। चप्पल पहनने और घर का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकलने में उसे मिनट भी नहीं लगा था और वह बिना कुछ समझे ही विक्रम के घर की ओर चल पड़ा था।
अमित को निकले अभी कुछ देर ही हुआ था कि राधिका के साथ श्याम घर पहुँचा तो निकिता को ऐसी हालत में अकेला पाकर एकदम से घबरा गया।
''निकिता!! ...क्या हुआ? ...अमित कहाँ है।''
बहुत पूछने पर अचानक ज़ोर-ज़ोर से रोते हुए निकिता ने बस इतना ही कहा था,
''विक्रम के घर गया है और...।''
निकिता ने अंतिम नज़र राधिका के चेहरे पर डाली और फिर बेहोशी की हालत में बिस्तर पर लुढ़क चुकी थी। लगा कि मानो वह राधिका का ही इंतज़ार कर रही थी। देखकर श्याम और राधिका के पसीने छूट गए थे। कुछ समझ न आया तो राधिका ने तुरंत निकिता की नब्ज़ देखी... वो बहुत तेज़ थी। श्याम गिलास में पानी भर लाया और उसके मुँह पर छींटे मारे मगर कोई असर न था। हाँ, चेहरे पर पीड़ा की वेदना साफ़ झलक रही थी। राधिका ने तुरंत निकिता के पैरों से चप्पल निकाली और फिर उसे बिस्तर पर ठीक से व्यवस्थित रूप से लेटाने लगी थी। दोनों कुछ समझ नहीं पा रहे थे। श्याम ने एक लंबी साँस ली और एक पल के लिए आँखें बंद की थी। कुछ और न सूझा तो राधिक को निकिता के पास छोड़ा और तेज़ी से स्कूटर स्टार्ट करके विक्रम के घर की ओर चल पड़ा था। सूरज उतर क्या गया, अंधेरा हो चुका था। रास्ते के राहगीर पहचाने नहीं जा रहे थे और वह रास्तेभर हर पैदल जाने वाले को, रुक-रुक कर देखता जा रहा था। मस्तिष्क क्रियाशील था। सोचने लगा... वैसे तो विक्रम पास में ही रहता है, अमित ज़रूर पैदल ही गया होगा। ...पर हुआ क्या है? ...कुछ समझ नहीं आ रहा ...कहीं विक्रम का एक्सीडेंट तो नहीं हुआ? ...बड़ी तेज़ी से मोटरसाइकिल चलाता है। फिर जबलपुर का ट्रैफिक भी तो बहुत खराब है। ...परंतु अगर एक्सीडेंट होता तो फिर निकिता घर पर कैसे होती। फिर निकिता को तो उसके साथ उसके पास ही होना चाहिए था। ...कहीं विक्रम को दूसरी लडक़ी के साथ तो नहीं देख लिया निकिता ने? ...अगर ऐसा होता तो अमित क्यूँ जाता? वैसे भी अमित पढ़ाई छोड़कर बीच में कहीं भी नहीं जाता था। निकिता के लिए उसके दिल में अच्छे भाव ज़रूर हैं मगर उसके लिए विक्रम के घर जाने की क्या आवश्यकता आ पड़ी? ...सोचते-सोचते श्याम नेमा को लगा कि उसका सिर फट जायेगा। रास्ते चलते हर आदमी को स्कूटर की लाइट में पीछे से पहचानना बड़ा मुश्किल हो रहा था। ऊपर से दिमाग़ में अजीब-अजीब विचार आ रहे थे।
उधर, अमित गुस्से में था। बड़ी तेज़ गति से विक्रम के घर की ओर बढ़ रहा था। उसे यह भी नहीं पता था कि वह क्या करने जा रहा है और क्या कर सकता है। उसे अपनी सारी अवस्थाओं का एहसास था... शारीरिक, मानसिक और आर्थिक। परंतु क्रोध तो कोई भी कर सकता है। हाँ, उसका अंजाम क्या होगा क्रोधी कभी नहीं जानता। और इस वक्त उसकी तीव्र भावना क्रोध में बदल रही थी।
उसने पहुँचकर घर की कॉल बेल बजाई तो विक्रम ने दरवाज़ा खोलकर बड़ी सरलता से कहा था,
''अरे बड्‌डे तुम, इतनी देर शाम को, और कैसे...''
''ये सब क्या है?'' अमित की आवाज़ में क्रोध था।
''क्या सब?'' विक्रम सहज था।
''निकिता के साथ।'' क्रोध में ज़्यादा बोलना संभव कहाँ होता है और अमित का गुस्सा सिर से उतरकर ज़ुबान पर चढ़ रहा था।
''क्यूँ क्या हुआ निकिता को?'' विक्रम अब भी साधारण रूप से बात कर रहा था।
अबकी बार अमित ने विक्रम के चौड़े कंधों पर हाथ रखकर उसे ज़ोर से झकझोरा था,
''तुम क्या ठीक कर रहे हो यह सब?''
एक मिनट के लिए तो विक्रम चौंका फिर उसने बड़े प्यार से अमित के हाथों को झटका था,
''तू कौन होता है बीच में बोलने वाला। यह हमारा आपसी मामला है।''
''मैं भी यही चाहता हूँ कि तेरा आपसी मामला ही रहे। ऐसी हालत में उसे प्यार की ज़रूरत है। चल जल्दी से शादी कर ले।'' भावनाएं वास्तविकता के धरातल से दूर होती हैं। बड़े ही साधारण और भावुकता से अमित झटका खाने के बाद भी उससे विनयपूर्वक कह रहा था।
''देख अमित, ज़्यादा आगे बढ़ने की ज़रूरत नहीं। उस पागल से मैं शादी करूँ...? सवाल ही नहीं। हाँ, जो खर्चा आयेगा मैं उसे देने को तैयार हूँ। मैंने उसे भी कहा था, पर बड़ी चतुर है, फँसाना चाहती है। मैंने कभी भी शादी के लिए नहीं कहा था। माना हम दोनों ने मिलकर मस्ती की है, पर उसके लिए वह खुद भी तैयार हुई थी। ऊपर से इतने सालों से मस्ती कर रही थी, अभी अचानक ये सब कैसे?''
विक्रम शारीरिक रूप से मज़बूत था। क्रोध उस पर अभी तक हावी नहीं हुआ था। ज़ोर से चबा-चबा कर कह रहा था। श्याम पीछे से पहुँच चुका था। पूरी बात सुने और समझे बिना दोनों को यूँ लड़ते हुए देखकर बीच-बचाव करता हुआ कहने लगा,
''क्या हुआ अमित? ...विक्रम क्या बात है? निकिता मेरे घर पर बेहोशी की हालत में है। क्या चक्कर है?''
''तो मैं क्या करूँ? उस बीमार पागल को अपने गले में लटकाकर, खुद मर जाऊँ। तुम जाकर उसको संभाल लो। मैं उसको बहुत अच्छी तरह से समझ चुका हूँ। जो वह चाहती है वह बिल्कुल संभव नहीं। यहाँ बहुत बदतमीजी करके गई है अगली बार आयी तो सारों को इकट्ठा कर लूँगा। जबरदस्ती नहीं चलेगी। पुलिस और कोर्ट से मुझे डर नहीं लगता।''
''तुम उसको ऐसी हालत में पागल नहीं कहोगे।'' अमित ने चीखते हुए कहा था। शायद पहली बार। मगर कोई असर नहीं था विक्रम पर। उस पर तो खून सवार हो चुका था, शायद निकिता का प्यार, देह का आकर्षण उसके दिमाग़ से अब पूरी तरह से उतर चुका था। उसने अमित को कंधे से पकडक़र घर के बाहर धकेलते हुए कहा था,
''यहाँ चिल्लाने की ज़रूरत नहीं। दोस्ती का लिहाज़ कर रहा हूँ। नहीं तो साले, हाथ-पैर तोड़ देता। ज़्यादा मुहब्बत आ रही है तो तू कर ले। तेरे को भी ऐश करायेगी। फिर जब नोचेगी, पागल होकर, तो समझ में आयेगा।''
श्याम ने बीच-बचाव करके अमित को बाहर निकाला और विक्रम का गुस्सा देखकर, उसे कुछ न कहना ही ठीक समझा। वह अब भी पूरी बात नहीं समझ पा रहा था। अमित हारा हुआ-सा विक्रम के घर से बाहर निकला था। उसका क्रोध उतरकर पानी हो चुका था। विक्रम उस पर हावी हो चुका था। श्याम के पूछने पर भी वह कुछ नहीं बता पा रहा था। शायद उसे बताने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। रास्ते में श्याम खुद कहता रहा,
''सब ठीक हो जायेगा। विक्रम का गुस्सा उतरने दो। फिर निकिता को भी थोड़ा सामान्य जीवन जीना चाहिए। हर वक्त डंडे लेकर नहीं खड़े रहते।''
परंतु अमित ने कोई जवाब नहीं दिया था। घर पहुँचने पर उसने देखा राधिका बेसब्री से उनका इंतज़ार कर रही थी। देखते ही धीरे से बोल पड़ी,
''कहाँ हो तुम लोग? इतनी देर से तुम लोगों का इंतज़ार कर रही हूँ। ब्लीडिंग हो रही है। शायद एबार्शन...। निकिता बहुत स्ट्रैस में है। जल्दी हॉस्पिटल ले चलना होगा।''
''क्या प्रिगनेंसी के बचने की कोई उम्मीद है?'' अमित ने पूछा था।
''नहीं बिल्कुल नहीं।''
''पक्का?''
''बिल्कुल पक्का, बहुत ज़्यादा ब्लड निकल चुका है।''
''फिर हॉस्पिटल ले जाना ठीक नहीं होगा।''
अमित ने अधिकार से कहा था। उसकी आँखों में निकिता के प्रति संवेदना टपक रही थीं। चेहरे पर क्रोध का स्थान हार और आत्मग्लानि ने ले लिया था। हाँ, बातों में भावनाओं का अपनापन छुपा था।
''विक्रम कहाँ है...?'' राधिका कौतूहलवश पूछ रही थी।
''तुम रुको यहीं पर, हम लोग सारा ज़रूरी सामान यहीं ले आते हैं। क्यूँ श्याम?'' अमित ने राधिका की बात का जवाब देना ठीक नहीं समझा था।
''हाँ, ठीक कह रहे हो।''
श्याम एक मिनट में सारी बात समझकर, ठगा-सा रह गया था।

यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
टिप्पणियाँ (0)add
टिप्पणी लिखें
quote
bold
italicize
underline
strike
url
image
quote
quote
smile
wink
laugh
grin
angry
sad
shocked
cool
tongue
kiss
cry
smaller | bigger

busy
 





Subscribe Newsletter

हमारे बारे में : About Us

Tarakash Universe Ideas

Copyright 2007-08 Tarakash.com, All Rights Reserved | Tarakash Universe is powered by: Chhavi Media Services