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बन्धन : खण्ड 3 / अध्याय 24 |
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उपन्यास
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गुरुवार , , 27 मार्च |
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मनोज सिंह
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उस दिन बड़े बेमन से श्याम और अमित कालेज गए थे। राधिका, निकिता की देखभाल के लिए उसी के पास ही रह गई थी। श्याम ने वार्डन और प्रोफेसरों से कोई बहाना बनाया था। दोनों की छुट्टी की अर्जी लगवा दी गई थी। तीसरे और अंतिम प्रौफ में क्लीनिकल ज़्यादा होते हैं। नॉन-क्लीनिकल और लेक्चर क्लास कम होती। सर्जरी हो या गायनी, क्लीनिकल के लिए वार्ड, अस्पताल और ऑपरेशन रूम में जाना पड़ता। प्रसूति गृह अर्थात गायनी की लैब। उस दिन सुबह-सुबह ही गायनी के क्लीनिकल के लिए प्रसूति गृह में क्लास थी। पहले मरीज़ की केस स्टडी डाक्टर ने समझाना शुरू किया ही था कि अमित को बार-बार निकिता का एबार्शन याद आने लगा। हाथ में लगता कि किसी का खून चिपका रह गया हो। कई बार हथेलियों की ओर निगाह चली जाती। अगले ही पल घबराहट हुई थी। दिल का दर्द हद से बढ़कर बेचैन करने लगा था। उसने मन लगाने की बहुत कोशिश की पर जब नहीं लगा तो वार्ड से बाहर आ गया था। हर औरत में निकिता का चेहरा दिखाई देता और हर बच्चे में निकिता का बच्चा। बर्दाश्त न हो सका तो अपने घर की ओर चल पड़ा था और फिर तुरंत बिस्तर पर लेटकर सोने की कोशिश करने लगा। माँ और सुप्रिया ने देखा तो समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हुआ? आज पहली बार अमित कालेज से आने के बाद बिना कुछ बात किए, चुपचाप लेट चुका था। अन्यथा रोज़ तो वह जब तक सारी बात सुप्रिया और माँ से नहीं कर लेता उसका मन नहीं भरता था। ...अगर ज़्यादा पढ़ाई भी होती तो भी आते के साथ चाय पीकर सुप्रिया के पास ही बैठकर पढ़ाई शुरू कर देता था और साथ ही कह भी देता, आज कोई बात नहीं करना। फिर कोई भी कुछ नहीं कहता। मगर आज पहली बार मालती ने देखा, बेटे के चेहरे पर थकावट के साथ-साथ उदासी भी थी। ...सोचने लगी कि कहीं तबीयत तो खराब नहीं ...सिर पर हाथ रखकर देखा तो बुखार नहीं था। कोई प्रतिक्रिया न मिलती देख अंत में हारकर माँ ने चिंता में पूछ ही लिया था,
''क्या बात है बेटा? ...तबीयत ठीक तो है?''
''हाँ, ठीक है। बस यूँ ही आराम करना है।''
और फिर बोलते ही मुँह दूसरी तरफ़ करके सोने की कोशिश करने लगा। मालती के चेहरे पर चिंता की लकीरें फैलने लगी थीं तो सुप्रिया ने लेटे-लेटे ही हैरान नज़रों से अपने भाई की ओर देखा था।
उधर, दो-तीन दिन राधिका ने श्याम के साथ रहते हुए निकिता की देखभाल की थी। उसे श्याम के साथ रहने में अब वैसे भी कोई परेशानी नहीं थी। दोनों इंगेज हो चुके थे और सगाई की तारीख़ पक्की हो चुकी थी। परंतु नये-नये साथ रहने पर भी उनमें कोई उतावलापन, जल्दबाजी या उच्छृंखलता नहीं थी। समाज की मर्यादा का ध्यान था। अपना नया-नया साथ भूलकर दोनों ने मिलकर निकिता की खूब सेवा की थी। बीच में श्याम ने जब राधिका से कहा था कि निकिता को कुछ दिनों के लिए अपने घर चले जाना चाहिए। तब राधिका ने निकिता से इस संदर्भ में बात की थी मगर उसने कोई जवाब दिये बिना, सिर्फ अमित के लिए पूछताछ की थी। राधिका और श्याम समझदार दोस्त थे, सोचने लगे... किसके साथ जाएगी? ...फिर इस हालत में अकेले भेजना भी ठीक नहीं। ...राधिका दिल्ली घर जाने की स्थिति में नहीं थी, न ही श्याम उसे छोड़कर जा सकता था। सगाई की तैयारियाँ भी करनी थी। अंत में राधिका ने ही सुझाव दिया था,
''अमित से पूछ लो, वह शायद चला जाये। ...पर दो दिन से आया क्यूँ नहीं?''
श्याम उसी दिन शाम को अमित के घर गया था। अमित उस हादसे से अब तक बाहर नहीं आ पाया था। मिलते ही पूछने लगा,
''कैसी है?''
''गुमसुम है, कुछ भी नहीं कहती। तुम्हें याद कर रही थी। ...उसे मैंने दिल्ली, घर जाने के लिए कहा था। मगर वो तो कोई बात ही नहीं करती। लेकिन ऐसी हालत में उसे जाना चाहिए, चेंज हो जाएगा, शायद अकेले के चक्कर में न जा रही हो। अब राधिका और मैं तो जा नहीं सकते, अगर तुम साथ चले जाओ तो शायद चली जाए।''
''हो सकता है माँ-बाप का सामना नहीं करना चाहती होगी। थोड़ा रुककर भेजेंगे। वैसे कल मैं आऊँगा।''
दूसरे दिन सुबह-सुबह अमित श्याम के घर पहुँचा, तो घुसते ही राधिका पूछने लगी थी,
''कहाँ हो! निकिता कितनी बार तुम्हारे बारे में पूछ चुकी है।''
''कहाँ है?''
''पीछे बालकनी में बैठी है। कुछ बात ही नहीं करती। उसे ले चलो, थोड़ा कालेज तक हो आते हैं। चेंज हो जाएगा।'' राधिका परेशान थी।
निकिता पीछे बालकनी में कुर्सी पर दूर आसमान को निहार रही थी। सदैव तेज़-तेज़ बोलने वाली के पास कहने के लिए आज कुछ नहीं था। चंचल चेहरे पर उदासी छायी हुई थी। अस्त-व्यस्त बालों से लग रहा था कि बिस्तर पर सोने की कोशिश में कई बार करवटें बदली गई पर शायद नींद नहीं आई थी।
''कैसी हो?''
सामने बालकनी की रेलिंग पर टिककर खड़े-खड़े अमित ने मुस्कुराने की भरपूर कोशिश की थी। बहुत देर तक कोई जवाब नहीं मिलने पर, अमित और आगे कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं कर पाया था। हाँ, थोड़ी-थोड़ी देर में नज़रें उसके चेहरे पर ज़रूर पड़ जाती थीं।
''चलो कालेज चलते हैं, नहा लो, फ्रेश हो जाओगी।''
अमित की आवाज़ में अपनापन था।
शून्य में ताक रही आँखों ने उसकी ओर अचानक रुख़ किया, अमित ने नज़रें मिलायी तो देखा उन आँखों में शिकायत थी। राधिका ने आकर चुप्पी तोड़ी और फिर उसके मनाने पर निकिता नहा धोकर तीनों के साथ ऑटो में बैठकर कालेज आ गई थी। थोड़ी देर कॉफी हाउस में बैठी रही। राधिका और श्याम कॉफी पी कर जा चुके थे। अमित भी क्लास में जाना चाहता था कि देखता है, दूर से विक्रम मस्ती में चला आ रहा था। उसे देखते ही निकिता के दोनों हाथ, मुट्ठी बनकर काँपने लगे थे और आँखों में गुस्सा उतर रहा था। विक्रम ने उसकी ओर देखे बिना अमित की ओर देखकर मुस्कुराने की कोशिश की थी परंतु कोई रिसपांस न मिलने पर दूसरे टेबल पर जाकर बैठ गया था। निकिता ने अचानक अमित का हाथ कसकर पकड़ा और लगभग खींचते हुए उसे बाहर ले आई थी।
''ऐसे भागने से काम नहीं चलेगा। सामना करो, अगर उसे कोई एहसास नहीं तो फिर तुम क्यों करती हो।''
अमित बहुत कुछ कह गया था। निकिता बिना कुछ कहे हॉस्टल की ओर बढ़ गई थी। हॉस्टल के गेट पर पहुँचकर अमित ने धीरे से कहा था,
''कुछ दिन के लिए घर चले जाओ।''
बिना कुछ सुने निकिता ने आँखों में आँखें डालकर मायूसी से सिर्फ इतना कहा था,
''थैंक यू।''
और मुड़कर तेज़ी से अंदर चली गई थी।
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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